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दोष किसका.."CONTEST "

Posted On: 31 Mar, 2017 Contest में

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उसके चेहरे पर नज़र पड़ते ही अजीब सी गिनगिनी होती थी.अपनी दादी का हाथ पकडे वो हर उस घर में जाती जहाँ उसकी दादी बर्तन मांजती थी.ज़रा सी बच्ची थी लेकिन उसको अपने बारे में शायद होश सँभालते ही सब कुछ पता हो गया था इसीलिए एकदम चुप रहती थी.कुछ खाने को दिया जाये तो चुपचाप ले कर खा लेती.मुंह का एक ही कोना खुलता था.दूसरा अजीब तरह से चिपका हुआ था.ऑंखें जैसे किसी ने पलकों पर चुन्नट डाल कर धागा खींच दिया हो.आश्चर्य होता था कि उसे दिखाई भी देता होगा या नहीं.अपनी माँ की चौथी संतान थी ये और पांचवी जचगी में उसकी माँ नवजात पुत्र सहित चल बसी थी.तब से दादी की उंगली से उसका हाथ छूटता न था.ऐसा नहीं था कि दादी उसे कलेजे का टुकड़ा बना कर रखती हो.वो तो उसे अपने साथ इसलिए रखे रहती थी ताकि वो जल्दी से जल्दी चौका बर्तन सीख जाये और पैसे कमाने लगे.हर समय डांटती रहती,उसके टेढ़े मेढ़े मुंह पर चाँटे लगाती और गाली देती रहती थी.डांट खाने के बाद जब वो रोती तो उसकी सिकुड़ी हुई आँखों से आंसू तो बहते ही साथ-साथ उसके चेहरे पर चेचक के दाग जैसे दो चार और गड्ढों से भी पानी बहा करता. अपने विकृत हाथों से वो आँखों के साथ-साथ पूरे चेहरे से बह रहे आंसू पोछती और बर्तन मांजने लगती.

लगातार तीन लड़कियों को जन्म देने के बाद उसकी माँ जब चौथी बार उम्मीद से हुई तो इसके शराबी बाप और इसी दादी ने मिलकर उसको किसी क्लिनिक में ले जाकर भ्रूण की जाँच करवाई.लड़की थी जो उन दोनों को नहीं चाहिए थी.पर माँ तो माँ ही होती है.चौका बर्तन कर अपना और अपने बच्चो का पेट भरने लायक कमा ही लेती थी.उसने साफ इंकार कर दिया और घर छोड़ कर जाने को तैयार हो गयी.शराबी आदमी और उसकी लालची माँ को लक्ष्मी जाती हुई दिखीं.मनुहार कर रोक लिया और धोखे से बच्चे का नुकसान करने वाली कोई देहाती दवा खिला दी.चार महीने से ज़्यादा का गर्भ था.

लोग कहते हैं कि लड़कियां बड़ी सख्त जान होती हैं आसानी से नहीं मरतीं.

वो ज़हरीली देहाती दवा बच्चे की जान तो नहीं ले पायी लेकिन अंदर ही अंदर अंग भंग करती रही.ये राक्षस रूपी माँ बेटे उस अभागी औरत को बिना बताये दवा खिलाते रहे और वो अनजाने में रोज़ ज़हर खाती रही.नियत समय पर लड़की जन्मी तो दाई डर कर चिल्लाते हुए कमरे से भाग आयी.दवा के कारण बच्ची के शरीर के अंग गल गए थे.हाथ पैर टेढ़े मेढ़े,चिपका हुआ मुंह,आँखों के जगह पर सिकुड़े सिकुड़े गड्ढे और गालों पर तीन चार बड़े बड़े छेद.

डायन दादी ने रोती हुई नवजात बच्ची का गला दबाना चाहा लेकिन उस सद्य प्रसूता ने पूरी हिम्मत के साथ अपनी बच्ची सास के हाथों से छीन ली और गंदे कपड़ों में ही चारपाई से उठ कर बाहर भागी.बाहर खड़ी मोहल्ले की औरतों ने सहारा दिया.सास और उसके गाली बकते हुए लड़के को समझा बुझा कर शांत किया और भगवान की देन समझ कर बच्ची को पालने के लिए कहा.वो बेचारी प्रसव के बाद की सिकुडन से पैदा हुए दर्द से दोहरी होती जा रही थी लेकिन चिल्ला चिल्ला कर अपनी बेटी को पालने का ज़िम्मा अकेले उठाने का ऐलान कर रही थी.
किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था.अगले साल फिर प्रसव पीड़ा को न झेल पाने के कारण वो जाति से कहारिन पर चरित्र से सिंहनी इस क्रूर संसार से विदा हो गयी,साथ में नवजात पुत्र को भी ले गयी.माँ बेटा दहाड़ मार मार कर रोये.कष्ट ज़्यादा यह था कि लड़का पैदा हो कर मर गया.
ये जी तो रही है.पर कभी सोचती होगी क्या कि वो किसलिए जी रही है??

