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कब..??

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हौसला है के ज़माने को आग लगाएंगे ,
कहाँ से लाएंगे शोले बुझे दिलों में अब ,


ज़मीर मर गया है ,जल के बुझ चुका है अब,
मुर्दा एहसास कफ़न के बिना ही दफ़न हैं अब,


वो रो रहे हैं सीना पीट पीट कर के अभी ,
जो कह रहे थे जियो या मरो हमें क्या अब ,


हाथ जिनके न उठे थे कभी दुआ के लिए,
बद्दुआ में भी उनकी न हो अब असर या रब,


उनके बुत, उनके खुदा उनकी खुदगर्ज़ी के सुपुर्द,
उनके जीवन में कहाँ इंसान की कदर है अब ,


किसकी गर्दन पे रखा पाँव है उन्हें क्या फिकर,
साँस लेता है कोई मर गया उन्हें क्या अब,


उन्हें तो गरज़ है अपने लिए उजालों की ,
किसी की ज़िन्दगी जलती हो चाहे बेमतलब ,


जिन्हों ने देखना चाहा न कभी सूरज को,
उनकी पलकों को चांदनी जला रही है अब,


और जो सर झुकाये जी रहे हैं मर मर के ,
उनकी मौतों को इंकलाब मिल सकेगा कब,


जो सह रहे हैं उनका सब्र मिटे, जब्र मिटे या न मिटे,
टूट जाएँ उठी तलवारें शायद ऐसे अब,


बन के आतिश खामोशियाँ कभी तो फूटेंगी,
कभी न कभी तो ये होगा मगर होगा कब,


वो वक़्त होगा समंदर भी हार जायेगा ,
वो आग बुझ न सकेगी जो यूँ लगेगी तब,


जो चुभ रहा है खलिश बन के गो के सच्चा है ,
वो लफ्ज़ आये ज़ुबां पर वो सुबह आयेगी कब…


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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
January 10, 2014

आदरणीय जवाहर भाई , सद्गुरुजी, विनय सक्सेना जी, अभिषेक जी, यतीन्द्र जी, शालिनी कौशिक जी, वैद्य सुरेन्द्रपाल जी, सोनम सैनी जी, योगी जी, शाही सर, शकुंतला मिश्रा जी और भगवन बाबू जी….मैं आप सब की ह्रदय से आभारी हूँ कि आप लोगों ने मेरी मामूली सी रचना को अपना कीमती समय दिया और मुझे जन्मदिन कि शुभकामनायें प्रेषित कीं…थोडा सा अपराध बोध है मुझे कि मैं चाह कर भी आपको समय से धन्यवाद तक न कह सकी , कारण, कुछ घर की ज़िम्मेदारियाँ और बुज़ुर्गों की अचानक आयी बीमारी ने मेरे दिन के 24 घंटे मुझसे ले लिए …मैं आप सब की भावनाओं से अभिभूत हूँ, भागयशाली हूँ जो आप सब मेरे मित्र हैं..आगे भी ऐसे ही साथ देते रहिएगा…पुनः धन्यवाद..

Bhagwan Babu Shajar के द्वारा
January 10, 2014

हर तरह के भाव है इस रचना में… सुन्दर..

shakuntla mishra के द्वारा
January 9, 2014

वो वक्त होगा समंदर भी हार जायेगा ! बहुत प्रभावशाली रचना है -बधाई सरिता जी

आर. एन. शाही के द्वारा
January 9, 2014

फ़ूट जाएंगे फ़फ़ोले ज़रा सी आहट से, सुना है आएगी क़यामत, मगर आएगी कब ? जब कभी आग सुलगती है ऐसा लगता है, करेंगे वो हमें शादाब, पर करेंगे कब ? किया हमें जो परेशाँ कभी, पशेमाँ हुए, चला था तीर कभी, फ़िर भला चलेगा कब ? सरिता जी, आपके अर्थ वाले अशआरों पर मेरे बेतुके बोल बस यूँ ही हैं … आपकी अच्छी पोस्ट की बधाई, नव-वर्ष की भी !

yogi sarswat के द्वारा
January 9, 2014

बन के आतिश खामोशियाँ कभी तो फूटेंगी, कभी न कभी तो ये होगा मगर होगा कब, क्या बात है ! बहुत सुन्दर ! जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें आदरणीय सरिता सिन्हा जी !

Sonam Saini के द्वारा
January 9, 2014

और जो सर झुकाये जी रहे हैं मर मर के , उनकी मौतों को इंकलाब मिल सकेगा कब, जो सह रहे हैं उनका सब्र मिटे, जब्र मिटे या न मिटे, टूट जाएँ उठी तलवारें शायद ऐसे अब, बन के आतिश खामोशियाँ कभी तो फूटेंगी, कभी न कभी तो ये होगा मगर होगा कब,…………….सारे शेर एक से बढ़कर एक हैं ……… लाजवाब रचना …..again with Question mark?….. :)

vaidya surenderpal के द्वारा
January 9, 2014

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

January 9, 2014

हाथ जिनके न उठे थे कभी दुआ के लिए, बद्दुआ में भी उनकी न हो अब असर या रब, bahut sundar bat kahi hai aapne .saadar

yatindranathchaturvedi के द्वारा
January 9, 2014

अद्भुत, सादर।

abhishek shukla के द्वारा
January 8, 2014

हौसला है के ज़माने को आग लगाएंगे , कहाँ से लाएंगे शोले बुझे दिलों में अब , ज़मीर मर गया है ,जल के बुझ चुका है अब, मुर्दा एहसास कफ़न के बिना ही दफ़न हैं अब……………बहुत सुन्दर …..आभार

विनय सक्सेना के द्वारा
January 8, 2014

जन्मदिन की ढेरों शुभकामनायें ….विनय सक्सेना “रिमझिम फुहार”

विनय सक्सेना के द्वारा
January 8, 2014

उन्हें तो गरज़ है अपने लिए उजालों की , किसी की ज़िन्दगी जलती हो चाहे बेमतलब …सुन्दर एवं समसामयिक…. विनय सक्सेना “रिमझिम फुहार”

sadguruji के द्वारा
January 8, 2014

आदरणीय श्रीमती सरिता सिन्हा जी,हम सब की तरफ से आपको जन्मदिन की शुभकामनायें.आप अदैव कर्मशील और स्वस्थ रहें तथा सबकों प्रेरणा देती रहें.अच्छी कविता बधाई,

jlsingh के द्वारा
January 7, 2014

बन के आतिश खामोशियाँ कभी तो फूटेंगी, कभी न कभी तो ये होगा मगर होगा कब, समय आ गया है कि खामोशियाँ फूटें, चिंगारी शोला बन कर दहके! तभी चमन में फूल खिलेंगे और बिखड़ेगी खुसबू हवाओं में सादर अभिनन्दन! बहुत ही सुन्दर कृति!


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