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फिर सुबह होगी...

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बात थोड़ी उलझी हुई सी है…..
धरती पर अनगिनत जीव हैं. सुनते हैं कि चौरासी लाख योनियां हैं…बलशाली भी हैं, निर्बल भी हैं. किसी को सौ साल से भी लम्बी आयु मिली है तो कोई सुबह पैदा हो कर शाम को मर जाता है..कोई जलचर है , कोई स्थलवासी तो कोई हर जगह आराम से रह लेता है….जिसको जैसा जीवन मिला है , वो जी रहा है…जीवन जीने की प्रक्रिया में चुनौतियाँ सब के सामने आती हैं, लेकिन अस्तित्व का संकट कम ही आता है …
हाँ , आता है, जब कोई जीव अपने प्रकृति प्रदत्त आचरण को छोड़ कर किसी अन्य क्रिया कलाप में लग जाता है या लगा दिया जाता है …..और ये प्रकृति विरोधी क्रिया मनुष्य के सिवा कोई और जीव नहीं करता..ये मनुष्य ही है जो अपने से कमज़ोर जीवों को , चाहे वो पशु हों या उसकी अपनी जाति की सहचरी, जिसे प्रकृति ने जीवन की सुंदरता और सरसता बनाये रखने के लिए निर्मित किया , उसको अपने अधीन करना चाहता है…..अधीनता की इस क्रिया में अधीनस्थ जीव को अपना नैसर्गिक आचरण और दिनचर्या छोड़नी पड़ती है , जिसके चलते निर्बल और भी ज्यादा निर्बल और अवलम्बित होता जाता है….
सृष्टि की शुरुआत कब हुई, मानव कब अपने वर्त्तमान रूप में आया..इसका अनुमान लगाना कठिन है, लेकिन ये तो तय है कि सभ्यता के विकास का मूल ही मनुष्य का स्त्री और पुरुष, दो जातियों का होना है… एक दूसरे की शारीरिक और मानसिक विभिन्नताओं को समझने और सम्मान देने के क्रम में ही सभ्यता विकसित होती चली गयी और समाज का जन्म हुआ….
इतिहास के ग्रन्थ बताते हैं कि प्राचीन युग में नारी और पुरुष का किसी किस्म का टकराव नहीं था..समाज में दोनों की प्रस्थिति समान होती थी. स्त्रियां भी वेदों/शास्त्रों का पठन -पाठन करती थीं और शास्त्रार्थ अदि में भी भाग लेती थीं…
विज्ञान कहता है कि कालांतर में शारीरिक रूप से कमज़ोर होने के कारण धीरे धीरे स्त्रियां पुरुष के अधीन होती गयीं….कभी सुरक्षा के चलते तो कभी स्वार्थ के कारण ….

लेकिन मनोविज्ञान का कहना है कि स्त्री को बौद्धिक स्तर पर अपने बराबरी में खड़ी देख कर पुरुष का अहम् आहत हुआ होगा जिसके लिए उसने नारी को धीरे धीरे नियमों में बांध कर अपने अधीन करना प्रारम्भ किया होगा…

.
और यहीं से अस्तित्व की लड़ाई प्रारम्भ हुई , जो आज कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी है…

.
विज्ञान के अनुसार स्त्री और पुरुष की मानसिक क्षमता (brain capacity) समान होती है लेकिन मनोविज्ञान कहता है कि स्त्री और पुरुष का मस्तिष्क बिलकुल अलग -अलग तरह से सोचता है..

लेकिन प्रश्न ये उठता है कि आखिर पुरुष को स्त्री के स्वावलम्बन से खतरा क्या है..??
क्या कारण है कि स्त्री ही पुरुष के अधीन हो जाती है…..??
अस्तित्व की रक्षा और सुरक्षा का प्रश्न स्त्री के सामने ही क्यूँ आता है ..??

असल में ये एक लम्बी दास्तान है, और इसके लिए दोनों ही पक्ष ज़िम्मेदार हैं….

बात को सरल करने के लिए हम ये मान लेते हैं कि चूँकि स्त्री और पुरुष , दोनों ही जातियों का कोई एक आदर्श गुण -धर्म वाला प्रतिनिधि नहीं है, अतः हम दोनों जातियों को कई वर्गों में बाँट कर विवेचना कर लेते हैं…..
ऐसा कहाँ होता है कि सभी पुरुष सभी स्त्रियों को अपनी दासी बनाये हुए हैं ..और न ही स्त्रियां अब ऐसी हैं कि नियमस्वरूप पुरुष की बंदिनी बन कर रहती हों…
समाज में अधिकांश पुरुष धीर , गम्भीर , शांत , सब का यथोचित सम्मान करने वाले संयमित और मर्यादित पुरुष हैं..

लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है जो नारी को सदा हेय समझता है..इनकी नज़रों में स्त्री का जीवन घर की चारदीवारी के भीतर ही सीमित रहना चाहिए ..उसको खाने और कपडे के सिवा खुली हवा में साँस तक लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए…. ये खुले आम नारी -विद्वेष (Misogyny) की भावना रखने वाले पुरुषों का वर्ग है ..
एक वर्ग है मानसिक रूप से बीमार व विकृत पुरुष का…जो स्त्री को कभी भी किसी भी रूप में सम्मान नहीं देते है .उसे उपभोग की वस्तु समझते हैं और अपमानित व प्रताड़ित करने के मौके ढूंढते रहते हैं..

लेकिन हर वर्ग के पुरुष के अंतस में कहीं न कहीं ,नारी के सफलता के नित नए आयाम तय करते हुए क़दमों को रोकने और उड़ान भरते हुए पंखों को काटने की इच्छा दबी रहती है…


प्रयोगसिद्ध है कि शांत ,संयमित व स्त्री की सफलता की सराहना करने वाले पुरुषों के अचेतन में भी कहीं न कहीं पुरुषोचित अहम् के कारण ईर्ष्या , व हीनता का भाव दबा रहता है…जिसे वे जान भी नहीं पाते ,लेकिन इसी भावना के कारण वे स्त्री के रास्ते में खुलेआम अवरोध न उत्पन्न करके उसे सुरक्षा अदि देने के नाम पर पिछाड़ना चाहते हैं…

अब यदि हम स्त्री के वर्गीकरण की बात करें तो सब से बड़ा वर्ग सामान्य मध्यमवर्गीय नारी का है..
इस वर्ग की स्त्री आज सदियों से बंधनों में रखे जाने के बावजूद भी हर क्षेत्र में सफलता की नयी ऊंचाइयों पर है…कोई भी विषय व क्षेत्र अब ऐसा नहीं रह गया है जहाँ नारी ने अपनी सफलता के झंडे न गाड़े हों…हालत ये है कि अज्ञात कारणों से नेवी तथा थलसेना के कुछ स्थानों की नौकरी का आवेदन करने से महिलाओं को निषेधित किया जाता है अन्यथा वे वहाँ भी पहुँच कर पुरुषों को पीछे कर सकती हैं….

बहरहाल..छुरी खरबूजे पर गिरे या खरबूजा छुरी पर….कटता तो खरबूजा ही है…
स्त्री के मार्ग में सब से बड़ा अवरोध है उसकी शारीरिक दुर्बलता….
नारी के सपनों की ऊँची उड़ान को रोकता है सिर्फ कुदरत द्वारा दिया गया दुर्बल शरीर…


एक सोलह साल की लड़की और सोलह साल के लड़के के शारीरिक बल में धरती आकाश का अंतर होता है और यही अंतर स्त्री की महत्वकांक्षी उड़ान के पंख काट डालता है…


होता ये है कि स्त्री भी एक स्नेहाकांक्षी ह्रदय रखती है..उसे भी अवसर, सम्मान और पहचान और संरक्षण चाहिए..
कुदरती कोमल भावनाओं के कारण अगर वो अपने करिअर के साथ साथ परिवार का भी ध्यान रखती है तो आम तौर पर देखा जाता है कि परिवार के बाकी लोग उसे एक काम करने वाली मशीन समझ कर सारा बोझ डाल देते हैं ..
घर के बाहर अगर वो मिष्टभाषी हो और सहज व्यवहार रखे तो पुरुष सहकर्मी उसे कोई सहज उपलब्ध वस्तु समझते हैं और यदि अपने आप में सीमित रहे तो चिढ़ कर आपसी खिसियानी बात चीत में उसे गालियों से भी नवाज़ा जाता है….

