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दास्तान-ए-अलर्जी

Posted On: 19 Apr, 2017 Others में

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एक दिन में सौ छींके आना कोई मज़ाक नहीं…ज़्यादा भी हो सकती हैं..
सोचने वाली बात है कि कोई खामखा ख़ुशी से दनादन छींकें नहीं मारता है..हाथ का काम रुक रुक सा जाता है..इधर अलमारी खोली उधर आक्छीं … से बाहर धूप में सूखते हुए कपडे हटाने गए कि बस आक्छीं..बच्चे बाहर से खेल कूद कर घर में घुसे नहीं कि बस आक्छीं..सुबह सवेरे आँख मुंह धो कर किचेन में एक प्याली चाय की दरकार से गए नहीं कि बस छीं छीं छीं …..
जिसको आती हैं वो तो परेशान है ही लेकिन लोग बाग़ भी पता नहीं क्या क्या समझते हैं ..इतना परेशान होने लगते हैं जैसे छींक कोई विस्फोट हो जिसमे वो उड़ जायेंगे…. अपने सारे काम छोड़ कर यूँ मुंह देखने लगते हैं जैसे छींके आने के बाद कोई अगला प्रोग्राम होने वाला है…हाँ कभी कभी हो भी जाता है…जब गरज के साथ छींटे भी पड़ते हैं ….
वैसे असली समस्या ये नहीं है..होता ये है कि एक ही घटना पर लोगो के विचार अलग अलग हो जाते हैं…मामूली सी बात है , छींक ही तो आ रही है , पर सोचा जाये तो बहुत बड़ी बात है…क्योंकि रोज़ एक निश्चित समय पर आप किसी काम के लिए पर्टिकुलर हो जाएँ तो हर किसी पर उसका इफेक्ट अलग तरह से होने लगता है..
खास तौर से तब जब छींकों को लेकर कोई अन्धविश्वास हो …मैं तो अपनी बेटाइम की छींकों से इतना डरती हूँ कि किसी बातचीत में जल्दी शामिल नहीं होना चाहती …कई बार ऐसा हुआ है कि कोई खुशखबरी सुना रहा होता है और मैं कमरे से बाहर भागती हूँ…….आक्छीं..
डरती हूँ कि इधर वो बेटी कि शादी की खबर सुना रहे हों और इधर मैं छींकी…आजकल की लड़कियों को तो जानते ही हैं..कल को उनके खुद के किसी आड़े तिरछे रवैये की वजह से कोई बात बिगड़ी तो सारा दोष मेरी छींक पर ही जायेगा..
कल मुझसे मेरे पड़ोस में रहने वाली एक सुकन्या पूछ रही थी…”आप कल बीमार थीं क्या..”
“नहीं तो.” मैं ने कहा “क्यूँ क्या हुआ..??”
“नहीं ….वो असल में कल मैं आपकी वजह से थोड़ी लेट हो गयी..”
“मेरी वजह से..??”
“हाँ वो रोज़ सुबह सात बजे आप छींकती हैं न तब मैं उठती हूँ .. कल आप छींकी नहीं तो मुझे ज़रा उठने में देर हो गयी .”
ओहोहोहोहोहो
गोया कि मेरी छींकों पर अब अलार्म घड़ियों का पेटेंट हो जायेगा..
जी में आया कि कहूं..”सॉरी, कल से मैं रोज़ टाइम पे छींका करुँगी..” लेकिन बस जी जली हुई सी मुस्कान फेंक कर वापस आ गयी..
मुश्किल ये है कि घर में सब को लगता है कि मुझे साइनस हो गया है….
भयानक…
मुझे याद आया मेरी एक परिचिता ने मुझसे साइनस के ऑपरेशन की विभीषिका का वर्णन किया था ….कैसे डॉक्टर टॉन्ग से जबड़ा खोल कर मुंह के अंदर सब काट कूट देते हैं…तीन दिन तक मुंह खुला पड़ा रहता है..ज़रा सी ठंडी हवा चले तो खिड़की से बाहर झाँकने भर से नज़ला हो जाता है ….आदि इत्यादि..
फिर भी….जब मैं ही सब को सलाह देती फिरती हूँ कि “Respect your ailment as a God’s gift ” सो कथनी और करनी में फर्क न करते हुए डॉक्टर के पास यूँ चली जैसे बलि के लिए बकरा कसाई के पास जा रहा हो..


“जो कू-ए-यार से निकले तो सू -ए-दार चले..”


