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जायसी का पद्मावत बनाम भंसाली का पद्मावत

Posted On 19 Jan, 2018 में

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सुप्रीम कोर्ट के ताज़े आदेशानुसार , रानी पद्मावती की कहानी पर बनी फिल्म “पद्मावत” , चार राज्यों में लगाये गए प्रतिबन्ध को हटाते हुए , पूरे भारत में 25 जनवरी ’18 को रिलीज़ की जा रही है .अब यह तो  फिल्म देखने के बाद ही बताया जा सकता है कि इस में ऐसा क्या है जो “करणी सेना” और “राजपूत सेना” को इतना नागवार गुज़रा कि उन्होंने एक सदियों पहले गुजरी हुई रानी के सम्मान की रक्षा के ठेकेदार बनते हुए वर्तमान समय में इतना हल्ला मचा रखा था  . सुनते हैं कि रानी पद्मावती के सम्मान के लिए अचानक जाग पड़ी “करणी -सेना” और “राजपूत-सेना” जैसे ग्रुप्स के लोगों को फिल्म में पद्मावती को पहनाये गए वस्त्रों , नृत्य और किसी ड्रीम सीक्वेंस पर ऐतराज़ था. फिर ऐसा क्या हुआ कि फिल्म में सीन तो सब वही के वही रखे गए , सिर्फ “पद्मावती” में से “I” हटा कर “पद्मावत” कर देने से सब के सब संतुष्ट हो गए.

“पद्मावत” से याद आया, सन 1540 में सूफी कवि मालिक मोहम्मद जायसी ने “पद्मावत ” नामक एक कालजयी ग्रन्थ लिखा था जिसमे रानी पद्मावती और रत्नसेन के प्रेम से लेकर विवाह तक और उसके बाद उनके राज्य व पद्मावती के सौन्दर्य पर मुस्लिम आक्रान्ता अलाउद्दीन खिलजी की बुरी नज़र पड़ने से उत्पन्न हुई युद्ध की स्थिति का वर्णन है . युद्ध में रत्नसेन बंदी तो हुए थे लेकिन उनके वीर सैनिकों गोरा और बादल ने अपने प्राण हथेली पर लेकर युद्ध किया. युद्ध में गोरा वीरगति को प्राप्त हुआ और बादल ने सेना का नेतृत्व करते हुए विजय प्राप्त की तथा बंदी रत्नसेन को छुड़ा कर चित्तौड़ के सिंहासन पर फिर से बैठाया.

हमारे यहाँ “कौवा कान ले गया” सुन कर कौवे के पीछे भागने की परम्परा है . इसी परम्परा के तहत अधिकांश भारतवासियों को यही पता है कि अलाउद्दीन खिलजी , रानी पद्मावती को जबरदस्ती उठा ले जाने के लिए आ रहा था इसलिए रानी ने अपनी सखियों के साथ जौहर कर लिया. जबकि सच्चाई इससे कोसों दूर है. जायसी कृत “पद्मावत” में साफ लिखा है कि जब अलाउद्दीन को युद्ध में हरा कर रत्नसेन फिर से सिंहासन पर बैठे तब पद्मावती ने उनको बताया कि उनके पड़ोस के एक छोटे से राज्य के राजा “देवपाल” ने पहले पद्मावती के पास विवाह प्रस्ताव भेजा जिसे रानी द्वारा अस्वीकार करने पर, छल द्वारा उसको हर लाने के लिए क्या क्या जतन किये .

रत्नसेन ने गुस्से में आकर देवपाल के राज्य पर चढ़ाई कर दी . जहाँ उसने देवपाल को तो मार डाला लेकिन साथ ही साथ इस बुरी तरह घायल हो गया कि अपने राज्य पहुँचने से पहले ही प्राण त्याग दिए. समाचार सुन कर रत्नसेन की दोनों रानियों पद्मावती और नागमती ने सोलह श्रृंगार किया और पति के शव के साथ उसी की चिता पर सती होकर प्राण त्याग दिए.

अलाउद्दीन चढ़ाई करने आया तो था लेकिन सिर्फ पद्मावती को छीनने नहीं बल्कि अपनी हार और अपमान का बदला लेने . इसलिए रत्नसेन की मृत्यु के बाद राजा की गद्दी पर बैठे बादल के साथ अलाउद्दीन का युद्ध हुआ . बादल ने और सभी राजपूतों ने अपने प्राण खोये, राज्य खोया और चित्तौड़ पर अलाउद्दीन का राज्य हो गया .

