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उजाले होते हैं अक्सर "ज्योति" बुझ जाने के बाद.....

Posted On: 23 Jan, 2014 Others,social issues,Others में

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प्रिय ज्योति,
क्या कहूं तुमसे ….
कहने सुनने से परे , न जाने कहाँ, कितनी दूर जा चुकी हो तुम हम सबसे..
अब तो समय भी नहीं रहा कि तुमसे कुछ कह सकूँ..जब समय था तब कहा होता तब पता नहीं तुमने ध्यान भी दिया होता या नहीं..


खैर….बीता हुआ समय, कुछ भी कर के लौटाया नहीं जा सकता, इस बात को जाते दिनों में जाते जाते न जाने कितनी बार, हर पल तुमने महसूस किया होगा..इस दुखद सच को अपने सर्वांग से भोगा होगा..और तुम्हारे साथ समूचे संसार ने…


तुम ज्योति थी न..उजाला करने के लिए तुम्हारा जन्म हुआ था..लेकिन एक विरोधाभास के साथ..


तुम वो ज्योति हो जो बुझ जाने के बाद उजाला कर गयी….


तुम तो वो ज्योति हो जिसके बुझी हुई लौ से उजाला तो क्या , आग लग गयी थी..


लोगों ने तुम्हे “निर्भया” कहा, “दामिनी” कहा , लेकिन सच बताना..क्या तुम्हे भी ऐसा लगा कभी कि तुम निर्भया या दामिनी हो…?? निर्भया किस लिए..?? क्या दिल्ली की भीषण ठण्ड में, आधी रात को सिर्फ मनोरंजन की खातिर किसी मित्र के साथ बाहर जाने को निर्भयता कहते हैं…??माफ़ करना , ये आज़ादी भले ही हर किसी का मौलिक अधिकार सही लेकिन इसे दुस्साहस से जोड़ना तब ही अच्छा माना जाता है जब उससे किसी का कुछ भला होने वाला हो…बेवजह कोई दुस्साहसिक कदम उठाना निर्भयता नहीं कहलाता..बिना किसी भी बारे में सोचे हुए , कुछ भी ऊट-पटांग कर बैठना कहाँ की निर्भयता है..


तैराकी सीखना किसी का अधिकार सही लेकिन बिना किसी तुक के भँवर में कूद पड़ना निर्भयता नहीं होती…


तुम ने अकारण ही बहुत कष्ट भोगे,.एक छोटी सी भूल का बहुत बड़ा खामियाज़ा भुगता..सारी दुनिया तुम्हारे साथ थी..सब ने तुम्हारे स्वास्थ्य और जीवन के लिए दुआएं मांगीं..तुम तो अंदर अस्पताल के बेड पर ज़िन्दगी और मौत की लड़ाई लड़ रही थी और बाहर हाँड़ कंपाने वाली ठण्ड में सारा का सारा संसार तुम्हारे लिए दिन , रात, सर्दी और बारिश की परवाह किये बिना सड़कों पर खड़ा था….तुम्हारे साथ जो अमानुषिक दुर्घटना घटी उसकी शुरुआत तुम्हारे इस अकारण के दुस्साहस से ही हुई..बेशक किसी को भीरु नहीं होना चाहिए लेकिन अनमोल जीवन को अंगारों के कुँए में कूद कर गंवाना निर्भयता तो नहीं कहलाता… ..


एक बार ..अगर सिर्फ एक बार तुमने सोचा होता तो शायद रात में घूमने का कार्यक्रम दिन में भी रखा जा सकता था..रविवार था उस दिन..अवकाश का दिन था और कार्य दिवस अगले दिन था…तुमने जो अकारण सजा पायी उस कष्ट का सहभागी बनते हुए दुनिया में किसी ने कभी ये प्रश्न नहीं उठाया ….

और तो और तुम्हारी माँ , श्रीमती आशा सिंह को भी दुर्योग ने ये मौका कभी नहीं दिया..कितनी बेबसी झेली होगी उन्होंने …..अगर मौका मिला होता तो शायद मन में उमड़ने घुमड़ने वाले लाखों हज़ारों सवालों में से वो तुमसे ये पूछतीं कि “बेटी, मुझसे पूछे बिना रात के दस बजे किसी लड़के के साथ तुम मूवी देखने क्यूँ गयी थी..अगर तुम बलिया में होती तब भी क्या ऐसा करती.?.मेरे द्वारा दी हुई आज़ादी का क्या तुमने गलत फायदा नहीं उठाया..?? तुम पर भरोसा करके मैं ने तुम्हे पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए बाहर भेजा था, न कि ज़िन्दगी को लापरवाही के हवाले करने….लड़के से दोस्ती करना गलत नहीं है और न ही कार्य के बोझ से थके हुए मन को तरोताज़ा करना कोई गलत बात है ..फिर भी…तुम्हारा मन इस बात को गलत क्यूँ समझ रहा था…तभी तो फोन पर वार्तालाप होने पर तुमने एक बार भी अपनी माँ को अपने प्रोग्राम के बारे में नहीं बताया ….बताया होता तो शायद अनुभव होने के नाते मैं तुम्हे रात में बाहर जाने से रोकती …शायद तुम मेरे कहने से तुम अपना प्रोग्राम स्थगित कर देती तो शायद आज कब्र में सोने के बजाय तुम मेरे सीने से लग कर सो रही होती..”.शायद..शायद..शायद…
मुझे लगता है कि निर्भय तुम नहीं बल्कि तुम्हारे बहादुर माता-पिता हैं…तुम्हारी बूढी दादी हैं..जो तुम्हारे चले जाने के बाद अपनी बाकी की बची हुई उम्र भर तुम्हारे साथ घटी हुई “रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर ” श्रेणी की अमानुषिक दुर्घटना का दंश दिलेरी के साथ झेलेंगे….


निर्भय तुम्हारी माता आशा सिंह हैं..उनकी मर्मान्तक पीड़ा को समझ पाना आसान काम नहीं है..एक माँ का पागल मन ही ऐसा हो सकता है कि यह पता होते हुए भी कि तुम्हारे पेट में एक भी सेंटीमीटर आँत नहीं है, फिर भी वो तुम्हारी आखिरी साँस लेने तक तुम्हे कुछ खिला सकने की चेष्टा करती रहीं….और फिर भी जिन्होंने मीडिया द्वारा लगभग दस महीनों तक तुम्हारा नाम छुपाये जाने के ढकोसले को बेतुकी बकवास बताते हुए कहा……


“मेरी बेटी ने कोई गलत काम नहीं किया तो फिर उसकी तस्वीर और असली नाम क्यूँ छिपाया जाये. मुंह वे छिपाएं जिन्होंने ये घिनौना काम किया..”