अच्छी खबर ये है कि ये रोग साइनस नहीं बल्कि अलर्जी का निकला ….
डॉक्टर ने , ..रब उसका भला करें, मुझे ऑपरेशन नहीं बल्कि सिर्फ अलर्जी टेस्ट करवाने को कहा है..
वहीं क्लिनिक में बैठी एक और महिला ने मुझे बताया कि उनका अलर्जी टेस्ट कई महीने से चल रहा है…
पहले तो नाक में छिड़काव करने वाली कोई दवा दी जाती है जिससे आप “नो एलर्जी रेस्पॉन्डिंग” स्थिति में आ जाएँ.. फिर उसके बाद हर सिटिंग में सम्भावित एलर्जेन्ट इंट्रोड्यूस करके उसका असर देख कर दवा बनायीं जाती है…
उन मोहतरमा की अभी तक धूल, गर्म कपडे, बादाम, काली मिर्च , चाय की पत्ती, कॉकरोच , पतिदेव की बाइक की चाभी जैसी कुछ ही चीज़ों से अलर्जी घोषित हो चुकी थी और सिटिंग के सेशन अभी चालू थे…….
मैं वहाँ से अपने फीस के पैसे का संतोष करके भाग आयी..
इस हिसाब से तो मेरी ज़िन्दगी भर अलर्जी टेस्ट के सेशंस चलते रहेंगे…डॉक्टर थक जायेगा लेकिन टेस्ट नहीं पूरा होगा क्यूंकि मुझे खुद पता है कि मुझे किन किन चीज़ों से अलर्जी है….
बहुत लम्बी लिस्ट है..
…मुझे पता है कि मुझे छींकें तब तब भी आना शुरू होती हैं जब….
..किसी ऐसे इंसान की लंतरानियां सुनती हूँ जो खुद भी जानता है कि मैं उसकी असलियत जानती हूँ..
…जब कोई अपना ख़ाली समय बर्बाद करने के लिए मेरा समय बर्बाद करता है ..
…जब कोई गलत व्यक्ति खुद को सही साबित करने के लिए ऊंची आवाज़ में चिल्लाता और खामखा की बकवास करता है …
…जब कोई किसी काम के पीछे की गयी मेहनत को दरकिनार कर के उसे नापसंद करके खिल्ली उड़ाता है …
…जब कोई किसी प्यार करने वाले इंसान के प्यार को मोहरा बना कर अपना उल्लू सीधा करता है…
..जब बात करने वाला ये ठान कर बैठा हो कि अपनी ही बात मनवाएगा और किसी की नहीं सुनेगा…
…जब कोई जीने के लिए नहीं खाता है बल्कि खाने के लिए जीता है..
…जब किसी ने अपना छोटा सा जीवन नफरतों के बीज बोने के लिए समर्पित कर रखा हो…
….जब कोई तुच्छ खुद को उच्च समझता हुआ दीखता है….
….जब कोई हुआ है उसे न देख कर जो नहीं हुआ है उसको देखता है..
….जब लोग अपने कमज़ोर मैनेजमेंट को स्वीकार नहीं करते और अपनी भड़ास निकालने के लिए बच्चो को पीटते हैं..
….जब लोग खुद भी हर समय रोते रहते हैं और चाहते हैं कि अगला भी किसी भी कीमत पर खुश न रहे…
….दूसरों का घर झाँकने में इतना व्यस्त रहते हैं कि अपने घर में सड़ते हुए कूड़े की बदबू नहीं जान पाते…
…जब कोई दस जगह मुँह मार के ग्यारहवीं जगह शादी कर के शरीफ बना हो लेकिन एक ही से प्यार करके शादी करने वाले को चरित्रहीन समझता हो…..
…और भी बहुत कुछ होता रहता है..भला क्या क्या टेस्ट होगा…
दरअसल हम जैसे लोग उस मटेरियल के ही नहीं बने होते जिनको कोई इलाज योग्य बीमारियां होती हैं..हमारे सारे के सारे रोग असाध्य हैं..
हम जैसों के लिए ही कहते हैं….


“इलाजे-दर्द-ए-दिल तुमसे मसीहा हो नहीं सकता,
तुम अच्छा कर नहीं सकते ,मैं अच्छा हो नहीं सकता..”


