Sincerely yours..

Aaiye Haath Uthayein Ham Bhi.............

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आखिर क्यों???

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क्या आपने कभी नोहे सुने हैं…?? अगर नहीं तो आइये आपको आज एक नोहा सुनाते हैं…


दो मोहर्रम को यहाँ मेरा रहबर था रुका
साथ कुनबा था मेरा मैं अकेला भी ना था
आओ ज़वारो मेरे साथ चलो
थाम कर दिल मेरा मक़तल देखो
ये मक़ामे अली अकबर है जहाँ
मेरे बच्चे पे जहाँ रोई अज़ान
ये मक़ामे अली असगर है जहाँ
आज भी बैठी हुई रोती है माँ
ये जगह वो है मेरे ज़वारो
लाशे क़ासिम हुवी पामाल इधर
दो मक़ामात जो आते हैं नज़र
कटे अब्बास के बाज़ू थे इधर
हैं ज़रा दूर जो दो दिल के क़रार
हैं मेरे और मोहम्मद के मज़ार
आसरे आशूर से तुरबत के करीब
मेरा हूर और मेरा लश्कर है यही
और ये टीला – ए ज़ैनबया है
यही ज़ैनब ने ये मंज़र देखा
मुझ पे चलता हुआ खंजर देखा
मेरा आशूर या चहल्लुम हो मेरा
करबला आता है कुनबा मेरा
फिर सकीना जो यहाँ आती है
मेरी तुरबत से लिपट जाती है

या हसन…
या हुसैन ..
हम न हुए….
हम क्यों न हुए…


इसी किस्म के नोहे (शोक भरे गीत ) मुहर्रम के महीने में मुस्लिम (विशेषकर शिया ) भाई मस्जिदों में , मजलिसों में रो रो के गाते हैं, जिन्हे सुन कर गैर मुस्लिमों के भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं..दरअसल मुहर्रम के महीने में ये नोहे प्रोफेट मुहम्मद के छोटे छोटे कमउम्र नवासों , हसन और हुसैन के दमिश्क के खलीफा यज़ीद के साथ हुए युद्ध में घटे हुए भीषण , अमानवीय अत्याचार को याद कर के दुखी हो कर मातम में गाये जाते हैं. मातम अपनी चरम सीमा पर मुहर्रम माह की दसवीं तारीख (अशूरा) को पहुँचता है , जिस दिन यज़ीद ने हसन , हुसैन, सहित मुहम्मद साहब के 72 अनुयायियों को , जिसमे छह माह की उम्र का बच्चा (अली असगर )भी था.., क्रूरतम अत्याचार करके मौत के घाट उतार दिया था..

इतना ही नहीं,मातम की इन्तहा में भावावेशित मुस्लिम युवा और बच्चे अपनी छाती पीट-पीट कर जुलूसों की शक्ल में रोते हुए सड़कों पर घूमते हैं, लोहे की ज़ंजीरों और चाकुओं से खुद को मारते है , जलते हुए अंगारों पर चलते हैं, लोटते हैंऔर सीना पीट पीट कर कहते हैं…..
हाय हसन….
हाय हुसैन …
हम तब होते….हम भी होते…..

लेकिन यहाँ मेरा मक़सद मुहर्रम के मातम का उद्भव बताना नहीं है बल्कि कुछ और बात है जो मुझे व्यथित कर जाती है..शायद इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है कि लगभग 1500 वर्ष बीत जाने के बाद भी उस दुखद घटना को याद कर के इस प्रकार खूनी मातम मनाने का क्या औचित्य है..
माना कि कर्बला का युद्ध भोले भाले मासूम निहत्थे विवश लोगों पर की गयी पाशविकता का एक भयंकरतम उदहारण है , लेकिन जो हो चुका , उस पर इस तरह रोने से क्या होगा..


मैं ने मुस्लिमों ही नहीं, गैर मुस्लिमों को भी मुहर्रम की कहानियां सुन कर दुःख से रोते देखा है..मनुष्यता की भावना जब ऊपर हो तो हिन्दू-मुस्लिम का भाव नहीं आता..लेकिन यूँ अपने ही खून से रंगरेज़ी कर के दुःख मनाने से बीता हुआ समय तो नहीं लौटाया जा सकता और न ही हसन, हुसैन और उनके सभी साथियों/ अनुयायियों पर किया गया अत्याचार ही वापस हो सकता है..


हो सकता है कि लोग मेरे मत से विभिन्नता रखें , लेकिन मेरे विचार से अब उस घटना की याद में मातम करने का कोई औचित्य नहीं है.

जैसा कि मैं हमेशा ऊर्जा के सकारात्मक व्यय में विश्वास रखती हूँ, यहाँ भी मुझे लगता है कि ये परंपरा, सारे विश्व की युवा शक्ति का ह्रास है…क्षरण है और भटकाव है..


ये मातम कर के आंसुओं से चेहरा और खून से शरीर को रंगे हुए , दीवानों की तरह रोते बिलखते युवक, किस तलाश में है और क्या पाना चाहते हैं…कोई इनको क्यूँ नहीं समझाता कि बीती हुई बात पर दुःख सबको होता है लेकिन उसके लिए जान भी दे देने से इतिहास में कोई बदलाव नहीं हो सकता..

इतिहास में जाइये तो एक से बढ़ कर एक भीषण युद्ध और क्रांतियां हुई हैं ..दोनों विश्व युद्धों को बीते हुए ही अभी बहुत ज़यादा समय नहीं हुआ है. प्रथम युद्ध में जर्मनी और द्वितीय में अमेरिका द्वारा किया गया मानवमात्र पर अत्याचार और विध्वंस भी हम भूले नहीं हैं..हम तब भी नहीं थे, लेकिन उसके लिए सीना पीट कर रोते नहीं हैं…

ज़यादा दूर क्यों जाएँ, भारत-पाक बॅटवारे के समय दोनों देशों की सीमाओं पर हुई खामखा की मार काट, पलायन, विस्थापन , बेतहाशा भागते हुए लोगों के व्यामोह, तड़प, और फिर भी जीने की बेचारगी कोई हँस कर भुला देने वाली घटनाएं नहीं है..हम उस समय भी नहीं थे लेकिन उसके लिए मातम नहीं करते ..या अगर होते भी तो शायद हज़ारों लाखों करोड़ों बेचारे लोगों की सूची में हमारा भी नाम होता ..उस समय जो कुछ भी घटित हो रहा था , पता नहीं हम उसे अपनी तरफ से रोकने की कोशिश भी करते या नहीं…

हाल ही के दिनों में भी देश /विश्व में क्या कुछ नहीं घटित हो रहा है ..हर तरफ अनाचार फैला है. स्वार्थ साधकों द्वारा अकारण ही निर्दोषों मासूमों की जान लेना जैसे एक बच्चे का खेल हो गया है…जॉर्डन, सीरिया, इसराइल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांगला देश , हमारा प्यारा भारत महान, और भी न जाने कितने विकासशील देश आग में जल रहे हैं…अब तो हम हैं..लेकिन क्या कर लेते हैं..

अपहरण , हत्या, डकैती, लूट, बलात्कार, दंगे ,ड्यूटी पर अफसर की हत्या ,शक्तिशाली द्वारा साधनविहीनों को दबाना आदि क्या कुछ आजकल नहीं हो रहा है..अब तो हम हैं लेकिन क्या कर रहे हैं..

वर्त्तमान के हथौड़े से भूतकाल की लकीर पीट रहे हैं साथ ही अपना सर भी फोड़ रहे हैं…

जिसे बदला नहीं जा सकता , उसपर रो रो के एक सुन्दर सम्भावी भविष्य की परिकल्पना को भी कर्महीनता के कारण नष्ट कर रहे हैं..

1984 में निर्दोष सिखों को छुपी जगहों से खींच खींच कर ज़िंदा जला दिया गया..क्या वो मानव नहीं थे..

उन की बरसी पर कौन सामूहिक मातम करता है..

2002 में गोधरा में ट्रैन में जाते हुए बेकसूरों को जलाया गया और बाद में शहर की बस्तियों में रहने वाले मासूम इंसानों के साथ अमानवीय पाशविक कृत्य किये गए..

क्या उनकी याद में मातम किये जाते हैं…..

20008 ,11 और 13 में मुम्बई में ब्लास्ट हुए..और मुम्बई में ही क्यों सीरियल ब्लास्ट तो अब हमारे देश में त्यौहार की तरह मनाये जाने लगे हैं..

हाल ही में मुज़फ्फरनगर में प्रायोजित सांप्रदायिक दंगे हुए….आरोप सिद्ध नहीं हुए , लेकिन सब जानते हैं कि किस तरह मानवीय भावनाओं को ताक पर रख कर मुस्लिम नेताओं ने ही राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने के लिए निर्दोष , गरीब मेव मुसलमानो को बेमतलब मरवाया… रुपये और शक्ति के बल पर पुलिस वालों का मुंह बंद किया और अपनी अपनी रोटियां सेकीं…

इन घटनाओं की विभीषिका क्या कर्बला की लड़ाई से कम है…

हम तब नहीं थे , इसलिए हसन , हुसैन को नहीं बचा सके , लेकिन अब हैं तो किसको बचा रहे हैं…

केवल खुद को बचा रहे हैं और अपना पल्ला झाड़ रहे हैं…

दंगों फसादों की स्थिति में खुद को सुरक्षित करते हुए घरों में बंद हो जाते हैं..पीड़ितों की मदद करते ज़रूर हैं लेकिन आग ठंडी हो जाने के बाद..

कर्बला के युद्ध में अपने न होने का अफ़सोस तो है लेकिन अपने होते हुए इस तरह की वीभत्स घटनाओं के घटित होने का अफ़सोस नहीं है…

हसन हुसैन की याद में सर पीटने वाले , खुद मुहर्रम के जुलूसों में ही, ज़रा सी बात पर पेच-ताब खा जाते हैं, और देखते ही देखते शिया -सुन्नी में ही कर्बला के युद्ध जैसा ही दृश्य उपस्थित हो जाता है..

ऐसे समय में ,ये अतीत की याद में अपने पुरखों की दुखद मृत्यु पर रोने वाले खुद अपने ही हाथों, अपने भाइयों की लाशें गिराते हैं…दंगों में बढ़ चढ़ के हिस्सा लेते हैं और मृत लोगो पर रो रो कर जीवितों का सर काटने के लिए तिलमिलाते छटपटाते रहते हैं..

मुझे दुःख होता है कि खामखा सलाखों से खुद को पीट कर ज़ख्म खा कर खून बहाने वाले, सेना में भर्ती हो कर यदि सीमा पर खून बहाएं तो शायद चीन और पाकिस्तान की नापाक देशविरोधी हरकतों पर रोक लग सके..
और सेना में नहीं तो किसी भी क्षेत्र में सकारात्मक कार्य करने के लिए अपनी ऊर्जा को बचा कर रखें..

मुझे विश्वास है कि सड़कों पर बहा हुआ अपने अनुयायियों का बर्बाद खून देख कर प्रोफेट मुहम्मद , हज़रत अली और हसन हुसैन की आत्मा खून के आंसू रोती होगी..

ज़रूरत एक जागरूकता की है, और एक सदियों पुरानी बेबुनियाद अनुचित परंपरा को रोकने के लिए सोचने की है..वर्ना कल को आने वाली पीढ़ी हमारे नाम ले कर भी नोहे गायेगी ..और हम बीते हुए समय की दुहाई देने में समय नष्ट कर, अपनी अकर्मण्यता को परंपरा का आवरण ओढ़ा कर अल्पविकसित ही रह जायेंगे…

महत्वाकांक्षा जब भीतर से आत्मा पर चोट करेगी तो झूठे संस्कार पैरों को बांध बैठे रहेंगे….हम आगे बढ़ने वाले समझदारों को तो देखेंगे लेकिन अपने पैरों की ज़बरदस्ती मोल ली गयी बेड़ियों को नहीं देख पाएंगे और छाती पीटकर रो रहे होंगे…

हाय हसन..
हाय हुसैन…
हम तब न हुए..
हम अब तो हैं..
पर बर्बाद हैं..
हम अब्दे खुदा,
हम खूने नबी, ,
हम खूने अली,
हम खूने हसन,
हम ज़हरा नसाब
हम शाहे ज़माँ….
हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं..
मरे हुए कल पे रो रो के आज को मारते हैं ….
हम बेकार हैं बर्बाद है..

हम पे सलामे करबला मातमी
हम पे सलामे शोहदा मातमी
हम पे सलामे सय्यदा मातमी
हम पे सलामे मुर्तज़ा मातमी
हम पे सलामे मुस्तफ़ा मातमी
हम पे सलामे बावफ़ा मातमी
हम अपनी अपनी माँओं की नज़रों के सुकून..
कब तक यही करते रहेंगे , बर्बाद हो के .
दिले ज़ैनबे कुबरा का चैन,
खुद पर कब रोवेंगे ज़हरा के सुकून…

या बस कहते रहेंगे कहते रहेंगे या हसन …या हुसैन…



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185 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
December 14, 2013

आदरणीया सरिता जी, आज मैंने आप का यह अत्यंत मौलिक और बड़े साहस के साथ लिखा गया आलेख देखा, तो 184 वीं टिप्पणी करने का मन हुआ | मैंने सरसरी निगाह से लगभग सभी टिप्पणियों को भी समझने का प्रयास किया | जाफ़र साहब के ब्लॉग पर जाने की कोशिश की पर उनका ब्लॉग खुला नहीं | आलेख और उस पर आई टिप्पणियों ने तथ्य को काफी-कुछ स्पष्ट किया है, किन्तु भारतीय ( वैदिक-पौराणिक युग से आज तक ) वैचारिकाता के समान ज़ाफरों में लकीर का फ़कीर से बाहर होने की व्यापक वैचारिक उदारता और समझ अभी भी पैदा नहीं हुई है | कम-से-कम भारत में ही यदि ऐसा हुआ होता तो आतंकवाद के शमन में बड़ा योगदान मिला होता | खैर.., वैचारिक तारों को झनझनाते इस नायाब आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    sinsera के द्वारा
    December 14, 2013

    आदरणीय सर, लेख को समझने के लिए धन्यवाद..हालाँकि इसके लिए मुझे ब्लॉग पर या घर पर काफी सुनना पड़ा, वो भी आपने पढ़ा ही होगा…जाफ़र साहब को मैं ने भरसक समझाने का प्रयास किया लेकिन वो अपनी अटल धारणा को कायम रखने की एक मिसाल बने रहे…फिर मेरी भी समझ में आ गया कि लाख वार्ताओं और शांति प्रयासों के बाद भी आज तक ये मसला अनसुलझा क्यूँ है….??

sadguruji के द्वारा
December 7, 2013

आदरणीय जाफर जी,मेरा प्रेम आप तक पहुंचे.अनगिनत मुस्लिम भाई मेरे परिचित हैं.हमारे त्योहारों पर वो हमें बधाई देते है और उनके त्योहारों पर हम उन्हें बधाई देते हैं.इसी देश में हमको और आप को मिल जुल के रहना है.इस देश में हिन्दू मुस्लिम के बीच कितने दंगे हुए,कोई गिनती नहीं है.लेकिन क्या इससे हम दोनों के धर्म पर कोई फर्क पड़ा,नहीं.आप अपने त्यौहार मनाते हैं और हम अपने त्यौहार मनाते हैं.इसी तरह से इस लेख का भी आप के त्यौहार पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.समय के साथ साथ मनुष्य अपने त्योहारों में कोई न कोई नई चीज भी जोड़ते जाता है.सरिता जी ने केवल इस लेख में एक सुझाव दिया है.उस सुझाव को अभी कोई नहीं मानेगा,लेकिन भविष्य में कभी इस पर इंसान विचार कर सकता है.बुद्धिजीवी लोगों का कार्य ही यही है.कि वो समाज को अच्छा सुझाव दें.ये लोग हिन्दू धर्म की तो और ज्यादा आलोचना करते हैं.आप बुरा न मानते हुए इस बहस को यहीं ख़त्म करें और हाँ,यदि आप का ब्लॉग है तो वहाँ पर अपने धर्म से सम्बंधित लेख लिखें.हम सब लोग भी आकर पढ़ेंगे.अब हम लोग इस बहस को यही ख़त्म करते हैं.अपनी शुभकामनाओं सहित.

Jafar के द्वारा
December 6, 2013

Shishta use dikhayi jati h jo shishta samjhe …or rhi baat shailesh ki to unko koi haq nhi h ye kehne ki jis din hume pata chalega to humara sir sharm se jhukega …..wo pahele apne ko dekh le phir bole…ye koi baat nhi h ki aap bhai bol k gaali de jayen….ye koi shishtta nhi h….aap b unka paksh lengi sarita ji…I know kyu…. lekin aapko fair hona chahiye…unko aapko bolna chahiye ki agar wo ye bol rhe h to kyu….unka kya ilm h islam ka jo hume muslim hoke nhi pata. .mai aapke dharm ki kai cheeze jaanta hun jo ki bahot hi sharmnaak h…ab mai kahiye to ek lekh likh dun…. ki aakhir kyu… naaga baba ki pooja 21st century me….bahot sharm ki baat h… aasaram jaise rapeist ko bhagwaan ka darja aakhir kyu… krishna ki raaass lila ke naam pe ashlilta kyu… kyu holi ya gadesh chaturthi me bhaang le k woman b road me besudh ho k naachti h…. shiv ratri me shiv or parwati ko gaaliyan kyu…like shiv fuc….parwati…. or bahot si baaten h….maine saare jawab islam se related bahot shaaleenta se diye h…lekin mai nahaq nhi sununga….mai jawab jb deta hun jb mera dil kehta h ab aap ko agar upar likhe sawal sahi lagte h to jawab dijiye lekin dil se……

    sinsera के द्वारा
    December 6, 2013

    जाफ़र साहब…आप लड़ाई न करें, जहालत जहाँ है वहीँ बुरी है…मैं ने कब कहा कि हिन्दू धर्म में ढकोसले नही हैं…लेकिन इसको लेकर क्या हम बच्चों की तरह लड़ जाएँ..??समझदारी तो इसमें है की हम इसको दूर करने की कोशिश करें….लेकिन बात यहाँ ढकोसले कि थी ही नही…मुझे अपना खून बहाने और आग पर जलने का सेन्स समझ में नहीं आया…नौजवानों की खामखा की खूंरेज़ी से तकलीफ हुई तो कह दिया अब इसमें मेरा धर्म तेरा धर्म कहाँ से आया..??इस लड़ाई का कोई अंत नहीं है क्यूंकि कोई पक्ष समझने को तैयार नहीं होता….आप बेशक लेख लिखिए …कोई जानकारी मिले तो अच्छा लगेगा, लड़ाई झगडे की बात हुई तो दुःख होगा बस और क्या…….

kanakjoshi के द्वारा
December 5, 2013

सरिता जी, आपको पहली बार पढ़ा है हमे, सच ही तो है कहा है आपने,

kanakjoshi के द्वारा
December 5, 2013

हमे तो लगता है ये झगड़ा ही बे-बुनयादी है, अगर इतिहास खंगाला जाये तो, हमारा पडोसी मुल्क और हम एक ही धर्म और एक ही लहू के दो रंग है, जिन्हे भारतवर्ष पर आक्रमण करने वाले मुगलो ने अपने धर्म में शामिल करने हेतु उनका धर्म परिवर्तन करा दिया और बीज बो दिया हिन्दू- मुस्लिम का…रही सही कमी भारत-पाक बटवारे ने पूरी कर दी और भारतवर्ष टुकड़ो में बट गया

    sinsera के द्वारा
    December 6, 2013

    कनक जी , आपको यहाँ देख कर बहुत अच्छा लगा…..आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद…

sinsera के द्वारा
December 4, 2013

जाफर साहब..अभी कुछ दिन पहले मैं ने आपको शालीन और शिक्षित कहा था, दुःख है कि आज आप अपनी सीमाएं तोड़ते नज़र आ रहे हैं..स्वतन्त्र देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ज़रूर है लेकिन व्यक्तिगत आक्षेप गाली -गलौज की हद तक नहीं पहुंचना चाहिए….आप अपनी धारणा रखने और शालीनता पूर्वक विरोध करने के लिए के लिए सादर आमंत्रित हैं, लेकिन मुझे आज आपकी भड़काऊ भाषा से काफी दुःख हुआ..शैलेश जी ने प्रेमपूर्वक “हमारे प्यारे मुसलमान भाई ” शब्द का प्रयोग किया है…. जिसके लिए मैं उनकी सराहना करती हूँ….आप भी कृपया अपना विरोध शिष्ट भाषा में दर्ज करें , जिसके लिए पूर्व में आपकी सराहना की गयी है..धन्यवाद….

    Jafar के द्वारा
    December 7, 2013

    mai aapko saare jawab already de chuka hun

Jafar के द्वारा
December 4, 2013

bewkoof gadha shailesh

sinsera के द्वारा
December 4, 2013

आज मेरी स्थिति उस माँ की तरह है जिसके सारे बच्चे आपस मे लड़ रहे हों.. …..इतना कि पाएँ तो एक दूसरे का रक्तपान कर लें…फिर भी सभी माँ से ही शिकायत भी ले कर आते हैं…ऐसे मे माँ क्या करे, सब ग़लत हों तो भी गला तो किसी का नहीं काट सकती , समझाएगी गी ही, ज़रूरी हुआ तो चपत भी देगी, बस ….जानती है कि अभी ये एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं लेकिन मिनटों मे साथ बैठ कर हंसते बोलते और गाते नज़र आएँगे..लड़ाई किसी मुद्दे को लेकर तो है नही बस सब अपनी अपनी बात उपर रखने के चक्कर मे योग्यता दिखा रहे हैं…सभी आपस मे एक दूसरे को जानते हैं फिर वर्णन करने की क्या ज़रूरत है…अच्छे बच्चों की तरह से बात ख़तम करके हाथ मुँह धो कर पढ़ने बैठिए…..क्योंकि समझने समझाने का टाइम अब ख़त्म हुआ… ……सबसे अच्छे तो जाफ़र साहब निकले..जिस बात को पहले दिन बोले थे , आज भी उसी पर अड़े हैं..इस पूरी कहासुनी का उनपर कोई असर नही है..सद्गुरुजी सही कहते हैं, उनका प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है, वैसे प्रश्न तो कोई था ही नही…उनकी एक बनी बनाई धारणा है, अटल विश्वास है….जिस पर वो अडिग हैं…………सद्गुरुजी समझदार हैं , अच्छी तरह समझ गये कि कौन क्या चाहता है…आगे से ऐसी लड़ाइयाँ देख कर व्यथित ना होइएगा बल्कि मेरी तरह आनंद उठाइएगा…जीवन चार दिन का है , ये भी सही है, और जीवन का आनंद उठाइए, किसी बात की जल्दी नही है, ये भी सही है……मंच पर चुपचाप काम करने का भी एक मज़ा है और इस किस्म के कोलाहल का भी अपना एक आनंद है…जीवन खट्टा, मीठा, तीखा ….हर स्वाद का मिश्रण है..ये मेरा दर्शन है…चार श्लोक याद करके ज्ञानी बन जाऊँ, अभी इतना वक़्त मेरे पास कहाँ……….