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36 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
April 26, 2017

आदरणीय सरिता जी दर्द भरी भावनाओं की सरिता आखिर अपने प्रवाह मैं बहा ही ले गयी |सरित भावनाओं मैं बह चुके कक्या बहते कुख नया करेंगे ,या प्रवाह से किनारा पाकर मौज मस्तती मैं डूब जायेंगे । नियती यही है । अ्पने प्रवााह को अ्नवरत जारी रखना तो सरिता धर्म है । अपने धर्म पालन पर सफलता पर बधाइयाॅ ।ओम शाॅति शाॅति

    sinsera के द्वारा
    April 30, 2017

    आदरणीय हरिश्चंद्र जी सादर नमस्कार, टंकण मशीन शायद कुछ दिग्भ्रमित थी लेकिन आपकी बात का सार मेरी समझ में आ गया . अपने लेखन धर्म का पालन करती रहूंगी जब तक उँगलियों में जान और आँखों में रौशनी है. रचना को आप लोगों का समय मिलता है यही सबसे बड़ा पुरस्कार और सफलता है. धन्यवाद.

harirawat के द्वारा
April 22, 2017

प्रिय सरिता जी नमस्कार ! कोटि कोटि बधाइयां , आपके परिश्रम, लगन, कला और उच्च कोटि की समस्या को आम जनता तक पहुंचाने के लिए आपको दिए गए पुरष्कार के लिए ! अचानक आपकी इस दर्दीली कहानी पर नजर पड़ गयी और पढ़ते पढ़ते आँखों से आसुओं की धारा बहने लगी ! साधुवाद !

    sinsera के द्वारा
    April 22, 2017

    आदरणीय हरि रावत जी , नमस्कार, जा तन लागे वा तन जाने … ये एक सच्ची कथा थी जो मैं ने जागरण के माध्यम से आप लोगों तक पहुंचाई. उस कन्या के लिए कुछ भी नहीं कर सकती हूँ यह विवशता बहुत दुखी कर जाती है. आपने समय दिया इसके लिए आभारी हूँ.

Jitendra Mathur के द्वारा
April 9, 2017

निस्संदेह हृदयस्पर्शी रचना है यह । अभिनंदन और पुरस्कृत होने के लिए हार्दिक बधाई सरिता जी ।

    sinsera के द्वारा
    April 10, 2017

    बधाई के लिए धन्यवाद आदरणीय जितेंद्र जी, सामाजिक बुराइयों की जड़ें बहुत गहरी हैं. जब तक इनके मूल पर चोट नहीं पहुंचेगी तब तक हम लेखक अधूरी ज़िम्मेदारी ही पूरी कर पा रहे हैं.

Alka के द्वारा
April 7, 2017

प्रिय सरिता जी प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पाने के लिए हार्दिक बधाइयाँ | रचना मैंने पहले ही पढ़ी थी और कहीं गहरे मन को छू गई थी पर किसी कारण वश प्रतिक्रिया नहीं दे पाई थी | वो छोटी लड़की कही मन में सजीव हो उठी | पुनः बधाई |

    sinsera के द्वारा
    April 8, 2017

    रचना पढ़ने और बधाई के लिए धन्यवाद प्रिय अलका जी. जीवन के कितने रंग कहाँ कहाँ बिखरे पड़े हैं कोई नहीं जानता. और जहाँ रंग ही नहीं है वहां भी लोगों को जीवन जीना ही पड़ता है. यही दुनिया है.

