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अब घर बैठे कीजिये बर्फानी बाबा के दर्शन

Posted On 4 Feb, 2018 में

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महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन का कथन है- “विज्ञान और आध्यात्म एक दूसरे के विलोम नहीं बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं.” लेकिन आध्यात्म जब अन्धविश्वास का रूप लेकर विज्ञान को ओवरटेक करने लगता है तब बात कुछ बिगड़ जाती है. आध्यात्म प्रकृति के चिंतन का ही एक रूप है और प्रकृति के रहस्य इतने गूढ़ हैं कि इन्सान अभी एक प्रतिशत भी जान नहीं पाया है. इन्हीं अनजाने रहस्यों को जब लोग वैज्ञानिक तर्कों से समझ नहीं पाते हैं तो अन्धविश्वास पैदा होता है जिसे चमत्कार का नाम दिया जाता है.

प्रकृति के इन्ही रहस्यों से निर्मित एक बेहद वैज्ञानिक और प्राकृतिक घटना को, आज के युग में भी लोग चमत्कार का नाम देकर पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ पूजने जाते हैं और उसके पीछे का वैज्ञानिक सत्य जानते हुए भी आँखें बंद कर के उसको झुठलाने की कोशिश न जाने क्यूँ करते हैं. जी हाँ, हम कश्मीर राज्य के श्रीनगर शहर के उत्तर-पूर्व में 135 किलोमीटर दूर समुद्रतल से 13600 फुट की ऊँचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा में बर्फ से बनने वाले प्राकृतिक शिवलिंग की बात कर रहे हैं. गुफा की परिधि लगभग डेढ़ सौ फुट है और इसमें ऊपर से बर्फ के पानी की बूँदें जगह-जगह टपकती रहती हैं. यहीं पर एक ऐसी जगह है, जिसमें टपकने वाली हिम बूँदों से लगभग दस फुट लंबा एक आकार बन जाता है जिसे शिवलिंग मान कर लोग अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं. यहाँ तक जाने का रास्ता बहुत ही दुर्गम है और सुरक्षा की दृष्टि से भी ठीक नही है. लेकिन धर्म के नाम पर कुछ भी न सोचने वाले लोग अपने जोखिम पर यात्रा करते है क्योंकि रास्ते में किसी अनहोनी के लिए भारत सरकार जिम्मेदारी नहीं लेती है .

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प्राचीन काल की बात जाने दीजिये, तब लोगों के पास रेफ्रिजरेटर नहीं था और उन्हें नहीं पता था कि “शिवलिंग” उन में भी बन सकते हैं. इसीलिए जब उन्होंने पहाड़ों में इस तरह के एक विशिष्ट प्राकृतिक गठन को देखा तो इसे कुछ अलौकिक समझा. लेकिन अभी भी, शिक्षित लोग भी अमरनाथ को तीर्थ मान कर यात्रा करते हैं, जबकि उन्हें अच्छी तरह पता होता है कि जिसे शिवलिंग का नाम देकर वो पूजा कर रहे हैं वो मात्र गुफा की छत से टपकने वाले चूना मिश्रित पानी के, अत्यधिक ठंड में जम जाने के कारण बना हुआ स्तंभ है.

सामान्य परिस्थिति में शुद्ध पानी का फ्रीजिंग पॉइंट 0 डिग्री सेंटीग्रेड होता है जो अशुद्धि मिलने के कारण कम हो जाता है. गुफा से टपकने वाला पानी शुद्ध नहीं होता बल्कि उसमे कैल्सियम कार्बोनेट और सोडियम के कुछ लवण अशुद्धि के रूप में मिले होते हैं और गुफा का तापमान 0 से कई डिग्री कम रहता है. ऐसे में अशुद्ध पानी छत से गिरते गिरते 0 डिग्री से पहले ही जमने लगता है और नीचे पहुँचने तक पूरी तरह से जम चुका होता है. लगातार एक ही स्थान पर पानी की बूंदें टपकने से और जमते रहने से धीरे धीरे वहां एक बड़ा सा बर्फ का पिंड तैयार हो जाता है जिसे श्रद्धालु “बर्फानी बाबा” या “पवित्र शिवलिंग” जैसे नाम देकर पूजना शुरू कर देते हैं. जबकि इनमें से हर किसी श्रद्धालु के घरों के फ्रीजर में भी पानी की बूंदों के टपकने और जम जाने से बने हुए बिलकुल ऐसे ही शिवलिंग पाए जाते हैं. हमारे ही देश में ही नहीं बल्कि स्लोवाकिया और ऑस्ट्रिया की बर्फीली गुफाओं में भी इसी तरह के बर्फ से बने प्राकृतिक आकार पाए जाते हैं.