    Jafar के द्वारा
    December 4, 2013

    sarita ji plz shailesh jaise jahil k cmnt na lijiye use koi haq nhi h ki wo kisi dharm ko galat kahe…

sadguruji के द्वारा
December 4, 2013

आदरणीय सूफी महोदय,जितना आप दूसरों के बारे में नेगेटिव बोलते है,वो सब अपनी ही गई गुजरी स्थिति बयान करते हैं.न तो आप में कोई ज्ञान है और न ही कोई शिष्टाचार.मुझे आप से बात करने में कोई रूचि नहीं है.इसीलिए आप भी जबदस्ती बातचीत न करें.अकेले में बैठ के अपने बारे सोचेंगे तो ये आप पे बिलकुल फिट बैठेगा-”बुरा जो देखन मै चला बुरा न मिलिया कोय,जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय.”आप अपने ज्ञान से पहले अपने को तो सुधार लें,फिर बाद में दूसरों को उपदेश दीजियेगा.मुझे आप के ज्ञान की जरुरत नहीं है.पहले अपने भीतर की अज्ञानता और अशंति को देखें.एक अंगुली आप किसी की तरफ उठाएंगे तो चार अंगुलियां अपनी तरफ होती हैं.वास्तव में आप चाहते नहीं हैं कि कोई इस ब्लॉग पर आये,इसीलिए हमेशा कोई न कोई नौटंकी करते रहते हैं.ऐसी घटिया दर्जे की नौटंकी आप करेंगे तो कोई उन ब्लॉगों पर जायेगा भी नहीं ,जहाँ जहाँ आप जायेंगे.यही आप चाहते भी हैं.वास्तव में आप मित्रता करके शत्रुता निभाते हैं.ये आप का नेचर है.मुझे ऐसे ज्ञानियों की जरुरत नहीं है.आप से लाखों गुना बेहतर अनेको ज्ञानी मेरे मित्र हैं.आप अपनी शब्दों की बाजीगरी और बौद्धिक चालबाज़ी से एक दो को मूर्ख बना लेंगे,लेकिन सबको नहीं.ज्यादा अच्छा हो कि अब आगे न आप कमेंट करें और न मै.

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 4, 2013

    मुनिवर आप मामले की गंभीरता को समझ नहीं रहे हैं.. ख़राब टेप रिकॉर्डर की तरह एक ही धुन सुनाने लगते हैं आप..मुझे मेरे बचपन के मित्र चमन की याद आ रही है वो रोज़ मेरे यहाँ ताश खेलने आता था रोज़ लड़ाई हो जाती थी उसकी किसी न किसी से, रोज़ बोल के जाता था कि अब कल नहीं आऊंगा, लेकिन फिर अगले दिन तय समय पर आ जाता था…!! ज्ञानी को इतनी गंभीरता शोभा नहीं देती है…!! मैं आपकी दिल से इज्ज़त करता हूँ…आप बेकार में क्रोधित हो जाते हैं… ब्रह्म चर्चा सुंदर है लेकिन हर वक़्त ब्रह्म चर्चा उचित नहीं है…!! और आप को बता दूं जो मैं कर रहा हूँ वो अति प्राचीन तिब्बतन ध्यान विधि है ‘अतिशयोक्ति’ किसी बात को उस पॉइंट तक पहुंचा दो जहाँ उसका रूपांतरण हो जाये…जैसे पानी का कोथनांक 100 d c होता है जहाँ पहुँच पर पानी भाप बन जाता है उसकी तरह विवाद का भी कोथनांक होता है…!! लगता है तिब्बत के बारे में आप बहुत कम जानते हैं…!! खैर..!! “मुझे आप से बात करने में कोई रूचि नहीं है.इसीलिए आप भी जबदस्ती बातचीत न करें.” रूचि कैसे होगी आपकी, लेकिन क्या करें…मेरी भी मज़बूरी है… कल अनील कह रहा था ‘ये कैसे सद्गुरु हैं यार…?’ मैंने कहा जैसे भी अच्छे हैं…इनको इनके जैसे बने रहने दो…जैसे आसाराम के बात लोगों की साधू शब्द पर से श्रधा उठ गया उसी तरह धीरे धीरे सद्गुरु शब्द का जो सम्मोहन है लोगों के भीतर हो भी इनके मद्ध्यम से टूट जाएगा…मैं भी जानबुझ कर अपने नाम में सूफ़ी जोड़ लिया… लोग शब्द से सम्मोहित हो जाते हैं… ज़रुरत है कि शोब्दों को नए अर्थ दे दिए जाएँ…ताकि लोग इसके भार से मुक्त हो जाए… शायद आप नहीं जानते आप का सद्गुरु होना मेरे लिए कितना उपयोगी है…ये सब मेरा ही कमाल है कि सोनम जी ने आपको डांट दिया था…वर्ना इस देश के लोगों में इतनी कहां हिम्मत की सदगुरुओं को डांट दे…अगर होता तो आज इस देश की ये दुर्दशा नहीं होती….!!

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
December 4, 2013

एक शिकायत है आपसे (आदरणीय सरिता जी), आपने जब अनील को डांट ही दिया था तो फिर सोनम जी को अनील को कुत्ता बोलने की क्या ज़रुरत थी…?? ये तो बात बढ़ाने वाली बात हो गयी…मामला निपट गया था, सब शांत थे लेकिन सोनम जी ने आ के आग में घी डाल दिया…अभी तक मैं सोनम जी के साथ था लेकिन अब मैं अनील का साथ दूंगा..लड़की की बेज्ज़ती अगर बेज्ज़ती होती है तो क्या लड़कों की कोई इज्ज़त नहीं होती है… अनील एक शादी-शुदा व्यवस्थित पुरुष हैं…अगर उनकी धर्म पत्नी पढ़ेंगी तो सोचिये उनपे क्या बीतेगी…मुझे नहीं लगता कि कोई सभ्य स्त्री ये कभी बर्दाश्त कर पाएगी कि कोई लड़की उसके पति की तुलना ‘कुत्तों’ से करे… आपकी बात मान कर अनील ने अपना मुंह बंद कर लिया था…सोनम जी को उसके मुंह में अंगुली करने की क्या ज़रुरत थी… अभी वो सरकारी मीटिंग में है मुझे बोला शाम को फ्री होता हूँ तो सब को देख लूँगा… आप से निवेदन है कि आप सब से कहिए कि वो कुत्ते-बिल्ली वाला भाषा का प्रयोग न करें…इससे से मंच का माहौल दूषित होता है…!!

    Sonam Saini के द्वारा
    December 4, 2013

    मैंने किसी को कुत्ता नही बोला बस आप लोगो को आपकी भाषा में ही जवाब दिया है ! जैसे उन्होंने अपनी बात कहने के लिए एक कहावत का सहारा लिया था वैसे ही मैंने अपनी बात कहने के लिए एक उदाहरण का सहारा लिया ..और वैसे भी जैसा करोगे वैसा भरोगे …. दुसरो के बारे में कुछ भी बोलने से पहले ये जरुर सोच लिया करिये कि जबान दुसरो के मुह में भी होती है ……….सारी दुनिया पर आप लोगो का ही राज़ नही है कि जिसके बारे में जो चाहोगे बोल दोगे और वो चुपचाप सुनता रहेगा ………..

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 4, 2013

    सोनम जी नमस्कार, “व की गलियो के कुत्तो की याद आ गयी ! वो भी बिलकुल आप दोनों की ही तरह व्यव्हार करते थे या यूँ कहूं कि आप दोनों बिलकुल उनकी ही तरह व्यवहार कर रहे हैं ” …. ये कौन सी कहावत है, हमने तो पहले नहीं सुनी थी ये कहावत…??? आगे आप कहती हैं…,”जितना भौंकना है भौंकिये हमे कोई फर्क नही पड़ता ” … इससे साफ़ पता चलता है कि आप अनील को कुत्ता समझती हैं… आप फिर कहती हैं, “Be Happy…… :) … और जिनको भौंकना हैं उनको भौंकने दीजिये …” आप ने साफ़ और स्प्ष्ट शब्दों में अनील को कुत्ता कहा है… दूसरी बात जब मैंने और सरिता जी ने अनील को पहले ही डांट दिया था तो फिर आपको गड़े मुर्दे उखाड़ने की क्या ज़रुरत थी…सब आप केलिए लड़ ही रहे थे… आदरणीय सद्गुरु जी ने भी इसकी भर्तसना की थी.. अगर अनील के व्यवहार में फिर भी सुधार नहीं आता तो हम ‘फीडबेक’ पर शिकायत करते, लेकिन इस तरह से खुले आम किसी को कुत्ता बिल्ली बोना अति निंदनीय है…अगर कल अनील ने गलती की थी तो आज आपने महा गलती की है …आपने सरिता जी की भी अवहेलना की है जब वो मामले की कारवाही कर रही थीं तो आपको बोलने की क्या ज़रुरत थी..?? अनील जी हमारे मंच के सम्मानित ब्लॉगर हैं जागरण परिवार भी इस बात को मानता है, अनील जी पर लगे सरे प्रतिबंध को जागरण परिवार ने हटा दिया है… अब हम सरिता जी, सद्गुरु जी और अनील जी के प्रतिक्रिया का इंतज़ार है…मंच की मर्यादा का सवाल है बात ऊपर तक जायेगी…!!!

    Sumit के द्वारा
    December 5, 2013

    हमे तो मोदी जी बात याद आ गयी, बिलकुल यही नज़ारा था उनके बोलने के बाद

shailesh001 के द्वारा
December 4, 2013

बड़ा ही सामयिक लेख है .. इसके बड़े मायने हैं खासतौरपर भारतीय मुसलमानों के लिए। जिस दिन हमारे प्यारे मुसलमान भाइयों को असलियत का पता चलेगा, मैं पूरी जिम्मेदारी और समझ से कहता हूं, शर्म और दुःख से जमीन में गड़ जाएंगे .. किसका गम मना रहे हैं, अपनों के ही हत्यारों के.  आगे जानेंगे मेरे ब्लॉग मं े.. धन्यवाद।

    sinsera के द्वारा
    December 4, 2013

    शैलेश जी नमस्कार, समय देने के लिए धन्यवाद….आपके ब्लॉग का इंतेज़ार रहेगा….

    Jafar के द्वारा
    December 4, 2013

    Oye shailesh tujjhe kya pata h islam k baare me jo itna bol raha h…pahele apne dharm ko dekh jo ashlil dharm h jo shiv or parwati ki shadi k din unko gaaliyan dete h or krishna ki raas lila ki baat krte ho..wo tm hi ho jo aasaram jaise rapist ko apni beti or behan dete ho kyunki tmhe to unme b bhagwaan nazar aata h…tm jo non veg ka dhong rajte ho….islam ko samjhenge pagal pahele apne ko samajh lo ki tm aakhir ho kyu..tm hi jo apni murtiyon ko pigs k beech chod dete ho..oh haan tmhe to pigs me b bhagwaan nazar aate h…mai na kisi dharm ko kehta hun or na apne dharm ki burayin sunta hun… pahele knowledge badha lo anghutha chaap phir koi cmnt krna.. mujhe pata h ki ab sidha apni aoukaat me utroge gaali galouch me….aakhir ho na jahil tm kuch nhi pats h bs chale aaye cmnt krne Bewkoof, non sence bak gaali behude

sadguruji के द्वारा
December 4, 2013

मुझे अफ़सोस है कि आदरणीया सरिता जी का लेख “आखिर क्यों?” कर्बला का मैदान बन गया है.उस मैदान में आज भी आदरणीय जाफर जी अपना अनुत्तरित सवाल लिए खड़े हैं.मै लेख पढ़ने गया था,परन्तु जाने-अनजाने बहस का एक पात्र बन गया.मै बहस करना नहीं चाहता परन्तु किसी के सवालों का जबाब नहीं देना भी ठीक नहीं है.मुझे महसूस हुआ कि सरिता जी आप नाम के अनुरूप ज्ञान की बहती हुई नदी हैं,साथ ही ज्ञानियों की गरिमा के अनुरूप विनम्रता और शिष्टाचार में पारंगत हैं.अनिल जी पहले हँसते है,मजाक उड़ाते हुए आनंद लेते है और फिर बहस के लिए उकसाते हैं.सूफी जी पहले बहस के लिए उकसाते और भड़काते हैं और फिर जबाब पाकर हँसते हैं,उसका आनंद लेते हैं.ये उनका तरीका है,जिसे मै पसंद नहीं करता.कमेंट करते समय सभी ब्लॉगर्स को विनम्रता और शिष्टाचार का पालन करना चाहिए.सारी बहस का मेरा एकमात्र उद्देश्य था कि इस मंच पर शांति बनी रहे.चार दिन का जीवन है.क्या पता किसकी कौन सी स्वांस आखिरी हो और ये सफ़र ख़त्म हो जाये.इस मंच बहुत से लोग अपना कार्य चुपचाप कर रहे हैं,वो सबसे बेहतर रास्ता है.

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 4, 2013

    मुनिवर, आपने किस हिसाब से जीवन को चार दिन का कहा है….??? और ये किस की बातों में पड़ गए हैं आप कि सूफी पहले बहस करता है उकसाता है, भड़कता है और फिर हँसता है…?? लोगों ने कह दिया और आपने एक धारणा बना ली…??? इतनी जल्दी निर्णय पर नहीं पहुंचे, आपके हिसाब से जीवन भले ही चार दिन का हो, लेकिन मेरे देखे..जीवन बस है, बिना किसी शुरुआत, मध्य और अंत के…कोई जल्दी नहीं है…घबराहट में कुछ भी मान कर मत बैठ जाइये…!!! ‘भक्त पेड़ से गिरे सूखे पत्ते की तरह होता है, उसको जहाँ हवा ले जगाये वहाँ जाता है उसकी अपनी कोई मर्ज़ी नहीं होता’, आपका अफ़सोस करना इस बात का सूचक है कि आप जीवन को अपने नियंत्रण में लेना चाहते हैं…आप निर्णायक बनना चाहते हैं…और जब कुछ आपकी मर्ज़ी के अनुकूल नहीं होता है तो आप बौखला जाते हैं…छोटे बच्चे की तरह हाथ-पैर पटकने लगते हैं…’भक्त प्रवाह एक साथ एक हो जाता है उसके विपरीत नहीं…’ उसके जीवन में कोई चुनाव नहीं होता…शांति तो शांति अशांति तो अशांति…वो सब के साथ राजी है…!! आपकी अज्ञानता हद दर्ज़े की है…छोटे बच्चे को भी जो बात समझ में आ जाये वो आपके पल्ले नहीं पड़ती…..जब इस देश के सद्गुरुओं का ये हाल है तो बांकी लोगों का क्या होगा…??? ठीक ही कहता है वॉट्स “भारत में कोई भी चार श्लोक याद कर के गुरु बन जाता है” कुछ सीखिए गीता से…कृष्ण आपकी तरह भीरु नहीं थे अगर होते तो वो भी आपकी तरह चुपचाप ॐ शांति शांति करते…!!

    sadguruji के द्वारा
    December 4, 2013

    सूफी महोदय,जितना आप दूसरों के बारे में नेगेटिव बोलते है,वो सब अपनी ही गई गुजरी स्थिति बयान करते हैं.न तो आप में कोई ज्ञान है और न ही कोई शिष्टाचार.मुझे आप से बात करने में कोई रूचि नहीं है.इसीलिए आप भी जबदस्ती बातचीत न करें.अकेले में बैठ के अपने बारे सोचेंगे तो ये आप पे बिलकुल फिट बैठेगा-”बुरा जो देखन मै चला बुरा न मिलिया कोय,जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय.”आप अपने ज्ञान से पहले अपने को तो सुधार लें,फिर बाद में दूसरों को उपदेश दीजियेगा.मुझे आप के ज्ञान की जरुरत नहीं है.पहले अपने भीतर की अज्ञानता और अशंति को देखें.एक अंगुली आप किसी की तरफ उठाएंगे तो चार अंगुलियां अपनी तरफ होती हैं.वास्तव में आप चाहते नहीं हैं कि कोई इस ब्लॉग पर आये,इसीलिए हमेशा कोई न कोई नौटंकी करते रहते हैं.ऐसी घटिया दर्जे की नौटंकी आप करेंगे तो कोई उन ब्लॉगों पर जायेगा भी नहीं ,जहाँ जहाँ आप जायेंगे.यही आप चाहते भी हैं.वास्तव में आप मित्रता करके शत्रुता निभाते हैं.ये आप का नेचर है.मुझे ऐसे ज्ञानियों की जरुरत नहीं है.आप से लाखों गुना बेहतर अनेको ज्ञानी मेरे मित्र हैं.आप अपनी शब्दों की बाजीगरी और बौद्धिक चालबाज़ी से एक दो को मूर्ख बना लेंगे,लेकिन सबको नहीं.ज्यादा अच्छा हो कि अब आगे न आप कमेंट करें और न मै.

sinsera के द्वारा
December 3, 2013

निकले थे कहाँ जाने के लिए पहुँचे हैं कहाँ मालूम नही……….

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 4, 2013

    मैं आपकी बात से सहमत हूँ,,,कलेजा दुखता है ये सब देख कर, लोग अर्थ का अनर्थ कर देते हैं…खैर यही जीवन है…’अगर हमें ये पता न हो कि कहाँ जाना है, तो कोई रोड भी मंजिल तक पहुंचा देता है मैंने मुहावरे का छीछालेदर नहीं किया था….मैं अनील को बस ये बताना चाहा रहा था कि ‘कौन सी बात कब और कहाँ कही जाती है, अगर ये सलीका पता हो तो हर बात सुनी जाती है’….ये माना कि लोगों को परेशान करना गलत नहीं है लेकिन किसी का दिल दुखना पाप है, दिल में ख़ुदा का घर होता है…!

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
December 3, 2013

अनील बाबू, आप लतारणीय (लात खाने योग्य) कब से हो गएँ…??? सद्गुरु जी कह रहे हैं आदरणीय सरिता जी के ब्लॉग पर इस तरह की बातें न करें…यही बेहतर है…अब सवाल ये है कि अगर सरिता जी उनकी नज़र में आदरणीय हैं तो क्या आप लतारणीय (लात खाने योग्य) हैं…?? अनील बाबू खुद कसम, हमें पता नहीं था कि आप इतने गिरे हुए इंसान हैं…!!

    December 3, 2013

    अब, यह तो राजेन्द्र जी ही बताएँगे……………..परन्तु मैं तो बस इतना ही कहूंगा कि हाँ मैं लातरणीय हूँ…….वो भी बचपन से………………..कभी मान बाप लात मरते थे ……….अभी मैं खुद को लात मरता हूँ………………इंसान गिरा हुआ ही होता है……………वो भी जन्म से ……..मैं भी कोई इससे अछूता नहीं………….

sinsera के द्वारा
December 3, 2013

हे प्रभु……इन्हे क्षमा कर दो….ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं…..

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 3, 2013

    ‘जीसस ने ये बात अज्ञानता में कही थी, इस व्यक्तव्य से ये पता चलता है कि जिस को ‘प्रभु’ की समझदारी पर संदेह है..दूसरी बात क्षमा उसे किया जता है जिससे हम खफा हों…क्या ‘प्रभु’ उनलोगों से खफा थे…?? क्या प्रभु जीसस से पूछ कर लोगों को सजा या माफ़ी देते थे…? मैं यहाँ ईसाइयत के विरोध में खड़ा हूँ…!!

    December 3, 2013

    भाई, मैं भी खड़ा हूँ……………….लेकिन चुप-चाप…………………मौन व्रत है मेरा………….

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
December 3, 2013

आदरणीय सरिता जी से विनम्र निवेदन… आपके ‘he is a very nice man’ वाले अनील जी महिलाओं का मंच पर मज़ाक उड़ा रहे हैं, अपने एक कमेंट में उन्होंने आदरणीय सोनम जी की तुलना ‘धोबी के वाहन’ से की जो की अति निंदनीय है.. स्वस्थ मज़ाक किसे नहीं पसंद है लेकिन किसी को ‘धोबी का वाहन कहना’ क्या उचित है…??? आप सब जागरण से अनील को वापिस लेन की पैरोकारी कर रहे हैं…मैं तो कहता हूँ कि इनको लिखने से मन कर दिया जाए…इससे पहलें इन्होने आदरणीय सद्गुरु का भी अपमान किया है… उदंडता की हद होती है …लेकिन ये सभी हदों को पार करते नज़र आ रहे हैं…!!

sadguruji के द्वारा
December 3, 2013

“मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कश्मकश मे है…. हो गर मालूम गहराई तो दरिया पार क्या करना…!!”अच्छी लगी आप की बात,आदरणीय सूफी ध्यान मुहम्मद जी,शुक्रिया.