तुम्हारे निर्भय पिता श्री बद्री लाल जी पूरी हिम्मत के साथ संसार से कहते हैं कि..“मेरी बेटी के विषय में कुछ भी कहें थोड़ा है. उसने जो लड़ाई लड़ी आपने देखी, अस्पताल में जूझते हुए बयान दिए. मगर अब ये लड़ाई आपको लड़नी है. और ये मशाल तब तक जलनी है, जब तक दिल्ली से, देश से ये दरिंदगी का अँधेरा खत्म हो जाए. और जो ऐसे हादसे का शिकार होकर जिंदा हैं, लड़ाई लड़ रही हैं, उनके लिए समाज को जागना होगा.”


ये सच है कि जिस समय ये दुर्घटना हुई उस समय हिंदुस्तान तो क्या ,पुरे विश्व में एक आक्रोश की लहर जाग उठी थी..लोग-बाग अपना होश-हवास खो कर, भूख,प्यास,नींद, सर्दी, बारिश भूल कर सड़कों पर आ उतरे थे..सिर्फ तुम्हारा हाल जानने को और तुम्हारे न रहने पर तुम्हे न्याय दिलाने को…लेकिन क्या हुआ..समय बीतने के साथ ज़ख्म भरते गए..हफ्ता बीतते न बीतते इसी किस्म की घटनाएं फिर सुर्ख़ियों में आने लगीं..तुम्हारे अपराधी पकडे गए लेकिन पूरे समाज में जो नराधम खुले घूम रहे हैं वो अपनी करनी करतूत करते चले आ रहे हैं..


ऐसा लगता है कि अख़बारों का प्रकाशन ही बलात्कार की ख़बरें छापने के लिए होता है…


कहते हैं कि औरत की छठी इन्द्रिय बहुत तेज़ होती है..लेकिन तुम किस धुन में थी कि रात की आखिरी बस में बैठे 6 नरपिशाचों के चेहरों पर खिंची अपराधिक भंगिमा न भाँप सकी..ऐसी दुःसह परिस्थिति में सड़क पर पैदल चलना ज़यादा श्रेयस्कर होता…
दुर्घटना को होने देने का मौका ही नहीं देना था न…
अब ये तो होगा नहीं कि दुर्घटना के डर से लड़कियां पढ़ना लिखना , बाहर निकलना , उन्नति और विकास के कार्यों में सहभागी होना छोड़ दें..आधी आबादी अगर घर बैठ जायेगी तो बाहर बचेगा क्या..???प्रतिभा, बौद्धिकता, मानसिक क्षमता .सब के सब आधे हो जायेंगे….


लेकिन ये भी सच है कि मनुष्यों के बीच मानुष-वेश में ही भेड़िये भी होते हैं..उनका क्या किया जाये….

वास्तव में लड़कियों को अपनी छठी इन्द्रिय को इतना तीव्र कर लेना चाहिए कि इन छद्म-मनुष्यों को पहचान सकें और इनसे सतर्क रहें….

देखो न…कोई भी बच्चा माँ के गर्भ से बलात्कारी बन के पैदा नहीं होता…
उसके आस-पास के वातावरण , संस्कार और पालन-पोषण में कोई बहुत भीषण कमी होती है जो उसको एक बलात्कारी के रूप में परिवर्तित कर देती है…ये बेहद चिंता का विषय है कि अब जब कि पहले की तरह रेप की घटनाओं को शर्मिंदगी की चारदीवारी में छुपा कर नहीं रखा जा रहा है ..दुनिया भर में इस निकृष्टतम अपराध के खिलाफ जागरूक आवाज़ें भी उठायी जारही हैं फिर भी ऐसी घटनाओं का ग्राफ निरंतर बढ़ता ही जा रहा है…

ज़ाहिर सी बात है कि अपराधी को अपने शिकार के कष्ट या बर्बादी से कुछ लेना देना नहीं होता बल्कि वे उसकी बेबस हार को अपनी जीत में बदल कर अपने निकृष्ट पौरुष का खुद को भरोसा दिलाते हैं….तो क्या उनका उपेक्षित अतीत कुछ ऐसा होता है जहाँ उनका अपने स्वाभाविक अस्तित्व से भरोसा उठ चुका होता है…??उनके बचपन को मिलने वाली देखभाल , वातावरण या पालन-पोषण में अवश्य ही कोई भारी कमी होती है…..

इस ओर कभी किसी का ध्यान नहीं गया लेकिन बलात्कारियों की मानसिकता का अध्ययन बेहद चौंकाने वाला होता है…अपराध की गम्भीरता और घृणितता को देखते हुए ये निकृष्ट व्यक्ति अवश्य ही नफरत के योग्य होते हैं लेकिन अपराध के परे ये बेहद शक्तिहीन और बेचारगी कि हद तक मानसिक बीमार होते हैं..इनमे आत्मसम्मान की घोर कमी होती है..सर्वेक्षणों द्वारा एकत्र आंकड़े बताते हैं कि अधिकतर वे ही पुरुष बलात्कारी बनते है जिनके बचपन ने अपने घर में कलहपूर्ण माहौल देखा है..जहाँ परिवारीजन आपस में असभ्य और अपशब्दो से भरपूर भाषा का प्रयोग करते हैं..बच्चों को बिना उनकी पूरी बात सुने , बेदर्दी से मारा और गालियों द्वारा डांटा जाता है..गलती के बगैर सजा दी जाती है ….और तो और , आंकड़े यहाँ तक कहते हैं कि उनके परिवार की महिलाएं बहुत संस्कारी और आदर्शवान होने का केवल ढकोसला और दिखावा करती हैं पर वास्तव में अंदर ही अंदर कुटिल होती हैं…इसी लिए इनके मन में औरतों की कोई इज्जत नहीं होती क्योंकि इन्होंने अपने घरों में इज्जत किये जाने योग्य महिलाएं नहीं देखी होती हैं.. …

इस तरह के माहौल से सामंजस्य न बैठा सकने के कारण बच्चे के मन में प्रतिशोध उपजता है जो अंदर ही अंदर उसको कुंठित और विद्रोहित करता रहता है…बढ़ती उम्र के साथ साथ बालक तनावग्रस्त रहने लगता है …किशोरावस्था में जब शरीर के रहस्यों की पहचान होने लगती है तो बालक तनाव को सेक्स द्वारा दूर करने का सरल उपाय खुद बखुद खोज लेते हैं…अवचेतन मन में निरंतर बसने वाली कुंठा , तनाव और निराशा के कारण महत्वाकांक्षा और जीवन से कुछ मिल सकने की आशा को तिरोहित हो कर भग्नाशा में बदलते देर नहीं लगती…ऐसा व्यक्ति हर समय हर किसी से प्रतिशोध लेने की भावना से ग्रस्त हो जाता है..ऐसे में जब भी कोई कमज़ोर शिकार सामने आता है तो ये दिशाहीन पुरुष बलात्कार जैसा निकृष्टतम अपराध कर बैठते है ..