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आपको याद होगा कुछे साल पहले, अत्यधिक गर्मी पड़ने के कारण, अमरनाथ की गुफा में भी पिंड बहुत ही छोटे आकार का तैयार हुआ था और तीर्थ यात्रियों का जत्था पहुँचने से पहले ही गर्मी के कारण पिघलने लगा था. ऐसे में गुफा के संचालनकर्ताओं ने दिल्ली से गुप्त रूप से नकली बर्फ मंगा कर नकली शिवलिंग तैयार किया था, जिसका बाद में पर्दाफाश हो गया था. इस घटना की आज तक कोई भी श्रद्धालु उपयुक्त कारण -सहित विवेचना नहीं कर सका है.

यहाँ पर मेरा इरादा आध्यात्मिकता को विज्ञान से जोड़ कर नास्तिकता का वर्चस्व स्थापित करने का बिल्कुल नहीं है. बल्कि मैं प्रकृति के हर एक तत्व में ईश्वरत्व, पवित्रता और आनंद की खोज के पक्ष में हूँ . प्रकृति ने ही सब को बनाया है और इसका अस्तित्व सब के लिए सामान रूप से महत्वपूर्ण है. इसकी कृपा को मेरा , तेरा कह कर बाँटने वालों और इसके नाम पर नफ़रत फ़ैलाने वाले हर किसी का घोर विरोध करना ही मनुष्य का परम दायित्व है. यही श्रद्धा है, यही आस्था है और यही असली पूजा है.

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

डॉ शोभा भारद्वाज के द्वारा
February 9, 2018

प्रिय सरिता जी आस्था का कोई तोड़ नहीं है आप सोच भी नहीं सकतीं जो बर्फानी बाबा के दर्शन करके आते हैं वह कितने उत्साहित होते हैं मानिये तो शंकर नहीं कंकड़ से समान है मैं मथुरा ब्याही हूँ परिवार बांके बिहारी जी के मंदिर से जुड़ा है श्रद्धा भी अपार है में जेएनयू कल्चर की थी अब तो मैं पूरी तरह बांके बिहारी के विग्रह के आगे ंत मस्तक हूँ दंडवत करती हूँ मेरे जेठ सन्यासी थे आज वह नहीं है कई देशों का में शायद लगभग ५६ देशों में गए मैने उनसे पूछा क्या पूजा या आस्था से कुछ मिलता है उनका उत्तर था कुछ नहीं फिर हम पूजा क्यों करें उनका उत्तर था समय कटता है कष्ट का बोध कम होता है | साइंटिस्ट सबसे बड़े आस्तिक होते हैं क्योकि वह आश्चर्यों से अधिक दो चार होते हैं

    sinsera के द्वारा
    February 9, 2018

    आदरणीय शोभा जी, नमस्कार, जी, मैं बिलकुल सोच सकती हूँ.मेरे घर के कितने लोग जाते हैं और आ कर नयनों से अश्रु बहा बहा कर जो वहां का वर्णन करते हैं उसे सुन कर सच में रोमांच हो आता है. लेकिन फिर भी आस्था आस्था है और साइंस साइंस है. असली बात यही है जो आपके जेठ जी ने कही कि पूजा से मन की शांति और विश्व की शांति ही अपेक्षित है. अमरनाथ के यात्रियों का गन पॉइंट पर होना दिल से अखरता है. दुःख है कि अभी तक सरकार इस दिशा में कुछ कर नहीं पाई है.

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
February 8, 2018

कुछ बातें तो है जो श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है (१) गुफा में आज भी कुछ श्रद्धालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई दे जाता है, जिन्हें श्रद्धालु अमर पक्षी बताते हैं। (२) आश्चर्य की बात यही है कि यह शिवलिंग ठोस बर्फ का बना होता है, जबकि गुफा में आमतौर पर कच्ची बर्फ ही होती है जो हाथ में लेते ही भुरभुरा जाए।(३) आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में ही होते है पवित्र हिमलिंग दर्शन / जब दुनियां के सबसे शिक्षित और वैज्ञानिक सोच रखने वाले लोग सबसे बड़े अन्धविश्वास (Canonisation & beatification ) पर विश्वास का मुहर लगाते है तो भारतीयों से क्या अपेक्षा की जाय /