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 3, 2013

    नमस्कार, शुक्रिया…!! लेकिन आप जो कर रहे हैं…उससे आपके भीतर का भय प्रगट हो रहा है, अहिंसा- हिंसा का ऑपोसिट नहीं है, भय के कारण किया गया प्रेम सिर्फ दिखावा होता है… ‘और ये तुम भी ठीक और वो भी ठीक और सब ठीक वाली बात दिल्ली में अच्छी लगती है’, ध्यानी पुरुष किसी के घाव पर फूल चढाने का काम नहीं करता है, आप जो कर रहे हैं वो कमज़ोरों की राजनीती है, ‘जिओ और जीने दो’… इस तरह की चालबाज़ियों ने इस देश को नपुंसक बना दिया है..हर कोई एक दूसरे की मुंह पोछने में लगा रहता है…!! आप जो आज कर रहे हैं वो औरतें सदियों से करती आ रही हैं…पहले बहस करती है…फिर अगर तर्क में हारने लगती हैं तो उग्र हो जाती हैं, फिर जब वहाँ भी असफलता मिलती है तो रोने लगती हैं…और मैंने आपका ये तीनो रूप देखा है…!! मीरा भी एक भक्त थी…क्या मलाज कि पडित उसे रणछोड़ दास जी के मंदिर में जाने से रोक दे…बोलती बंद कर दी थी मीरा ने पंडित की…धार था उसके व्यक्तित्व में…वो चापलूसी नहीं करती थी… चेतन्य महापंडित थे पहले फिर भक्त हुए… और एक आप हैं जो खुद को भक्त कहते हैं…काम सारे आप नेताओं वाले करते हैं…कभी प्रतियोगिता में भाग लेते हैं तो कभी अनील के लिए गुहार लगाने जेजे के सामने खड़े हो जाते हैं… पहले अनिल से लड़ते हैं फिर डर के मारे हाय-अनील-हाय-अनील करने लगते हैं…. मन के प्रति सजग होइए सद्गुरु जी…!! शान्ति की माला जपने से शांति नहीं आती है…सदियों से इस देश के मंदबुद्धि पंडित शांति शांति जप रहे हैं…

    December 3, 2013

    हाँ…………..हाँ…………………… हुआ जब गम से यूँ बेहिस तो गम क्या सर के कटने का, न होता गर जुदा तन से तो जानु पर धरा होता, हुई मुद्दत की ग़ालिब मर गया पर याद आता है, वो हरेक बात में कहना कि यूँ होता तो क्या होता………….

    sadguruji के द्वारा
    December 3, 2013

    आदरणीय सूफी मुहम्मद जी,आप हमेशा ग़लतफ़हमी में क्यों जीते हैं.कहते हैं की विचार इसान की छवि होते हैं.अगर आप के विचारों को मै आप की छवि मान लूँ तो मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है की वो बेहद ख़राब है.आप ये बताइये की मैंने अनिल जी से लड़ाई कब की ? और अनिल जी से मै क्यों डरूंगा ? मै नहीं भी ये सब करता तो भी चलता रहता,उससे क्या फर्क पड़ता ? जागरण जंक्शन से आग्रह मैंने अपने विवेक से दिया था.अपने कुछ कमेंट में अनिल जी ऐसा करने का सुझाव भी दिया था.आप को विश्वास न हो तो मेरा लेख “जागरण परिवार से निवेदन” में उनके कमेंट पढ़ लें.आप हमेश आपस में लड़ाने-भिड़ने वाली बात क्यों करते हैं ?आप ने मेरे कमेंट में ये पढ़ा होगा-”बचपन से मेरी आदत है कि पांच रुपये की हांड़ी (मिटटी का बर्तन) भी लेता था खूब ठोंक बजाकर.आज भी वही आदत बरकरार है.किसी के ज्ञान को परखने का मेरा अपना ही एक अलग तरीका है.चाहे सूफी जी हों या अलीन जी,कुछ बातें उनकी सही होती हैं और कुछ गलत भी.उनकी सही बात का समर्थन करना चाहिए और गलत बात का विरोध.दुश्मनी क्या चीज होती है मै नहीं जानता.” और जागरण जंक्शन वाले कमेंट में ये भी पढ़ा होगा-”उनके किसी लेख में कोई आपत्तिजनक बात होगी तो जरुर आप से शिकायत करेंगे और आप कार्यवाही भी कीजियेगा.” आप कमेंट ध्यान से पढ़कर तब कमेंट किया कीजिये.आपस में लड़ना-भिड़ना ही आप का शौक और घटिया राजनीती है.आखिर में एक बात और वो ये की हम लोग ऐसे कमेंट आदरणीय सरिता जी के इस ब्लॉग पर न करें ,यही बेहतर है.

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 3, 2013

    मुनिवर क्रोध में आपका विवेक समाप्त हो गया है लगता है…”कहते हैं की विचार इसान की छवि होते हैं” कोई कहता है और आप मान लेते हैं…??? “मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है की वो बेहद ख़राब है” कब तक अफ़सोस और क्रोध के द्वन्द में फसे रहिएगा…?? या तो क्रोध से मुक्त हो जाइये या अफ़सोस से…!! “और अनिल जी से मै क्यों डरूंगा ?” ये तो आप जाने कि आप उनसे क्यों डरते हैं…इस पर ध्यान कीजिए…!! “मै नहीं भी ये सब करता तो भी चलता रहता,उससे क्या फर्क पड़ता ? ” सवाल सुन्दर है, खुद से पूछें…शयद जड़ तक पहुँच पाएं…. “जागरण जंक्शन से आग्रह मैंने अपने विवेक से दिया था” झूठ बोल रहे हैं आप ऐसा आपने अनील के द्वारा खॊचारे जाने पर किया…उससे त्रस्त हो कर किया…!! “बचपन से मेरी आदत है कि ” सभी आदत बेहोशी से पैदा होते हैं…यही नहीं बहुत आदत आपमें बच्चों जैसी है…बचपना बरक़रार है…बच्चों जैसा होना चाहिए संत को, बचपना अच्छी बात नहीं…!! “ञान को परखने का मेरा अपना ही एक अलग तरीका है.” एक ही इसलिए है क्योंकि तरीका सदैव उधार होता है…बोध को जगाइए…कबतक तरीके की बैशाखी के सहारे चलते रहेंगे…??? “जरुर आप से शिकायत करेंगे ” शौक से कीजिए मेरी साड़ी बातें आपत्तीजनक होती हैं…!! “आदरणीय सरिता जी के इस ब्लॉग पर न करें” सुन्दर राजनीती है, अगर सरिता जी आदरणीय हैं तो क्या अनील जी लतरणीये हैं..लात खाने योग्य हैं जो उनके ब्लॉग पर ऐसी बाते करेंगे आप…??? “आपस में लड़ना-भिड़ना ही आप का शौक और घटिया राजनीती है” मुझे तो किसी से कोई लड़ाई नहीं है, लोग खुद अपनी बचाव में मुझ से लड़ने लगते हैं…!!! राजनीति तो मेरे खून में… I love it.

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
December 3, 2013

राजनीति हो रही है इस मंच पर, लोग भाई-भतीजावाद की राजनीती कर रहे हैं…लोगों को भावुक कर के उसके बुद्धि पर पर्दा डाला जा रहा है…ऐसा लगरहा जैसे सब उन्माद में कुछ से कुछ बक रहे थे…जब उन्माद उतरा तो हाई-दईया-हाई-भैया कर रहे हैं…सास-बहु की सीरियल चल रहा हो जैसे, अनील जी और सद्गुरु जी ऐसे गले मिल रहे हैं जैसे मेरे में बिछड़े दो भाई हो, मनमोहन देसाई की फ़िल्म की तरह पहले खूब लड़े अब गठ्जोडी कर रहे हैं, एक दूसरे का आंसू पोछ रहे हैं…….’इसी को कहते हैं एक ही थैली के चट्टे-बट्टे’ या फिर चोर-चोर मौसेरे भाई…, सरिता जी कह रहीं हैं मैं अनील को व्यक्तिगत रूप से जानती हूँ, तो क्या आप दोनों लोगों का वोट बटोरने के लिए एक दूसरे का विरोध कर रहीं थीं…??? सोनम जी कह रहीं है कि वो किसी को छोड़ेंगी नहीं…क्या है ये सब…??? अब लेखनी में भी जातिवाद, क्षेत्रवाद, और परिवारवाद होगा…?? लानत है…!!!

Jafar के द्वारा
December 3, 2013

Paheli baat mashih abhi zinda h…or dusri baat ki hm logo ko jo krna h hm kr rhe h…hm islam jo kehta h wo kr rhe h….or aap is jeevan ko kya samjhti h agar ye khtm ho jaye to koi baat nhi..ye to bs ek exam h jo hm de rahe h,is jeevan me agar marne ka darr ho to islam ka rule thodi na todenge hum…or jb imam aayenge tb inko jawab wo allah or wo denge..jo janabe Musa A.S. ne Firoun ko diya tha….aap ye kyu soch rhi h ki hm kuch nhi kr rhe h sirf matam kr rhe h..tamam aalim h jo mohharram me hadees padhte h….in logo ko batate h…allah ne kaha h sabr karo allah sabriyon ke sath h zaroori ni h ki wo sirf is zindagi me sath h..wo aakhirat me humare sath hi hoga..or wo log jinhone bekasuron ki jaan li unka sath allah chod dega or unko dozak me daalega… ye life ek exam h jise hme paas krna h jaisa islam kehta h or wo hm kr rhe h…. or hm unko saare jawab de rhe h apni awaaz ahelebait or quran se ..hm unki tarah jahil nhi h or na unki tarah bekasuron ko maarte h to unhone kh diya shia is non muslim,shia kafir…Laanat ho unpe…

seemakanwal के द्वारा
December 2, 2013

बहुत सही कहा आपने .आभार

    sinsera के द्वारा
    December 2, 2013

    सीमा जी नमस्कार….समय देने और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद…..

sadguruji के द्वारा
December 2, 2013

अपने को ‘मुसलमान’ कहने वाले चरमपंथियों द्वारा किये गये आतंक को इस्लामी आतंकवाद कहते हैं। ये तथाकथित मुसलमान भांति-भांति के राजनीतिक तथा मजहबी उद्देश्यों की पूर्ति के लिये आतंक फैलाते हैं। इस्लामी आतंकवाद मध्य पूर्व, अफ्रीका, यूरोप, दक्षिणपूर्व एशिया, भारत एवं अमेरिका में बहुत दिनों से मौजूद है। आतंकी संगठनों में ओसामा बिन लादेन द्वारा स्थापित अल कायदा नामक सैनिक संगठन कुख्यात है। इस संगठन ने मध्य पूर्व एवं अरब प्रायदीप में अमेरिकी सेना की उपस्थिति को समाप्त करने को अपना उद्देश्य घोषित किया है इसके अलावा इस संगठन के घोषित उद्देश्य हैं – उन अरब शासनों को उखाड़ फेंकना जिन्हें यह संगठन ‘भ्रष्ट’ एवं ‘ कम मजहबी ‘ समझता है ; इजराइल को अमेरिकी समर्थन की समाप्ति; पूर्वी तिमोर एवं कश्मीर को मुसलमानों को सौंपना आदि।

    Sonam Saini के द्वारा
    December 2, 2013

    आदरणीय सद्गुरु जी ………..सुबह मैंने यहाँ इस पोस्ट पर एक कमेंट किया था शायद आपने नही पढ़ा …हाँ मुझसे एक गलती हो गयी कि वहाँ मैंने सिर्फ जफ़र भाई को सम्बोधित कर के लिखा है आप लोग को नही, इसीलिए अब यहाँ मैं सभी से कह रही हूँ कि अब आगे इस पोस्ट पर जो भी कमेंट करे वो पोस्ट के बारे में हो न कि उजुल फिजूल बातो के बारे में ! मुझे उमीद है कि बाकी सभी के लिए मुझे अलग से कोई कमेंट करने कि जरूरत न पड़े ! अगर आप लोग समझदार हैं तो समझ जायेंगे और अगर समझदार नही हैं तो भी कृपया बेकार के कमेंट करके मिसेज सिन्हा के लिखे विचारो का अपमान न करें …….. जो उन्होंने कहना चाहा है उसी वही रहने दे …………….धन्यवाद ……….और हाँ ये सभी के लिए है …………

    December 2, 2013

    अब यह कौन सी बला आ गयी…………………. ………………….यह तो समझ में आ गया कि यह सभी के लिए ………………………….. पर यह समझ में नहीं आया कि हमेशा के लिए है या फिर अभी के लिए है…………….

    sadguruji के द्वारा
    December 2, 2013

    आदरणीया सोनम सैनी जी,मुझे मालूम नहीं था कि ये आप का ब्लॉग है.आप से निवेदन है कि यदि आप को कमेंट की इतनी ज्यादा समझ है तो मेरे सारे कमेंट डिलीट कर दीजिये,जिसे आप उजुल फिजूल कह रही हैं.आप का ये ब्लॉग है तो मै वचन देता हूँ कि दुबारा इस ब्लॉग पर मै नहीं आउंगा.

    sinsera के द्वारा
    December 2, 2013

    सोनम जी, नीचे मैं ने एक जगह लिखा था की आतंकवादियों का मॉटिव स्पष्ट नही है….सद्गुरुजी ने उसी का जवाब दिया है….अपने शायद ध्यान से नही देखा होगा…मैं आपकी प्रेममई भावना की कद्र करती हूँ …..लेकिन कही से कोई जानकारी मिल रही हो तो उसे फ़िज़ूल नही समझना बल्कि जानकारी देने वाले का धन्यवाद देना चाहिए………..सद्गुरुजी , आप आहत न हों… सोनम का ऐसा कोई उद्देश्य नहीं है…

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 3, 2013

    सोनम की बेज्ज़ती हुई… ईई …ईई

    December 3, 2013

    सोनम जी की बेइज्जती……………………..अरे सोनम जी की! ……………..विश्वास नहीं होता है भाई!…….क्या मजाक कर रहे हो यार……………….कौन किया ?……………कब किया? ………..कहाँ किया?………………..क्यों किया ?……………….

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 3, 2013

    ये बेचारी आयी थीं पक्ष लेने के लिए, सरिता जी ने पोंका कर दिया…सब कबीलौती घुसार दिया, इसीलिए कहते हैं…’ज्यादा काबिल नहीं बनना चाहिए…’ बेचारी की भद हो गयी….आय राम…!!!

    December 3, 2013

    हाँ……………..हाँ…………………… मतलब की सरिता दी की है, यकीं नहीं होता……………….बेचारी कितना उनका मानती थी, मान की तरह……कितना प्रेम था उनके प्रति, कितना विश्वास था. आज तो सब ख़त्म हो गया………..भगवान् इस डर्ड्स को सहने के लिए उसे शक्ति दे………. बेचारी न इधर की हुई न उधर की ……………………….किसी ने सच ही कहाँ है ….धोबी का………….हाँ…………..हाँ……………हाँ…………………..

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 3, 2013

    अबे तुम तो सोनम जी का मज़ाक उड़ा रहे हो…सरिता जी ने जितनी फ़ज़ीहत नहीं कि थी उससे ज्यादा तुम कर रहे हो… ‘धोबी का ….’ से क्या मतलब है तुम्हारा…??? ये सभ्य मंच है…किसी का इस तरह से मज़ाक उड़ाना कहाँ का शिष्टाचार है, अभी उन्होंने कहा था ‘he is a nice man’ यही नाइसगीरी है तुम्हारा…??? अभी तो उन्होंने तुम्हारा पोस्ट डिलीट करवा था अब तुमको मंच से निष्कासित कर दिया जाएगा…. जल्दी से माफ़ी मांगो और अपनी बात वापिस लो… तुमने मर्यादा का उलंघन किया है… मैं इसकी निंदा करता हूँ…!!!

    sinsera के द्वारा
    December 3, 2013

    अनिल जी…ये मेरी और सोनम की बात है..आप क्यूँ बोले बीच मे……फिर जाऊँ मैं फीडबैक पर…???

    sinsera के द्वारा
    December 3, 2013

    प्रिय सोनम , आशा है की आपने इन लड़ने भिड़ने वालो की बातों पर कान नही दिया होगा.ये यहाँ के Laurel and Hardy …..ये मंच सीखने सिखाने के लिए है, इस प्रक्रिया मे मैं ने अगर आपको कुछ समझाया तो आशा है आप अन्यथा नही लेंगी…

    sinsera के द्वारा
    December 3, 2013

    सूफी साहब…Now you are jumping into conclusions…..Are u fanatic…..?? ये लड़ाने भिड़ाने वाला मंथरा जैसा काम न शुरू कीजिये……उसके लिए तो आपने लड़की के नाम से एक ब्लॉग बना ही रखा है….वहीँ जा कर गाइये…….”मैं तेरी दुश्मन , दुश्मन तू मेरा , मैं नागिन तू सपेरा….”………सोनम कोई दल-बदलू नेता नहीं है जो आपके बहकावे में आ जायेगी…..

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 3, 2013

    भलाई का जमाना नहीं रहा अब…मैं लड़की को अबला समझ कर उसकी मदद कर रहा था और उल्टे मेरे पर आरोप लगा रही हैं…मैं किसी को लड़ा नहीं रहा हूँ, आपके ‘he is a very nice man’ की हकीकत आपको बता रहा था… शादी-शुदा हो कर क्या अनिल जी को ये शोभा देता है कि किसी लड़की को ‘धोबी का वाहन’ बोलें?? ज़रा सोचिये…अगर अदरदरणीय सोनम जी ‘धोबी का वाहन’ हुईं…तो धोबी कौन हुआ…?? मामले की गम्भीरता को समझिये….!!! सोनम जी एक परिपक्व लेखिका हैं…वो खूब समझ रहीं हैं कि किसने किसका पोंका किया है..सो आपको सफाई देने की ज़रुरत नहीं है…!!

    December 3, 2013

    मियाँ,शादीशुदा होने का मतलब क्या है? मैं सच को झूठ मान लूँ………………..कहीं आपके कहने का मतलब यह तो नहीं कि बोलने का हक़ आप कुंवारों को है………! हाँ…………………….मिया, यह तो मुझे भी पता नहीं कि धोबी कौन है……यह दी ही बतायेंगी. अब मैं किसी भी मामले में कुछ नहीं बोलूँगा वरना यदि अबकी शिकायत हुई तो मैं तो गया काम से……………अतः मैं तो चुप हूँ. अब हमको ज्यादा मत बोलायिए. दी, को भी पता चल गे है कि मैं बेकसूर हूँ. अब मेरी शिकायत नहीं करेंगी………………हैं न दी.

    sinsera के द्वारा
    December 3, 2013

    अनिल जी, मज़ाक थोडा ज्यादा हो गया है..सब धान साढ़े बाइस पसेरी नहीं होता… जो कहना है हमसे कहिये सुनिये, सोनम को परेशान न करें…सूफी साहब…कहावत की छीछालेदर न करें….मुहावरे का शाब्दिक अर्थ नहीं बल्कि भावार्थ समझें…अगर मैं कहूं कि आपकी शोहरत को देख कर अनिल जी की छाती पर साँप लोट रहे हैं तो कृपया आप अनिल जी के कपडे फाड़ कर साँप मारने की जुगत में न लग जाइयेगा…. और सोनम जी, आपके लिए एक और शिक्षा….ये संसार है, यहाँ कदम कदम पर ऐसे ही टाँग खींचने वाले लोग मिलेंगे..ये तो कुछ नहीं है, कुछ बनने और पाने की राह में अभी न जाने ऐसे कितने इम्तेहान देने पड़ेंगे….अगर इन बातों को दिल से लगा कर रुक गए तो लोग धक्का दे कर आगे निकल जाते हैं…….”मैं गिरा था तो बहुत लोग हँसे थे लेकिन, सोचता हूँ मुझे आये थे उठाने कितने…… ” कोई किसी को उठाने नहीं आता है , अपने कदम खुद ही मज़बूत करने पड़ते हैं……..

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 4, 2013

    ” आपकी शोहरत को देख कर अनिल जी की छाती पर साँप लोट रहे हैं” ये आप एक तीर से दो शिकार कर रही हैं…ये गलत है…अनिल मेरा मित्र है आप हमारी दोस्ती में दरार डालना चाहती है… “टाँग खींचने वाले लोग मिलेंगे..” आप एक तरफ कह रही हैं अनील से कि मज़ाक ज्यादा हो गया और दूसरी और इस तरह के मुहावरे….ख़ुदा खैर, करे…अब क्या बोलूं मैं…’हे ईश्वर सद्बुद्धि दो मुझे…

    Sonam Saini के द्वारा
    December 4, 2013

    आप दोनों को देखकर (सूफी मोहम्मद और अनिल जी) मुझे हमारे गांव की गलियो के कुत्तो की याद आ गयी ! वो भी बिलकुल आप दोनों की ही तरह व्यव्हार करते थे या यूँ कहूं कि आप दोनों बिलकुल उनकी ही तरह व्यवहार कर रहे हैं …… वो जब भौंकते थे तो हम गली में जाकर उन्हें डांटते-मारते थे कि भौकना बंद कर दो लेकिन वो मानते नही थे और और ज्यादा भौंकने लगते थे …..वही हाल आप दोनों का है …. जितना आप लोगो को रोकेंगे आप उतना ही ज्यादा भौंकेंगे इसीलिए हमने सोचा कि आप को पूरी छूट दे दें जितना भौंकना है भौंकिये ………जब लगेगा कि कोई सुन नही रहा है तो अपने आप भौंकना बंद कर देंगे ! इसीलिए जितना भौंकना है भौंकिये हमे कोई फर्क नही पड़ता ……………

    Sonam Saini के द्वारा
    December 4, 2013

    सूफी ध्यान मोहम्मद जी ……… किसी के दो शब्द कह देने से न तो किसी की बेइज्जती होती है और न ही इज्जत बढ़ती है .. अगर ऐसा होता तो अब तक तो हमारे नेता लोग आत्महत्या कर चुके होते .! दूसरी बात श्रीमती सिन्हा ने मुझसे क्या कहा और मैंने उनसे क्या कहा आप इसके चक्कर में न पड़े …… हमे अच्छे से मालूम हैं की हम किसके बारे में क्या सोचते हैं और क्या नही, किसको क्या मानते है और क्या नही ………आप लोगो के कह देने से कुछ नही होने वाला…………

    Sonam Saini के द्वारा
    December 4, 2013

    अनिल कुमार अलीन जी…………आप की तो पूरी स्टोरी ही मुझे कंफ्यूज लगती है …. आपकी बातो से ऐसा लगता है कि आप अपने खुद के ही विचारो में उलझे हैं , कृपया पहले यह तय कर लें कि आप किस बात से सहमत हैं और किस बात से नही …….ये चमचागिरी करना छोड़िये कि सूफी मोहम्मद ने कुछ कह दिया तो आप भी चल दिए उनकी हाँ में हाँ मिलाने …. ऊपर आपने एक कमेंट में लिखा है कि “भगवान इस डर्ड्स को सहने के लिए उसे शक्ति दे” जब आप का भगवान पर विश्वाश ही नही है तो फिर उनसे भीख मांगने की क्यों जरूरत पड़ गयी ??? …………और हाँ कुछ घटिया लोगो की घटिया बातो से कोई अपनी माँ को माँ मानने से इंकार नही करता और न ही उसकी भावनाए बदल जाती हैं , न ही माँ के लिए सम्मान खतम हो जाता है ….हम जिसे अपना मानते हैं वो उम्र भर हमारा ही रहेगा ……..लेकिन ये बात शायद आपको समझ में न आये , शायद आप के वहाँ दुसरो की बातो में आकर अपने ही माँ बाप को छोड़कर भागने का रिवाज होगा ……… खैर हमे जो कहना था कह दिया आप को जितनी सफाई देनी है देते रहिएगा ….. क्योंकि आपका तो काम ही यही हैं न ……..