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
April 7, 2017

पहले तो प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पाने के लिए बधाई / बहुत ही मार्मिक घटना का वर्णन आपने किया है / मैं अपने अनुभवों के आधार पर यही कहना चाहता हूँ कि कन्या संतान को न पसंद करने वालों में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या ही ज्यादा है / महिलाओं के प्रति असुरक्षा की भावना और उनके शादी में होने वाले खर्च निम्न और मध्यमवर्ग के लोगों का कन्या संतान न पसंद करने का प्रमुख कारण है / आशा है आप भी मेरे विचारों से सहमत होंगी /

    sinsera के द्वारा
    April 7, 2017

    बिलकुल सहमत हूँ राजेश जी.न जाने क्या कारण है कि “मोहे न नारी नारी के रूपा …” अभिजात्य वर्ग की महिलाएं भी दादी नानी बनती हैं तो पोता ही चाहती हैं . बहुत से ऐसे घर हैं जहाँ बेटा पैदा होने पर बहुत बड़े भोज का आयोजन किया जाता है लेकिन बेटी की छठी बरही ऐसे ही चुपचाप पूज दी जाती है.जबकि इनके यहाँ खिलाने या पढ़ाने की कोई समस्या नहीं होती है.न जाने हमारे दश की विचारधारा कब बदलेगी/सुधरेगी….

Siddharth Arora के द्वारा
April 7, 2017

बहुतेरी प्रूफ रीडिंग खामियां हैं! निराशावाद को बढ़ावा देती कहानी!

    sinsera के द्वारा
    April 7, 2017

    पढ़ने व प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद सिद्धार्थ जी. मैं टेक्निकली बहुत पारंगत नहीं हूँ सो खामियां हो सकती हैं, ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद. अगर आप गलतियों को अंडरलाइन कर दें तो अगली बार दूर करने की कोशिश करुँगी. जागरण ने सच्ची घटनाएं शेयर करने का एक आयोजन किया था. लेखक को अपनी तरफ से आशावाद या निराशावाद का छौंक लगाने की गुंजाइश नहीं थी. लेकिन फिर भी एक अनपढ़ देहाती महिला अपनी मेहनत के बल पर कन्या भ्रूण की हत्या के खिलाफ अपने घर वालों से लड़ती है और अकेले अपनी बेटियों का पालन पोषण करने का साहस रखती है, मेरी समझ से समाज के लिए यह एक सराहनीय और आशावादी सन्देश है. निराशावाद तो तब होता जब वो आत्महत्या कर लेती या जेजे पर उपस्थित आप जैसे बहुतेरे अन्य लोगों की तरह अपनी पहचान गोपनीय रखने का प्रयास करती. माफ़ कीजियेगा ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्यूंकि मुझे जेजे पर आपकी आई डी सर्च करने पर नहीं मिली. मैं आपके आशावादी ब्लॉग पढ़ना चाहती हूँ, कृपया लिंक दने का कष्ट कीजियेगा. आभार

jlsingh के द्वारा
April 7, 2017

मेरी और से पहले ही आप प्रथम थी और परिणाम भी वही आया… बहुत बहुत बधाई आदरणीय सरिता बहन! साथ ही आदरणीया यमुना जी, और आदरणीय राजेश कुमार श्रीवास्तव जी को बहुत बहुत बधाई. प्रतियोगिता के दौरान रचना देनेवाले सभी प्रतिभागियों को का बी अभिनन्दन! जागरण जंक्शन को इस तरह के आयोजन करने के लिए बार बार बधाई! वास्तव में यह अनूठा मंच है जहाँ जुड़कर लोग आत्मीय बन जाते हैं! सादर!

    के द्वारा
    April 7, 2017

    विश्वास बनाये रखने के लिए धन्यवाद जवाहर भाई साहब.सभी ने बहुत अच्छे अच्छे मुद्दों पर बेहतरीन लिखा था. प्रथम, द्वितीय या तृतीय स्थान पाना तो इत्तेफाक है बस. जेजे पर चाहे जितने दिनों बाद आइये लेकिन अपनापन कही नहीं जाता, ये सच है.

Shobha के द्वारा
April 7, 2017

प्रिय सरिता जी प्रथम पुरूस्कार और ऐसी कहानी मन को छू गयी गजब की भाषा शैली मुबारक मेरा पी सी गड़बड़ है मेरे सूत्र में लिखे वाक्यों के भावो को समझियेगा

    के द्वारा
    April 7, 2017

    आदरणीय शोभाजी मुबारकबाद के लिए शुक्रिया. आप तो कुछ भी न लिखें तो भी भाव समझ लूँगी . बस ऐसे ही प्रेम व्यवहार बना रहे ईश्वर से यही प्रार्थना है.