यही है रानी पद्मावती की कहानी जो जायसी कृत “पद्मावत” में है और शायद संजय लीला भंसाली की फिल्म में भी इस कथा में अपनी तरफ से कोई छेड़-छाड़ नहीं की गयी है . राइटर्स फ्रीडम के तहत अगर कुछ दृश्यों को फिल्माते समय कल्पना का सहारा लिया भी गया होगा तो इससे मूल-कथा पर कोई फर्क नहीं पड़ता है .

ऐसे में “करणी -सेना” और “राजपूत-सेना” सहित  सभी प्रबुद्ध जनों से मेरा जायसी कृत मूल “पद्मावत” पढने का विनम्र अनुरोध है. आप एक बार मूल पद्मावत पढ़ लेंगे तो मेरा दावा है कि संजय लीला भंसाली के पैर पकड़ कर रो रो कर माफ़ी मांगेंगे .

मूल पद्मावत में जायसी ने रत्नसेन और पद्मावती के प्रेम और विवाहोपरांत मिलन का जो गन्दा और अश्लील  वर्णन किया है, उसने पद्मावती को माँ मानने वाले राजपूतों की वास्तव में माँ-बहन कर दी है. आत्मा -परमात्मा की आड़ लेकर जायसी ने पद्मावती के अंग प्रत्यंग का भद्दा और C-ग्रेड वर्णन तो किया ही है साथ ही रत्नसेन के साथ मनाई गयी प्रथम-रात्रि का भी ऐसा घृणित और बेहूदा वर्णन किया है, जिसे पढ़ कर भी पद्मावती को माँ मानने वाले राजपूतों का न तो खून खौलता है और न ही पद्मावत की प्रतियाँ जलाने का खयाल आता है .

आत्मा और परमात्मा का मिलन कबीर के साहित्य में भी है . लेकिन कबीर ने कभी आत्मा के परमात्मा से मिलन को “राम और रावण के युद्ध ” का नाम नहीं दिया जैसा कि जायसी ने दिया है. न ही कबीर ने आत्मा-परमात्मा के मिलन के बाद शैया -विध्वंस का वर्णन , रानी के वस्त्रों का फट जाना , आभूषणों का चूर-चूर हो जाना, और शरीर पर नख -क्षत और दंत-चिन्हों के होने का वर्णन किया है. यहाँ तक अगर हम संकेतों को जबरदस्ती आत्मा-परमात्मा-मिलन की ओर ढकेल भी दें तो रात्रि-मिलन के अगले दिन जायसी ने रानी की सखियों और यहाँ तक कि माता तक की चुहलबाजी के द्वारा पद्मावती के गुह्य अंग-प्रत्यंग में पाए जा रहे मिलन के एक एक चिन्हों का वर्णन जी खोल कर किया है. आप कैसे सोच सकते हैं कि आत्मा परमात्मा से मिलने के बाद फिर संसारवासियों  के पास अपना हाल बताने आती है?

ये सारा वर्णन पढ़ने के बाद किसी का भी मन कहीं से भी इसे आत्मा-परमात्मा का मिलन मानने को तैयार नहीं होगा . न जाने करणी सेना और राजपूत सेना वालों को उनकी तथाकथित माँ के यौवन अंगों और प्रथम मिलन का यह बेहूदा वर्णन कैसे बर्दाश्त होता है.

खैर, अंत में यह कथा पढ़ने वालों के लिए जायसी ने एक संदेश भी दिया है. उन्ही के शब्दों में सुनिए-