हालाँकि एक अन्य वर्ग अति महत्वाकांक्षी स्त्रियों का भी हैं..जो आगे बढ़ने के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार रहती हैं..कहते हुए क्षोभ होता है परन्तु ये अतिशय महत्वाकांक्षी स्त्रियां सफलता पाने के लिए अपने स्त्रीत्व को मोहरा बनाती हैं और स्त्री होने का भरपूर फायदा उठाते हुए अपने शरीर को भी दांव पर लगाने से नहीं हिचकिचाती हैं….देखा जाये तो अस्तित्व का आभासी संकट सब से ज्यादा इसी वर्ग की स्त्रियों के सर पर है ….इनकी बौद्धिकता न के बराबर होने के कारण यदि ये अपना शरीर दांव पर न लगाएं तो प्रगति की राह में कहीं भी न टिक पाएं..लेकिन ये अनैतिक तरीके से अर्जित सफलता अधिक दिन नहीं टिकती और एक न एक दिन पर्दाफाश होता है..परिणामस्वरूप जो छीछालेदर होती है उसका कोई हिसाब ही नहीं..

यहाँ प्रश्नचिन्ह शोषण करने वाले पुरुषों पर नहीं है..बल्कि अपने फायदे के लिए स्वेच्छा से देह समर्पित करने का शॉर्ट -कट अपनाने वाली नारियों से पूछा गया प्रश्न है कि जब तक स्वार्थ सिद्धि होती रहती है , तब तक आदान-प्रदान का ये खेल राज़ी ख़ुशी से चलता रहता है , लेकिन जैसे ही लाभ में कोई कमी आने लगती है या कोई मुद्दा फंसता है वैसे ही ये सती नारियां यौन-शोषण का ट्रम्प कार्ड क्यों चल देती हैं…


अंत में एक बहुत छोटा वर्ग उन नारियों का है जिनके सामने सच में ही अस्तित्व की रक्षा का संकट है…ये वो महिलाएं और बच्चियां हैं जो संसाधन विहीन हैं…मेधावी और कुशाग्र होने के बाद भी या तो कमज़ोर आर्थिक स्थिति या दूरस्थ गांवों अदि में रहने के कारण जो शिक्षा से वंचित रह जाती हैं…जिनके दो हाथ कलम पकड़ने के बजाय अपने माता पिता के साथ पेट भरने के उपाय खोजते हैं..और जिनके आगे बढ़ने के अरमानो को कुचलते हुए उनके माता पिता कच्ची उम्र में ही ज़िम्मेदारी से मुक्ति पाने के लिए शादी के चक्रव्यूह में फंसा देते हैं ….सरकार द्वारा अगर उनकी पढाई के लिए वज़ीफ़ा मिलता भी है तो वो घरेलू कार्यों में ही खर्च कर दिया जाता है…
आज सही मायनों में इन्ही बच्चियों को सहारे और सहयोग की ज़रूरत है ताकि ये भी आगे बढ़ के अपने जीवन मे कुछ बन सकें और सदा पराश्रित ही न रहें…


वैसे एक बात और भी है…..
शासक और सर्वहारा वर्ग सदा पुरुष और नारी ही क्रमशः हों, ये ज़रूरी नहीं होता….


सत्ता की शक्ति की शराब का नशा अपने से कम शक्ति वाले को सताने से और तेज़ चढ़ता है..

अतः सत्ता जिसके भी हाथ में हो, चाहे वो पुरुष हो या स्त्री, अपने से निर्बल को दबा कर अपने अहम् को पोषित करता है… देखा गया है कि कभी कभी परिवार में उच्च प्रस्थिति प्राप्त महिलाएं ही महिलाओं को प्रताड़ित करने में पीछे नहीं रहती…
ऐसे में एक आदर्श सुन्दर समाज की परिकल्पना कैसे की जा सकती है …..


ऐसा समाज जहाँ कोई बलशाली किसी निर्बल को न सताए..


जहाँ सब एक दूसरे का वास्तविक सम्मान करते हों..


जहाँ कोई किसी की प्रगति देख कर कुंठित न हो बल्कि प्रेरणा ले…


जहाँ स्त्री व पुरुष दो अलग जातियां न हो कर केवल इंसान हों और प्रतिद्वंदी न हो कर एक दूसरे के सहयोगी हों …


जहाँ सब अपनी अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुसार कार्यक्षेत्र अपनाएं और तरक्की के शॉर्ट कट न अपनाएं..

याद रखें….हाथ मिलाने के लिए बंद मुठ्ठी को खोलना पड़ता है…

दर्पण के सामने जो रूप होगा वही प्रतिबिंबित होगा…


अत्याचार का अंत सदा क्रांति से होता है…अतः सब को जीने का अधिकार मिलना चाहिए…..