    Sonam Saini के द्वारा
    December 4, 2013

    और आप माय स्वीटेस्ट ए जे ….. परेशान मत होइए, अगर हम चुप रहना जानते हैं तो कहना भी जानते हैं ! मैं रिप्लाई नही करना चाह रही थी लेकिन क्या करूं जवाब देना जरूरी था I am sorry ……… अक्सर ऐसा होता है कि लोग चुप रहने वाले को कमजोर समझ लेते हैं इसलिए मुझे ऐसा करना पड़ा ! आपको समझने और जानने के लिए मुझे किसी और के विचारो की जरूरत नही ! इसलिए डोंट वरी ……. Be Happy…… :) … और जिनको भौंकना हैं उनको भौंकने दीजिये …….. I am waiting for ur new article….. :)

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 4, 2013

    सोनम जी हमें आपकी बात का तनिक भी बुरा नहीं लग रहा है, आपकी तिलमिलाहट बिलकुल जायज है, जैसा आपके साथ हुआ अगर वो किसी भी अबला नारी के साथ होता तो वो बौखला ही जाती…हम आपके प्रति सहानुभूति प्रगट करते हैं…आप के गावं के कुत्ते बिना बात के भौंकते हैं लेकिन हमारे यहाँ के कुत्ते भौंकते ही नहीं थे, पता है फिर हम क्या करते थे…?? हम उसके पूछ पर मिट्टी-तेल डाल देते थे…फिर वो ऐसा भौंकता था कि पूछिए मत…एक दम से बौखला जाता है, तिलमिलाहट में कुछ से कुछ करने लगता है…खैर ये तो रही गावं की बात लेकिन आज भी हम ‘पूंछ पर मिट्टी-तेल डालने वाला फार्मूला’ इस्तेमाल में लातें हैं…कुत्तों के साथ नहीं इंसानो के साथ…!!! खैर ये तो रही कुत्तों और इंसानों की बात…. आपने बिलकुल ठीक किया ‘कोई अगर किसी को धोबी का वाहन बोलेगा तो दूसरा उसको थोड़े न छोड़ देगा…आपने अनील की तुलना श्वान से की मेरे कलेजे को ठंडक पहुंचा…..!!! आज आपने अनील को ‘सर’ नहीं बोला ये देख कर भी अच्छा लगा…आप इसको sir क्या बोलती थीं…ये तो ‘सर’ पर ही चढ़ने लगा था…!! लेकिन आपकी एक बात से मैं सहमत नहीं हूँ…आप कहती हैं कि आप की कोई बेज्ज़ती नहीं हुई है…ऐसा कैसे मान लेंगे हम…इस तरह भरी महफ़िल में सब के सामने उनको आपकी भद नहीं करनी चाहिए थी…ये तरीका नहीं है, उनको आपको व्यक्तिगत् मेल या कॉल करके समझा देना चाहिए था..इस तरह सब के सामने…वो भी सद्गुरु जी जैसे सम्मानित व्यक्ति के सामने आपका मजाक उड़ना उचित नहीं है… “अक्सर ऐसा होता है कि लोग चुप रहने वाले को कमजोर समझ लेते हैं” ये बात आपकी एक दम सही है… कमज़ोर ही नहीं समझ लेते हैं फिर हमें कई फोर्मुला इस्तेमाल में लाना पड़ता है उनके मुखार-बिंदु से हुनकर भरबाने के लिए…कई फार्मूला में से हमारे ‘all टाइम हिट फार्मूला’ के बारे में मैं आपको बता ही चूका हूँ…!! मैं तो कहता हूँ लाइफ ऐसा होना चाहिए ‘बोलो और बोलने दो’…!! (मुझ से जितना बन पड़ता था उतनी खातेदारी मैंने आपकी कर दी है, जो कमी रही गई होगी वो अभी थोड़ी देर में मेरे लतारणीय मित्र अनील पूरी कर देंगे…अगर वो भी चुक गये तो..आपकी ‘स्वीटेस्ट ए जे’ तो हैं हीं ..वैसे ईईई ‘ए जे’ का होता है जी…??)

    December 4, 2013

    “शायद आप के वहाँ दुसरो की बातो में आकर अपने ही माँ बाप को छोड़कर भागने का रिवाज होगा ……… ” आप तो यह बोलकर मेरी बोलती ही बंद कर दी. अपने तरफ से और मेरे तरफ से (दोनों तरफ से) सारे वाद-विवाद को एक ही वाक्य में ख़त्म कर दिया……………….शुक्रिया………….. यदि जाने-अनजाने में गलती हो गयी हो मुझसे तो माफ़ कर देना……..एक फिर शुक्रिया बोलना चाहूँगा…………..अब मैं चलता हूँ……………..यार संदीप अब और हसीं-मजाक मत कर …………..आगे नहीं बोल पाउँगा…………

    sinsera के द्वारा
    December 4, 2013

    समय , काल, परिस्थिति, वचन परायणता , इंसान से कब क्या कराये, इसका भरोसा नहीं होता..कभी कभी जो गलत दिखता है, वास्तव में वही सही होता है…बिना पूरी बात जाने कुछ बोलना नही चाहिए…यदि दो व्यक्ति विधिसम्मत तरीके से एक दूसरे के प्रति मन से समर्पित हैं, तो क्या माता पिता को बेवजह विरोध कर के बच्चो को मार डालना न्यायोचित है…???घर से भागने का रिवाज कही नहीं होता , लेकिन प्रेम करके छोड़ देना , किसी को धोखा दे कर किसी और से विवाह करने के रिवाज से तो वो रिवाज कहीं अच्छा है जिसको लोग मज़े लेने की सस्ती भाषा में “घर से भागना” कहते हैं…..वचन निभाने के लिए घर से भागने वालों का मैं ह्रदय से सम्मान करती हूँ…

Jafar के द्वारा
December 2, 2013

Or ye baat akal wali b nhi h ki wo udhar se bomb fek rahe h or hum danda lele unki taraf badh rhe h…islam me kai sharten h or hm islam ko follow kr rhe h aatanwaad ko nhi ki jo wo kr rhe h wahi hm b karen..jehad abhi kalam se wajib h to hm unka jawab dete h….jo humara deen kehta h wahi hm kr rhe h or jb imam aayenge tb hm b talwaar se jawab denge

Jafar के द्वारा
December 2, 2013

Aapne kaha ki aapko kya lagta h ki imam kya aayenge…beshak wo aayenge..agar mai sochta hun ki allah h to mtlb mere liye h..agar mujhe jaise lagta h ki allah h waise hi mujhe lagta h ki imam aayenge…or na humare paigamber aam insaan the na koi humare imam…plz aisa dubara na kahiyega..aakhir aap islam k baare me janti kya h jo aap itna sb kuch kh rhi h….

    Sonam Saini के द्वारा
    December 2, 2013

    नमस्कार जफ़र भाई ………देखिये वो कितना जानती हैं और आप कितना जानते हो ये आप दोनों अच्छे से जानते हो ! अब इस बात को यही खत्म करिये ..आप इस्लाम के बारे में आदरणीय श्रीमती सरिता सिन्हा से ज्यादा जानते हो ऐसा सही हो सकता है, जरूरी तो नही कि आप को कम जानकारी हो या उन्हें कम जानकारी हो ! बात को आगे बढ़ाने से क्या फायदा ! उन्होंने ऊपर जो भी लिखा है वो सिर्फ अपने विचार रखे हैं, जिसका अधिकार सभी को है और जिसका अधिकार जागरण जंक्शन मंच सभी को देता है ! आप उनसे असहमत है या कोई और उनसे असहमत है ये तो आपके अपने विचार हैं जो आप भी यहाँ रख चुके हो ! मेरा आपसे ये विनय निवेदन है कि अब इस टॉपिक पर की जाने वाली बहस को यही ख़त्म करे और आगे बढे ! और रही बात सूफी मुहम्मद की बातो का जवाब देने की तो मैं यही कहूँगी कि इस पर आप अपना एक अलग से ब्लॉग लिखे और वहाँ उनसे जवाब मांगे या फिर उनके ब्लॉग पर जाकर तभी आपको सही जवाब मिल पायेगा ! उम्मीद हैं आप मेरी बातो को अन्यथा नही लेंगे और समझेंगे …..शुक्रिया …

    sinsera के द्वारा
    December 2, 2013

    जाफ़र साहब ..आपकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना इस लेख का मकसद नहीं था..भूल चूक से ऐसा हुआ हो तो क्षमा करें….मैं अल्लाह की शक्ति को भी मानती हूँ और पैगम्बर तथा इमाम की भी इज़ज़त करती हूँ, बेशक वो आम आदमी नहीं थे…यहाँ .सोनम जी का कहना भी सही है..आप अपनी बात पर अड़े है और मैं अपनी..इस तर्क-वितर्क का कोई अंत नहीं है..फिर भी आपसे एक बात कहना चाहूंगी..मुझे आपकी बात थोडा कायरतापूर्ण लगती है..चलिए मान लेते हैं की इमाम कभी आएंगे , लेकिन हम आप तो अभी आये हुए हैं..हम भी तो अपनी तरफ से कुछ करें..या फिर से सारी ज़िम्मेदारी उन्ही के सर डाल दें कि जब वो आयें तो चैन से जी न सकें…लड़ाई में खुद को झोंक दें और प्यासे अपनी जान दे दें……फिर हम आप उनके नाम पर मातम और अज़ादारी करें….ऐसा नहीं है, सब को अपने अपने हिस्से की लड़ाई लड़नी होगी….. ये आग अब किसी एक इमाम के बुझाने से नहीं बुझने वाली है…दीन कभी ये नहीं कहता है कि किसी का अन्याय सहो …शैतानों को मुंहतोड़ जवाब देना है…कलम से ही सही..आवाज़ तो उठाइये…………अपने एक पुराने ब्लॉग का लिंक दे रही हूँ, थोडा समय दे कर कृपया पढ़ने का कष्ट करियेगा………http://sinsera.jagranjunction.com/2012/04/06/%E0%A4%85%E0%A4%AC-%E0%A4%AF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%88-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%88-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%86/

sadguruji के द्वारा
December 2, 2013

आदरणीय सरिता सिन्हा जी,सौवे कमेंट की आपको बधाई.आप निर्णायक विदुषी हैं चर्चा मण्डली की,आप ये मत सोचिये कि कोई लड़ाई चल रही थी.ये तो विचारों का समुंद्रमंथन था.बचपन से मेरी आदत है कि पांच रुपये की हांड़ी (मिटटी का बर्तन) भी लेता था खूब ठोंक बजाकर.आज भी वही आदत बरकरार है.किसी के ज्ञान को परखने का मेरा अपना ही एक अलग तरीका है.चाहे सूफी जी हों या अलीन जी,कुछ बातें उनकी सही होती हैं और कुछ गलत भी.उनकी सही बात का समर्थन करना चाहिए और गलत बात का विरोध.दुश्मनी क्या चीज होती है मै नहीं जानता.मुझे तो इस बात की फिक्र है कि सब शांत ही हों जायेंगे तो हम चर्चा करेंगे किससे ? बिना चर्चा के ज्ञान हज़म होता नहीं है.काशी शास्त्रार्थ के लिए हमेशा से प्रसिद्द रहा है.मेरी नज़र में वो काशी की सबसे बड़ी चीज है.ये मंच भी मेरे लिए काशी ही है.आप को ह्रदय से धन्यवाद देते हुए मै बताना चाहूंगा कि बीच में जब अलीन जी का ब्लॉग पेज खुल रहा था तब कुछ लेख उनके मैंने पढ़े थे और मुझे अच्छे लगे थे.अलीन जी करेला हैं,लेकिन मंथन रूपी स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद हैं.तटस्थ होकर मैंने अपनी आत्मा और विवेक से निर्णय लिया है कि जागरण परिवार से आग्रह करूँ कि उनके ब्लॉग पर जो भी पाबन्दी लगी हों वो हटाई जाये और उन्हें नये ब्लॉग पोस्ट करने कि अनुमति दी जाये.आप की सलाह और विचार के लिए मै जागरण परिवार को भेजा जाने वाला सुझाव नीचे दे रहा हूँ.इसे जागरण के “फीडबैक” और “ब्लॉगिंग शिखर सम्मान” दोनों जगह मैंने लगा दिया है- ……………………………………………………………………………………………………………………………… ………………………………………………………………………………………………………………………………. आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार, महोदय सादर हरि स्मरण ! आप लोगों ने इस मंच पर मुझे जो भी सम्मान दिया है,उसके लिए ह्रदय से धन्यवाद.मै आप लोगों से एक आग्रह करना चाहता हूँ कि इस मंच के ब्लॉगर आदरणीय अनिल कुमार “अलीन” जी के साफ्टवेयर को ठीक कर उन्हें बिना किसी बढ़ा के पुन:लिखने कि अनुमति दी जाये.बीच में जब उनका ब्लॉग पेज खुल रहा था,तब मैंने उनके लेख पढ़े थे.उनके लेख उच्च स्तर के हैं और पाठकों के लिए उपयोगी और शिक्षाप्रद हैं.इस समय पाठक उनके नए लेखों से वंचित हो रहे हैं.जीवन का कोई भरोसा नहीं है कि कौन कब तक जियेगा ? इसीलिए सच कहने वाले ऐसे विद्वान जब तक इस संसार में हैं,तब तक उनके विचार और अनुभव लोगों के बीच प्रसारित होना चाहिए और ये लोगों पर छोड़ दिया जाये की क्या वो पसंद करते हैं और क्या नहीं ? उनके किसी लेख में कोई आपत्तिजनक बात होगी तो जरुर आप से शिकायत करेंगे और आप कार्यवाही भी कीजियेगा,परन्तु फ़िलहाल अभी उन्हें ब्लॉग लिखने व् पोस्ट करने की अनुमति दी जाये.मै पहले की बातें नहीं जानता,परन्तु सच कहने वाले ऐसे विद्वान व्यक्ति से यदि जाने अनजाने कुछ गलतियां भी हुईं हैं तो उसे क्षमा करते हुए उन्हें पुन:ब्लॉग लिखने और पोस्ट करने की अनुमति प्रदान की जाये.इससे अनगिनत पाठकों को लाभ होगा.मेरी जानकारी के अनुसार उनके ब्लॉग के पाठक सबसे ज्यादा हैं.यदि आप लोग तत्काल अनिल कुमार अलीन जी के सॉफ्टवेयर को ठीक कर उन्हें लिखने और पोस्ट करने की सुविधा पुन:प्रदान करते हैं तो मुझे ही नहीं बल्कि इस मंच के सभी ब्लॉगरों को बहुत ख़ुशी होगी.सादर धन्यवाद और शुभकामनाओं सहित.

    December 2, 2013

    आदरणीय संपादक महोदय, दरअसल आपके फीडबैक पर कुछ नहीं तो दस बार से भी अधिक अपनी समस्या लेकर आ चूका हूँ कि मेरे नाम पर क्लिक करने पर मेरा ब्लॉग न खुलकर आपके जेजे का होम पेज खुलता है जिससे मेरा लेख मेरे पाठको तक नहीं पहुँच पा रहा है. आप द्वारा मुझे एक बार आश्वासन देने के बाद भी कोई करवाई नहीं की गयी. अतः आप से पुनः आग्रह करता हूँ कि इस गड़बड़ी को जल्द से जल्द दुरुस्त करने का कष्ट करें. साथ ही आदरणीय राजेंद्र जी द्वारा उठाये गए मेरी समस्या के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करना चाहता हूँ …………….आप सभी का हार्दिक आभार अनिल कुमा ‘अलीन’

    sinsera के द्वारा
    December 2, 2013

    आदरणीय सद्गुरुजी, निर्णायक भी नहीं हूँ और विदुषी भी नहीं..लेकिन चर्चा अगर शास्त्रार्थ से मुड़ कर तकरार की और जाने लगे तो ज़रा घबराहट होती है…आप ज्ञानी लोग हैं इस लिए बात-चीत में मज़ा आ रहा है..चर्च में ज्ञान की परतें खुल रही हैं अन्यथा मैं कब की ये पोस्ट छोड़ कर जा चुकी होती…..अनिल जी को आप नहीं जानते हम लोग बहुत पहले से जानते हैं ..आपका पुराना ब्लॉग एक दुर्घटनावश डिलीट हो चूका है , मुझे दुःख है कि आप उन की पहले की शानदार पोस्ट्स पढ़ने से वंचित रह गए..फीडबैक पर सबसे पहले मैं ने ही उनका ब्लॉग खोलने के विषय में अनुरोध किया था और दुर्भाग्य कि बात है कि उनकी एक भटकी हुई पोस्ट को डिलीट करने के लिए भी मैं ने ही फीडबैक पर लिखा था….बात सिर्फ एक पोस्ट डिलीट करने कि थी ब्लॉग कैसे डिलीट हो गया ये मैं नही जान सकी उन दिनों मैं अपने श्वसुर महोदय के ऑपरेशन के कारण लगभग दो महीने हॉस्पिटल में थी…..जो भी हो मैं आज भी उनके लेखन की प्रशंसक हूँ इसीलिए उनकी हर “बकवास”(क्षमा सहित )झेलती हूँ….वैसे हम लोग व्यक्तिगत रूप से भी मिल चुके हैं.No offence to say that he is a very nice man ..

    December 3, 2013

    दी, आपने सिर्फ बकवास लिखा होता तो मैं यहाँ नहीं आया होता. चूँकि आपने क्षमा मांगकर मुझे शर्मिंदा कर दिया. मेरे बारे में कभी भी कहीं आलोचना होती मैं उसका बुरा नहीं मानता और न ही सफाई देता हुआ. मैं मुख्यतः दो बातों पर जवाब देता हूँ पहला किसी लेख(विषय) पर दूसरा मेरे द्वारा शुरू किये गए बकवास पर क्योंकि वह गेम मैं खेल रहा होता हूँ. मुझे कोई मजबूर नहीं कर सकता अनाप सनाप बोलने के लिए सिवाय मेरे. आपने इससे पहले भी मुझे देखा है कि जब भी मुझ पर व्यक्तिगत आक्षेप होता है मैं चुप रहा हूँ…या फिर कुछ बोला हूँ तो एक हसीं मजाक के साथ ताल गया हूँ. …….अभी हाल ही में शिप्रा पराशर मुझे उकसाने की कोशिश की परन्तु मैं उसे नज़र अंदाज़ कर गया….! मैं उनके अधीन नहीं यहाँ तक की अपने मन के भी नहीं उसके साथ भी एक गेम ही खेल रहा हूँ…………

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 3, 2013

    एकला चलो, एकला चलो, चरैवेति..चरैवेति…… क्या हो रहा है बही इस मुल्क में…?? खाली-पीली लोग इमोशनल हो रहे हैं…कोई हथियार डाल रहा है तो कोई, राग अलाप रहा है… देखिये लेखनी में भाई-भतीजा-वाद नहीं चलेगा….ये तो औरतों वाली बात हो गई, औरतें पहले बहस करती हैं, फिर गुस्सा करती हैं, फिर रोने लगती हैं…और मैं यहाँ यही देख रहा हूँ… आदरणीय सद्गुरु, अनील जी, और ‘आप’….कृपया भावुक न हों…लेखक को संवेदनशील होना चाहिए भावुक नहीं…भावुकता चलवाज़ी है…. और आप के लिए एक शेर…”किस बात का डर है तुम्हें क्यूँ चुप सी लगी है सच बोलने भर से तो क़यामत नहीं आती, थोड़ी सी मोहब्बत भी ज़रूरी है जिगर में गुस्से से ही सीने में बगावत नहीं आती” सद्गुरु जी और अनील जी के लिए एक शेर…. “पनाहों में जो आया हो तो उस पर वार क्या करना…..जो दिल हारा हुआ हो उस पर फिर अधिकार क्या करना …. मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कश्मकश मे है…. हो गर मालूम गहराई तो दरिया पार क्या करना…!!” भाई उठो, जागो, लोगों को हिलाओं, एक दूसरे के घावों पर फूल मत डालो…अगर कुछ करना ही है तो मरहम में नमक मिला कर घाव पर मल दो….!!!

    sadguruji के द्वारा
    December 3, 2013

    आदरणीय सूफी ध्यान मुहम्मद जी,-”मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कश्मकश मे है…. हो गर मालूम गहराई तो दरिया पार क्या करना…!!”अच्छी लगी आप की बात,शुक्रिया.