मैं घर में तो क्या सड़क पर निकलने लायक भी नहीं हूँ क्यूँकि अक्सर भीख मांगते या कूड़ा बीनते हुए बच्चों को रोक कर उनके माँ बाप का एड्रेस पूछने लग जाती हूँ .या फिर अपना एड्रेस दे कर कहती हूँ कि घर पे आओ तो तुम्हे स्कूल ले जा कर एडमिशन करवा दूँ..
….नए नए जवान हुए बच्चों को स्मोक करते या गुटका खाते देखती हूँ तो नसीहत देने लगती हूँ…
…..अगर घर के लोग मेरी इन हरकतों को नापसंद करते हैं और मुझे छींकें आने लगती है तो एलर्जी टेस्ट में इन चीज़ों की भला क्या पहचान हो पायेगी…….
डॉक्टर कहते हैं कि या तो अलर्जी के कारण से बचिए या फिर उसकी आदत बना लीजिये..
तो मैं ने अब आदत सी बना ली है..बचना तो हो नहीं सकता क्योंकि कोकून में रह कर तो ज़िन्दगी गुज़ारी नहीं जा सकती..
वैसे कभी कभी मैं दिन भर किसी से न मिलूँ, बाहर भी न निकलूँ, फोन भी न करूँ तो भी मुझे छींकें आती ही हैं…. लगता है मुझे ज़िन्दगी से ही अलर्जी हो गयी है..अब इससे तो नहीं बच सकती ना….तो फिर जब तक ज़िन्दगी है , इसी तरह छींकते जाना है…
बस उपरवाले से यही प्रार्थना है कि मेरी वजह से कभी किसी और को छींकें ना आयें……


हाल फ़िलहाल कि खबर ये है कि 25-30 वर्षों से माता के जगराते के पंडाल में झूम झूम कर कर रात भर लाउडस्पीकर पर

कीर्तन गाने वाले को दो मिनट की अज़ान की आवाज़ से अलर्जी होने लगी है …


मेरा रोग दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है

इस बार अलर्जी किसी और को हुई है और तबसे छींके मुझे लगातार आना चालू हो गयी हैं..

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
April 25, 2017

प्रिय सरिता जी बेहद उम्दा व्यंग लेखन है . बहुत बहुत आभार

    sinsera के द्वारा
    April 30, 2017

    लेख पढ़ने और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए मैं आपकी आभारी हूँ प्रिय यमुना जी

jlsingh के द्वारा
April 22, 2017

आदरणीया सरिता बहन, आपका लेख पहले भी कहीं पढ़ा है पर याद नहीं कहाँ… हाँ इसमें सोनू निगम वाला अद्ध्याय भी जुड़ गया. वासे मुझे भी पार्टी में आइसक्रीम खाकर घर आते आते छींकें आनी शुरू जाती है और जब तक सारा आइसक्रीम का पानी न निकल जाए आती रहती हैं. अपने पैसे से खाये आइसक्रीम से छींकें आयी हों ..याद नहीं…. छींके तो अभी भी आनी शुरू हो गई है लगता है AC ज्यादा ठंढा हो गया है…. अब बंद करना ही पड़ेगा. … कल यानी परसों कह सकते हैं एक फोटो शॉप की दुकान में भी मुझे छींके आनी शुरू हो गई, जब ४ वेद ६ शास्त्र और १८ पुराण के ज्ञाता श्री श्री १०८ श्री देवल श्री ….. बाबा ने कहा की वे झाड़खंड में विश्व का सबसे बड़ा गौरक्षा मंदिर बनवाने जा रहे हैं… कुल ३३ करोड़ का बजट है …१०० करोड़ तो मोदी जी ही देने वाले हैं बाकी आपलोग देंगे…. मैं तो उनके चरण स्पर्श कर घर आ गया पता नहीं पांच साल बाद मंदिर बन जायेगा तब उसमे मुझे घुंसने देंगे या नहीं… आक्छीं….

    sinsera के द्वारा
    April 22, 2017

    आदरणीय जवाहर भाई साहब , लेख काफी पहले fb के पुराने अकाउंट पर था . अब ज़्यादा लिखने का टाइम नहीं मिलता परिस्थितियां बहुत बदल गयी हैं. जेजे भी छूट सा गया था. अचानक “भेदभाव का सामना ” प्रतियोगिता में भाग लेने का आमंत्रण मेल द्वारा मिला, विचारोत्तेजक विषय था तो मैं ने सोचा कुछ लिख दूँ. इत्तेफाक से पुरस्कार भी मिल गया. अब जेजे पर आते रहना चाहती हूँ नहीं तो एक अजीब सी ग्लानि होगी. लोग भी सोच सकते हैं कि ऐसे तो गायब रहती हैं बस पुरस्कार की लालच में चली आयी थीं. यह लेख जेजे के ड्राफ्ट में था. सोनू निगम के प्रकरण पर अनुकूल लगा तो थोड़ी सी एडिटिंग के साथ पोस्ट कर दिया. अच्छा एक बात मुझे समझ में नहीं आती…..मंदिर पर इतना पैसा कोई कैसे खर्च कर देता है. इतने में तो अच्छा खासा अस्पताल खुल जाये. क्या मानव सेवा प्रभु की सेवा नहीं है…??? वैसे छींक आना अच्छी बात है. तबियत हलकी हो जाती है.