यदि हमें अपने लिए कुछ अच्छा चाहिए तो अच्छा देना भी पड़ेगा……


एक न एक दिन हम सब अपने सम्मिलित प्रयासों से ऐसे ही स्वस्थ, सुन्दर ,आदर्श समाज में सुख का सवेरा देखेंगे ….
इसी कामना के साथ………


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58 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
August 16, 2014

उच्च कोटि का लेख डॉ शोभा

    sinsera के द्वारा
    August 16, 2014

    आदरणीय शोभा जी, नमस्कार, इतने पुराने लेख को महत्त्व देने के लिए आपका धन्यवाद..

sadguruji के द्वारा
January 1, 2014

आदरणीया सरिता सिन्हाजी,आपको और आपके समस्त परिवार को नववर्ष की बधाई.

    sinsera के द्वारा
    January 3, 2014

    आदरणीय सद्गुरुजी, नव वर्ष में याद करने के लिए धन्यवाद…मुझे आने में थोड़ी देर हो गयी, क्षमा चाहती हूँ…आपको भी सपरिवार नव वर्ष और आने वाले सभी वर्ष शुभ हों….

shakuntla mishra के द्वारा
December 26, 2013

बहुत दिनों के बाद आपका लेख पढ़ने को मिला .आपके लेखन में एक मौलिकता रहती है

    sinsera के द्वारा
    December 26, 2013

    लेखन को मान देने के लिए आपका धन्यवाद शकुंतला जी …

RAHUL YADAV के द्वारा
December 25, 2013

सबसे पहले आपको बधाई सरिता जी … सार्थक लेख दिया आपने सरिता जी जो एक आदर्श समाज की नींव रखता है पर व्यवहार की कसौटी पर ये कल्पना मात्र ही है। शायद आप इसे पुरुषवादी मानसिकता कहें लेकिन मै इसे इस लिहाज से कह रहा कि ईश्वर ने सभी को अलग-अलग मस्तिष्क दिया जिसका हर कोई अपने ही अंदाज में प्रयोग करता है। सही और गलत जैसे शब्दों का स्वामी मनुष्य ही है जिसने एक आदर्श और सभ्य समाज को बनाने के स्वरूप इसे इजात किया। कुदरत भी कभी अपने नियम के विपरीत होता है , कभी बिन बादल बरसात भी होती है , कभी जन्म लेने से पूर्व ही बच्चे को रोग का सामना करना पड़ता है। इसी तरह स्त्री-पुरुष की कथा भी है। वर्तमान समाज में स्त्रियों को ही सबसे ज्यादा बेटे की कामना होती है। पुरुषों के बारे में आप ज्यादा जानती हैं लेकिन ये आंकड़ा है कि 70 प्रतिशत से ज्यादा स्त्रियां अपने पति के लिए ईमानदार नहीं होती। जिसका विवरण आपने अपने लेख के माध्यम से दूसरी तरह से पेश किया ही है। सास – बहु जैसे किस्से भी स्त्रियों के ही आपसी मतभेद है। जो हमेशा ही पुरुष भूमिका से संयमित होते हैं। अच्छे और संयमित मनुष्य ही सदैव समाज के लिए सर्वोत्तम और प्रथम रहेंगे , उनमें चाहे स्त्री हो या पुरुष । फिर एक नया सवेरा होगा जैसा आपने वर्णित किया। …………………..एक बार फिर बधाई के साथ आपकी सोच को नमन ।

    sinsera के द्वारा
    December 26, 2013

    राहुल यादव जी नमस्कार,अपने बिल्कुल वही बात चिन्हित की है जो मैं कहना चाहती थी…हम सबसे पहले मनुष्य हैं ,… स्त्री पुरुष बाद मे….अगर सभी एक दूसरे के सहयोग से एक स्वस्थ सोच के साथ आदर्श समाज की स्थापना का सपना देखें तो नया सवेरा मुश्किल सही पर दूर नही है….

    sinsera के द्वारा
    December 26, 2013

    कीमती समय देने के लिए धन्यवाद..

abhishek shukla के द्वारा
December 23, 2013

आपकी कि अभिव्यक्ति को शत-शत नमन…………

    sinsera के द्वारा
    December 23, 2013

    अभिषेक जी, आपकी प्रकारान्तरित सराहनापूर्ण प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद…