    December 3, 2013

    हाँ…………….हाँ………….मजा आ गया गुरु! अब मैं जाग गया हूँ, हिलाने को तैयार भी, घाव पर नमक लगाने को भी तैयार हूँ…………………! जा रहा हूँ नमक खरीदने……………..यहीं बैठे रहो अभी आता हूँ…………

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 3, 2013

    अनील बाबू- सद्गुरु जी आपको इमोशनल-फूल समझ रहे हैं…आपको झांसे में ले रहे हैं…मीठी-मीठी बातें कर के आपको गुमराह कर रहे हैं… यहाँ सजग होने की ज़रुरत है… तर्क से हार जाने के बाद इंसान ऐसा ही करता है, कमज़ोर आदमी अक्सर अहिंसा की बात करने लगता है, प्रेम के गीत गाने लगता है… अभी सरिता जी को ही देखिए डर के मारे कसीदे पढ़ रहीं है… सोनम जी इतने डर गयी हैं कि फू-फा कर के दूसरों को डरा रही हैं…. ये सब बनर-भवकी है… !! गहन जागरूकता चाहिए यहाँ… संवेदशील होना सुन्दर है…लेकिन भावुक होना बुजदिली है…!!

    December 3, 2013

    अभी जो कश्मकश में है, जिंदगी का मजा, क्या ख़ाक लेगा; जो दरिया पार बैठा हो, नापकर गहराई, क्या खाक करेगा…….. बरखुदार……………. बेपनाह घूमते है, युहीं हम दर-बदर होकर, पनाह देकर औरों को, अलीन क्या ख़ाक करेगा. ………………………….

sinsera के द्वारा
December 1, 2013

आदरणीय सद्गुरुजी और भाई अनिल जी ……आप लोगो कि सेवा में एक गीत प्रस्तुत है……. चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनो ना मैं तुम से कोई उम्मीद रखू दिलनवाज़ी की, न तुम मेरी तरफ देखो, ग़लत अंदाज़ नज़रों से, न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये मेरी बातों से, ना जाहीर हो तुम्हारी कश्मकश का राज नजरों से, तारूफ रोग हो जाये, तो उसको भूलना बेहतर, ताल्लूक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा, वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा…………

    December 1, 2013

    शुक्रिया काली मैया…………………मेरा काम ख़त्म हुआ…………बहुत दिनों बाद आपसे मुलाकात हुई अनिल और सद्गुरु के बहाने…………………….देखिये फिर कब मिलते हैं………………..

    sinsera के द्वारा
    December 1, 2013

    लेकिन मेरा कम ख़तम नहीं हुआ….आप लोगो से निवेदन किया जा रहा है कि आपसी सम्बन्धों को सुधारने की कोशिश करें….सभी ज्ञानी हैं, कोई बड़ा कोई छोटा….लेकिन कोई किसी की बात सह नहीं पा रहा है..चिढ रहे हैं, कुढ़ रहे है..वार पर वार कर रहे हैं…अब ये कैसे माना जाये कि किताबों से उठाया गया ज्ञान सही काम कर रहा है……कहते हैं कि …….”विद्या ददाति विनयं”……..ये कैसी विद्या है जो विनय नहीं प्रदान कर पा रही है….

    December 2, 2013

    सादर चरण स्पर्श डी! झूठ को मान लेने से वो सत्य नहीं हो जाता है और सत्य को माना नहीं जाता वरन वो झूठ हो जाता है. कारण मन तो उसे जाता है जो नहीं हो और जो है उसे मानना एक झूठ है. किताबों से उठाया हुआ ज्ञान कभी सही काम कर ही नहीं सकता क्योंकि वो सब झूठ है उसमे हमारी कोई अनुभव या अनुभूति नहीं. ज्ञान, हम सबके अंदर ही है जिसका एक सिरा ईश्वर से जुड़ा है. जो कभी ख़त्म नहीं हो सकता. बिलकुल कुवें की भांति, जिसमे से जितना चाहे निकालिये , कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि उसका स्रोत तो कोई और है. परन्तु किताबों या किसी अन्य माध्यम से प्राप्त किया हुआ ज्ञान, मन पर बने एक हौज के जल की तरह है. जिसको समय-समय पर नहीं बदलने पर सड़ने लगता है. जिसमे अहम् है कि यह मेरा है. परन्तु कुवें का अपना कोई अहम् नहीं. कारण उसका अपना कुछ भी नहीं वो जो कुछ भी पा रहा है किसी और माध्यम से जितना देगा उतना बढ़ेगा. परन्तु हौज से निकालने पर दिन प्रति दिन कम होता जाएगा और एक दिन खाली हो जाएगा. यही कारण है कि जब कोई हमारे इकट्ठे किये हुए ज्ञान पर उंगली उठाता है तो हम तिलमिला जाते है कि अब तो इसे खाली करना पड़ेगा. हममे अहम् पैदा हो जाता है कि यह मेरा है, मेरा मेहनत किया हुआ है. युहीं कैसे खाली कर दे. परन्तु ज्ञान तो सुव्यवस्थित एवं क्रमबद्ध होता है….. आपुने अभी पूछा है न, “…….”विद्या ददाति विनयं”……..ये कैसी विद्या है जो विनय नहीं प्रदान कर पा रही है….” तो बस यह विद्या वैसी ही है जैसे किसी हौज में इकठ्ठा किया हुआ जल. यदि हम चाहते है कि ज्ञान के कुवें को प्राप्त करना जिसे पाकर सारा अहम् नाश होता है तो मन द्वारा बनाये गए हौज को तोड़ना होगा, उसके जल को बह जाने देना होगा. फिर अपने भीतर खुदाई करना होगा. जैसे-जैसे हम निचे चलते जायेंगे वैसे-वैसे कंकड़, पत्थर, मिटटी, कीचड़ निकलता जाएगा परन्तु उससे भयभीत नहीं होना, हतोत्सहित नहीं होना है, भागना नहीं,……….निरंतर लगे रहना है तब जाकर हम ज्ञान के स्रोत को पा पाएंगे परन्तु उस कुवें को बचाने के लिए निरंतर कुवें की सफाई करते रहना होगा वरन एक दिन ऐसा आएगा कि वह धीरे-धीरे भर जाएगा और हमें फिर अपने मन पर एक हौज बनाकर चलना होगा……………………

sinsera के द्वारा
December 1, 2013

जाफ़र साहब, आप क्यों इन भुलावों में अटके हैं कि अभी कोई पैगम्बर और इमाम आने वाले हैं और दुनिया सुधर जायेगी…ज़रा अंतरात्मा से पूछ कर बताइये, क्या आप को ये बातें सच लगती हैं…?? वो जो लोग थे वो भी आम इंसानों कि तरह ही पैदा हुए थे लेकिन उन्हों ने अपने स्तर से समाज में फैली हुई बुराइयों को दूर करने कि कोशिश कि औए खुद को मिटा दिया…उनके माथे पर नहीं लिखा होता है कि वो पैगम्बर या इमाम हैं…आप हम मे से ही किसी को उठना होगा …कोई भी आम आदमी जिसके अंदर ज़बरदस्त विल पॉवर हो वो ये काम कर सकता है…क़यामत जब होगी तब होगी तब तक दुनिया यूँ ही आग में जलती रहे…? ?? ये जिहादी और आतंकवादी मुसलमान नहीं है बल्कि इबलीस की औलादें हैं….इन लोगों के पास इतनी शक्ति कहाँ से आती है कि ये सारी दुनिया को दहशत में लिए हुए हैं..इन लोगो ने इस्लाम को मिटाने का ज़िम्मा ले रखा है, आज इन्ही की वजह से लोग अच्छे मुस्लिमों को भी शक की नज़र से देखते हैं..आप भी फील करते होंगे कि एक ज़माने में जैसे सिखों को देख के लोग डरते थे वैसे आज मुस्लिमों से डरते हैं….जनता मे ये धारणा घर करती जा रही है की ये जेब मे पाकिस्तान से आए हुए बम ले कर घूमते हैं…..ये अपने को जेहादी कहने वाले चाहते क्या हैं . ये भी नही पता…सिर्फ़ निर्दोषों को कत्ल करना इनका काम है…यही तो यज़ीदियत है….इससे लड़ने कौन आगे आ रहा है…….इनके खिलाफ कुछ करिये , ये मस्जिदों के वाइज़ जैसी बोली मत बोलिये..ये उनका प्रोफ़ेशन है, जिसके लिए वो तनख़ाह उठाते हैं……बल्कि आप लोग ऐसी आवाज़ उठाइये कि कुछ परिणाम दिखे….आप देखिये , पूरा विश्व आपके साथ होगा…..क़यामत के हश्र से वो शैतान की औलाद नहीं डरेंगे , क्योंकि उनको भी पता है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है……

sinsera के द्वारा
December 1, 2013

सूफी साहब , यहाँ पर आप थोडा सही हैं..आपने और जाफ़र साहब ने नेट से उठाया हुआ मैटर ज्यों का त्यों यहाँ पेस्ट कर दिया , ध्यानपूर्वक पूरा पढ़ना सम्भव न हो सका , फिर भी साधु बनने की कोशिश कि और सार सार गह लिया..थोडा बहुत छूटा भी होगा, क्षमा चाहती हूँ..देखिये, मैं ने सड़क पर मुहर्रम के जुलुस में खून से लथपथ युवा देखे, दुःख हुआ तो ये लेख लिख दिया…अब इसमें राजनीती कैसी……..Mohammed was an absolutely illiterate man, and the Koran, in which his sayings are collected, is ninety-nine percent rubbish. आपके कहे हुए ये शब्द अगर निंदा की श्रेणी में नहीं आते हैं तो मैं गलत हूँ….मैं महान बनने केलिएकिसी की डर के मरे तारीफ करुँ ऐसा नहीं है, गीता और कुरान “वाद ” हैं, मैं ने दोनों पुस्तकों को पूरा नहीं पढ़ा है, सिर्फ अंश पढ़े हैं, प्रभावित हूँ , इसका मतलब डरना नहीं है…अब मैं किस किस से डरूँ…….एक तो जागरण वालों नेमेरा लेख छापा , तो बिना किसी भूमिका के सिर्फ एक नोहा छाप दिया….मैं आपको क्या बताऊँ, मेरे पास परिचितों के जितने भी फोन आये, सब यही कह रहे हैं की अब तुम नोहा लिखने लग गयी…कुछ रिश्तेदरों ने समझाया कि मुसलमानों वाला काम न करो, कल को तुम्हारे बच्चों की शादी में दिक्कत आयेगी………..मेरे घर के लोगो का कहना है कि ऐसे लेख लिखोगी तो शहर में हिन्दू-मुस्लिम दंगा हो जायेगा….हमारे घर पर लोग पत्थर फेंकने लगेंगे…जीना मुश्किल हो जायेगा…..ये तो हाल है इस देश का…मैं क्या जवाब दूं इस बात का..ये हिंदू मुस्लिम का मुद्दा लगता है आपको कहीं से..?? ये सारे हिंदू-मुस्लिम एकता की बातें करने वाले लोग हैं…जो दीखता है वो सच होता है, क्या आप अब भी इस बात से सहमत हैं…??गुलाब का फूल ही क्या , इंसान भी मुरझाता है, मरता है क्यों कि ये आर्गेनिक चीज़ें हैं, इनकी एक हाफ लाइफ होती है, decaying और weathering होती है, इसे हम आप नहीं रोक सकते, प्लास्टिक का फूल सिथेटिक है, एक सिद्धांत के आधार पर बनाया गया है, इसे आप ज़मीन में गाड़ दीजिये और सौ साल बाद भी निकालिये तो वैसे का वैसा मिलेगा …..सिद्धांत ज़िंदा रहते हैं, क्योंकि वो सिंथेसिस किये जाते हैं… किताबों में सिद्धांत होते हैं, इसीलिए वो ज़िंदा रहती हैं……..जाहिल हर युग में हुए हैं और होते रहेंगे तभी तो कसाब और अफ़ज़ल को फाँसी दे दी गयी……..क्या वो गुनहगार थे या जिन्होंने उनका ब्रेन-वाश करके इस तरफ धकेला , वो गुनहगार थे….बड़ी वाहवाही मिली बस..आतंकवाद जहाँ था वहीं रहे, इससे किसको फ़र्क पड़ा….. एक ही किताब , एक ही टीचर से एक ही क्लास में पढ़ने वाले बच्चो को अलग अलग नंबर मिलते हैं……क्योंकि सबकी grasping power अलग अलग होती है…लेकिन बुरा भला टीचर को कहा जाता है….जहाँ तक मोटिव की बात है, कड़वी दवा का मोटिव क्या होता है…?? परिणाम पाने के लिए क्या वो अपना characteristic छोड़ दे?? उसे आपने काम से मतलब है, रूप से नहीं..ये कोई conclusion नहीं है सिर्फ मेरे विचार हैं, विचार रखना कोई fanaticism तो नहीं होती…..

    Jafar के द्वारा
    December 2, 2013

    Yahan pr sufi ji ne osho ki baat likhi h…na ki apni aap unka lekh sahi se padhen

    sinsera के द्वारा
    December 2, 2013

    जी बेहतर…

ANAND PRAVIN के द्वारा
November 30, 2013

वाह…….वास्तव में आपलोग पूर्ण मंथनकार हैं…….जितना बड़ा लेख नहीं उससे बड़े बड़े कई निचे के प्रतिक्रियाएं हैं………..बहुत खूब आदरणीय सूफी जी आदरणीय सरिता दीदी आदरणीय मित्र अनिल जी आदरणीय सद्गुरु जी और आदरणीय जाफर साहब…………क्या लड़ने को और वाद विवाद को ही अभिव्यक्ति कहते हैं ……..लड़ना ही है तो सार्थकता पर लड़े और कृपया कर मेरे इस कमेन्ट पर कमेन्ट कर सरिता दीदी के पोस्ट को १०० करोड़ की कैटेगरी में ना पहुचाएं ……….धन्यवाद

    sinsera के द्वारा
    December 1, 2013

    भाई आनंद प्रवीण जी , नमस्कार, आपने सुना तो होगा ही आज साक्षात देख लीजिए……”बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी….”

    December 1, 2013

    आदरणीय प्रवीण जी! आपकी नज़र में साथर्कता क्या है? राजनीती पर बहश करना, मोदी का साथ देना, साहित्य को व्यवसाय बनाना ……यह सब अनिल के लिए एक मूर्खता है……………….और जो अनिल लिए साथर्कता है वो किसे और के लिए मूर्खता है…………..यह सब हरेक व्यक्ति कि मनोस्थिति पर निर्भर करता है……………..कि आखिर वो किसको वैलू दे रहा है…………….

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    December 1, 2013

    भाई अनिल जी किसने कहा साहित्य का व्यवसाय करो…..किसने कहा मोदी का साथ दो देश आजाद है जो सोच सकते हो सोचो……एक बात याद रखना खुद को होशियार कहने से कोई होशियार नहीं बन जाता पर हाँ दूसरों को मूर्ख कहने से छोटा अवस्य हो जाता है………..बाकी तुम इतने समझदार हो की इसपर भी बिना कुछ कहे नहीं रह पाओगे……..धन्यवाद ……सकारात्मकता सकारात्मक कार्य करने से समझ में आती है वरना उदाहरण भी बेमतलब ही नकलते हैं

    December 2, 2013

    महोदय, पहिले आप यह निश्चित हो जाएँ कि मैं आपका दोस्त हूँ या भाई हूँ या फिर दोनों? मैं आपके इस सवाल का जवाब नहीं दूंगा क्योंकि मैं जान रहा था कि आप ऐसा ही कुछ बोलने वाले हैं. मतलब यह मेरी इच्छा थी कि आप मुझसे लड़ना शुरू करें. कारण कि इससे पहले किया हुआ आपका कमेंट और वह यह है………… “बहुत खूब आदरणीय सूफी जी आदरणीय सरिता दीदी आदरणीय मित्र अनिल जी आदरणीय सद्गुरु जी और आदरणीय जाफर साहब…………क्या लड़ने को और वाद विवाद को ही अभिव्यक्ति कहते हैं ” जो आपके साथ हुआ है बिलकुल वही सद्गुरु के साथ हुआ उसमे उनकी कोई अपनी गलती नहीं जैसे कि यहाँ आपकी कोई गलती नहीं. परन्तु आपको मैं मजबूर कर लड़ने को. यह आपका भी स्वाभाय जिसे आप स्वीकार नहीं करना चाह रहे थे. परन्तु आपके अहम् को चोट करते ही आप भी लड़ने के लिए मैदान में आ गए और सफाई देने लगे आप पर मेरे द्वारा लगाये गए इल्ज़ामों पर. यदि आप चुप-चाप बचकर निकल गए होते तो आप सही हो गए होते. परन्तु यह असम्भव था सिर्फ आप ही के लिए नहीं हर किसी के लिए और उससे मैं अलग नहीं. आपका या मेरा सफाई देना यह इंगित करता है कि या तो हैम गुनाहगार या फिर कमजोर. जब किसी के विचारों से ऐसा लगता है कि खुद को अहंकार, द्वेष, इत्यादि से मुक्त बताता हैं तो मैं उसके अहंम पर चोट कर देता हूँ फिर उसका वह रूप बाहर निकल आता है जिससे वह भागता है या फिर इंकार करता है. परन्तु हकीकत यह है कि सकारात्मक या फिर नकारात्मक दोनों ही गुण हमारे अंदर विदयमान है उससे कभी भी किसी प्रकार अलग नहीं हो सकते. जिससे हमारा बैलेंस बना है एक ख़त्म दूसरा ख़त्म परन्तु यह असम्भव है क्योंकि फिर आप, आप नहीं रह जायेंगे. न आपके अंदर सच रह जाएगा और न ही झूठ.

Jafar के द्वारा
November 30, 2013

Or aap chahen to you tube pe ya net pe chand ke jo 2 tukde rasool allah mohammad s.a.w.w ne kiye the uske nishan aaj b chand pe h aap nasa ne jo pic li h dekh sakti h…or mohammad saww ne koi quran apne aap se nhi likha h unko allah ka sandeshwahak jeebrail namak farishta jo kehta tha wo likhte the..or quran khud challenge krta h ki agar tm chaho to isse achi kitab likh ke dikha do…nhi likh paoge..quran or islam me hr baat ka jawab h..

Jafar के द्वारा
November 30, 2013

Or sufi mohammad ne Aapke gure osho ki baat likhi h unhone quran ko galat nhi kaha h aap puri baaten unki padhiye

Jafar के द्वारा
November 30, 2013

Quran ki surah Al-Bakra verse 190 Padhiye saaf 2 likha h ki deen ki raah me unse lado jo tmse lade or agar wo baaz aa jaye to phir na lado beshak allah maaf krne wala h or katl atyachaariyon ke alawa kisi or ko na karo lekin pata nhi in aatanwaadiyon ne kya samjha h inko to qayamat me wo saza milegi jo kisi ko nhi milegi… inko to aisa lagta h ki saara theka islam ka inhone utha rakha h..allah ki lanat ho in pr…ye wahi jahil h jinjone mere imam ko shaheed kiya….

Jafar के द्वारा
November 30, 2013

Mujhe hindi nhi type krni aati isliye aapko apni site se saari jaankaariyan di h..

    sinsera के द्वारा
    December 1, 2013

    अप जिस ब्लाक में अपने कमेंट डाल रहे हैं, उसी में दाहिने तरफ hinglish बटन है, उसे ऑन करिये , हिंदी टाइप हो जायेगा…लेकिन आपने अपना नाम “जाफ़र” कैसे लिखा था…??

