Sincerely yours..

Aaiye Haath Uthayein Ham Bhi.............

63 Posts

2163 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 7725 postid : 1320873

उस पार किनारा तो है ही नहीं.. "contest "

Posted On: 26 Mar, 2017 Contest में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

कहते हैं लोग प्यार पर खुद को लुटा देते हैं.पर ऐसा भी क्या कि प्यार को अपराध घोषित कर कोई किसी को लूट ही ले.

प्यार तो दो ज़िन्दगियों का मिल कर एक नयी ज़िन्दगी शुरू करने का सलीका होता है.और फिर वो दोनों तो जैसे एक दूजे के लिए ही बने थे.
सभी कहते थे कि वो अगर सूर्य था तो ये उसकी धूप,वो फूल था तो ये सुगंध,वो बादल तो ये बरखा.इस का नाम लीजिये तो उस की चर्चा खुद होने लगती थी.ऐसी स्वर्ण और कुंदन जैसी जोड़ी थी उनकी.
शादी तो होनी ही थी हाँ उन दोनों के सिवा किसी और को स्वीकार न थी.घर से कोई नहीं आया पर घर तो जाना ही था.शरीफ लोग थे.गालियों और तानों से नहीं नवाज़ा लेकिन आरती भी नहीं उतारी.बहू की हत्या कर देते ऐसे लोग नहीं थे हाँ अरमानों की हत्या से तो कोई पाप नहीं लगता न.और फिर जब मुफ्त में चौबीस घंटे की नौकरानी मिल रही हो तो भला कौन दरवाज़े नहीं खोलेगा.हाँ उन खुले दरवाज़ों से न तो बाहर जाने का कभी कोई रास्ता हुआ और न ही बहू के माता-पिता के अंदर आने का.मिट्टी का तेल डाल कर बहू नहीं,बहू की डिग्रियां जलाई गयीं.बचपन की सी उम्र थी उनकी.अभी पढाई ख़त्म ही हुई थी.न जाने क्या सोचा और क्रांति की मशाल ले समाज रूपी कूड़े को जलाने के लिए निकल पड़े.ऐसा लगता था जैसे संसार को बदल डालेंगे लेकिन क्या जानते थे कि सांसारिकता तो चक्रव्यूह है,एक मोर्चा जीतो तो दूसरा तैयार मिलता है.झूठी शान,दिखावा,रंग-रूप,खानदान,धर्म,जात.न जाने कितने व्यूह थे जिन्हें मिल कर जीतते जीतते कैसे वो अपना जुड़ाव ही हार गए,वो जान ही न पायी.
बेटा तो अपना था, कब तक तिरस्कृत होता ,लेकिन पराये की बेटी ऐसे भी अपनी नहीं हो पाती फिर जो खुद से चली आयी हो उसे तो हर समय विद्रूप दृष्टि,व्यंगबाण और पक्षपाती भेद-भाव का सामना करना होता था.बेटे को रोज़गार में लगाने की कोशिशें हुईं और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आने वाले प्रवेश-पत्र सिर्फ बहू के ही फाड़े गए.क्रांति का एक दूत तो अपने घर,माता-पिता और भाई-बहनों के बीच आ कर आरामतलबी की चाह में फरमांबरदार हो गया,अब उसके हिस्से की ज्वाला में भी इसको अकेले ही जलना था.संसार भर में उजाला करने के लिए जो दीपक दोनों ने मिल कर जलाये थे,जब बुझाये गए तब वो तो परे खड़ा रहा,काला धुंआ भभक कर सिर्फ इस के ही मुंह पर पड़ा और आत्मा को भी कहीं अंदर तक जला कर राख कर गया.
एक चमकता चाँद,टूटा हुआ तारा बन कर रह गया.
प्यार की वह नाव जिस पर बड़े से बड़े तूफान में भी न डिगने का लंगर उन दोनों ने मिल कर डाला था,वो थोड़ी सी यात्रा के बाद ही टुकड़े टुकड़े हो गयी.वो तो टूटी नाव के सहारे ही तैर कर पार हो गया और यह संघर्ष के मझधार में फँसी ही रही.निकल आती तो भी कहाँ जाती.
फिर उस बड़े से आंगन में,एक सारे संसार के कद से भी बड़ा गड्ढा खोदा गया.जो इसे साथ ले कर पर्वतों से भी ऊपर आसमानों तक जाने के सपने संजोता था,खुद उसी ने,एक कुदाली प्यार के नाम,एक भरोसे के नाम,एक कसमों वादों के नाम,एक कड़े से कड़े दुःख में भी साथ निभाने के नाम और एक हर पल साथ रहने के नाम पर मारी.फिर उस गड्ढे में डाले गए सपने,अरमान,खिलखिलाहटें,दपदपाता रूप,चमकती ऑंखें,यौवन,जीवन.सिर्फ इसका,उसका नहीं.
और फिर निराशा और हताशा की मनों मिट्टी से वो गड्ढा पाट दिया गया.सब कुछ दफ़न हो जाने की सज़ा मिली,सिर्फ इसको,उसको नहीं.
क्योंकि वो बेटा है,अपना है,पवित्र है.
क्योंकि ये बेटी है,पराये की है और प्रेम करने के नाते पापी है.

हाँ उस गड्ढे पर अब एक वृक्ष है जिसमे से रूपये झरते हैं.

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

8 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mrssarojsingh के द्वारा
March 31, 2017

समाज के कड़वे सच को सूंदर अल्फाजों में व्यक्त किया है आपने सरिता जी बधाई स्वीकार करें .

    sinsera के द्वारा
    March 31, 2017

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद सरोज जी.आभारी हूँ.

Alka के द्वारा
March 28, 2017

सरिता जी , बहुत कुछ कह गया आपका ये ब्लॉग | ये दोहरी मानसिकता ख़त्म करने की शुरुआत हमें अपने घर से ही करनी पड़ेगी |

    sinsera के द्वारा
    March 29, 2017

    आदरणीय अलका जी, नमस्कार,आभारी हूँ. आपके कमेंट हमेशा कुछ अच्छा करने की प्रेरणा देते हैं.

yamunapathak के द्वारा
March 27, 2017

सरिता जी बहुत सुन्दर ब्लॉग साभार

    sinsera के द्वारा
    March 29, 2017

    धन्यवाद यमुना जी.आभारी हूँ.

Shobha के द्वारा
March 27, 2017

प्रिय सरिता जी बहुत ही टचिंग अंदर तक आत्मा को हिला दिया पढ़ी लिखी कैरियर की चाह रखने वाली महिलाएं दोहरे पाट में पिसती हैं ,चुनिदा शब्द सुंदर भाषा अनमोल भाव से सजोंई गयी कहानी यह अनेक औरतों की कहानी की आत्मा को आवरण आपने दिया है |

    sinsera के द्वारा
    March 29, 2017

    आपके कीमती कमेंट पड़ी सकारात्मक ऊर्जा देते हैं. ..पढ़ने के लिए आपका बहुत धन्यवाद प्रिय शोभा जी.


topic of the week



latest from jagran