के द्वारा
December 21, 2013

Mera naam kaha gayab ho gya??? :( …aap ese hi pahchan lijiyega….nicha wala cmnt mera hai ok g… :)

    sinsera के द्वारा
    December 23, 2013

    प्रिय सोनम जी, नमस्कार…अंदाज़ तो आप ही के लगते हैं..जो भी हो..आप की बधाई , सराहना और प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद…

के द्वारा
December 21, 2013

Best blogger of the week ka khitab fir se aapke naam hua ….aur hota bhi q nhi…hume to pahle se hi pta tha ki yhi hone wala hai … :) :D bcoz u hv ur own style of writing, a unique style with truth, Home page pr aapko best blogger k roop me dekhkar mn prashann ho gya…. :D Best blogger ke liye bahut shubhkamnaye or badhai aapko (Party ki pratiksha ke sath) … :) ….aapke lekh ke baare me kya kahu sabhi logo ne sabkuch kah diya ab m nadan kya kahu…bas yun hi apni writing se JJ pr char chand lgate rahiye….aur hume (dunia ko) achchi achchi baate sikhate rahiye…. All the best…. :) :) :) aapki sabhi manokanaye shighr hi puri ho jaye isi shubhamna ke sath

lavanya के द्वारा
December 21, 2013

बहुत बहुत बधाई हो सरिता जी. आगे भी इसी तरह के अच्छे-अच्छे लेख लिखते रहिए. यही मेरी कामना है.

    sinsera के द्वारा
    December 23, 2013

    बधाई देने के लिए धन्यवाद लावण्या जी..

Dr S Shankar Singh के द्वारा
December 21, 2013

सरिता जी ,सादर नमस्कार. ,”बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ दी वीक” चुने जाने पर आपको बहुत बहुत बधाई.,एक सनुलित लेख की जितनी प्रशंसा की जाय उतना ही कम है. स्त्री पुरुष अगर प्रतिस्पर्धी होने के बजाय एक दूसरे के पूरक होने का व्यववहार करें तो यह सबसे आदर्श स्थिति होगी. मैं आश्वस्त हूँ फिर सुबह अवश्य होगी. होगी…

    sinsera के द्वारा
    December 23, 2013

    आदरणीय Dr S Shankar Singh…आपके आशावादी विचारों से सहमत हूँ.. बधाई देने के लिए आपका धन्यवाद.

tejwani girdhar के द्वारा
December 21, 2013

very nice

    sinsera के द्वारा
    December 23, 2013

    तेजवानी गिरधर जी आपका धन्यवाद…

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 20, 2013

सुन्दर – सार्थक और सशक्त प्रस्तुति ! सम्मान के लिए अतिरिक्त बधाई !~

    sinsera के द्वारा
    December 20, 2013

    आचार्य विजय गुंजन जी,कीमती समय देने व बधाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..

Imam Hussain Quadri के द्वारा
December 20, 2013

सबसे पहले मुबारकबाद क़बूल करें आप काबिले तारीफ हैं और आपकी सोच फिकर और कलम एक न एक दिन औरत के ज़िन्दगी को रौशनी से भर देगा कलम आपके हाथों में एक तलवार और प्रेम कि तरह होता है अब ये कलम उस सोच और फितरत को उजागर करता है जिसे आपने अपने दिल से अवाम पर ज़ाहिर किया है मुझे उम्मीद है के हम सब मिल कर अपने समाज के उन गलतियों को सुधारेंगे जो आज छोटा से बड़ा बनता जा रहा है इसके लिए सबसे पहले अपने तन मन को सुधारना होगा तभी हमारी बातें और सोच का असर दूसरों पर होगा . एक बार फिर बधाई के साथ आपका बहुत बहुत शुक्रिया इस रौशनी को फैलाने के लिए .

    sinsera के द्वारा
    December 20, 2013

    क़ादरी साहब , सहमति पूर्ण प्रतिक्रिया व बधाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..