इसके ठीक विपरीत , मनोविज्ञान कहता है कि जिन लड़कों कि माँएं उन पर प्यार दुलार से नियंत्रण रखती हैं, उन्हें अपने नज़दीक रखती हैं, वे लड़के स्त्री स्पर्श में छुपे प्रेम की कोमलता को समझते हैं और सम्मान देते हैं…

अभी तुम ये कहोगी कि किसी को देख कर उसके अतीत के बारे में कैसे जाना जा सकता है..पर ऐसा नहीं है..अस्वस्थ व्यक्ति, चाहे वो मानसिक रूप से अस्वस्थ ही क्यूँ न हो….साफ़ पहचान में आ जाता है..

ऐसे व्यक्ति के हाव भाव भंगिमा , बात करने का तरीका सामान्य व्यक्ति से बिलकुल अलग होता है ..वे अगर समूह में हो तो खामखा एक दूसरे से फूहड़ बातें और भद्दे इशारे करके आतंकित करने की हद तक अट्टहास करते हैं .. और अगर अकेले ही हो तो नोटिस किये जाने की हद तक असामान्य और भोंडी हरकतें करते हैं..
ज़ाहिर है कि ये घोर अपराध अकेले में ही होता है इसलिए ऐसे मौके पर वे अगर किसी शिकार को देख लेते है तो पहले छिछले किस्म की हरकत शुरू कर देते हैं और विरोध किये जाने की स्थिति में पकड़ जाने या बात बिगड़ने के डर से अपराध को पूरा करने का भरसक प्रयास करते हैं…यहाँ तक कि वे अपने शिकार की जान भी ले बैठते हैं..
इतना तो तय है की अगर समय रहते कोई सहायता को न आ गया तो फिर इन मानसिक रोगी इंसान रूपी भेड़ियों से एक कमज़ोर लड़की का बचना लगभग असम्भव हो जाता है…


तो फिर ऐसी स्थिति ही क्यों आने दी जाये…


घर से निकलते समय ये बिलकुल पता नहीं होता कि रास्ते में साधू मिलने वाले हैं या शैतान…तो फिर क्यूँ न अपनी सुरक्षा का प्रबंध करके चला जाये….बुराई को मिटाने का संकल्प लेने के लिए सब से पहले ज़िंदा रहना तो ज़रूरी है न…

मानसिक रूप से विकृत व्यक्ति को सुधार पाना लगभग असम्भव है….क्योंकि बीमारी के कीटाणु काफी पहले से , उसके बचपन के दिनों से ही अंदर घर बनाना शुरू कर देते हैं..
अशिक्षा या कुशिक्षा, माता पिता का लापरवाह पालन पोषण, घर का गन्दा माहौल, बुरी सोहबत, बच्चे की गलत आदतों और बुरी हरकतों को नज़रअंदाज़ करना आदि ऐसे हज़ारों कारण है जो व्यक्ति को दिग्भ्रमित कर देते हैं..ऐसे में कुंठित मन से सही गलत की पहचान ख़त्म हो जाती है और कहीं अगर किसी गलत हाथों द्वारा अश्लील साहित्य या फ़िल्म से परिचय करा दिया गया तो बस एक अच्छा खासा व्यक्ति सेक्स द्वारा तनाव को दूर करने के सरलतम तरीके के बारे में जान लेता है और शिकार की तलाश में रहने लगता है….


ज़रा सोचो ज्योति…..ऐसे व्यक्तियों को भीड़ में से ढूँढ कर गोली तो नहीं मारी जा सकती न…सिर्फ बचा ही जा सकता है….काश समय रहते ये बातें तुम्हे समझायी जा सकतीं…..

तुम तो अपनी नासमझी से कुर्बान हो गयी लेकिन ऐसी और न जाने कितनी बच्चियां, लड़कियां और महिलाएं हैं जो तुम्हारी बुझी हुई ज्योति से उजाला मांग कर अपने जीवन को खतरे से बचा सकती हैं….

ज़रूरत है आत्मविश्वास की…न की अतिरेक विश्वास की..


लेकिन देखो…साल बीतते देर न लगी पर कुछ भी न सुधरा..तुम्हारा शहीद होना बेकार चला गया, स्थिति ज्यूँ कि त्यूँ है, बल्कि और बिगड़ गयी है….कारण जानना चाहती हो….???

क्योंकि लोग पापियों को सजा दिलाने में जुट गए और पाप के कारण को नज़रअंदाज़ कर बैठे…इसीलिए पापी मिटते गए परन्तु पाप फलता फूलता रहा….


ये कर्महीन, दिशाहीन, लक्ष्यहीन भटकती नौजवानी….अपनी योगयता से ऊँची महत्वाकांक्षा पालना…थोड़े से पैसे कमा कर उसे मौज मज़े में खर्च करना….अश्लील साहित्य/फ़िल्म का चस्का…मस्तिष्क को पंगु बना देता है…और खामखा का तनाव बाहर निकलने के असामान्य रास्ते ढूँढता है..


इसीलिए देखो….अधिकतर ऐसे अपराधी निचले तबके के कम पढ़े लिखे साधारण कमाई वाले कामगार पाये जा रहे हैं..जिनके जीवन का लक्ष्य चार पैसे पा कर पूरा हो चुका है…

लोग कहते हैं कि लड़कियों का खुला पहनावा और उन्मुक्त व्यवहार अगर बलात्कार के लिए उकसाता है तो फिर नन्ही बच्चियां या उम्रदराज़ महिलाएं इनका शिकार कैसे बन जाती हैं….लेकिन वास्तव में कारण यही है….