    sinsera के द्वारा
    February 8, 2018

    प्रिय राजेश जी, नमस्कार,युवाओं से देश को बड़ी उम्मीदें हैं. कम से कम इतनी उम्मीद तो है ही कि हर बात को वैज्ञानिक तर्क की कसौटी पर कस कर देखें. आप खुद सोचिये, कबूतर या कोई भी जीवधारी क्या प्रजनन नहीं करते? कहते हैं और बताते हैं पर क्या जाना , अपनी आँखें और दिमाग सबसे बड़ा साथी होते हैं . छत से टपकते हुए पानी में तमाम अशुद्धियाँ शामिल रहती हैं क्यूंकि वह पत्थरों से होकर आता है. अशुद्धियों के कारण उसका फ्रीजिंग पॉइंट कम हो जाता है और वह ठोस रूप में जमा रहता है बाकि जगह की बर्फ वातावरण में उपस्थित पानी की वाष्प के जम जाने के कारण बनती है जो कि पानी का शुद्धतम रूप है, इसीलिए भुरभुरी रहती है. आषाढ़ पूर्णिमा से लेकर पूरे सावन तक वातावरण का जो तापमान होता है वो ही इस आकार को जमाये रखने के लिए उपयुक्त होता है . पहले और बाद में नहीं. और जब कपाट ही नहीं खुले होते तो किसी को क्या पता कि अंदर क्या है. यदि यह ईश्वरीय बात होती तो दिल्ली से बर्फ लाकर शिवलिंग न बनाया जाता . खैर, मुझे किसी की आस्था पर कोई प्रश्न नहीं उठाना है साथ ही मैं Canonisation & beatification की घोर विरोधी हूँ. सदियों से खलील जिब्रान और न जाने कितने प्रोटेस्टेंट्स ने अपनी पूरी ज़िंदगी विरोध में नष्ट कर डाली लेकिन इन कैथोलिक्स का वर्चस्व नहीं तोड़ पाए. ये सब राजनैतिक चोंचले हैं. शक्ति का सुख उठाने के लिए सीधे भगवान ही बन जाओ. शर्म नहीं आती इन canonized लोगों को. अगर इनके पास इतनी ही शक्तियां हैं तो विश्व में फैला हुआ अनाचार और अधर्म नष्ट करके दिखाएँ. वरना अभी मैं और आप ही तिलक लगा कर भगवान बन कर बैठ जाएँ तो न जाने कितना चढ़ावा आने लगे. भावावेश में कुछ ज़्यादा कह दिया हो तो क्षमा करें.

sadguruji के द्वारा
February 6, 2018

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! पठनीय और विचारणीय लेख ! मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिये ! मुझे लगता है कि बहुत से लोग आस्था से भी ज्यादा पिकनिक मनाने की गरज से जाते हैं ! हिन्दुओं में जिसे तीर्थ करना कहते हैं, वो मेरे विचार से वस्तुतः मन में प्रकृति के सदैव क्रियाशील तीन गुणों सत, रज और तम (रोजमर्रा की करनी) आदि से कुछ देर के लिए मुक्ति पाना है ! तीर्थों में भी दुकानदारी चलती है, अधिकतर समझदार लोग जानते है ! रोजमर्रा की ऊबन मिटाने के लिए या कहिए मन बहलाने हेतु भी बहुत से लोग घूम आते हैं ! सार्थक और मौलिक चिंतन हेतु पुनः बधाई ! सादर आभार !

    sinsera के द्वारा
    February 8, 2018

    आदरणीय सद्गुरुजी,प्रणाम, लेख को समय देने के लिए आपका धन्यवाद.आपका कहना सही है , तीर्थयात्रा की परम्परा सत, रज और तम के दोषों से मुक्ति पाने के लिए ही शुरू हुई होगी. और धीरे धीरे इसमें दुकानदारी और राजनीति ने अपनी जगह बना ली.अगर रोजमर्रा की ऊबन मिटाने के लिए या मन बहलाने की बात है तो लोग अपनी पिकनिक के लिए सरकार की और अपनी जान आफत में डालते ही हैं साथ ही आतंकवादियों और भारत के दुश्मनों को चारा भी उपलब्ध करा देते हैं.

jlsingh के द्वारा
February 6, 2018

यहाँ पर मेरा इरादा आध्यात्मिकता को विज्ञान से जोड़ कर नास्तिकता का वर्चस्व स्थापित करने का बिल्कुल नहीं है. बल्कि मैं प्रकृति के हर एक तत्व में ईश्वरत्व, पवित्रता और आनंद की खोज के पक्ष में हूँ . प्रकृति ने ही सब को बनाया है और इसका अस्तित्व सब के लिए सामान रूप से महत्वपूर्ण है. इसकी कृपा को मेरा , तेरा कह कर बाँटने वालों और इसके नाम पर नफ़रत फ़ैलाने वाले हर किसी का घोर विरोध करना ही मनुष्य का परम दायित्व है. यही श्रद्धा है, यही आस्था है और यही असली पूजा है. यही श्रेष्ठ है … सादर!

    sinsera के द्वारा
    February 8, 2018

    आदरणीय भाई साहब, नमस्कार, ख़ुशी हुई कि इस लेख को लिखने के पीछे मेरे मंतव्य को आपने समझा. अगर कोई किसी भी चीज़ में आस्था रख कर सुखपूर्वक जी रहा है तो ये उसका सोचने का ढंग है.बेशक हम जानते हैं कि सृष्टि एक आटोमेटिक मशीन के सिवा कुछ नहीं.लेकिन मशीन चलने के लिए एक ऊर्जा के स्त्रोत की ज़रूरत होती है. उसी स्त्रोत को आप चाहे जो नाम दें और चाहे जैसे सम्मान दें, किसी को उससे क्या लेना देना. लेकिन न जाने इंसान क्या पाना चाहता है. ईश्वर सबका भला करे.


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