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अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे

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सुबह तो रोज़ जैसी ही हुई थी लेकिन उस दिन एक अजीब सी बात हुई..

उस दिन नींद से जागते ही हर किसी को एक सूचना मिली. किसी के फोन में मैसेज पड़ा था, किसी के अख़बार के अन्दर पैम्फलेट था तो किसी की ईमेल में था..

किसी अनजान का  मैसेज..दर्द में डूबा हुआ..जिसने भी पढ़ा, चौंक उठा..मैसेज में लिखा था..

“मैं अब अपने जीवन से तंग आ चुका हूँ. जिधर भी जाता हूँ, अपनी ही बुराइयाँ सुनता हूँ. हर कोई मुझे कोसता रहता है.हर गलत बात के लिए मुझ पर ही उँगलियाँ उठाई जाती हैं. आरोपों की बौछार से मेरा तन मन  छलनी हो गया है.इतने सारे दोष उठा कर अब मैं जीना नहीं चाहता.इसलिए मैं ने अपने घृणित जीवन को समाप्त करने का फैसला किया है.

मुझे ईश्वर का वरदान प्राप्त है कि जो लोग मुझे सरेआम गालियाँ देते  हैं, अगर वो ही सब, अपने अपने मन में मुझसे मुक्त होने का संकल्प लेकर, एक एक पत्थर मारेंगे, तभी मेरे जीवन का अंत होगा, अन्यथा नहीं…इसलिए आप सब  से अनुरोध है कि मेरे  घृणित जीवन को समाप्त करने  के लिए आप आज दिन में ठीक बारह बजे निश्चित समय पर चौराहे पर पहुँच जाएँ , अपने पवित्र मन और संकल्प से एक एक पत्थर मुझे मारें, और अपनी आँखों के सामने मुझे समाप्त होते हुए देखें.. मैं नगर के चौराहे पर खुद को सूली पर टांग कर संसार  को अपने  बोझ से मुक्त करने के लिए आप  सब का इंतज़ार कर रहा हूँ..

मैं चाहता हूँ कि सभी नागरिक मेरी मृत्यु के साक्षी बने. जिसने जिसने मुझे कोसा है, गालियाँ  दी हैं, दोषी ठहराया है..उन सब की उपस्थिति को मैं अपने   मरते  हुए अस्तित्व  से आखिरी बार महसूस करना चाहता हूँ.. जिन्हें अपने जीते जी मैं ने कभी चैन से नहीं रहने दिया , उन्हें चैन की साँस भरते देखना चाहता हूँ..मैं जिन जिन का दोषी हूँ, उनमे से एक भी अगर मेरे अंतिम क्षण में उपस्थित न रहा तो मैं मर न सकूँगा…अवश्य आइयेगा ..

आपका अपना– पाप  “

नगर में तहलका मच गया..हर कोई पाप को मरता हुआ देखने के लिए उत्सुक हो उठा…बड़े बड़े राजनेता, नौकरशाह,अफसर,बिल्डर,व्यापरी,भक्त, पुजारी,योगी, भोगी, स्त्री , पुरुष, लड़के ,लड़कियां  ….सभी..

हर तरफ एक ख़ुशी की लहर दौड़ गयी. पाप से यूँ छुटकारा मिल जायेगा ये किसी ने सोचा न था.सब को बारह बजने का इंतज़ार था..

लोग अपने अपने काम समेटने लगे.

नेताओं ने भ्रष्टाचार के धंधे समेटना शुरू किया . जब पाप ही न रहेगा , तो ये काले धंधे कैसे चल पाएंगे. काला साम्राज्य समेटते समेटते नेताजी के मन में मोह समा गया. काली  कमाई के बिना जीवन कैसे चलेगा? हजारों नाम से हजारों बैंक अकाउंट हैं. किस किस को सरेंडर करें और किसको रहने दें . बारह बजे तक तो हो भी नहीं पायेगा . फिर  जिस राजसी ठाठ बाट  से रहने की आदत हो गयी है, क्या वो ईमानदारी की कमाई में मिलेगा? लेकिन नेता के पास  ईमानदारी की कमाई? किस सोर्स से आयेगी..?तनख्वाह से..??

जिस जिस को अपनी शक्ति के बल पर शोषित किया है , अब उसको पाप के मर जाने के बाद किसके बल पर दबायेंगे. पाप के मरने से मेरा तो फायदा कम नुकसान ही ज्यादा है.नेताजी असमंजस में पड़ गए. छोडो, मैं नहीं जाता . हजारों की भीड़ में किसी को पता भी नहीं चलेगा कि कौन आया , कौन नहीं आया..