आज जब कि मोबाइल और इंटरनेट बेहद सस्ते हो कर निचले तबके के आम आदमी के हाथ तक पहुँच चुके हैं वहाँ ये कम पढ़े लिखे , थोड़े से पैसे पा जेन वाले कामगार, इसका उपयोग शिक्षा के लिए नहीं बल्कि पोर्न साइट्स देख कर उत्तेजित होने के लिए करते हैं..और देखो न , उधर कोई लड़की अर्धनग्न हो कर पैसे कमाने के लिए पोर्न फ़िल्म में काम कर के उकसाने का निकृष्ट काम करती है , इधर कोई दूसरी शालीन , निरपराध लड़की अपराधी के हत्थे चढ़ कर अपनी ज़िन्दगी बर्बाद करवाती है….

क्या कभी किसी ने इस देश में ये आवाज़ उठाई कि जहाँ लड़कियों को शिक्षा देने के लिए फीस मुक्ति, किताबें , साईकिल, लैपटॉप अदि दिए जाने की योजनाएं पायी जाती हों ,उस विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारतवर्ष में सर्वोच्च न्यायपालिका द्वारा मदिरालयों में लड़कियों को बार डांसर का काम करने के लिए लाइसेंस क्यूँ दिया जाता है….ये लड़कियों को विकास की कौन सी राह दिखाई जा रही है..

एक छोटी सी डिवाइस लगा कर समूचे क्षेत्र में पोर्न साइट्स को बंद किया जा सकता है….देश में बढ़ते हुए यौन-अपराधों के देखते हुए भी इन साइट्स का धड़ल्ले से प्रचलन जारी है और कानून के रखवालों के कान पर जूँ नही रेंगती..

खैर..ऐसे ही देश में हम बसते हैं तो फिर अपनी सुरक्षा अपने हाथ….

अपने लिए, अपने माँ बाप के लिए, अपने परिवार के लिए, अपने अस्पताल के लिए……तुम जी रही होती तो नज़ारा ही कुछ और होता….

आज ज्योति, तुम बुझ गयी लेकिन बुझने के बाद भी अगर किसी को कुछ उजाला मिल सके  तो हम यही कहेंगे..

हमेशा वक़्त का कानून चलता हो, ऐसा ही नहीं होता,
उजाले होते हैं अक्सर  ”ज्योति”  बुझ जाने के बाद…..


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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Kailin के द्वारा
July 11, 2016

Claro, no te extrañe, veremos a ver cuanto tiempo tardan en hacerlo en las comunidades gobernadas por el PP,lo del REPAGO, di¡e9&#1,1;SorÃgn ciegos y sordos en Andalucia los que les van a votar?Salud

Shobha के द्वारा
August 16, 2014

बहुत ही अच्छे विचार आँख मैं आंसू आ गए डॉ शोभा

    sinsera के द्वारा
    August 16, 2014

    आदरणीय शोभा जी,नमस्कार, दुःख तो इस बात का है की अभी भी इस तरह की घटनाओं में कोई कमी नहीं है बल्कि दिनोदिन मानसिक विकृति की दर और अपराध की वीभत्स्ता बढ़ती ही जा रही है….

visnu Kulshrestha के द्वारा
June 21, 2014

आदरणीया सरिता बहन काफी दिनों से आपका कोई लेख नहीं आया है सब ठीक है

sadguruji के द्वारा
April 6, 2014

आदरणीया सरिता सिन्हा जी,लगभग दो महीने से मंच से आप अनुपस्थित हैं.ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि आप स्वस्थ हों और आपके घर में सब कुशल मंगल हो.हम सब लोग आशा करते हैं कि नए संवत में आप अपनी रचनाओं के साथ मंच पर शीघ्र उपस्थित होंगी.शुभकामनाओं सहित.

yogi sarswat के द्वारा
January 30, 2014

ये सच है कि जिस समय ये दुर्घटना हुई उस समय हिंदुस्तान तो क्या ,पुरे विश्व में एक आक्रोश की लहर जाग उठी थी..लोग-बाग अपना होश-हवास खो कर, भूख,प्यास,नींद, सर्दी, बारिश भूल कर सड़कों पर आ उतरे थे..सिर्फ तुम्हारा हाल जानने को और तुम्हारे न रहने पर तुम्हे न्याय दिलाने को…लेकिन क्या हुआ..समय बीतने के साथ ज़ख्म भरते गए..हफ्ता बीतते न बीतते इसी किस्म की घटनाएं फिर सुर्ख़ियों में आने लगीं..तुम्हारे अपराधी पकडे गए लेकिन पूरे समाज में जो नराधम खुले घूम रहे हैं वो अपनी करनी करतूत करते चले आ रहे हैं.. उसकी बहुत गलतियां रही होंगी और ये गलतियां दिल्ली में कोई मायने नहीं रखती जहां 14 साल की उम्र में बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड की जरुरत महसूस होने लगती है , क्यूँ ? मैं नहीं जानता ! तब अपने संस्कारों और सरोकारों की याद नहीं रह जाती किसी को भी ! जो हुआ वो जैसा हुआ , कोई अलग अलग तरीके से बयान करेगा किन्तु उसकी मौत ने बहुत कुछ बदला तो है कानून की किताब में , भले जमीन पर उसका असर नहीं दीखता !

    sinsera के द्वारा
    January 30, 2014

    आदरणीय योगी जी नमस्कार ….ज़ख्म भर चुके हैं दिख रहा है..”मैं नहीं जानता”…बहुत आसान है कहना …सच कहा आपने ….कानून की किताब में जो कुछ भी बदला हो, ज़मीं पर असर नहीं है….विचार प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद..

yamunapathak के द्वारा
January 28, 2014

सरिता जी इस ब्लॉग के दोनों ही पहलू बहुत ही विचारणीय हैं. अपराध के कारणों का विश्लेषण बहुत ही तार्किक है …और सच कहा आपने पोर्न साइट्स बंद होने चाहिए….इन अपराध को मैं क्षणिक भावावेश से उतपन्न भी नहीं मानती ये हर वक्त अंतर्मन में उठने वाले विचारों की कार्यों में परिणति होते हैं अच्छा साहित्य,अच्छी संगति से कोसों दूर ऐसे व्यक्तित्व सदा जो सोचते हैं वही कर बैठते हैं सच कहूं तो जिनके लिए साहित्य लिखा जाता है वे इसे पढते नहीं और जो पढ़ रहे होते हैं वे पहले से ही सुसंस्कृत और परिष्कृत होते हैं अगर आपका यह ब्लॉग ऐसे लोगों तक भी पहुँच पाता वे भी इसे पढते …पर नहीं पोर्न साइट्स देखना ही जब अच्छा लगे तो कोई इतने सुन्दर विचारों तक क्यूँ आना पसंद करे .इस सम्बन्ध में मैंने यह छोटी सी भावाभिव्यक्ति रखी है यहाँ ……. o poetry ! plzzzzzzzz…… u go to hibernate or be dormant as ……. you are useless for those who need to be changed and who want to read you are already changed. इतने उत्कृष्ट ब्लॉग के लिए आपको हार्दिक बधाई.