    Santosh Kumar के द्वारा
    December 21, 2013

    आदरणीय दीदी ,..सादर प्रणाम बहुत ही अच्छे लेख पर क्या कहूँ …..आदरणीय कादरी जी के विचारों से अक्षरशः सहमत हूँ …शत शत अभिनन्दन

rekhafbd के द्वारा
December 20, 2013

सरिता जी ,,”बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ दी वीक” चुने जाने की बहुत बहुत बधाई.,बहुत अच्छा आलेख

    sinsera के द्वारा
    December 20, 2013

    रेखाजी, नमस्कार,आपकी बधाई सर आँखों पर…कीमती समय देने के लिए धन्यवाद…

sadguruji के द्वारा
December 20, 2013

आदरणीया सरिता जी,”बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ दी वीक” चुने जाने की बहुत बहुत बधाई.आप ने सही कहा है कि स्वस्थ, सुन्दर ,आदर्श समाज की स्थापना हम सब के सम्मिलित प्रयासो के बिना सम्भव नहीं है.

    sinsera के द्वारा
    December 20, 2013

    आदरणीय सद्गुरुजी, सद्भावना व सहयोग के लिए बहुत बहुत धन्यवाद…

jlsingh के द्वारा
December 20, 2013

पहले बधाई तो दे लूं फिर आपसे पूछूं कि और कितनी बार बधाइयाँ देनी पड़ेगी? … आपको याद तो होगा ही कि कितनी बार आपको इस सम्मान(ब्लॉगर ऑफ़ दी वीक) से नवाजा गया है! बहुत बहुत बधाई सरिता बहन, उम्मीद है, आगे भी आप अपनी लेखनि से हम सबको, जागरण जंक्शन मंच को प्रभावित करती रहेंगी! सादर!

    sinsera के द्वारा
    December 20, 2013

    जी सबकुछ बिल्कुल याद है …इस मंच पर अपना पहला दिन भी याद है ..डरी सहमी सी मैं, ना टाइप करना आ रहा था, ना पोस्ट करना, प्रतिक्रिया कैसे लिखना है और जवाब कहाँ देना है, कुछ समझ मे नही आ रहा था..लेकिन आप सब के असीमित स्नेह और सहयोग ने आज इस जगह तक पहुँचाया है..ये मेरा नही आप लोगो की कद्र का सम्मान है…आशा है की ऐसे ही आगे भी आप सब का साथ मिलता रहेगा…..बहुत बहुत हार्दिक आभार….

yamunapathak के द्वारा
December 17, 2013

बहुत सुन्दर लेख दर्पण के सामने जो रूप होगा वही प्रतिबिंबित होगा…बिलकुल सही बस दो बातें ज़रूरी हैं ..दर्पण साफ़ और चमकदार हो और स्वयं की आँखें भी स्वच्छ और खुली हों ..समाज में स्त्री-पुरुष के वर्गीकरण से ज्यादा व्यक्तिगत स्वभाव मायने रखता है …कुछ स्त्रियां पुरुषों से शोषित हैं तो कुछ पुरुष भी स्त्री से शोषित हैं फर्क डिग्री का हो सकता है ….सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्तिगत रूप से हमारी विचारधारा और स्वभाव क्या है. साभार

    sinsera के द्वारा
    December 17, 2013

    प्रिय यमुना जी, नमस्कार….जी बिलकुल सही है, नज़रिये के लिए नज़र तो ज़रूरी ही होती है………शोषण के लिए तो मैं ने कहा ही है कि जिसके हाथ में सत्ता हो वही शोषण करने लगता है….चाहे वो स्त्री हो या पुरुष….आपके आगमन का धन्यवाद…

आर एन शाही के द्वारा
December 16, 2013

हमेशा की तरह बहुत सुन्दर प्रयास सरिता जी । अब जैसा जागरण परिलक्षित हो रहा है, चहुँओर जैसी खुशनुमा बयार का आभास हो रहा है, उसमें असामान्य पहियों की लंगड़ाती चाल अवश्य तिरोहित होगी । फ़िर वह सुबह भी अवश्य आएगी, जिसकी प्रतीक्षा में भारतीय नारी समाज ने सदियों तक घनघोर तिमिर के मध्य ही साँसें चलाते रहने का अभिशाप झेला, और उफ़ तक नहीं करने दिया गया । परन्तु सन्तुलन के लिये सह-अस्तित्व का बोध, एकदूसरे के प्रति परम्परागत सम्मानभाव, तथा अपनी-अपनी सीमाओं के प्रति सजगता भी नितान्त आवश्यक होगी । समाज को नारी से जो अपेक्षाएँ रही हैं, उसकी मर्यादाएँ लांघ कर अप्राकृतिक स्वरूप की चाह जैसी अभीप्सा भी समाज के हित में नहीं होगी, इसका ध्यान भी नारी को रखना ही होगा । जब ध्रुवसत्य है कि प्राकृतिक दुर्बलता का कोई निदान नहीं, तो महत्वाकांक्षाओं में भी एक मर्यादा का भाव लेकर चलना ही होगा, ताकि कुंठाजनित विवादों का कभी सामना न करना पड़े । साधुवाद !