हर जगह अफरातफरी मची थी. पाप के ऊपर पत्थर फेंकने से पहले सब को अपने अपने राज़  छुपाने की चिंता सता रही थी. अफसर ,नौकरशाह अपने दलाली कमीशनी और रिश्वतखोरी के सबूत मिटाने में जुटे थे, लेकिन बौखलाहट में समझ नहीं पा रहे थे कि इनमे से कुछ लिंक तो बचा लें ताकि आगे कभी काम आ सके.

व्यापारियों ने जमाखोरी का माल निकालने की सोची लेकिन फिर उनमे से कुछ बोरियों में कंकड़ मिला मिला कर अपने ही गोदाम में रखने का काम शुरू करवा दिया .

भक्त, पुजारी भगवान का नाम लेने में जुटे थे, मुल्ला ,मौलवी  सजदे में गिरे हुए थे..हे प्रभु, या ख़ुदा, पाप  मर गया तो हमारा क्या होगा. किसी को हमारी ज़रूरत ही न होगी. पाप ही न होगा तो सब नेक राह पर खुद ही चल लेंगे. ये करोड़ों का चढ़ावा, दान दक्षिणा,अरबों का चंदा .. सब बंद हो जायेगा तो हम खायेंगे क्या? हमारा पूरा कुनबा बर्बाद हो जायेगा…भगवान तक पहुँचने का रास्ता दिखाने के नाम पर अब हम किसको भटकायेंगे. रक्षा करो . . रक्षा करो प्रभु. हमको जिंदा रखने के लिए पाप को मरने न दो…

शिक्षक ,रक्षक से ले कर भक्षक तक्षक तक सब के सब बिलबिला कर, जहाँ तहाँ  भाग भाग कर, पाप को मारने से पहले अपने अपने पापों की निशानियाँ मिटाने में जुट गए.. फर्जीवाडे की योजनाओं के कागज़, कुएं तालाब  खोदने के कागज़, पुल और डैम बनवाने के कागज़, फर्जी नियुक्ति, फर्जी एडमिशन, फर्जी अंकपत्र, भविष्यनिधि, छात्रनिधि, यूनिफोर्म, बस्ते, किताबें,मिड डे मील, फर्नीचर, स्टेशनरी, बाढ़ की राहत, सूखे की राहत, सरकारी पत्र, गैर सरकारी पत्र, प्रेम पत्र….सब छुपाये, हटाये, बढ़ाये. फाड़े, जलाये जाने लगे..

आखिर पाप के मर जाने के बाद ये  सब तो सामने आ ही जायेगा.. फिर कोई किसी को क्या जवाब देगा. कोई किसी से कैसे नज़रें मिलाएगा..

सासें रोने लगीं..बिना दहेज़ वाली बहू को जला नहीं पाएंगी, दूसरे की बेटी का अपने हित में शोषण कैसे करेंगी.

बहुएं कलपने लगीं..ससुराल के लिए निष्ठावान बनना पड़ेगा..

कर्मचारी को चिंता सताने लगी कि अब सारे समय ईमानदारी से काम करना पड़ेगा..

विवाहित लोगों का तो काल हो गया..किसी एक के  हो कर कैसे रह सकेंगे ..मन में ही सही, कुविचार आने ही न पायेगा , पाप के बिना तो जीवन नरक सामान हो जायेगा.

कुंवारों की मुसीबत हो गयी… छुप छुप के मिलना,झूठ-फरेब, धोखा, प्रेम के नाम पर जाल में फंसाना, इन सब के बिना नीरस जीवन तो मौत से भी बदतर हो जायेगा…

अब पढ़े बिना पास होने के लिए गुरूजी को चढ़ावा चढ़ाने के दिन गए..फर्जी डिग्री के दिन गए..ऊपर के अधिकारी को मेज़ के नीचे से उपहार देकर नौकरी पाने के दिन गए..

अब कमज़ोर की कमजोरी शक्तिशाली की शक्ति नहीं बन सकेगी..

अब गरीब की गरीबी, अमीर की अमीरी नहीं बन सकेगी..