    sinsera के द्वारा
    January 29, 2014

    प्रिय यमुना जी, नमस्कार..आपकी यह छोटी सी भावाभिव्यक्ति मुझे भाव विह्वल कर गयी…और इसके साथ आपकी प्रतिक्रिया भी बहुत अच्छी लगी..ये बात तो है कि जिन तक ये बात पहुंचनी चाहिए वे तो ऐसे साहित्य से कोसों दूर हैं…इसीलिए हमें ये करना होगा कि हम समाज को जागरूक करें…आज स्कूलों में चौथी पांचवी क्लास से ही बच्चे बॉय फ्रेंड गर्ल फ्रेंड बनाना चालू कर देते हैं…ताज्जुब होता है कि अक्सर दोस्तों तक बात सीमित रहती है और माँ बाप तब जान पाते हैं जब पानी सर से ऊपर चला जाता है… आरुषि का केस इसका ज्वलंत उदहारण है..सहेलियों के उकसाने पर उसने घरेलु नौकर से सम्बन्ध बनाये …माता पिता का इस तरह समाज में ऊँचा मुकाम हासिल करने का क्या फायदा कि अपना बच्चा ही गर्त में गिरा पड़ा हो….खैर..न तो एक अपराधी है और न ही एक शिकार…..सब शिक्षा लें और सब की भलाई सोचें तभी कुछ हो सकता है…..अपने विचार देने के लिए आपका धन्यवाद..

mparveen के द्वारा
January 27, 2014

सावधानी में ही सुरक्षा है … और यही सत्य है .. अति हर चीज की बुरी है फिर वो चाहे आजादी हो या कुछ और … सबकुछ सोच समझकर अगर कदम उठते तो शायद………..

    sinsera के द्वारा
    January 29, 2014

    प्रिय प्रवीण जी, नमस्कार….बदली और कुहासे के मौसम में धूप की तरह बहुत दिनों बाद आपने दर्शन दिए…अच्छा लगा..आपकी बात भी अच्छी लगी कि हर काम करने से पहले लोग थोडा सोच कर कदम उठाते तो शायद….

sadguruji के द्वारा
January 27, 2014

आदरणीया सरिता सिन्हा जी,पूरा लेख पढ़ने के बाद महसूस हुआ कि आपने कितनी मेहनत इस लेख को लिखने में की है.एक बहुत सार्थक पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाई.आपने अपने लेख में एक जगह कहा है कि-”एक बार ..अगर सिर्फ एक बार तुमने सोचा होता तो शायद रात में घूमने का कार्यक्रम दिन में भी रखा जा सकता था..रविवार था उस दिन..अवकाश का दिन था और कार्य दिवस अगले दिन था…तुमने जो अकारण सजा पायी उस कष्ट का सहभागी बनते हुए दुनिया में किसी ने कभी ये प्रश्न नहीं उठाया” उस लड़की ने तो गलती की ही,परन्तु ये घटना हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है ?समाज में गरिमा और सम्मान के साथ सभी को जीने का अधिकार है,जो हमारा सरकारी सिस्टम हमें देने में असमर्थ है.निर्भया ने अपनी जान अपनी गरिमा और सम्मान की रक्षा के लिए लड़ते हुए कुर्बान की है,उसके बहादुरी के जज्बे को सलाम.लानत है उन रेपिस्टों पर और शर्म आनी चाहिए हमारे सरकारी सिस्टम को जो हमें सुरक्षा प्रदान करने में नाकाम है.आप ने और कई ब्लॉगर मित्रों ने इंटरनेट पर परोसे जानेवाली अश्लील सामग्री को बढ़ते हुए बलात्कार के लिए दोषी ठहराया है.ये भी एक अर्धसत्य है.मैं एक पुस्तक पढ़ रहा था,उसमे दिया था कि समाज में आज से भी ज्यादा बलात्कार प्राचीन समय में होता था,जबकि उस समय इंटरनेट टीवी और फ़िल्म कुछ भी नहीं था और महियाएं कपड़ों से पूरा शरीर ढके रहती थीं.बलात्कार एक प्राकृतिक बीमारी है.यदि ऐसा नहीं होता तो तेजपाल बुद्धिजीवियों पर बलात्कार के आरोप नहीं लगते.आदरणीय संतलाल करुण जी कभी बलात्कारियों का गुप्तांग काटने की बात करते है तो कभी उनको मौत कि सजा देने की बात करते हैं.ये कोई स्थायी समाधान नहीं है और बुद्धिजीवियों के द्वारा सुझाया गया उचित समाधान भी नहीं है.इस समस्या का उचित समाधान ये है कि हम इसे एक प्राकृतिक समस्या मानते हुए स्त्री और पुरुष दोनों एक दुसरे कि प्रकृति को समझें और आपस में दोस्ती बढ़ाएं.समाज में जब भावनात्मक सम्बन्ध बढ़ेंगे तो बलात्कार जैसी घटनाएं तभी रुकेंगी.बलात्कार केवल मर्द ही नहीं करते हैं,बलात्कार स्त्रियां भी करती हैं,लेकिन उस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता है.कमेंट थोडा विस्तृत हो गया,इसके लिए क्षमा कीजियेगा.अच्छे लेख के लिए पुन:बधाई.