Rita Singh, 'Sarjana' के द्वारा
April 6, 2017

सरिता जी बहुत दिनों बाद आज जे जे खोला तो आपको बेस्ट ऑफ़ द ब्लॉगर के रूप में देखकर ख़ुशी हुई बहुत बहुत बधाई हो.

    sinsera के द्वारा
    April 6, 2017

    प्रिय रीता जी, नमस्कार, जेजे का साथ मुझसे भी काफी दिनों से छूट सा गया था. सभी संगी साथी बहुत दिनों बाद मिले बहुत अच्छा लगा. आपकी बधाई के लिए हार्दिक धन्यवाद.

yamunapathak के द्वारा
April 6, 2017

प्रिय सरिता जी सप्रेम नमस्कार कांटेस्ट की प्रथम विजेता को यमुना की तरफ से हार्दिक बधाई .कल ही पढ़ा था यह ब्लॉग .इस सम्मानीय अनुपम मंच के निर्णय पर और आप पर हमें गर्व है .मेरी एक इल्तज़ा भी है कृपया आप पूर्व की तरह इस मंच पर नियमित रूप से लिखा करें .आप के ब्लॉग पढ़ना अच्छा लगता है . साभार

    sinsera के द्वारा
    April 6, 2017

    आपकी प्रेम भरी बधाई के लिए बहुत धन्यवाद प्रिय यमुना जी. साथ ही साथ आपका इतना मान पा कर भी अभिभूत हूँ. कुछ ज़िम्मेदारियाँ और कुछ स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियां थी लिखना काफी कम हो गया था. लेकिन यहाँ फिर से आ कर लगा कि मैं क्या मिस कर रही थी. कोशिश कर रही हूँ कि लिखती भी रहूं और आप लोगों के अच्छे अच्छे आलेख पढ़ती भी रहूं. बहुत धन्यवाद.

sadguruji के द्वारा
April 6, 2017

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! बहुत अच्छी रचना ! प्रतियोगिता में पुरस्कृत होने पर बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई !

    sinsera के द्वारा
    April 6, 2017

    बधाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सद्गुरु जी. आप के कमेंट्स सदैव प्रेरणा देते हैं .

yamunapathak के द्वारा
April 5, 2017

प्रिय सरिता जी सप्रेम नमस्कार बेस्ट ब्लॉगर की उपाधि के लिए बधाई .यह ब्लॉग शब्द चित्र प्रस्तुत करता गया .ऐसा अक्सर होता है की बेटियों को जन्म नहीं देने के लिए माँ को दवा खिला दी जाती है .मेरे गाँव में भी ऐसी एक अनचाही बेटी है जो आँखों से देख तो सकती है पर दवा के प्रभाव से उसकी आखों के पालक बस एक लाइन भर ही खुले हैं .बहुत दिक्कत होती है .इस वर्ष उसने एम् बी ए कम्पलीट कर लिया .जब वह दस वर्ष की थी तब कटक के अस्पताल में आपरेशन के बाद थोड़ी पलक खोलने की कोशिश की गई पर उससे दृष्टि जाने का भय था .अतः वैसे ही रखा गया सर को ऊपर उठा उठा कर देख पाती है किताब आँखों के बिलकुल पास लाकर पढ़ती है. साभार

    sinsera के द्वारा
    April 6, 2017

    प्रिय यमुना जी, दुःख होता है अपने देश की यह स्थिति देख कर . दूसरे और भी देशों में स्त्री की बड़ी दुर्दशा है लेकिन कम से कम हमारे यहाँ की तरह वहां देवी की पदवी देने का नाटक नहीं होता है. यहाँ तो स्त्री को देवी की तरह पूजते हैं और फिर विसर्जित कर देते हैं.

sadguruji के द्वारा
April 5, 2017

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ सम्मान हेतु बहुत बहुत अभिनन्दन और हार्दिक बधाई ! ऐसे पात्रों के लिए समाज में जाकर कुछ किया जा सके तो वो एक बहुत समाज सेवा होगी ! इस मामले में संत मदर टेरेसा की जितनी भी तारीफ़ की जाए वो कम है ! एक छोटे रूप में अपने सामर्थ्यनुसार मेरी भी यही कोशिश रहती है ! सादर आभार !

    sinsera के द्वारा
    April 5, 2017

    सद्गुरुजी, सादर प्रणाम,आप के जीवन के बारे में आपके ब्लॉग्स द्वारा जितना जानती हूँ उससे लगता है कि तमाम उत्तर चढाव से गुजरने के बाद अब अपने एक ऐसा जीवन चुन लिया है जो सबके कल्याण के लिए है. मदर टेरेसा तो व्यक्तिगत परिवार के चक्रव्यूह में नहीं फँसी इसलिए सारा संसार उनका परिवार हो गया.लेकिन जो गृहस्थी में रह कर सामाजिक कल्याण कर सके उसी का परमार्थ वास्तव में सिद्ध होगा. बधाई देने के लिए धन्यवाद.