Jafar के द्वारा
November 30, 2013

Jihad ka means hota h ki aap islam ke jo dushmann h unke khilaf action len…wo action pahele kalam se h phir talwaar se h…talwaar ka action tb h jb koi nabi ho ya koi imam present me ho..or abhi islam me na koi nabi h or na koi imam…to talwaar ya gun se islam ke dushmano ko katl karna sarasar galat h..ye aatangwaadi bs apni dehshat phailaate h inka koi mazhab nhi h..or ye galat kisi ki jaan lete h lelin jinhe maarte b h unse islam ko koi khatra nhi h… hm shia h hm apne kalam se saare jawab dete h..kyunki humare leader abhi nhi aaye h…abhi na koi nabi h or na koi imam…isliye hm koi ladai inke khilaf nhi utha rhe h…hm saare jawab kalam ki jihaad se de rahe h lekin ye jo b kr rhe h wo allah dekh rhe h… hm sabr kr rhe h or krte rahenge jb humare 12th imam aayenge tb inko talwaar se jawab denge…abhi hm wo kr rhe h jo islam kehta h…allah sabr krne walo k sath h,hme kayamat k din acha badla milega..is life me agar shahid b ho jaye to koi baat nhi…

sinsera के द्वारा
November 29, 2013

भाई अनिल जी , नमस्कार, क्या कहना चाहा था मैं ने और चर्चा कहाँ से कहाँ मुड़ गयी….खैर….अच्छा है, काफी जानकारी मिली..हर बात में सकारात्मकता ढूंढनी चाहिए…

sinsera के द्वारा
November 29, 2013

सूफी ध्यान मुहम्मद जी, आपको नमस्कार….आपके अध्ययन को नमस्कार….यहाँ भी थोड़ी ख़ुशी थोडा गम है…ख़ुशी ये कि आप किसी विषय को ध्यान पूर्वक पढ़ते हैं और जानकारी शेयर करते हैं..गम ये कि खुद को इतना महान समझने लगे कि युगों से स्थापित महान व्यक्तियों और पुस्तकों पर आपत्ति उठाने लायक हो गए…. जिस समय और जिस महाद्वीप में इस्लाम धर्म की शुरुआत हुई, वहाँ का माहौल इतना जाहिलाना था कि उन लोगों को नफीस ज़ुबान में नहीं समझाया जा सकता था..सब आपस में लड़ने कटने वाले क़बीले थे ..उको समझने के लिए उनकी बुद्धि के अनुसार बातें कही गयीं..उस प्रतिकूल माहौल में एक व्यक्ति ने अगर समाज सुधार का काम किया, अच्छी जीवन शैली सिखाने के लिए सोच-समझ कर एक किताब लिखी…तो हमें उनका आभारी होना चाहिए, वो ज़माना सोचिये, आज की तरह लैपटॉप और नेट नहीं था..पथरीले पहाड़ों पर , आग उगलते रेगिस्तानों में भटक कर सब तरफ से सताया हुआ इंसान अगर मानवमात्र की भलाई के लिए ही सोचता रहा और अपने कर्तव्य से नहीं डिगा तो वो कोई साधारण इंसान नहीं बल्कि ईश्वर का पैगम्बर ही होगा…आप इसे लीपा पोती नहीं कहियेगा और न ही किसी को प्रभावित करने की कोशिश…मेरा खुद का ये मानना है की लक्ष्य लेकर तो कई लोग चलते हैं लेकिन मरते दम तक जो अपने रस्ते से न डिगे , उसे ही ईश्वरीय दूत कहा जा सकता है …आज हम जिन बातों को कमी समझते हैं , हो सकता है वो उस वक़्त कि डिमांड रही हो …….जब आज तक लोग सीधी बात नहीं समझते , ऊँगली टेढ़ी करनी पड़ती है , तो 1500 साल पहले तो जहालत कि हद थी ………जैसे माएं बच्चों को खाना खिलाती हैं तो शेर भालू को बुलाती हैं , कुछ वैसा ही रहा होगा …अप मोटिव देखिये , तरीके पे क्यूँ जाते हैं …..जो भी हो ………..i strongly condemn people who disrespect great men, prophets and holy books…..अगर उनमे कुछ बात न होती तो वो अब तक मिट चुके होते ……आपके पास ज्ञान का असीमित भंडार है …..but plz…..be modest and polite……आपने कुछ दिनों पहले कहा कि कोई गीता पर ऊँगली उठता है तो मुझे लगता है किसी ने मेरी माँ को गाली दी हो …….अब आप क़ुरान पर ऊँगली उठा रहे हैं ……क्यूँ ……………गीता के साथ आपकी श्रद्धा है , क़ुरान के साथ क्यूँ नहीं , जबकि दोनों ही पुस्तकें अपनी उत्पत्ति के काल के हिसाब से जीवन शैली सिखाती हैं जो आज भी लाभकारी है ………………आपसे उत्तर चाहती हूँ कि आप गीता के लिए निष्ठावान हैं तो क़ुरान के लिए क्यूँ नहीं ……ARE U BIASED ……..???????

    sadguruji के द्वारा
    November 30, 2013

    आदरणीय अनिल कुमार “अलीन” जी,आप ज्ञानी जरुर हैं,लेकिन अपने को जरुरत से ज्यादा चालक समझते हैं.आप ने गलत टिपण्णी की है,इसीलिए मै उसका जबाब दे रहा हूँ.मेरा हृदय स्वच्छ है और मै आप की तरह लड़ाने-भिडाने का कम नहीं करता हूँ.आप ने बचपन से ही पिल्लों को लड़ाया है और आज भी आप की वही आदत बनी हुई है.मैंने अपने कमेंट में ये नहीं कहा कि सरिता जी पहले अच्छा नहीं लिखती थीं.कई महीने बाद उन्होंने लेख लिखा है,मेरा मंतव्य उसी बात से था.सबसे पहले तो ज्ञानी व्यक्ति को किसी के बीच टाँग अडाना नहीं चाहिए और यदि आप ऐसी गलती कर ही रहे हैं तो पहले आप कमेंट तो ध्यान से पढ़ लिया कीजिये.अपने को इस मंच का सबसे बड़ा ज्ञानी साबित करने का रोग आपको लगा हुआ है.फलदार वृक्ष हमेशा धरती की तरफ झुका रहता है.आप तो ये भी भूल जाते हैं कि शिष्टाचार और विनम्रता ज्ञानी व्यक्ति का पहला लक्षण है.ये सारे कमेंट पढ़ने के बाद आदरणीय सरिता सिन्हा जी सबसे ज्यादा व्यवहारिक और सबसे बड़ी ज्ञानी नज़र आती हैं.अपनी गलतियों को स्वीकारते हुए उसे ठीक करते जाना ये उनकी विशेषता है.उन्ही से आप कुछ सीखिए.

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    November 30, 2013

    पहले दो तीन मज़ाक कर लूँ आप से… पहला- मुझे नहीं लगता कि आपने मेरे कमेंट को ध्यान से पढ़ा है… आपने जल्दबाजी में प्रतिक्रिया दे दिया है… मैंने अभी तक न तो क़ुरान की निंदा की है न ही मोहम्मद साहेब की… दूसरा- आपकी ये प्रतिक्रिया मजह लीपा-पोती ही है, आपने हड़बड़ाहट में कुछ से कुछ बोल दिया है…जैसे, “अच्छी जीवन शैली सिखाने के लिए सोच-समझ कर एक किताब लिखी…तो हमें उनका आभारी होना चाहिए”, “गम ये कि खुद को इतना महान समझने लगे कि युगों से स्थापित महान व्यक्तियों और पुस्तकों पर आपत्ति उठाने लायक हो गए” “मेरा खुद का ये मानना है की लक्ष्य लेकर तो कई लोग चलते हैं लेकिन मरते दम तक जो अपने रस्ते से न डिगे , उसे ही ईश्वरीय दूत कहा जा सकता ” …… ये सब क्या हैं..?? मैं क्या अगर कोई भी मुस्लमान अगर आपकी ये प्रतिक्रिया पढ़कर आपके विरोध में खड़ा हो जाएगा… आपने सही कहने के चक्कर में गलत गलत बात कह दी है… अब मेरी बात- किसने कहा आपको कि गीता के साथ मेरी ‘श्रद्धा’ है…?? आपने मेरी बातों को गलत ढंग से रखा है, “कोई गीता पर ऊँगली उठता है तो मुझे लगता है किसी ने ‘मेरी’ माँ को गाली दी हो”…??? मैंने ऐसा कही और कहीं नहीं कहा है…?? मैंने कहा था, ‘गीता का अपमान करना ‘माँ’ को गाली देने के समान है..’ इसमें ‘मेरी माँ और गाली कहाँ है…??? सारे धर्म ग्रन्थ कूड़ा-कचड़ा है, और जब मैं ये कहता हूँ कि ‘गीता समस्त ग्रंथों का सार है’ तो मेरा सिर्फ इतना मतलब है कि ‘कूड़ा-कचड़ा’ का सार है…दूसरी बात अगर निंदा करना महानता नहीं है तो डर के मारे किसी की झूठी तारीफ करना कौन सी महानता है….??? आप कहती हैं, “अगर उनमे कुछ बात न होती तो वो अब तक मिट चुके होते” गलती में हैं आप ‘गुलाब का फूल सुबह खिलता है सांझ कुमलाह जाता है, जब कि प्लास्टिक का फूल सदियों सदियों ज़िंदा रहता है’, चूँकि उनमे कोई बात नहीं है सिर्फ बकवास है इसीलिए वो ज़िंदा हैं…लोगों को झूठ के साथ जीने में आसानी होती है… मेरा किसी राजनितिक, धार्मिक, साम्प्रदायिक, या किसी जाति और क्षेत्र से कोई लेना देना नहीं है, अतः मैं किसी की तरफदारी नहीं कर सकता… बुद्धपुरुष माहौल से को प्रभावित करते हैं उससे खुद प्रभावित नहीं होते हैं…’क्यों बुद्ध ने अंगुलिमाल से लड़ाई नहीं की…क्यों उसको तलवार से नहीं डराया???’ आप की सब दलीलें बचकानी हैं… जैसे कोई माँ अपने बच्चे की गलती को को सही सावित करने के लिए कुछ से कुछ दलीलें देने लगती है, उसी तरह आप भी डर कर कुछ से कुछ बोल रहीं है…!! लोग सब दिन से सब जगह जाहिल ही रहे हैं, ऐसा नहीं कि पहले जाहिल थे आज नहीं हैं…. ‘जीसस को सूली देने वाले लोग क्या जाहिल नहीं थे…?? सुकरात को जहर देने वाले लोग क्या जाहिल नहीं थे…? महावीर के कान में सीसा पिघलवा कर डालने वाले लोग जाहिल नहीं थे…?? बुद्ध पर पत्थर फेकने वाले लोग जाहिल नहीं थे क्या…???, दिल्ली के जामा मस्जिद में सरमद का गला काट देने वाले लोग जाहिल नहीं थे क्या…??? अल्हिल्लाज मंसूर को सूली देने वाले लोग जाहिल नहीं थे क्या…?? एम्.फ़ हुसैन को भारत से खदेड़ कर भगा देने वाले लोग जाहिल नहीं थे क्या…??? “अप मोटिव देखिये , तरीके पे क्यूँ जाते हैं” नहीं बिल्कुल नहीं, आप देखिये मोटिव, मुझे सत्य देखने दीजिए…नीम का मोटिव कितना भी अच्छा हो उसमे मीठे आम नहीं लग सकता, मोटिव से क्या होता, परिणाम मायने रखता है… कोई चाहे कितने ही सही मोटिव के साथ बबूल पेड़ उगाये उसमे आम नहीं लग सकते, आप को राजनीती करनी है आप मोटिव देखिये…. .i strongly condemn people who disrespect great men, prophets and holy बुक्स… what’s the difference between and the other illiterate men then… Now you strongly condemn, tomorrow you will surely kill, isn’t it..?? Now I ask you, are you fanatic… one should be open for discussion not ready to jump into conclusion???

    November 30, 2013

    हाँ…………हाँ……………हाँ…………….हूँ………हूँ…………….हूँ…………! समझने और होने में वही अंतर है जो जमीं और आसमान में है. आपकी जानकारी के लिए एक बार फिर बता दूँ कि मैं कोई ज्ञानी नहीं. जी, जवाब आप नहीं दे रहे हैं बल्कि मैं दिलवा रहा हूँ. वो इसलिए ताकि आपका वह चेहरा सामने आये जिसको आप दुनिया से छिपा रहे हैं. आप जो है उसे स्वीकार कर सके. बचपने से ही नहीं बचपन में लड़ाया है, दोनों दो बाते हैं. रहीं बात मेरी तो मैं जो हूँ उसे स्वीकार करता हूँ. हो सकता है कि आपका ह्रदय बचपन से ही शुद्ध हो. यदि ऐसा है तो आप सड़ रहे हैं. यह अलग बात है कि आप स्वीकार न करे. तलब का पानी कितना भी शुद्ध हो यदि समय के साथ नहीं बदला गया तो सड़ने लगता है, बदबू देने लगता है, उसमे कीड़े पड़ने लगता है. ऐसा ही कुछ आपके साथ है, यहाँ आपकी शुद्धता नहीं बल्कि आपका गुरुर बोल रहा वो भी झूठ और धोखे से भरा हुआ. आपने कमेंट में क्या लिखा है और किया नहीं, इसकी सफाई आपको देने की कोई जरूरत नहीं. क्योंकि यह गुनहगारों और कमजोरों का काम होता हैं परन्तु आप तो शुद्ध हैं. हैं न………हाँ………..हाँ………मुझे ज्ञानी कहकर खुद को अपमानित न करें. वरना शुद्धता की तोहीन होगी. वैसे भी आपको एक बार बताया था कि मैं ज्ञान और मूर्खता दोनों से परे हूँ……..मैं अनिल कुमार ‘अलीन’ हूँ और इस नाम को किसी विशेषण अथवा उपाधि की. आवश्यकता नहीं………साबित करना और करवाना दोनों ही मूर्खों का काम है मजा तो बस जो हैं हम, वही होने में हैं. अभी आपने कहाँ कि फलदार वृक्ष हमेशा धरती की तरफ झुके होते हैं. मतलब आपके कहे अनुसार झुक गया तो मैं फलदार हो जाउंगा मतलब ज्ञानी सही अर्थों में कहलाऊंगा. महोदय इससे हास्यपद क्या होगा कि आप मुझे जानते हैं जो मैं हूँ फिर भी मुझे वह साबित करना चाहते हैं जो मैं नहीं हूँ. यह बनावटी जीवन जीना छोड़िये और खुद को स्वीकार करिये. आप यहाँ कहना, “ये सारे कमेंट पढ़ने के बाद आदरणीय सरिता सिन्हा जी सबसे ज्यादा व्यवहारिक और सबसे बड़ी ज्ञानी नज़र आती हैं.” संदिग्ध है. इससे सिद्ध होता है कि आप दुबिधा में है. आपके अनुसार वो नज़र आती है, वैसा है नहीं…..आप एकदम भ्रमित है. आपको खुद नहीं पता कि आप क्या बोल रहे हैं? क्यों बोल रहे हैं? कहाँ बोल रहे हैं? किससे बोल रहे हैं? बस खुद की खुद से नाराजगी दूसरों पर झल्लाकर निकाल रहे हैं. जी, खुद से मुंह छुपकर दूसरों से, यह आप ही सीखिए और जीवन भर खुद से दूर होकर दूसरों के पीछे युहीं भागते रहिये और जब थक जाइयेगा तब खुद के पास आइयेगा वही मिलूंगा आपसे. फिर यह सवाल वहीँ उठाइएगा……… when all the knowledge and the power of world come to end. I am started from there……………..I am Anil Kumar ‘Aline.’………..इसे भी समझने मत लगिएगा क्योंकि समझ से बाहर हूँ खुद को समझिये आप. जब ऐसा कर जायेंगे तो मैं खुदबखुद समझ में आ जाउंगा. ……..

    sadguruji के द्वारा
    December 1, 2013

    मान्यवर अनिल कुमार “अलीन” जी.आप ने कहा है- when all the knowledge and the power of world come to end. I am started from there……………..I am Anil Kumar ‘Aline.’……….आप को मै बता दूँ कि जिस अवस्था का आप ने जिक्र किया है,उस अवस्था को प्राप्त व्यक्ति मौन हो जाता है.काशी में इस अवस्था को प्राप्त अनगिनत लोग हैं.आप भ्रमित और आत्म सम्मोहित हैं.मै तो हर क्षण स्वयं में लीन रहता हूँ,लेकिन आप स्वयं से बहुत दूर हैं,स्वयं को जानते भी नहीं हैं,केवल एक थके हारे व्यक्ति की तरह दूसरों से ईर्ष्या करके,दूसरा का मजाक उड़ाकर और अपनी समझ से दूसरों से बदला लेकर सुख महसूस करते हैं.ये एक मानसिक बीमारी है.पहले आप एक अच्छा इंसान तो बनिए,ज्ञान की ऊँची बातें बाद में कीजियेगा.आप के लेख पढ़कर आप के ज्ञान से थोडा सा प्रभावित हुआ था,लेकिन आप के व्यवहार ने सब धो पोंछ के साफ कर दिया है.बेहतर हो कि आप अपना ज्ञान अपने पास रखें और कमेंट पर कमेंट न करें.आदमी मुह से बक बक करके ज्ञान अज्ञान से पार नहीं होता है,बल्कि मौन से होता है और ज्ञान अज्ञान के पार मुक्त व्यक्ति का एक ही लक्षण है–बड़े बड़ाई ना करें,बड़े न बोलें बोल ! हीरा मुख से कब कहे लाख हमारो मोल !!आप ने अपना उपनाम अलीन रखा है,फिर भी कम क्रोध लोभ मोह ईर्ष्या-द्वेष प्रतिशोष की भावना और अहंकार में “लीन” रहते हैं.पहले अपने उपनाम को सार्थक कीजिये ज्ञान की बातें बाद में कीजियेगा.अपने प्रेम और शुभकामनाओं सहित.

    December 1, 2013

    मुझसे पहिले आपको सूफी ध्यान मुहम्मद बता चुके हैं कि सारी अवस्थाएं झूठ होती है. इसका मतलब कि सत्य कोई और है जो इन अवस्थाओं का साक्षी है. दूसरी बात मैं कोई अवस्था का जिक्र नहीं किया जो मैं हूँ उसे बताया हूँ. भ्रमित, सम्मोहित, थका, हारा, इर्ष्या, मजाक और बदला………………….अब आप काफी हद तक कुछ-कुछ देख रहे हैं जो कब से दिखाना चाह रहा था. परन्तु आप गुरुर के मारे सत्य को स्वीकार नहीं करना चाह रहे थे. कुछ दिन पहिले आपसे बोला था कि आप जो भी मुझको बोल रहे हैं वो एक झूठ है सिवाय यह कि मैं एक आइने की तरह हूँ. एक ऐसे आइने की तरह जिसके सामने आदमी का केवल वो रूप सामने आता है जिसे वो अस्वीकार करता है. वो चाहे सद्गुरु हो या फिर अनिल दरअसल आप जो मुझमें देख रहे हैं वह आपका वही प्रतिबिम्ब है जिससे आप दूर भाग रहे हैं, जिसे अस्वीकार कर रहे हैं. यह आपका पीछा तबतक करेगा जबतक कि आप खुद को स्वीकार न कर लेते. अभी भी आपकी बातों में गुरुर है, झूठ, द्वेष है, …..आपका या फिर किसी अन्य का पीछा तबतक नहीं छोडूंगा जबतक कि वह मुझसे भागता रहेगा. क्योंकि जिसे आप अनिल में ढूढ़ रहे हैं वह आपसे अलग नहीं. वह आप ही का रूप है. आप कभी खुद को ग्यानी कहते हैं, तो कभी भक्त, कभी सद्गुरु, कभी आप गुरुओं में लीन रहते है, कभी किताबों व ग्रंथों में, कभी खुद में ,………………………यह सब आपकी अवस्थाएं हैं जो कि एक झूठ है. इसके अलावा भी कुछ अवस्थाएं है आपकी जिसे आप स्वीकार नहीं करना चाहते……..जैसे कि ढोंगी, मुर्खता, भ्रमित, सम्मोहित, थका, हारा, इर्ष्या, मजाक और बदला इत्यादि. यह सब भी झूठ है. यह झूठ सिर्फ आप ही के साथ नहीं अनिल के साथ भी है और अन्य के साथ भी. परन्तु मैं न ही कोई व्यक्ति हूँ और न ही कोई अवस्था. आप बार-बार मुझसे या किसी अन्य से प्रभावित होने की मुर्खता क्यों करते हैं आप खुद से प्रभावित होइए. मैं ज्ञान और अज्ञान से पार नहीं हूँ, बल्कि परे हूँ. मैं कोई मुक्त या बंधक नहीं बल्कि इससे परे हूँ, मैं को व्यक्ति या आत्मा नहीं बल्कि इससे परे हूँ,….आपका कहना, ” –बड़े बड़ाई ना करें,बड़े न बोलें बोल ! हीरा मुख से कब कहे लाख हमारो मोल .” यह रति-रटाई बाते बंद करिए आखें खोलिए और सच का सामना करिए. आखें बंद कर लेने से सूरज डूब नहीं जाता बल्कि आप उससे आखें बंद करके अँधेरे से नाता जोड़ना जोड़ लेते हैं. अलीन( जो ग्रहण करने योग्य न हो) मेरा उपनाम नहीं बल्कि वह रूप है जिसे दुनिया स्वीकार नहीं करना चाहती और यह अनिल के अन्दर ही नहीं आपके अन्दर भी है और दूसरो के अन्दर भी जब कोई इससे मुख मोड़ने की कोशिश करता है या फिर यह देखने की कोशिश करता है कि मेरा इससे कोई नाता नहीं तब-तब यह हरेक अनिल में अलीन बनकर बाहर आता है और अपने होने का एहसास करता है. परन्तु मेरे लिए तो अनिल भी झूठ है और अलीन भी…………….क्योंकि मैं इन दोनों से परे हूँ………….अनिल कुमार अलीन तो बस मेरा ऑब्जेक्ट था, एक माध्यम था जिसके सहायता से आपके अन्दर के अलीन को निकालकर आपके सामने रख सकू जिससे आप मुंह मोड़ रहे हैं, जिससे आप भाग रहे हैं, खुद को गलतफहमी में डाले हुए है. आप बाहर से किसी भी अवस्था में रहे अन्दर आपकी हरेक आव्स्थाएं रहेंगी. ………….आपने खुद को गुरु, ग्यानी, भक्त इत्यादि नामक आवलंबन लगा रखा था. सबकों ख़त्म कर दिया हूँ, आप एकदम निर्वस्त्र हो चुके हैं,……….आज आप उतने ही नंगे दिख रहे हैं जितना अलीन है. परन्तु यह सब झूठ सिवाय मेरे ………………मेरा काम ख़त्म हुआ………………..अब मैं चलता हूँ……….. When all the knowledge and the power of world come to end. I am started from there……………..I am Anil Kumar ‘Aline.’…

    sadguruji के द्वारा
    December 2, 2013

    आदरणीय अनिल कुमार अलीन जी,सादर प्रेम.ॐ शांति:शांति:शांति:

Jafar के द्वारा
November 29, 2013

kuch samajh me aaya aapko…ab article likhengi phir aap?

    sinsera के द्वारा
    November 29, 2013

    जाफ़र साहब नमस्कार, ..क्यों भाई , आर्टिकल लिखने में क्या हो गया..नहीं लिखती तो इतनी सारी जानकारी कैसे मिलती..इसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद ..मुझे तो बहुत ख़ुशी है और थोडा दुःख भी…ख़ुशी इस बात की कि आप लोगो ने अपनी बातों को बहुत ही शालीन तरीके से सामने रखा वर्ना आम तौर पर ऐसे मुद्दों पर लोग यूँ उछलते है जैसे सांप की पूँछ पर पैर पड़ गया हो…और दुःख ये की जो मैं ने कहना चाहा था वो आपने समझा नहीं..मेरा मतलब सिर्फ ये था कि जो बात गुज़र चुकी है उसे बदला नहीं जा सकता , तो उस दुःख को अपने दिल के अंदर रखें और आगे बढे, तरक्की करने की सोचें…आपने कहा कि मातम करके हम ये दिखाते हैं कि हम ज़ुल्म सहने के लिए तैयार हैं..लेकिन ये तैयारी कहीं दिखी नहीं….हाल ही में अभी इतनी सारी अन्यायपूर्ण दुर्घटनाएं हुईं लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं लगा ….बाद में लोगो ने अफ़सोस ज़ाहिर किये लेकिन दंगो कि आग में कोई नहीं कूदा…सड़कों पर, स्टेशन पर, ट्रेनों में जो निर्दोष मारे गए, उनपर आप कभी नहीं रोये, क्या इसलिए कि वो आपका मज़हब शेयर नहीं करते…कुछ पागल आतंकवादियों की हरकतों से आज इस्लाम जैसा महान धर्म दाँव पर लगा हुआ है..उनको जड़ से मिटाने का बीड़ा ये हौसलामंद नौजवान क्यों नहीं उठाते…आपको पता है, इसी बेहूदे तथाकथित “जिहाद ” ने इस्लाम की इतनी बदनामी करा रखी है, आपको बुरा नहीं लगता…?? आप मुझे शिक्षित लगते हैं…क्यों नहीं आप आपने जैसे और शिक्षितों को साथ लेकर इस झूठे जिहाद को जड़ से उखाड़ फेंकने का बीड़ा उठाते हैं..यकीं मानिये..अगर तब कोई लड़ाई हुई और उसमे खून बहाना पड़े तो आप की माँओ के साथ हमें भी गर्व होगा…अजमल कसाब को जन्नत की हूरों के झूठे सपने दिखा कर जिन लोगों ने आतंकवाद का रास्ता पकड़ाया, उस ने अपनी दो साल की की कैद में उन पर हज़ार लानतें भेजी होंगी और कोसा होगा..ऐसा न होता तो वो कोर्ट में रोता हुआ न दिखायी देता…आप ऐसे भटके हुए नौजवानो को सही रास्ता दिखाने का नेक काम उठाइये ….बहुत मुश्किल है न…उन पाकिस्तान और दुबई में बैठे हुए आकाओं से लड़ना….लेकिन तब हम जानेंगे की आप क़ुरबानी देने से नहीं डरते और ज़ुल्म सहने को तैयार हैं….शुभकामनाओं सहित…

Jafar के द्वारा
November 29, 2013

kya hua aapne reply. krna kyu band kr diya?