    sinsera के द्वारा
    January 29, 2014

    आदरणीय सद्गुरुजी, नमस्कार, जो बात मुझे खटकी थी उस को अपने अंडरलाइन नहीं किया…मैं ने आगे कहा…”अगर तुम बलिया में होती तब भी क्या ऐसा करती…??” थोड़ी यह बात भी होती है , बच्चे घर से निकलते ही आज़ाद पंछी की तरह उड़ने लगते हैं..खैर…..ज्योति की मृत्य “Multiple system failure” से हुई ….सिर्फ उसका ही नहीं बल्कि पूरी सोसाइटी का “Multiple system failure” हुआ था……सिर्फ इंटरनेट की ही बात नहीं है वो तो जलती हुई आग में घी जैसा है..इंसान का लालन पालन , परिवेश, पैरेंटिंग ..सब कुछ मायने रखती है….बीमारी की जड़े बहुत गहरी हैं तभी तो त्वरित सजा दे कर भी समाधान के बजाय घटनाएं बढ़ती जा रही हैं…अपने सही कहा की एक दूसरे को सम्मान देने से ही ऐसी घटनाएं रुकेंगी….स्त्रियां पुरुष को उसकी इच्छा के विरुद्ध उकसा तो सकती हैं लेकिन इससे पुरुष की प्राकृतिक शारीरिकी को कोई नुकसान नहीं पहुचता इसलिए दोनों के “after effect ” में बहुत फर्क है …..अपने समय दिया इसके लिए धन्यवाद…

Sonam Saini के द्वारा
January 27, 2014

नमस्कार जी …………… अगर ये कहूं कि हमेशा कि तरह ही एक बहतरीन लेख लिखा है आपने तो फिर ये एक घिसा पिटा कमेंट होगा लेकिन यही सच है तो कहना तो पड़ेगा ही …………लाजवाब लेख …… जहाँ तक मैंने समझा है, मैंने महसूस किया है तो ये लेख एक “लेखिका” ने नही बल्कि एक “माँ” ने लिखा है ! और लोग अगर इसे पाठक न बनकर एक माँ , पिता, भाई, बहन, बेटी बनकर पढ़ेंगे तो शायद आपके लेख के उद्देश्य को ठीक से समझ पाएंगे ! अपनी सुरक्षा का खुद ही प्रबंध करना होगा लेकिन बड़े अफ़सोस से ये कहना पड़ रहा है कि सुरक्षित होना सब चाहते हैं लेकिन सुरक्षा करना कोई नही चाहता ! आप ही की तरह अगर सभी माँ- पिता या घर के बाकि सदस्य भी अपने बच्चो को ये सब बाते समझा पाये तो निश्चित ही स्थति में कुछ सुधर जरुर होगा ……आई होप कि मैंने कुछ गलत नही कहा होगा ……………धन्यवाद and All the best….

    sinsera के द्वारा
    January 28, 2014

    एक मुद्दे की बात मिली…माँ…लेकिन माँ अक्सर अपने बच्चे की सुरक्षा कर के निश्चिन्त हो जाती है…यदि सारे लोग सारे लोगो को सुरक्षित देखना चाहें और प्रयास करें तो निश्चित ही स्थति में कुछ सुधार जरुर होगा….शुभकामना के लिए धन्यवाद..

Rachna Varma के द्वारा
January 24, 2014

सरिता जी हमेशा कि तरह बहुत बढ़िया लेख , अगर जागरूकता रहे और लड़कियाँ स्वयं को मजबूत तथा थोड़ी सी भी चैतन्य रखे तो दुर्घटनाओ को टाला जा सकता है भेड़िये तो हर दौर में हर जगह मिल जायेंगे जरुरी है कि समय रहते उनके इरादो को भांपने का सलीका सीख जाये |

    sinsera के द्वारा
    January 25, 2014

    रचना जी नमस्कार…समाज में हर वर्ग की तरह एक अपराधी वर्ग भी पाया जाता है….इनको सजा देने का काम जिनका है वो कर रहे हैं..हम सिर्फ आवाज़ उठा सकते हैं और अपनी सुरक्षा कर सकते हैं…. सहमतिसूचक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद…

    sinsera के द्वारा
    January 25, 2014

    आदरणीय सर, .आपके आलेख पढ़े लेकिन आपने कमेंट्स बंद कर रखे हैं इसलिए खाली हाथ लौट आयी … अपराधी को सजा दिलाने के लिए दुनिया भर में आवाज़ें उठायी गयीं और उठायी जा रही हैं..उन में मेरी भी एक आवाज़ शामिल है ..लेकिन ये अंतहीन क्रम है …इस तरह तो पापी कुंठित हो जायेगा लेकिन पाप और पाप की सम्भावना अन्यत्र बनी रहेगी..कितने जंगलों में से कितने अपराधियों को चुन कर कितनी बार सजा दी जायेगी……मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं ने बलात्कारियों के पक्ष में कोई बात कही हो..ये तो सिर्फ एक कार्य-कारण सम्बन्ध का विश्लेषण है.. बिना कारण जाने किसी भी बीमारी को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जा सकता..ये वैसे ही है जैसे हम किसी बीमारी का वैक्सीनेशन लेते हैं…इसका ये मतलब तो नहीं कि इलाज किया ही नहीं जायेगा…आपके कहने का ये अर्थ भी लगाया जा सकता है बलात्कार की घटनाएं होती रहें ताकि बलात्कारी को भीषण सजा दी जा सके…. किसी को पकड़ कर मार डालने से सिर्फ सोच समझ का आभाव झलकता है इससे धरती का बोझ कभी कम नहीं होता……वर्ना इतनी विभीषिकाएँ हुईं…भूकम्प आये, ट्रेने टकरायीं, प्लेन क्रश हुए, बादल फटे, दंगे हुए, आतंकी हमले हुए…..लेकिन जनसँख्या का आंकड़ा वहीँ का वहीँ है………..माफ़ी चाहती हूँ, आपने हमेशा गम्भीर सोच का परिचय दिया है ,आपसे ऐसे लापरवाह कमेंट की अपेक्षा नहीं थी….कृपया अन्यथा न लीजियेगा …कीमती समय देने के लिए धन्यवाद…

Madan Mohan saxena के द्वारा
January 24, 2014

भाबपूर्ण आलेख सादर मदन कभी इधर भी पधारें

    sinsera के द्वारा
    January 25, 2014

    कीमती समय देने के लिए धन्यवाद मदन जी…

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
January 24, 2014

इतना लम्बा लेक्चर :( काई को ?? एतना सुनाने को नहीं मांगता है !! मिसटीक हुआ बच्ची से….वो अभी हयात होता, तो मैं उसको सारी बोलने को कहता | पूरा लेखा पढ़ा, ऐसा लगा जैसे जोर की डांट पड़ रही है | ये हड़काने वाला लेख था | वैसे न तो मेरा रेप हुआ और न ही मैंने किसी का रेप किया है, गुस्सा भी आ रहा था इतना सब कुछ सुन कर | ऐसा थोड़े न बोलतें है, वो बेचारी मर गयी और आप उसको सुनाए जा रही है… तकलीफ होता है | और ये अचानक आपको गड़े मुर्दे को उखाड़ने को काय सूझी, बात आई गई हो गई, ये अचानक से झंडा-वंडा ले कर कैसे निकल गईं???