सारे संसार में हाहाकार मचा हुआ था. ऐसा हाहाकार तो प्रलय आने पर भी न मचता. लोग दौड़ दौड़ कर अपने पापों के सबूत मिटा भी रहे थे और आड़े वक्त के लिए उनमे से कुछ बचा भी रहे थे पर काम ऐसा था कि निपटता ही न था..

देखते ही देखते बारह बजने को आये..समय का पता ही न चला . चौराहे पर सन्नाटा था.. लोग अपने अपने कीमती दस्तावेजों को संजोने में ऐसा लगे कि पाप को मारने जाने के समय का ध्यान ही न रहा ..

ठीक बारह बजे…चौराहे पर पाप के मरने का नज़ारा देखने केवल एक छोटा सा मासूम बच्चा पहुंच कर चुपचाप सूली पर लटके हुए “पाप” के कलेजे  से टपकता हुआ लहू  देख कर दुखी हो रहा था..अपने नन्हे नन्हे हाथों से सहारा  देकर उसने पाप को उतारना चाहा..

“क्यूँ मरना चाहते हैं आप? अगर सब आपसे नफरत करते है तो आइये , मैं आपको अपने ह्रदय में रख लूँगा..”

पाप कांप उठा..”नहीं बच्चे नहीं..तुम्हारा ह्रदय तो बेहद कोमल और निष्कलंक है. ऐसी साफ सुथरी जगह पर तो मैं रह ही नहीं सकता..हर समय मेरा दम घुटता रहेगा..”

“फिर..??”

“फिर क्या..” पाप के होठों पर कुटिल मुस्कान उभर आई. “चिंता न करो प्यारे बच्चे. ईश्वर  के वरदान के मुताबिक मुझे तो ऐसे भी तब तक नहीं मरना है जब तक हर मनुष्य मन में मुझे मारने का संकल्प ले कर एक एक पत्थर न मारे.”

“आज अगर एक भी इंसान पीछे हट जाता तो फिर मैं मर ही नहीं सकता था ..लेकिन  देखो, यहाँ तो मुझे पत्थर मारने कोई आया ही नहीं. . मेरा सूली पर लटके रहना बेकार ही है.. मैं तो  चला वापस उसी संसार में, जो मेरे बिना चल ही नहीं सकता..”

“…..तुम्हारे ह्रदय में भी आऊंगा मैं..” पाप सूली से उतरते हुए मुस्कुराया…”लेकिन अभी नहीं..थोड़े और बड़े हो जाओ..तब आऊंगा..”

बच्चा चुपचाप खड़ा “पाप” की कही हुई बातों को समझने की कोशिश कर रहा था..

visit…

http://sinserasays.com/

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
October 12, 2016

आदरणीया सरिता जी, नए दौर के चालू मेरुदंड के इर्द-गिर्द बहुत ही सघन तंतुओं से बुनी गई आज की दुनियादारी पर यह सटीक कहानी कहने के लिए सहृदय साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    sinsera के द्वारा
    October 12, 2016

    आदरणीय संतलाल जी, सादर नमस्कार, बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई अच्छा लगा , कीमती प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार..

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
August 27, 2016

सरिता जी भगवन का लाख लाख शुक्र है कि मैं अब भी जिन्दा हुॅ ।आपका लेख  पड़ते पड़ते मेरी साॅसे  रूक गयीं जब अपने को अंत तक जिन्दा पाया तो लंबा स्वाश आया । भगवान का स्वरुप ही हुॅ मैं । मै कैसे मर सकता हुॅ । मेरे बिना स्रष्टि अधूरी हो जायेगी । फिर कैसे ओम शांति शांति होगी ।

    sinsera के द्वारा
    August 27, 2016

    आदरणीय हरिश्चंद्र जी, सादर नमस्कार, आपका कमेन्ट पढ़ कर अनायास ही हंसी आ गयी “….वर्ना इस दौर में अब कौन मुस्कुराता है…” खैर..अभी दो दिन पहल ही जन्माष्टमी थी और आप योगेश्वर कृष्ण का सन्देश भूल गए..!! “पाप से घृणा करो, पापी से नहीं..” तो यहाँ पाप के मरने मारने का प्रसंग था पापियों को डरने की क्या आवश्यकता? जब पापियों का नंबर आयेगा तब चिंता न करें, लाइन में आपसे पहले मैं रहूंगी…