    sinsera के द्वारा
    December 17, 2013

    आदरणीय शाही सर, नमस्कार….इतने समयांतराल के बाद आपका आना एक सुखद एहसास है….मेरी पिछली कई पोस्ट्स ने आपको बेहद मिस किया है..आशा है कि आप अपने सरे काम सकुशल निपटा आये होंगे…मैं आपके इस विचार से सहमत हूँ कि नारी को मर्यादा और शील की सीमा में रहना चाहिए….नारी होने का फायदा उठाने के बारे में नहीं सोचना चाहिए ….साथ ही पुरुष को भी कामकाजी महिलाओं को “सहज उपलब्ध” की दृष्टि से नही देखना चाहिए…आपकी प्रतिक्रिया का आभार…

yogi sarswat के द्वारा
December 16, 2013

सशक्त आलेख और सशक्त विषय !

    sinsera के द्वारा
    December 17, 2013

    योगी जी नमस्कार..कीमती समय और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद…

jlsingh के द्वारा
December 16, 2013

आदरणीय सरिता बहन, सादर अभिवादन! आज ही इस आलेख के मुख्यांश को जमशेदपुर से छपने वाले दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर देख बहुत ही सुखानुभूति क अनुभव हुआ…तत्काल मैं इस आलेख तक आ पहुंचा. बहुत ही सारगर्भित आलेख! “….अत्याचार का अंत सदा क्रांति से होता है…अतः सब को जीने का अधिकार मिलना चाहिए….. यदि हमें अपने लिए कुछ अच्छा चाहिए तो अच्छा देना भी पड़ेगा……”

    sinsera के द्वारा
    December 16, 2013

    आदरणीय जवाहर भाई साहब, अपने मेरे लेख को इतना महत्त्व दिया इसके लिए आभारी हूँ..सराहना व सहमति के लिए धन्यवाद..

omdikshit के द्वारा
December 13, 2013

सरिता जी, आप ने सभी पहलुओं को गम्भीरता से वर्णित किया है.अनुकरणीय लेख.

    sinsera के द्वारा
    December 16, 2013

    आदरणीय ओम जी, सहमति व प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद..

sadguruji के द्वारा
December 13, 2013

बहुत अच्छा लेख.बधाई.साहिर साहब कि ये पंक्तिया याद आ गईं-जिस सुबह की खातिर जुग जुग से, हम सब मर मर कर जीते हैं जिस सुबह के अमृत की धून में, हम जहर के प्याले पीते हैं इन भूखी प्यासी रूहों पर, एक दिन तो करम फर्मायेगी वो सुबह कभी तो आयेगी.

    sinsera के द्वारा
    December 16, 2013

    ji sadguruji , jis subah ki kalpana hai us ke aane ke filhaal to asar nahi hain…lekin hame ummid aur koshish karte jana hai…

sumit के द्वारा
December 13, 2013

तारीफ के लिए शब्द नहीं मिल रहे है, वैसे ये लेख सबको पढ़ना चाहिए …

    sinsera के द्वारा
    December 16, 2013

    सराहना के लिए बहुत शुक्रिया सुमित जी..कौन सा लेख नहीं पढ़ना चाहिए वैसे??

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
December 13, 2013

सुन्दर आलेख /

    sinsera के द्वारा
    December 16, 2013

    प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद राजेश जी..