    sinsera के द्वारा
    January 25, 2014

    आपका कमेंट ज़माने की ज़बान बोलता है..यही सच है ..दुनिया वालों के लिए एक घटना घटी, समय बीता और बात आयी गयी हो गयी..इसीलिए तो घटनाएं घटती रहती हैं और आयी गयी होती रहती हैं…तारीफ तो उनकी है जो मोमबत्ती ले के निकले थे और आगे घटने वाली और घटनाओं के लिए और ज़यादा मोमबत्ती का आर्डर दे के बैठे हैं…गड़े मुर्दे उखाड़ने और झंडा वंडा ले के निकलने का वास्तव में क्या मतलब….” न तो हमने रेप किया न हमारा हुआ.”ये शायद आपकी सोच नहीं है… .अपने जिस आत्मघाती तरीके से दुनिया की सोच को सामने रखा है वो काबिले तारीफ है….हो सकता है लोग आप को क्रूर कहें लेकिन मैं समझती हूँ कि ये ये जनसामान्य की सोच रखने का तरीका है….इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं…

sumit के द्वारा
January 24, 2014

हर बार कि तरह एक सुंदर पोस्ट ….. लड़कियों को जरुर पढ़ना चाहिए

    sinsera के द्वारा
    January 25, 2014

    स्पेशल कमेंट के लिए आभार सुमित जी… :-)

Shipra Parashar के द्वारा
January 24, 2014

आदरणीय सरिता जी, आपका ब्लॉग पढ़ा. बलात्कार की वीभत्सता का बहुत विस्तृत और सूक्षम वर्णन किया है आपने. मनोवैज्ञानिक स्तर पर सूक्षम निरीक्षण किया है वह वास्तव में किसी हद तक सटीक है पर बहुत हद तक इसमें एक सूक्षम निरीक्षण छूट गया है. बहुत तो नहीं पर आपके कई अन्य पोस्ट भी पढ़े हैं. खासकर आपके गज़लों की अन्य पाठकों की तरह मैं भी मुरीद हूं. आपके हर लेख में गहनता होती है. पर सच कहूं तो इस लेख से मैं कहीं निराश हुई हूं. आपने ज्योति के नाम आधुनिकता के नाम पर मस्ती-मजाक और खिलंदरेपन में जीने वाली जिन लड़कियों को यह खत लिखा है वह उद्घोष मुझे गलत लगा. मैं सहमत हूं इस बात से कि लड़कियों की अपनी सुरक्षा अपने हाथ है. मैं सहमत हूं इस बात से कि समाज में ऐसे बीमार भरे पड़े हैं और इन्हें चुन-चुन कर खत्म नहीं किया जा सकता. मेरा भी मानना है ‘Prevention is better than Cure’. मैं मानती हूं इस बात को कि लड़कियों की छ्ठी इंद्रियां बहुत तेज होती हैं और उन्हें भगवान की दी इस नेमत को अपनी सुरक्षा के चाक-चौबंद में लगाना चाहिए, इस्तेमाल करना चाहिए. मैं मानती हूं इस बात को विश्वास की जरूरत होती है, अतिरेक विश्वास इंसान को डुबा ले जाता है. मैं मानती हूं इस बात को कि अपनी सुरक्षा अपने हाथ होती है और हर लड़की को इसके लिए खुद सोचना चाहिए. लेकिन जो आपने ज्योति का मुद्दा उठाया है मुझे लगता है इसमें ज्योति का अतिविश्वास आधुनिकता के आवेग में खुद पर अतिरेक विश्वास नहीं था बल्कि हमारे समाज की एक दकियानूसी, पिछड़ी सोच का अतिरेक विश्वास था. ‘एक पुरुष के साथ सुरक्षा की भावना के सामाजिक चलन का अतिरेक विश्वास था’. यह वही भावना है कि एक 20 साल की लड़की को सुरक्षित रखने के लिए 10 साल के भाई को भेज दिया जाता है. ज्योति की अनहोनी के आस-आस ही नोएडा में 8वीं की एक लड़की जो अपने 10 साल के भाई के साथ सामान खरीदने जा रही थी और गैंगरेप की शिकार हुई (दिन में ही) उसे आप क्या कहेंगी? उसमें छ्ठी इंद्रिय से बचने की जरूरत पर आप क्या कहेंगी? जहां तक सवाल है आधी रात का.. हां, यह लड़की को सोचना चाहिए! पर इसके लिए भी जगह और परिवेश मायने रखता है. खैर वह दूसरी बात है. पर यहां सवाल आधी रात का नहीं था, यहां सवाल था कि बस एक लड़के, एक पुरुष के साथ मात्र से एक स्त्री, एक लड़की अपने आप को सुरक्षित महसूस करने लगती है जबकि हकीकत यह है कि हैवानियत पुरुष या स्त्री नहीं देखती. इसमें ज्योति का दोष नहीं समाज की उस सोच का दोष है जो ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देता है. ज्योति में आत्मविशास होता तो वह अपनी सुरक्षा के लिए खुद सोचती और सोचती कि उस खाली बस में इन ‘दो लोगों’…दो लोगों के साथ कुछ अनहोनी घट सकती है. उसमें आत्मविशास ही नहीं था. उसे अपने पुरुष साथी के साथ होने भर से अपनी सुरक्षा का विश्वास था. हमें इस सोच को बदलना होगा. कहते हैं जो अपनी मदद नहीं करता, भगवान भी उसकी मदद नहीं करता. आज की लड़कियां कपड़ों में, रहन-सहन में, टेक्नॉलोजी के इस्तेमाल में और अन्य कई रूपों में आधुनिक जरूर हो गई हैं लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह है कि सोच में आज भी ये पिछड़ी हुई हैं, हमारा समाज पिछड़ा हुआ है. ‘अपनी सुरक्षा अपने हाथ’ की सोच जब तक महिलाओं में नहीं आएगी तब तक ये निर्भया जैसे मामले होते रहेंगे लेकिन हमें यह समझना होगा कि आखिर कारण है क्या और कहां है? उस कारण का सही विश्लेषण करना होगा. वरना मुद्दा भटक जाएगा. नब्ज पकड़े बिना इंजेक्शन दोगे तो जान चली जाएगी. एक स्त्री होकर सिर्फ आधुनिकता के नाम पर स्त्रियों का पक्ष लेना सही नहीं है लेकिन समाज का एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते न सिर्फ एक स्त्री लेकिन समाज के हर व्यक्ति को इसपर गहराई से, सही दिशा से सोचने की जरूरत है, समस्या के कारणों और इसके निवारण पर सही विश्लेषण की जरूरत है. कहना तो बहुत कुछ और भी चाहती हूं. पर यहां इतने में समाप्त करना चाहूंगी. आपका भी मकसद समाज की सुरक्षा है, मेरा भी. कभी और लंबी बात होगी. बात करने से बात बनती है. ऐसे प्रयास होने चाहिए और हर समाज के तबके को अपना, पराया, धर्म, जाति, लिंग भेद से परे होकर गंभीरता से इसपर विचारना और अपने मत रखने चाहिए. प्रयास एक सही निष्कर्ष निकालने और उसे स्वीकार करते हुए बदलाव लाने के होने चाहिए. तभी वास्तव में कुछ सुधारात्मक बदलाव हो सकता है.