Jafar के द्वारा
November 29, 2013

करबला में लिखी गई थी इस्लामी आतंकवाद की पहली इबारत मोहर्रम का महीना तो दरअसल इस्लामिक कैलेन्डर के अनुसार वर्ष का पहला महीना होता है। परन्तु इसी मोहर्रम माह में करबला (इराक) में लगभग 1400 वर्ष पूर्व अत्याचार व आतंक का जो खूनी खेल एक मुस्लिम बादशाह द्वारा खेला गया, उसकी वजह से आज पूरा इस्लामी जगत मोहर्रम माह का स्वागत नववर्ष की खुशियों के रूप में करने के बजाए शोक व दुःख के वातावरण में करता आ रहा है। शहीद-ए-करबला हजरत इमाम हुसैन को अपनी अश्रुपूरित श्रद्घांजलि देने के साथ-साथ पूरी दुनिया में इस्लामी जगत के लोग उस सीरियाई शासक यजीद को भी लानत भेजते हैं, जिसने हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन व उनके 72 परिजनों को आज से लगभग 1400 वर्ष पूर्व मैदान-ए-करबला में फुरात नदी के किनारे तपती धूप में क्रूरतापूर्वक भूखा व प्यासा शहीद कर इस्लामी आतंकवाद की पहली इबारत लिखी थी।बडे दुःख का विषय है कि इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मोहम्मद द्वारा इस्लाम के रूप में परिचित कराए गए इस पंथ पर उन्हीं के अपने दौर में ही ग्रहण लगना शुरु हो गया था। हजरत मोहम्मद इस्लाम धर्म का पालन करने वाले मुसलमानों से ऐसी उम्मीद करते थे कि वे केवल एक अल्लाह के समक्ष नतमस्तक हों, चरित्रवान हों, पवित्र हों, एक-दूसरे के प्रति प्रेम, सद्भाव व सहयोग की भावना रखने वाले हों, दानी हों, छल-कपट, झूठ, मक्कारी, व्याभिचार, दुराचार से दूर हों। किसी दूसरे के माल व दौलत पर नजर न रखते हों, जुआ, शराब, हरामखोरी, हरामकारी जैसे दुव्र्यसनों से हरगिज वास्ता न रखते हों। ऐसी व ऐसी और तमाम विशेषताओं को धारण करने वाले व्यक्ति को हजरत मोहम्मद साहब एक सच्चे मुसलमान की श्रेणी में गिना करते थे। यही निर्देश उन्होंने अपने परिजनों को भी दिए थे। अतः उनके निर्देशों का पालन करना तथा हजरत द्वारा बताए गए इस्लामिक सिद्घान्तों पर हूबहू अमल करना उनके परिजन अपना कर्त्तव्य समझते थे।दूसरी ओर इस्लाम की उत्पत्ति के केंद्र मदीना से कुछ दूर सीरिया देश जिसे उस समय ‘शाम’ के नाम से जाना जाता था में मुआविया नामक शासक का दौर था। मुआविया का पुत्र यजीद जिसमें कि सभी अवगुण मौजूद थे, वह अपने पिता मुआविया की मृत्यु के बाद शाही वारिस के रूप में शाम राज्य की गद्दी पर काबिज हो गया। इस्लामी इतिहास का वह पहला काला दिन था जिस दिन यजीद जैसे भ्रष्ट, चरित्रहीन व अत्याचारी शासक ने स्वयं को किसी इस्लामिक देश का बादशाह घोषित करने का दुस्साहस किया था। उधर हजरत मोहम्मद द्वारा चलाए गए पवित्र पंथ इस्लाम की रक्षा के लिए तथा इसे यजीद जैसे किसी अपशकुनी बादशाह से दूर रखने के लिए हजरत मोहम्मद का वह पहला घराना था जिसने यजीद जैसे दुष्ट क्रूर सीरियाई सुल्तान को किसी इस्लामी देश का इस्लामी शासक मानने से साफ इन्कार कर दिया था। यही कारण था जिसके चलते दसवीं मोहर्रम को करबला के मैदान में बेगुनाहों के खून की होलियां खेली गईं। क्रूरता का एक ऐसा इतिहास करबला के मैदान में यजीद के सेनापतियों व उसके सैनिकों द्वारा रचा गया जिसकी दूसरी मिसाल आज तक देखने व सुनने को नहीं मिली। एक ओर तो यजीद अपनी गुलाम महिलाओं, मां जैसी उम्र वाली गुलाम महिलाओं, अपनी ही बहनों व बेटियों तक से व्याभिचार करने में गर्व महसूस करता था। उसे शराब के नशे में खुदा से रुबरु होने अथवा नमाज पढने का ढोंग करने में आनन्द की अनुभूति होती थी। हजरत इमाम हुसैन तथा हजरत मोहम्मद का पूरा घराना यजीद के दुष्चरित्र से पूरी तरह परिचित था। केवल हजरत मोहम्मद का परिवार ही नहीं बल्कि पूरे इस्लामी जगत में उस समय यजीद की चरित्रहीनता की चर्चा होने लगी थी। यजीद जैसे आततायी व्यक्ति को इस्लामी देश के शासक के रूप में देखकर मुस्लिम जगत इसे इस्लाम धर्म पर एक बडे अपशकुन के रूप में देख रहा था। ऐसे क्रूर, दुष्ट एवं व्याभिचारी शासक को इस्लामी देश के शासक के रूप में अपनी स्वीकृति प्रदान कर देना हजरत मोहम्मद के नवासे व हजरत अली व फातिमा के बेटे हजरत हुसैन के लिए आखिर कहां सम्भव था।हजरत इमाम हुसैन ने यजीद को शाम के इस्लाम शासक के रूप में स्वीकृति प्रदान करने से इन्कार कर दिया। और हजरत हुसैन का यही इन्कार करबला की दर्दनाक घटना का तो कारण बना ही साथ-साथ करबला की यही घटना इस्लाम की रक्षा के लिए हजरत मोहम्मद के घराने की ओर से दी गई महान कुर्बानी का भी एक सबब बनी। इतिहास साक्षी है कि दस मोहर्रम को करबला में यजीद की सेनाओं द्वारा हजरत हुसैन के 6 माह के बच्चे अली असगर, 18 वर्ष के जवान बेटे अली अकबर से लेकर 80 वर्ष के बुजुर्ग तक को तीरों व तलवारों से शहीद कर दिया गया। इतिहासकार बताते हैं कि करबला की घटना मई माह में घटित हुई थी। इराक में मई माह में पडने वाली गर्मी के विषय में आसानी से सोचा जा सकता है। आज भी वहां गर्मियों में दिन के समय सामान्य तापमान 50 डिग्री से अधिक ही होता है। सुना यह जाता है कि करबला के हादसे के समय प्राकृतिक रूप से कुछ ज्यादा ही गर्मी पड रही थी तथा फुरात नदी के किनारे की रेगिस्तानी जमीन आग की तरह तप रही थी। ऐसे भयंकर गर्मी के वातावरण में यजीदी फौजों द्वारा हजरत हुसैन व उनके सभी 72 साथियों के तम्बुओं को फुरात नदी के किनारे से बलपूर्वक हटा दिया गया। इतना ही नहीं बल्कि तीन दिन तक इन्हें नदी से पानी लेने की इजाजत तक नहीं दी गई। हजरत इमाम हुसैन की ओर से कुर्बानी देने आए इन 72 लोगों में दूध पीने वाले बच्चे से लेकर बुजुर्ग महिलाएं यहां तक कि हजरत हुसैन के एक पुत्र जैनुल आबदीन भी शामिल थे जोकि उन दिनों बहुत बीमारी की अवस्था से गुजर रहे थे।यजीद रूपी उस आतंकवादी शासक ने किसी पर भी कोई दया नहीं की। यदि हजरत मोहम्मद के परिवार के इन सदस्यों के कत्ल तक ही बात रह जाती तो भी कुछ गनीमत था। परन्तु यजीद ने तो करबला में वह कर दिखाया जिससे आज का यजीदी आतंकवाद भी कांप उठे। हजरत इमाम हुसैन व उनके पुरुष साथियों व परिजनों को क्रूरता के साथ कत्ल करने के बाद यजीद ने हजरत इमाम हुसैन के परिवार की महिला सदस्यों को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया। उनके बाजुओं पर रस्सियां बांधकर उन्ह बेपर्दा घुमाया गया। उसी जुलूस में आगे-आगे हजरत इमाम हुसैन उनके बेटों, भाई अब्बास व अन्य शहीदों के कटे हुए सरों को भाले में बुलंद कर आम लोगों के बीच प्रदर्शित किया गया। हजरत हुसैन की 4 वर्ष की बेटी सकीना को सीरिया के कैदखाने में कैद कर दिया गया जहां उसकी मृत्यु हो गई। आश्चर्य की बात तो यह है कि एक ओर तो इस घटना से दुःखी होकर इस्लामी जगत यजीद के नाम पर थूक रहा था तथा उसके मुस्लिम शासक होने पर सवाल खडे कर रहा था तो वहीं दूसरी ओर यजीद अपने को महान विजेता समझता हुआ हुसैन के लुटे हुए काफिले को देखने वालों को यह भ्रमित करने की कोशिश कर रहा था कि यह हश्र उन लोगों का किया गया है जिन्होंने यजीद के शासन के विरुद्घ विद्रोह करने का साहस किया था। एक ओर तो सीरिया के बाजारों में हजरत हुसैन व उनके परिजनों की शहादत को लेकर कोहराम मचा था तो दूसरी ओर यजीद अपने दरबार में ठीक उसी समय शराब व ऐश परस्ती से भरपूर जश्न मना रहा था।बहरहाल इस दर्दनाक घटना को 1400 वर्ष से अधिक बीत चुके हैं। हजरत इमाम हुसैन व उनके परिजनों द्वारा दी गई बेशकीमती कुर्बानी के फलस्वरूप इस्लाम आज दुनिया का दूसरा सबसे बडा पंथ माना जा रहा है। परन्तु यह भी एक कडवा सच है कि यजीदियत आज भी अपना फन उठाए हुए है। यजीदियत आतंकवाद के रूप में आज भी पूरे विश्व की शांति भंग करने का प्रयास कर रही है। कहना गलत नहीं होगा कि आज फिर यजीदियत को समाप्त करने के लिए हुसैनियत के परचम को बुलंद करने की जरूरत महसूस की जा रही है। अर्थात् आतंकवाद के आगे न झुकने के संकल्प की जरूरत, इसका मुंहतोड जवाब देने की जरूरत, इसे हरगिज आश्रय व प्रोत्साहन न देने की जरूरत तथा कदम-कदम पर इसका विरोध करने की जरूरत। और यदि जरूरत पडे तो इसके लिए बडी से बडी कुर्बानी देने के लिए भी तत्पर रहने की जरूरत। हुसैनियत का जज्बा ही इस्लाम पर लगते जा रहे ग्रहण से उसे बचा सकता है अन्यथा आतंकवाद के रूप में यजीदियत ठीक उसी प्रकार इस्लाम धर्म को निगल जाने के लिए बेताब है जैसे कि करबला में 1400 वर्ष पूर्व इस्लाम को आहत करने का एक प्रयास यजीदी विचाराधारा द्वारा किया गया था। कत्ल-ए-हुसैन अस्ल में मर्ग-ए-यजीद है। इस्लाम जिंदा होता है हर करबला के बाद।

    November 29, 2013

    आपके कहने का मतलब यह कि ………………वरना इस्लाम मर जायेगा……………………….

Jafar के द्वारा
November 29, 2013

उफ़ुक़ पर मुहर्रम का चाँद नुमुदार होते ही दिल महज़ून व मग़मूम हो जाता है। ज़ेहनों में शोहदा ए करबला की याद ताज़ा हो जाती है और इस याद का इस्तिक़बाल अश्क़ों की नमी से होता है जो धीरे धीरे आशूरा के क़रीब सैले रवाँ में तबदील हो जाती है। उसके बाद आँसूओं के सोते ख़ुश्क होते जाते हैं और दिल ख़ून के आँसू बहाने पर मजबूर हो जाता है। यह कैसा ग़म है जो मुनदमिल नही होता?। यह कैसा अलम है जो कम नही होता?। यह कैसा कर्ब है जिसे एफ़ाक़ा नही होता?। यह कैसा दर्द है जिसे सुकून मयस्सर नही आता?। सादिक़े मुसद्दक़ पैग़म्बर (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमाया था: ………………………. बेशक क़त्ले हुसैन से मोमिनीन के दिल में ऐसी हरारत पैदा होगी जो कभी भी ख़त्म नही होगी। वाक़ेयन यह ऐसी हरारत है जो न सिर्फ़ यह कि कम नही होती बल्कि चौहद सदियाँ गुज़रने के बाद भा बढ़ती ही जाती है, बढ़ती ही जा रही है। मैदाने करबला में फ़रज़ंदे रसूल (स) सैय्यदुश शोहदा हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके अंसार व अक़रबा को तीन दिन का भूखा प्यासा शहीद कर दिया गया। करबला वालों का ऐसा कौन सा अमल है जो दूसरों की बनिस्बत ख़ास इम्तेयाज़ का हामिल है?। जहाँ हमे करबला के मैदान में अज़मते आमाल व किरदार के बहुत से नमूने नज़र आते हैं उन में एक निहायत अहम सिफ़त उन में आपस में एक दूसरे के लिये जज़्ब ए ईसार का पाया जाना है। शोहदा ए करबला की ज़िन्दगी के हर हर पहलू पर, हर हर मंज़िल पर ईसार व फ़िदाकारी व क़ुरबानी की ऐसी मिसालें मौजूद हैं जिसकी नज़ीर तारीख़े आलम में नही मिलती। शहादत पेश करने के लिये अंसार का बनी हाशिम और बनी हाशिम का अंसार पर सबक़त करना तारीख़े ईसारे आलम की सबसे अज़ीम मिसाल है। करबला करामाते इंसानी की मेराज है। करबला के मैदान में दोस्ती, मेहमान नवाज़ी, इकराम व ऐहतेराम, मेहर व मुहब्बत, ईसार व फ़िदाकारी, ग़ैरत व शुजाअत व शहामत का जो दर्स हमें मिलता है वह इस तरह से यकजा कम देखने में आता है। मैंने ऊपर ज़िक किया कि करबला करामाते इंसानी की मेराज का नाम है। वह तमाम सिफ़ात जिन का तज़किरा करबला में बतौरे अहसन व अतम हुआ है वह इंसानी ज़िन्दगी की बुनियादी और फ़ितरी सिफ़ात है जिन का हर इंसान में एक इंसान होने की हैसियत से पाया जाना ज़रुरी है। उसके मज़ाहिर करबला में जिस तरह से जलवा अफ़रोज़ होते हैं किसी जंग के मैदान में उस की नज़ीर मिलना मुहाल है। बस यही फ़र्क़ होता है हक़ व बातिल की जंग में। जिस में हक़ का मक़सद, बातिल के मक़सद से सरासर मुख़्तलिफ़ होता है। अगर करबला हक़ व बातिल की जंग न होती तो आज चौदह सदियों के बाद उस का बाक़ी रह जाना एक ताज्जुब ख़ेज़ अम्र होता मगर यह हक़ का इम्तेयाज़ है और हक़ का मोजिज़ा है कि अगर करबला क़यामत तक भी बाक़ी रहे तो किसी भी अहले हक़ को हत्ता कि मुतदय्यिन इंसान को इस पर ताज्जुब नही होना चाहिये। अगर करबला दो शाहज़ादों की जंग होती?। जैसा कि बाज़ हज़रात हक़ीक़ते दीन से ना आशना होने की बेना पर यह बात कहते हैं और जिन का मक़सद सादा लौह मुसलमानों को गुमराह करने के अलावा कुछ और होना बईद नज़र आता है तो वहाँ के नज़ारे क़तअन उस से मुख़्तलिफ़ होते जो कुछ करबला में वाक़े हुआ। वहाँ शराब व शबाब, गै़र अख़लाक़ी व गै़र इंसानी महफ़िलें तो सज सकती थीं मगर वहाँ शब की तारीकी में ज़िक्रे इलाही की सदाओं का बुलंद होना क्या मायना रखता?। असहाब का आपस में एक दूसरों को हक़ और सब्र की तलक़ीन करना का क्या मफ़हूम हो सकता है?। माँओं का बच्चों को ख़िलाफ़े मामता जंग और ईसार के लिये तैयार करना किस जज़्बे के तहत मुमकिन हो सकता है?। क्या यह वही चीज़ नही है जिस के ऊपर इंसान अपनी जान, माल, इज़्ज़त, आबरू सब कुछ क़ुर्बान करने के लिये तैयार हो जाता है मगर उसके मिटने का तसव्वुर भी नही कर सकता। यक़ीनन यह इंसान का दीन और मज़हब होता है जो उसे यह जुरअत और शुजाअत अता करता है कि वह बातिल की चट्टानों से टकराने में ख़ुद को आहनी महसूस करता है। उसके जज़्बे आँधियों का रुख़ मोड़ने की क़ुव्वत हासिल कर लेते हैं। उसके अज़्म व इरादे बुलंद से बुलंद और मज़बूत से मज़बूत क़िले मुसख़्ख़र कर सकते हैं। यही वजह है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पाये सबात में लग़ज़िश का न होना तो समझ में आता है कि वह फ़रज़ंदे रसूल (स) हैं, इमामे मासूम (अ) हैं, मगर करबला के मैदान में असहाब व अंसार ने जिस सबात का मुज़ाहिरा किया है उस पर अक़्ल हैरान व परेशान रह जाती है। अक़्ल उस का तजज़िया करने से क़ासिर रह जाती है। इस लिये कि तजज़िया व तहलील हमेशा ज़ाहिरी असबाब व अवामिल की बेना पर किये जाते हैं मगर इंसान अपनी ज़िन्दगी में बहुत से ऐसे अमल करता है जिसकी तहलील ज़ाहिरी असबाब से करना मुमकिन नही है और यही करबला में नज़र आता है। हमारा सलाम हो हुसैने मज़लूम पर हमारा सलाम हो बनी हाशिम पर हमारा सलाम हो मुख़द्देराते इस्मत व तहारत पर हमारा सलाम हो असहाब व अंसार पर। या लैतनी कुन्तो मअकुम।