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    September 1, 2016

    सरिता जी आत्म संतोष हुआ मरने के बाद कोइ तो साथ होगा । वैसे भी सरिता (गंगा) पतित पावन होती है । ओम शांति शांति 

sadguruji के द्वारा
August 26, 2016

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! सार्थक और विचारणीय ब्लॉग प्रस्तुत करने के लिए आपका सादर अभिनन्दन ! आपका लेख पढ़ एक गीत की ये पंकितयाँ याद आ गईं- “ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या, रीतों पे धरम की मुहरें हैं ! हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे !” पाप-पुण्य को परिभाषित करना कठिन है ! किसी कवि ने कहा है- “तुम उनके जो तुमको ध्यायें ! जो नाम रटें मुक्ति पायें ! हम पाप करें और दूर रहें ! तुम प्यार करो तो माने !” भगवान पापियों से प्रेम करें, उन्हें सन्मार्ग दिखाएं, तभी दुनिया से पाप मिटेगा ! अच्छी प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

    sinsera के द्वारा
    August 26, 2016

    आप ज्ञानी हैं सद्गुरुजी, आपके काफी सारे प्रेरणास्पद ब्लॉग मैं ने पढ़े हैं.पापियों को सन्मार्ग दिखाना आपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है. आपका जीवन धन्य है. प्रश्न यह है कि सन्मार्ग कोई देखना चाहता भी है या नहीं..अगर एक भी व्यक्ति पाप को पत्थर मारने से पीछे हट गया तो पाप कैसे मरेगा..

jlsingh के द्वारा
August 26, 2016

२२ अगस्त को स्व. हरिशंकर परसाई का जन्म दिन था. आपने २३ को इस ब्लॉग को इस पटेल पर उतरा है. इससे अच्छी श्रंद्धाजलि शायद उनके और किसे ने दिया हो पता नहीं. पर आपने एक महत्वपूर्ण विषय जो सबके अंदर व्याप्त है को बहार लाकर आइना ही दिखा दिया! अब क्या होगा? आदरणीया बहना, इसीलिये आपको मैं बड़ी दीदी कहता हूँ. इस रचना को कहीं तो सम्मानित होना ही चाहिए. … यार हमारी बात सुनो ऐसा इक इन्सान चुनो जिसने पाप ना किया हो जो पापी ना हो जिसने पाप ना किया हो जो पापी ना हो. कोई है चालाक आदमी कोई सीधा-सादा कोई है चालाक आदमी कोई सीधा-सादा हममें से हर एक है पापी थोड़ा कोई ज़्यादा …इससे ज्यादा और क्या कहूँ. सादर!

    sinsera के द्वारा
    August 26, 2016

    इस छोटे से प्रयास के लिए आपने बहुत बड़ी बड़ी बातें कह दीं जवाहर भाई, आपका धन्यवाद . शेष, जो कहना चाहा था वो तो आपने समझ ही लिया, ज़्यादा कह के क्या होगा. पढ़ने के लिए धन्यवाद.

Jitendra Mathur के द्वारा
August 23, 2016

बहुत प्रेरक एवं विचारोत्तेजक कथा जिसे मनोरंजन के नहीं, मनन के निमित्त पढ़ा जाना चाहिए और इसमें अंतर्निहित संदेश को ग्रहण किया जाना चाहिए । पाप से मुक्त होने की वास्तविक मंशा ही जब तक न हो, तब तक पाप को कोसना व्यर्थ है ।

    sinsera के द्वारा
    August 24, 2016

    आदरणीय जीतेन्द्र जी, नमस्कार, आपने सही कहा, कथा का वास्तविक सन्देश यही है .. पाप को कोसना एक दिखावा है, वास्तव में तो सभी किसी न किसी हद तक इससे लाभ ही लेना चाहते हैं..कीमती समय देने के लिए धन्यवाद.

Shobha के द्वारा
August 23, 2016

प्रिय सरिता जी अति सुंदर ढंग से आपने पाप कथा का विश्लेष्ण किया ” सही निष्कर्ष “चिंता न करो प्यारे बच्चे. ईश्वर के वरदान के मुताबिक मुझे तो ऐसे भी तब तक नहीं मरना है जब तक हर मनुष्य मन में मुझे मारने का संकल्प ले कर एक एक पत्थर न मारे.”

    sinsera के द्वारा
    August 24, 2016

    आदरणीय शोभा जी, नमस्कार, वैचारिक उद्वेग की ज्वाला में आपकी सराहना मरहम का काम करती है. अतिशय धन्यवाद.


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