    के द्वारा
    April 22, 2017

    भारतमित्र मंच पर पढ़ा था ये लेख पहले आपने. 

sadguruji के द्वारा
April 21, 2017

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! सादर अभिनन्दन ! आपका लेख पढ़ते हुए मुझे भी झींक आ गई, क्योंकि कूलर के सामने बैठा हूँ ! झींक का रोग कई वर्ष पहले मुझे भी था ! बारिश आने से कई घंटे पहले ही झींक आने लगती थी ! सर्दी-जुखाम हमेशा रहता था ! इसके कारणों को मैंने ढूंढा, जैसे- धूल गर्द से बचा जाए, कूलर के सामने या पंखे के ठीक नीचे सोया या बैठा नहीं जाए ! गर्म पानी से नहाया जाए ! लेकिन इस रोग से पूर्णतः छुटकारा मुझे सुबह-शाम खाली पेट एक कप गर्म पानी में बीस-बीस एमएल एलोविरा जूस डालकर पीने से मिला ! आपने झींक के रोग के साथ साथ अन्य कई सामाजिक समस्याओं पर भी बहुत सटीक व्यंग्य साधा है ! आपने धार्मिक एलर्जी की भी बात की है ! मेरा अपना विचार है कि दुनिया के सारे धर्म इंसान की नैसर्गिक आजादी को छीनने का ही काम करते हैं ! इनका काम ईश्वर के बारे में बताना है, लेकिन ईश्वर के बारे में ये सब सच बताने और इंसान को ईश्वर से मिलने की सही राह बताने की बजाय कन्फ्यूज ही ज्यादा करते हैं ! आज के युग में तो धर्म सबसे बड़ा व्यापार बन गया है ! अच्छी प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

    sinsera के द्वारा
    April 21, 2017

    आदरणीय सद्गुरुजी, नमस्कार, छींकों से परेशानी तो है मैं भी चाहती हूँ कि ये मर्ज़ ठीक हो जाये लेकिन एक बात है, ताबड़तोड़ छींकें आने के बाद जो आराम मिलता है कि क्या बताऊँ . वैसे ये एलोवेरा के जूस वाला इलाज कर के देखती हूँ शायद आराम हो जाये. मुझे तो अब धर्म के नाटक से भी एलर्जी होने लगी है . सरकार अगर धर्म पर ही बैन लगा दे और देश का कानून ही सबका धर्म हो तो एक आदर्श स्थिति हो जाये . ऐसा हो तो सब झंझट ही मिट जाये.लेकिन न तो ऐसा होगा न झंझट मिटेगा. समय देने के लिए आपका आभार ..

Shobha के द्वारा
April 20, 2017

प्रिय सरिता जी एलर्जी का इतना अच्छा वर्णन मेने कहीं नहीं सूना न पढ़ा आपने क्या शानदार लेख लिखा है मेने उसका रसास्वादन जम कर किया

    sinsera के द्वारा
    April 21, 2017

    आदरणीय शोभा जी अच्छा है आप डॉक्टर न हुईं वरना मरीज़ का हाल सुन कर आनंद उठाने लगतीं फिर मरीज़ तो कहीं का न रहता. ये एक मज़ाक है वैसे…अन्यथा न लें..आपने पढ़ा इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद …

Jitendra Mathur के द्वारा
April 20, 2017

बहुत ख़ूब सरिता जी । आपके लेख को हास्य और व्यंग्य दोनों ही श्रेणियों में रखा जा सकता है । लिखकर आपको आनंद आया होगा, पढ़कर मुझे आया । आभार और अभिनन्दन आपका ।

    sinsera के द्वारा
    April 21, 2017

    आदरणीय जीतेन्द्र जी, समय देने के लिए हार्दिक धन्यवाद. जिस मूड से लेख लिखा है वही पाठक तक पहुँच जाये तो लेखक को भी मज़ा आता है. आभार ..


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