Santlal Karun के द्वारा
December 13, 2013

आदरणीया सरिता जी, आप ने नारी और उसके जीवन की विसंगतियों पर विस्तृत तथा बहुत ही पठनीय आलेख दिया है — “यहाँ प्रश्नचिन्ह शोषण करने वाले पुरुषों पर नहीं है..बल्कि अपने फायदे के लिए स्वेच्छा से देह समर्पित करने का शॉर्ट -कट अपनाने वाली नारियों से पूछा गया प्रश्न है कि जब तक स्वार्थ सिद्धि होती रहती है , तब तक आदान-प्रदान का ये खेल राज़ी ख़ुशी से चलता रहता है , लेकिन जैसे ही लाभ में कोई कमी आने लगती है या कोई मुद्दा फंसता है वैसे ही ये सती नारियां यौन-शोषण का ट्रम्प कार्ड क्यों चल देती हैं…” XXXXX “अंत में एक बहुत छोटा वर्ग उन नारियों का है जिनके सामने सच में ही अस्तित्व की रक्षा का संकट है…ये वो महिलाएं और बच्चियां हैं जो संसाधन विहीन हैं…मेधावी और कुशाग्र होने के बाद भी या तो कमज़ोर आर्थिक स्थिति या दूरस्थ गांवों अदि में रहने के कारण जो शिक्षा से वंचित रह जाती हैं…जिनके दो हाथ कलम पकड़ने के बजाय अपने माता पिता के साथ पेट भरने के उपाय खोजते हैं..और जिनके आगे बढ़ने के अरमानो को कुचलते हुए उनके माता पिता कच्ची उम्र में ही ज़िम्मेदारी से मुक्ति पाने के लिए शादी के चक्रव्यूह में फंसा देते हैं ….” …इत्यादि | मेरी निजी धारणा है कि नारी-जीवन के प्रति समझ, सहभाव और सद्व्यवहार हर पुरुष का धर्म है, पर चिंतनीय कि ऐसा दुनिया में बराबर दिखाई नहीं देता | आप के लेख से मुझे पन्त की ये पंक्तियाँ याद हो आईं — ” प्रकट हुई मानव-अंगों में सुन्दरता नैसर्गिक शत उषा-संध्या से निर्मित नारी-प्रतिमा स्वर्गिक |” ऐसे स्वस्थ लेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    sinsera के द्वारा
    December 16, 2013

    आदरणीय सर, आपने लेख के भाव को पंत जी की कविता का साम्य देकर इसकी महत्ता द्विगुणित कर दी..कीमती समय व प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद…

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
December 13, 2013

‘वो सुबह कभी तो आएगी…वो सुबह कभी तो आएगी….nice article… A great argument is possible on these points…!!!

    December 14, 2013

    हाँ……………हाँ……………………सम्मानित और आदरणीय……………सरिता जी का मजाक बना रहे हो…………..तुम जैसे नालायको से यही आशा ही किया जा सकता है…………

    sinsera के द्वारा
    December 14, 2013

    :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) मैं सोच ही रही थी कि खून की गंध लगते ही वैम्पायर आने लगेंगे……. :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-) :-)

    December 14, 2013

    हाँ……………..हाँ……………….हाँ…………………..हाँ……………..हाँ……………….हाँ…………………..ओह माय गॉड …………….हाँ……………..हाँ……………….हाँ…………………..हँसी बंद नहीं हो रही है दी…………………….नाराज मत होइए; जी भर के हँस लेने दीजिये………………हाँ……………..हाँ……………….हाँ…………………..हाँ……………..हाँ……………….हाँ…………………..ओह माय गॉड …………….हाँ……………..हाँ……………….हाँ…………………..मैं यह सोचकर हँस रहा हूँ कि आप का कहना है, “मैं सोच ही रही थी कि खून की गंध लगते ही वैम्पायर आने लगेंगे…….” हाँ……………..हाँ……………….हाँ…………………..हाँ……………..हाँ……………….हाँ…………………..ओह माय गॉड …………….हाँ……………..हाँ……………….हाँ…………………..हँसी बंद नहीं हो रही है दी…………………….और मेरा कहना यह है कि काश आप खून बहाने से पहिले सोच लेती तो वैम्पायर नहीं आते. हाँ……………..हाँ……………….हाँ…………………..हाँ……………..हाँ……………….हाँ…………………..ओह माय गॉड …………….हाँ……………..हाँ……………….हाँ…………………..

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 16, 2013

    पगला गये हो का बे….??? ऐसे गला फाड़ के क्यों हंस रहे हो…??

    sinsera के द्वारा
    December 17, 2013

    अनिल जी, हम यहाँ खून बहाने नहीं बल्कि शहीद होने आये हैं और शहादत का अरमान रखने वाले सोचा नहीं करते….

    December 18, 2013

    तो फिर यह कौन बोला है, आपका भूत ………………..मैं सोच ही रही थी कि खून की गंध लगते ही वैम्पायर आने लगेंगे…………………

December 13, 2013

स्त्री व् पुरुष का इतना विस्तृत विश्लेषण ……पढ़ते पढ़ते लगा कि कहीं मनु को तो पढ़ने नहीं बैठ गए किन्तु मनु जागरण जंक्शन पर कहाँ से आते चलिए ये फ़र्ज़ आपने बखूबी निभाया .

    sinsera के द्वारा
    December 16, 2013

    शालिनी जी आपका स्वागत है , खूबसूरत प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ..


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