Sincerely yours..

Aaiye Haath Uthayein Ham Bhi.............

63 Posts

2156 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 7725 postid : 1321414

ओ अपने पापा की मुनिया .. "contest"

Posted On: 28 Mar, 2017 कविता में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

हुनर देखो कमाल देखो इसके हाथ का,

ये खेल इसका रात दिन का है ,दिन रात का,

यही चूल्हा यही चौका यही आंगन ड्योढ़ी,

इसी में रहती है अपने पापा की मुनिया जो थी,

कमाल करने को रखती है सिर्फ अपने दो हाथ,

न आँख कान है इसके ,और न दिल न दिमाग ,

अपने बचपन की यादों का मुरब्बा है बनाया इसने,

आज के खाने में इसके सपनों की चटनी भी थी,

ये अपने साथ डिग्री जैसी चीज़ भी कुछ लाई थी,

जो बताते थे कभी क्लास में अव्वल ये थी,

उन डिग्रियों का क्या अचार इसने डाला है ,

यही एक सबके पेट दर्द की दवा जो थी ,

घर के पिछवाड़े से पीछे भी एक सूना कोना,

वहीँ बसा ली है इसने अपनी  जादू की दुनिया,

किवाड़ खुलते ही लग जाते हैं पेड़ों पर झूले,

और रचे  जाते हैं हाथों पे मेहँदी के बूटे,

तितलियां फूल और जुगनू और पंछियों के पंख ,

हंसी के दौर और प्यारी सहेलियों का संग,

दुलार माँ-पापा का भाई बहनों की तकरार ,

अनोखी बस्ती बसी है उसी द्वार के पार,

सबसे छुपके छुपा के झाँक आती है एक बार,

जिनको देखे बिना युग हो  गए दो चार हज़ार,

चढ़ा के द्वार पर किस्मत से भी भारी सांकल,

फिर चली आती है वापस उसी दहलीज़ में,

कुछ का है कुछ  जहाँ बनाना उसको जादू से,

दो  हाथ चार, आठ, सौ करेगी जादू से,

दर्द उबालेगी और राहत का बनाएगी काढ़ा,

राख अरमानो की ले, धो डालेगी बर्तन सारे,

बह चले जायेंगे वो हाथ भी फिर पानी के साथ,

उगा करते थे कभी जिन पे कांच के सपनों  से पंख,

वो पंख टूट कर पड़े हैं अब जहाँ देखो,

पाँव में चुभते हैं जब भी कदम बढाती है,

एक कलम थी न तुम्हारी, उसे झाड़ू कर लो,

ओ अपने पापा की मुनिया , बुहार दो  आंगन,

फेंक दो किरचें उन सपनों की और चैन से सो,

उम्मीदें, ख्वाब , हसरतें उठा के सब फेंको,

अचार , बड़ियाँ और पापड़ बनाने की खातिर,

कल सुबह फिर से मर जाना जीने की खातिर…..

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

4 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
March 30, 2017

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! पठनीय और विचारणीय कविता की प्रस्तुति हेतु बहुत बहुत अभिनन्दन और हार्दिक बधाई ! महिलाओं की समस्याओं पर आप अपनी उत्कृष्ट और सहज भाषाशैली में प्रहार करती हैं ! बहुत अच्छा प्रयास ! सादर आभार !

    sinsera के द्वारा
    March 31, 2017

    प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ आदरणीय सद्गुरुजी

Shobha के द्वारा
March 29, 2017

सरिता जी पढ़ कर मन भर आया

    sinsera के द्वारा
    March 29, 2017

    बहुत आभारी हूँ शोभा जी और खुशकिस्मत हूँ कि मुझे आप जैसी मित्र मिली हैं .


topic of the week



latest from jagran