    sinsera के द्वारा
    January 25, 2014

    शिप्रा जी, स्वागतम..आपसे मेरी पहचान नयी नहीं है..आपकी और सूफी जी की खट्टी मीठी नोक झोंक के हमने भी बहुत मज़े उठाये हैं और तभी से आपकी शब्द सम्पदा, चयन, और धाराप्रवाह लेखन शैली की मैं प्रशंसक हूँ..ये अलग बात है की उस पोस्ट में मेरे कमेंट की जगह नहीं थी सो कहा नहीं…मैं जानना चाहती हूँ कि मुझसे क्या निरिक्षण छूट गया क्यूंकि लेख का उद्देश्य सब की सुरक्षा ही है…लेकिन अपने कमेंट में आप मेरी हर बात से सहमत होती दिखीं, कहीं भी उस छूटी हुई बात का उल्लेख नहीं किया.. ये बात तो है कि जहाँ लड़कियां आधुनिकता के युग में लड़कों को चुनौती देती हुई दिखती हैं वहीँ अंदर ही अंदर पुरुष के साथ सुरक्षित रहने के संस्कार को खुद से दूर नहीं कर पाती हैं.. शायद ये अनजाने में पुरुष कि शक्ति को स्वीकार करना हो..शायद इसीलिए ये अस्तित्व की जंग कभी ख़त्म नहीं हो पाती है…जी हाँ समाज का ज़िम्मेदार नागरिक होने केनाते हैम गलतियों को उजागर करते हैं न कि किसी का पक्ष लेते हैं इसीलिए कहा कि अपनी और से सुरक्षा के प्रबंध पूरे रखना चाहिए …फिर कब क्यूँ कहाँ कौन कैसे आदि की चर्चा तो बाद की बात है…आपकी बात अच्छी लगी ..धन्यवाद..

ranjanagupta के द्वारा
January 24, 2014

बहुत बधाई सरिता जी !इतने विचार प्रवण आलेख हेतु !किन्तु इस समस्या की जड़ संस्कार हीनता ,पोर्न साईट है जो सभी जानते है ,क्या किसी नेता ,अभिनेता या किसी सरकार द्वारा आज तक कोई रोक लगाई गई ?किसी ने पैसे और पैसे कमाने के सिवा कभी ये सोंचा की बच्चो को संस्कार पढाई से भी ज्यादा जरूरी है !सब कोरी बाते करते है देश रसातल में जाता है तोजाये !किसको पड़ी है ?बहुत दुनिया में अंधेर गर्दी है !अब ईश्वर ही इस मुल्क को बचा सकता है!

    sinsera के द्वारा
    January 25, 2014

    आदरणीय रंजना जी, नमस्कार, अप भी सुप्रीम कोर्ट कि भाषा बोल रही हैं कि “इस देश को अब भगवान ही बचा सकता है..”सही है जब न्यायाधीशों के पास यहाँ की दुर्दशा के लिए शब्द नहीं हैं तो हम क्या कहें… बस यही कहना है कि बीमारी को जड़ से उखाड़ने की ज़रूरत है…समय देने के लिए आपका धन्यवाद..

jlsingh के द्वारा
January 24, 2014

आदरणीया सरिता बहन, सुप्रभात! मैं सोच रहा था कि काफी दिनों से आपकी कोई पोस्ट क्यों नहीं आ रही…? मैं यह भी सोच रहा था कि आप गहन अद्ध्ययन में लगी होंगी और कुछ नया लेकर उपस्थित होंगी … जो भी हो आपके विस्तृत आलेख को पढने के बाद मुझे यही समझ में आया कि यह आलेख हर माँ और हर लड़की अवश्य पढ़े … शायद आपका यह ‘ज्योति की जागृति’ वाला आलेख पढ़कर कुछ नयी बालाओं का भला हो … पर उन सुनन्दाओं, मदेरणाओं, गीतिकाओं,फिजाओं का क्या होगा जो जान बूझ कर गलतियां करती हैं. प्रश्न सिर्फ पुरुष की ही मानसिकता का नहीं है …नयी अंधी और विकसित कही जेन वाली संस्कृति … जहाँ समलैंगिकता को बढ़ावा दिया जाय …उन सबका क्या होगा. पोर्न साइट्स तभी विकसित होते हैं जब लोग गणमान्य लोग चाव से देखते हैं … प्राइम टाइम में या कहें हर टाइम में कोंडोम का उत्तेजक विज्ञापन …ऊफ! दीदी … बहुत कुछ जो यहाँ लिखने योग्य भी नहीं है … फिर भी हमारा आपका काम है जन जागरण …मैं चाहूंगा आप इस आलेख को अन्य मंचों पर भी रक्खे ..और फेसबुक पर तो अवश्य ही रक्खें. आपका भाई – जवाहर.

    sinsera के द्वारा
    January 25, 2014

    हर बात का कोई न कोई कारण अवश्य होता है जवाहर भाई ऐसा मेरा मानना है.इसीलिए मैं बात की तह खोजती हूँ… हर चीज़ का बाज़ारीकरण, मनुष्य को भड़काना उकसाना, खामखा की महत्वाकांक्षा पालना और फिर अपनी गलती दूसरों के सर मढ़ना..यही चलन हो गया है..कुछ भी करने स पहले सिर्फ कुछ सेकण्ड्स , इंसान अगर विचार कर ले तो शायद कुछ गलत निर्णय बदले जा सकें…शेष तो सब नक्कारखाने में तूती की तरह ही है…


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