Shobha के द्वारा
April 4, 2017

प्रिय सरिता इस प्रसंग को जिस तरह आपने लिखा आपकी भाषा सारा नजारा आँखों के सामने आ गया बहुत दुःख हुआ था आपको बेस्ट ब्लागर की मुबारक बाद

    sinsera के द्वारा
    April 5, 2017

    बधाई के लिए धन्यवाद आदरणीय शोभा जी,लेकिन मैं अब लिखने के साथ साथ महिलाओं के लिए कुछ सामाजिक कार्य भी करना चाहती हूँ. सिर्फ मुद्दा उठाना इनके साथ मज़ाक करना है, जब तक कि कोई हल न ढूंढा जाये.

shakuntla mishra के द्वारा
April 2, 2017

बेटा नशे में ,अशिक्षित लोग कभी कभी ऐसा देखने में आता है पर आज बहुत कुछ बदला है मेरे महरी की बेटी की मनमानी से उसका पूरा घर परेशान है | वह अपनी युवा बेटी के खर्चे से परेशां रहती है |

    sinsera के द्वारा
    April 2, 2017

    ये बिलकुल सच है आदरणीय शकुंतला जी,कारण है कुशिक्षा. एक बार अशिक्षा ठीक है लेकिन कुशिक्षा तो इंसान को कहीं का नहीं छोड़ती. महरी की लड़कियां चौका बर्तन कर के पैसे तो पा जाती हैं लेकिन सलीका सिखाने वाला कोई नहीं होता. और भड़काने के लिए टीवी हर घर में मौजूद होता है. प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

jlsingh के द्वारा
April 2, 2017

लोग कहते हैं कि लड़कियां बड़ी सख्त जान होती हैं आसानी से नहीं मरतीं. आपने जिस ढंग से चित्रण किया है – अगर मैं जज होता तो यह पुरस्कार आपको ही देता… पुरस्कार अलग चीज है पर प्रस्तुति तो एक दम खलिश जैसे सारा दर्द निकाल कर रख दिया गया हो… और कुछ कहने को बचा ही क्या है? सादर! आप की कलम चलती रहे. यही कामना करता हूँ.

    sinsera के द्वारा
    April 2, 2017

    शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद जवाहर भाई साहब. लिखना तो खैर अब काफी कम हो गया है.जिन समस्याओं पर लिखती हूँ अब उनके लिए कुछ सामाजिक काम करना चाहती हूँ. कभी घरेलू ज़िम्मेदारियों ने समय दिया तो सामाजिक उत्थान का काम अवश्य करुँगी. अब इस बात के लिए शुभकामना दीजिये.

sadguruji के द्वारा
April 1, 2017

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! बेहद मार्मिक रचना ! एक कमेंट में आपने बहुत सही कहा हैं कि सदियां बीत जाएंगी पर स्त्रियों का दमन और शोषण बंद नहीं होगा ! पठनीय और विचारणीय प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

    sinsera के द्वारा
    April 1, 2017

    सद्गुरुजी, नमस्कार,ये विषय ही विचारणीय और दुःखद है. सबसे बड़ी विडम्बना तो ये है कि स्त्री का शोषण करने में कभी कभी खुद स्त्रियां भी शामिल रहती हैं .

Shobha के द्वारा
April 1, 2017

प्रिय सरिता जी मन क्या आत्मा भी हिल गयी गरीबी में ऐसी क्रूरता कुछ दिन पहले पढ़ा उड़ीसा में नवजात बच्ची को जमीन में गाद दिया पैर बाहर निकल आया लोगों ने बच्ची खोद कर निकाल ली बच गयी

    sinsera के द्वारा
    April 1, 2017

    शोभा जी,मैं काफी पहले एक पारिवारिक उत्सव में गयी थी वहीँ इस बच्ची के बारे में जाना था. अब तो उन परिचित का वहां से ट्रांसफर हो चुका है. पता नहीं उसका क्या हुआ. महीनो तक उसके बारे में भूल नहीं पायी थी.अपना देश भी क्या है.कन्या को पूजते हैं लेकिन भ्रूणावस्था से ही उसके ऊपर अत्याचार शुरू हो जाता है.


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