जायसी कहते हैं-  कवि ने अपने मन में यह सोच कर इस कथा की रचना की है कि सम्भव है जगत में इस कथा के रूप में प्रेम का कोई चिन्ह रह जाये. जगत में भला रत्नसेन जैसा राजा कहाँ है और कहाँ हीरामन जैसा बुद्धिमान तोता. न तो अलाउद्दीन जैसा कोई सुल्तान है और न ही राघव जैसा पद्मावती के रूप का वर्णन करने वाला वक्ता. कहाँ वह रूपवती रानी पद्मिनी ही है. जगत में कुछ भी शेष नहीं है केवल कथा ही शेष है और मिथ्या है . वह पुरुष धनी है जिसकी यश और कीर्ति शेष है . फूल सूख जाता है लेकिन उसकी सुगंध शेष रहती है. संसार में ऐसा कौन है जिसने यश को नही बेचा और किसने उसे मोल नहीं लिया . यश का भी सौदा होता है, इस कथा को पढने वाले मुझे दो वाक्यों में याद रखेंगे क्यूंकि अब मेरा यौवन चला गया और वृद्धावस्था आ गयी है. बल शरीर को कमजोर कर के चला गया और नेत्रों की ज्योति इनमे पानी छोड़ कर चली गयी है .दांत गए तो कपोल मात्र त्वचा हो कर रह गए हैं और वचन (बोली ) चला गया है तो अरुचिपूर्ण वचन दे गया है. बुद्धि गयी तो ह्रदय को बावला कर गयी है और गर्व गया तो सर को नीचे झुका कर चला गया है. श्रवण गया तो कानों को ऊँचा करके सुनता हूँ और शरीर की गुरुता चली गयी है तो सर धुनता हूँ. यौवन गया तो मानो जीवित ही मृतक समान हूँ . यौवन ही जीवन है उसके बाद मृत्यु है. बुढ़ापे में अब मेरा सर भी हिलने लगा है , न जाने किसने मुझे बूढ़े होने का आशीष दिया है.

यह “पद्मावत” ग्रन्थ की आखिरी पंक्तियाँ हैं. एक सूफी संत कहे जाने वाले कवि के हृदय के उद्गार. जब एक सूफी को भी अपना अंत समय निकट जान कर धरती पर मनुष्यता के अस्तित्व की चिंता है तो हे! एक 400 साल पहले हुई रानी को माँ मानने वालों ! मृत स्त्री के सम्मान के लिए तलवारें लिए कायर की तरह खड़े हो और वर्तमान में न जाने कितनी बहनों बेटियों का रोज़ सम्मान लुट रहा है , कुछ उसकी भी चिंता कर लो . जो बात बीत गयी उसका कुछ नहीं होना है लेकिन अगर वास्तव में नारी को सम्मानित देखना ही चाहते हो तो अपनी तलवारें अपनी आज की बहन-बेटियों के सम्मान पर आक्रमण करने वालों के गले पर चलाओ. आन -बान और शान को कायम रखने के लिए यही करना होगा. हाँ, अगर  मुफ्त में बिना कुछ किये धरे टीवी पर दिखना और सस्ती लोकप्रियता जुटाना चाहते हो तो अलग बात है.

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
January 21, 2018

प्रिय सरिता जी अन्य लेखों के समान ही उत्तम लेख एक महिला ने मुझे बताया में आज के किशोरों से पूछा रानी पद्मावती कौन थी उन्होंने जबाब दिया बाहुबली की अम्मा थी सुन कर दुःख हुआ आज की पीढ़ी अपने इतिहास से कितनी दूर थी जायसी के पद्मावत से पद्मावती की कहानी ली गयी वास्तव में यह चितौड़ रानी पद्मनी की जोहर गाथा है मुस्लिम तर्क देते है अलाउद्दीन के समय के इतिहास कार आमिर खुसरो ने कहीं जिक्र नहीं किया है ताना शाही में तानाशाह स्वयम इतिहासकार से इतिहास लिखवाते थे फिर उस समय की वीरांगना की मजबूरी थी चार लाख की फौज चितौड के किले को घेरे थी लेकिन उनके कहने पर १६००० rअज्पुतानियों ने जोहर किया राजपूतों ने केसरिया साफा बाँध कर अंतिम युद्ध किया कोई नहीं बचा देश का दुर्भाग्य था हर राज्य अलग – अलग अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे थे यह सुलतान की हार थी

    sinsera के द्वारा
    January 23, 2018

    आदरणीय शोभा जी, मैं इतिहास पर केवल नाम और काल-खंड तक ही विश्वास करती हूँ. कथाओं को क्या कहा जाये जब हमारे जीते जी हमारी कही हुई बातें लोग बदल कर पेश करते हैं तो सैकड़ों हज़ारों साल पहले जो हुआ उसका अक्षरशः सत्य होना असम्भव ही है. रीतिकाल का साहित्य तो वैसे भी राजा लोग अपने चारणों से लिखवाया करते थे. मतलब की बात रखी और बाकी निकाल फेंकी. महिमामंडन करने के लिए कल्पना की कोई सीमा नहीं तय थी. ऐसे में साहित्य को इतिहास मानने की भूल हम कैसे कर सकते हैं. फिर उस पर इतना हल्ला? जीती जागती माँ-बहनों की इतनी चिंता करें तो देश में नारियों को असुरक्षा का डर ही मिट जाये.


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