Jafar के द्वारा
November 29, 2013

पिछले 1400 वर्षों के दौरान, साहित्य की एक अभूतपूर्व राशि दुनिया की लगभग हर भाषा में इमाम हुसैन (अस) , पर लिखी गयी है, जिसमे मुख्य रूप से इमाम हुसैन (अस) के सन 61हिजरी में कर्बला में अवर्णनीय बलिदान का विशेष अस्थान और सम्मान है! इस्लाम धर्म के सबी मुसलमान इस बात पर सहमत हैं के कर्बला के महान बलिदान ने इस्लाम धर्म को विलुप्त होने से बचा लिया ! हालांकि, कुछ मुसलमान इस्लाम की इस व्याख्या से असहमत हैं और कहते हैं की इस्लाम में कलमा के “ला इलाहा ईल-लल्लाह” के सिवा कुछ नहीं है! मुसलमान का कुछ गिरोह हजरत मुहम्मद को भी कलमा के एक अनिवार्य अंग मानते हुए कलमा में “मुहम्मद अर रसूल-अल्लाह” को भी पहचाना है! इस्लाम धर्म के मुख्य स्तम्भ (तौहीद, अदल, नबूअत और कियामत) में तो सभी विश्वास रखते हैं परंतू यह समूह पैगम्बर (स अ ) द्वारा बताये, सिखाये और दिखाए[1] हुए “इमामत” को ना तो पहचानता ही है और ना ही इसको कलमा का एक अभिन्न अंग मानता है! मुसलमानों के केवल एक छोटे तबके ने इमामत को पहचाना और यह विश्वास करते हैं की इमामत के प्रत्येक सदस्य अल्लाह के प्रतिनीधि और नियुक्ती हैं! यह अल्लाह के ज्ञान में था कुछ मुसलमान हजरत अली (अस) को “अमीर उल मोमनीन” के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे! इसलिए अल्लाह ने इन लोगों का परीक्षण करने के लिए और अपनी स्वीकृति पर लोगों को विलाए-अली (अस) की स्वीकृति/अस्वीकृति के अनुसार इनाम / सज़ा देने का फैसला किया था ! अल्लाह ने इनके अस्वीकृति के फलसवरूप हजरत मुहम्मद द्वारा यह घोषणा कर दी के इनके (हजरत अली (अस) के ) बिना कोई भी कर्म या पूजा के कृत्यों इनके लिए नहीं जमा किये जायेंगे और ना ही अल्लाह इनके धर्मो कर्मो को स्वीकार करेगा! इसी कारण हजरत मुहम्मद (स अ व ) , उनकी पुत्री हजरत फातिमा ज़हरा (स:अ) ने सारी ज़िंदगी अल्लाह के इस फैसले को बचाने में निछावर कर दी! और इन्ही कारणों से उन्हें शहीद भी कर दिया गया! जब इमाम हुसैन (अस) कुफा के रेगिस्तान से कर्बला की तरफ जा रहे थे तो किसी ने उनसे उनकी यात्रा का उद्देश्य पुछा! इमाम (अस) ने कहा , मै कर्बला , इस्लाम को पुनर्जीवित करने के लिए जा रहा हूँ और मै उन हत्यारों को उजागर करने जा रहा हूँ जिसने मेरे नाना मुहम्मद मुस्तफा (स अ व ) , मेरी माँ फातिमा ज़हर (स:अ) , मेरे भाई हजरत हसन (अस) को क़त्ल किया है और इस्लाम को नेस्त-ओ-नाबूद करने में कोई कसार नहीं छोड़ी है! इमाम हुसैन (अस) पर यह संक्षिप्त लेख उत्तरार्द्ध सिद्धांत के अनुयायियों को समर्पित है. हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम : इमाम हुसैन (अल हुसैन बिन अली बिन अबी तालिब , यानि अबी तालिब के बेटे अली के बेटे अल हुसैन , 626-680 ) अली अ० के दूसरे बेटे और पैग़म्बर मुहम्मद के नाती थे! आपकी माता का नाम फ़ातिमा जाहरा था । आप अपने माता पिता की द्वितीय सन्तान थे। आप शिया समुदाय के तीसरे इमाम हैं! आपका जन्म 3 शाबान, सन 4 हिजरी, 8 जनवरी 626 ईस्वी को पवित्र शहर मदीना, सऊदी अरब) में हुआ था और आपकी शहादत 10 मुहर्रम 61 हिजरी (करबला, इराक) 10 अक्टूबर 680 ई. में वाके हुई! आप के जन्म के बाद हज़रत पैगम्बर(स.) ने आपका नाम हुसैन रखा, आपके पहले “हुसैन” किसी का भी नाम नहीं था। आपके जनम के पश्चात हजरत जिब्रील (अस) ने अल्लाह के हुक्म से हजरत पैगम्बर (स) को यह सूचना भेजी के आप पर एक महान विपत्ति पड़ेगी, जिसे सुन कर हजरत पैगम्बर (स) रोने लगे थे और कहा था अल्लाह तेरी हत्या करने वाले पर लानत करे। आपकी मुख्य अपाधियाँ निम्नलिखित हैं : * मिस्बाहुल हुदा * सैय्यिदुश शोहदा * अबु अबदुल्लाह * सफ़ीनातुन निजात इतिहासकार मसूदी ने उल्लेख किया है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम छः वर्ष की आयु तक हज़रत पैगम्बर(स.) के साथ रहे। तथा इस समय सीमा में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को सदाचार सिखाने ज्ञान प्रदान करने तथा भोजन कराने का उत्तरदायित्व स्वंम पैगम्बर(स.) के ऊपर था। पैगम्बर (स.) इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से अत्यधिक प्रेम करते थे। वह उनका छोटा सा दुखः भी सहन नहीं कर पाते थे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से प्रेम के सम्बन्ध में पैगम्बर(स.) के इस प्रसिद्ध कथन का शिया व सुन्नी दोनो सम्प्रदायों के विद्वानो ने उल्लेख किया है। कि पैगम्बर(स.) ने कहा कि हुसैन मुझसे हैऔर मैं हुसैन से हूँ। अल्लाह तू उससे प्रेम कर जो हुसैन से प्रेम करे। हज़रत पैगम्बर(स.) के स्वर्गवास के बाद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम तीस (30) वर्षों तक अपने पिता हज़रत इमामइमाम अली अलैहिस्सलाम के साथ रहे। और सम्स्त घटनाओं व विपत्तियों में अपने पिता का हर प्रकार से सहयोग करते रहे। हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद दस वर्षों तक अपने बड़े भाई इमाम हसन के साथ रहे। तथा सन् पचास ( 50) हिजरी में उनकी शहादत के पश्चात दस वर्षों तक घटित होने वाली घटनाओं का अवलोकन करते हुए मुआविया का विरोध करते रहे । जब सन् साठ (60) हिजरी में मुआविया का देहान्त हो गय, व उसके बेटे यज़ीद ने गद्दी पर बैठने के बाद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत (आधीनता स्वीकार करना) करने के लिए कहा , तो आपने बैअत करने से मना कर दिया।और इस्लामकी रक्षा हेतु वीरता पूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गये। हज़रत मुहम्मद (स.) साहब को अपने नातियों से बहुत प्यार था मुआविया ने अली अ० से खिलाफ़त के लिए लड़ाई लड़ी थी । अली के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र हसन को खलीफ़ा बनना था । मुआविया को ये बात पसन्द नहीं थी । वो हसन अ० से संघर्ष कर खिलाफ़त की गद्दी चाहता था । हसन अ० ने इस शर्त पर कि वो मुआविया की अधीनता स्वीकार नहीं करेंगे, मुआविया को खिलाफ़त दे दी । लेकिन इतने पर भी मुआविया प्रसन्न नहीं रहा और अंततः उसने हसन को ज़हर पिलवाकर मार डाला । मुआविया से हुई संधि के मुताबिक, हसन के मरने बाद 10 साल (यानि 679 तक) तक उनके छोटे भाई हुसैन खलीफ़ा बनेंगे पर मुआविया को ये भी पसन्द नहीं आया । उसने हुसैन साहब को खिलाफ़त देने से मना कर दिया । इस दस साल की अवधि के आखिरी 6 महीने पहले मुआविया की मृत्यु हो गई । शर्त के मुताबिक मुआविया की कोई संतान खिलाफत की हकदार नहीं होगी, फ़िर भी उसका बेटा याज़िद प्रथम खलीफ़ा बन गया और इस्लाम धर्म में अपने अनुसार बुराईयाँ जेसे शराबखोरि, अय्याशी, वगरह लाना चाह्ता था। आप ने इसका विरोध किया, इस कुकर्मी शासन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए इमाम हुसैन (अस) को शहीद कर दिया गया, इसी कारण आपको इस्लाम में एक शहीद का दर्ज़ा प्राप्त है। आपकी शहादत के दिन को अशुरा (दसवाँ दिन) कहते हैं और इसकी याद में मुहर्रम (उस महीने का नाम) मनाते हैं । करबला की लडाई करबला ईराक का एक प्रमुख शहर है । करबला , इराक की राजधानी बगदाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में एक छोटा-सा कस्बा है ! यह क्षेत्र सीरियाई मरुस्थल के कोने में स्थित है । करबला शिया स्मुदाय में मक्का के बाद दूसरी सबसे प्रमुख जगह है । कई मुसलमान अपने मक्का की यात्रा के बाद करबला भी जाते हैं । इस स्थान पर इमाम हुसैन का मक़बरा भी है जहाँ सुनहले रंग की गुम्बद बहुत आकर्षक है । इसे 1801 में कुछ अधर्मी लोगो ने नष्ट भी किया था पर फ़ारस (ईरान) के लोगों द्वारा यह फ़िर से बनाया गया । यहा पर इमाम हुसैन ने अपने नाना मुहम्मद स्० के सिधान्तो की रक्षा के लिए बहुत बड़ा बलिदान दिया था । इस स्थान पर आपको और आपके लगभग पूरे परिवार और अनुयायियों को यजिद नामक व्यक्ति के आदेश पर सन् 680 (हिजरी 58) में शहीद किया गया था जो उस समय शासन करता था और इस्लाम धर्म में अपने अनुसार बुराईयाँ जेसे शराबखोरि,अय्याशी, वगरह लाना चाह्ता था। । करबला की लडा़ई मानव इतिहास कि एक बहुत ही अजीब घटना है। यह सिर्फ एक लडा़ई ही नही बल्कि जिन्दगी के सभी पहलुओ की मार्ग दर्शक भी है। इस लडा़ई की बुनियाद तो ह० मुहम्मद मुस्त्फा़ स० के देहान्त के के तुरंत बाद रखी जा चुकी थी। इमाम अली अ० का खलीफा बनना कुछ अधर्मी लोगो को पसंद नहीं था तो कई लडा़ईयाँ हुईं अली अ० को शहीद कर दिया गया, तो उनके पश्चात इमाम हसन अ० खलीफा बने उनको भी शहीद कर दिया गया। यहाँ ये बताना आवश्यक है कि, इमाम हसन को किसने और क्यों शहीद किया? असल मे अली अ० के समय मे सिफ्फीन नामक लडा़ई मे माविया ने मुँह की खाई वो खलीफा बनना चाहता था प‍र न बन सका। वो सीरिया का गवर्नर पिछ्ले खलिफाओं के कारण बना था अब वो अपनी एक बडी़ सेना तैयार कर रहा था जो इस्लाम के नही वरन उसके अपने लिये थी, नही तो उस्मान के क्त्ल के वक्त खलिफा कि मदद के लिये हुक्म के बावजूद क्यों नही भेजी गई? अब उसने वही सवाल इमाम हसन के सामने रखा या तो युद्ध या फिर अधीनता। इमाम हसन ने अधीनता स्वीकार नही की परन्तु वो मुसलमानो का खून भी नहीं बहाना चाहते थे इस कारण वो युद्ध से दूर रहे अब माविया भी किसी भी तरह सत्ता चाहता था तो इमाम हसन से सन्धि करने पर मजबूर हो गया इमाम हसन ने अपनी शर्तो पर उसको सि‍र्फ सत्ता सोंपी इन शर्तो मे से कुछ ये हैं: – 1. वो सिर्फ सत्ता के कामो तक सीमित रहेगा धर्म मे कोई हस्तक्षेप नही कर सकेगा। 2. वो अपने जीवन तक ही सत्ता मे रहेगा म‍रने से पहले किसी को उत्तराधिकारी न बना सकेगा। 3. उसके म्ररने के बाद इमाम हसन खलिफा़ होगे यदि इमाम हसन कि मृत्यु हो जाये तो इमाम हुसैन को खलिफा माना जायगा। 4. वो सिर्फ इस्लाम के कानूनों का पालन करेगा। इस प्रकार की शर्तो के द्वारा वो सिर्फ नाम मात्र का शासक रह गया, उसने अपने इस संधि को अधिक महत्व नहीं दिया इस कारण करब्ला नामक स्थान मे एक धर्म युध हुआ था जो मुहम्म्द स्० के नाती तथा अधर्मी यजीद (पुत्र माविया पुत्र अबुसुफियान पुत्र उमेय्या)के बीच हुआ जिसमे वास्त्व मे जीत इमाम हुसेन अ० की हुई प‍र जाहिरी जीत यजीद कि हुई क्योकि इमाम हुसेन अ० को व उन्के सभी साथीयो को शहीद कर दिया गया था उन्के सिर्फ् एक पुत्र अली अ० (जेनुलाबेदीन्)जो कि बिमारी के कारन युध मे भाग न ले सके थे बचे आज यजीद नाम इतना जहन से गिर चुका हे कोई मुसलमान् अपने बेटे का नाम यजीद नही रखता जबकी दुनिया मे ह्सन व हुसेन नामक अरबो मुस्ल्मान हे यजीद कि नस्लो का कुछ पता नही पर इमाम हुसेन कि औलादे जो सादात कहलाती हे जो इमाम जेनुलाबेदीन अ० से चली दुनिया भ‍र मे फेले हे इमाम हुसैन ( अस) विरोध और उसका उद्देश्य हज़रत इमाम हुसैन (अस) ने सन् ( 61) हिजरी में यज़ीद के विरूद्ध क़ियाम ( किसी के विरूद्ध उठ खड़ा होना) किया। उन्होने अपने क़ियाम के उद्देश्यों को अपने प्रवचनो में इस प्रकार स्पष्ट किया कि 1. जब शासकीय यातनाओं से तंग आकर हज़रत इमाम हुसैन (अस) मदीना छोड़ने पर मजबूर हो गये तो उन्होने अपने क़ियाम के उद्देश्यों को इस प्रकार स्पष्ट किया। कि मैं अपने व्यक्तित्व को चमकाने या सुखमय जीवन यापन करने या उपद्रव फैलाने के लिए क़ियाम नहीं कर रहा हूँ। बल्कि मैं केवल अपने नाना (पैगम्बरे इस्लाम) की उम्मत (इस्लामी समाज) में सुधार हेतु जारहा हूँ। तथा मेरा निश्चय मनुष्यों को अच्छाई की ओर बुलाना व बुराई से रोकना है। मैं अपने नाना पैगम्बर(स.) व अपने पिता इमाम अली ( अस) की सुन्नत(शैली) पर चलूँगा। 2. एक दूसरे अवसर पर कहा कि ऐ अल्लाह तू जानता है कि हम ने जो कुछ किया वह शासकीय शत्रुत या सांसारिक मोहमाया के कारण नहीं किया। बल्कि हमारा उद्देश्य यह है कि तेरे धर्म की निशानियों को यथा स्थान पर पहुँचाए। तथा तेरी प्रजा के मध्य सुधार करें ताकि तेरी प्रजा अत्याचारियों से सुरक्षित रह कर तेरे धर्म के सुन्नत व वाजिब आदेशों का पालन कर सके। 3. जब आप की भेंट हुर पुत्र यज़ीदे रिहायी की सेना से हुई तो, आपने कहा कि ऐ लोगो अगर तुम अल्लाह से डरते हो और हक़ को हक़दार के पास देखना चाहते हो तो यह कार्य अल्लसाह को प्रसन्न करने के लिए बहुत अच्छा है। ख़िलाफ़त पद के अन्य अत्याचारी व व्याभीचारी दावेदारों की अपेक्षा हम अहलेबैत सबसे अधिक अधिकारी हैं। 4. एक अन्य स्थान पर कहा कि हम अहलेबैत शासन के उन लोगों से अधिक अधिकारी हैं जो शासन कर रहे है। इन चार कथनों में जिन उद्देश्यों की और संकेत किया गया है वह इस प्रकार हैं, 1. इस्लामी समाज में सुधार। 2. जनता को अच्छे कार्य करने का उपदेश । 3. जनता को बुरे कार्यो के करने से रोकना। 4. हज़रत पैगम्बर(स.) और हज़रत इमाम अली ( अस) की सुन्नत (शैली) को किर्यान्वित करना। 5. समाज को शांति व सुरक्षा प्रदान करना। 6. अल्लाह के आदेशो के पालन हेतु भूमिका तैयार करना। यह समस्त उद्देश्य उसी समय प्राप्त हो सकते हैं जब शासन की बाग़ डोर स्वंय इमाम के हाथो में हो , जो इसके वास्तविक अधिकारी भी हैं। अतः इमाम ने स्वंय कहा भी है कि शासन हम अहलेबैत का अधिकार है न कि शासन कर रहे उन लोगों का जो अत्याचारी व व्याभीचारी हैं। इमाम हुसैन ( अस) के विरोध के परिणाम 1. बनी उमैया के वह धार्मिक षड़यन्त्र छिन्न भिन्न हो गये जिनके आधार पर उन्होंने अपनी सत्ता को शक्ति प्रदान की थी। 2. बनी उमैया के उन शासकों को लज्जित होना पडा जो सदैव इस बात के लिए तत्पर रहते थे कि इस्लाम से पूर्व के मूर्खतापूर्ण प्रबन्धो को क्रियान्वित किया जाये। 3. कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन ( अस) की शहादत से मुसलमानों के दिलों में यह चेतना जागृत हुई ; कि हमने इमाम हुसैन (अस) की सहायता न करके बहुत बड़ा पाप किया है। इस चेतना से दो चीज़े उभर कर सामने आईं एक तो यह कि इमाम की सहायता न करके जो गुनाह (पाप) किया उसका परायश्चित होना चाहिए। दूसरे यह कि जो लोग इमाम की सहायता में बाधक बने थे उनकी ओर से लोगों के दिलो में घृणा व द्वेष उत्पन्न हो गया। इस गुनाह के अनुभव की आग लोगों के दिलों में निरन्तर भड़कती चली गयी। तथा बनी उमैया से बदला लेने व अत्याचारी शासन को उखाड़ फेकने की भावना प्रबल होती गयी। अतः तव्वाबीन समूह ने अपने इसी गुनाह के परायश्चित के लिए क़ियाम किया। ताकि इमाम की हत्या का बदला ले सकें। 4. इमाम हुसैन (अस) के क़ियाम ने लोगों के अन्दर अत्याचार का विरोध करने के लिए प्राण फूँक दिये। इस प्रकार इमाम के क़ियाम व कर्बला के खून ने हर उस बाँध को तोड़ डाला जो इन्क़लाब (क्रान्ति) के मार्ग में बाधक था। 5. इमाम के क़ियाम ने जनता को यह शिक्षा दी कि कभी भी किसी के सम्मुख अपनी मानवता को न बेंचो । शैतानी ताकतों से लड़ो व इस्लामी सिद्धान्तों को क्रियान्वित करने के लिए प्रत्येक चीज़ को नयौछावर कर दो। 6. समाज के अन्दर यह नया दृष्टिकोण पैदा हुआ कि अपमान जनक जीवन से सम्मान जनक मृत्यु श्रेष्ठ है।

Jafar के द्वारा
November 29, 2013

करबला की लडा़ई मानव इतिहास कि एक बहुत ही अजीब घटना है। यह सिर्फ एक लडा़ई ही नही बल्कि जिन्दगी के सभी पहलुओ की मार्ग दर्शक भी है। इस लडा़ई की बुनियाद तो ह० मुहम्मद मुस्त्फा़ स० के देहान्त के बाशी रखी जा चुकी थी। इमाम अली अ० का खलीफा बनना कुछ अधर्मी लोगो को पसंद नहीं था तो कई लडा़ईयाँ हुईं अली अ० को शहीद कर दिया गया, तो उनके पश्चात इमाम हसन अ० खलीफा बने उनको भी शहीद कर दिया गया। यहाँ ये बताना आवश्यक है कि, इमाम हसन को किसने और क्यों शहीद किया?, असल मे अली अ० के समय मे सिफ्फीन नामक लडा़ई मे माविया ने मुँह की खाई वो खलीफा बनना चाहता था पर न बन सका। वो सीरिया का गवर्नर पिछ्ले खलिफाओं के कारण बना था अब वो अपनी एक बडी़ सेना तैयार कर रहा था जो इस्लाम के नही वरन उसके अपने लिये थी, नही तो उस्मान के क्त्ल के वक्त खलिफा कि मदद के लिये हुक्म के बावजूद क्यों नही भेजी गई? अब उसने वही सवाल इमाम हसन के सामने रखा या तो युद्ध या फिर अधीनता। इमाम हसन ने अधीनता स्वीकार नही की परन्तु वो मुसलमानो का खून भी नहीं बहाना चाहते थे इस कारण वो युद्ध से दूर रहे अब माविया भी किसी भी तरह सत्ता चाहता था तो इमाम हसन से सन्धि करने पर मजबूर हो गया इमाम हसन ने अपनी शर्तो पर उसको सिर्फ सत्ता सोंपी इन शर्तो मे से कुछ ये हैं: – वो सिर्फ सत्ता के कामो तक सीमित रहेगा धर्म मे कोई हस्तक्षेप नही कर सकेगा। वो अपने जीवन तक ही सत्ता मे रहेगा मरने से पहले किसी को उत्तराधिकारी न बना सकेगा। उसके म्ररने के बाद इमाम हसन खलिफा़ होगे यदि इमाम हसन कि मृत्यु हो जाये तो इमाम हुसैन को खलिफा माना जायगा। वो सिर्फ इस्लाम के कानूनों का पालन करेगा। इस प्रकार की शर्तो के द्वारा वो सिर्फ नाम मात्र का शासक रह गया।

Jafar के द्वारा
November 29, 2013

कर्बला का पैग़ाम | इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद से मोहर्रम केवल एक महीने का नाम नहीं रह गया बल्कि यह एक दुखद घटना का नाम है, एक सिद्धांत का नाम है और सबसे बढ़कर सत्य व असत्य, अत्याचार तथा साहस की कसौटी का नाम है। वास्तव में करबला की नींव उसी समय पड़ गई थी कि जब शैतान ने आदम से पहली बार ईर्ष्या का आभास किया था और यह प्रतिज्ञा की थी कि वह ईश्वर के बंदों को उसके मार्ग से विचलित करता रहेगा। समय आगे बढ़ता गया। विश्व के प्रत्येक स्थान पर ईश्वर के पैग़म्बर आते रहे और जनता का मार्ग दर्शन करने का प्रयास करते रहे दूसरी ओर शैतान अपने काम में लगा रहा। ईश्वर के मार्ग पर चलने वालों की संख्या भी कम नहीं थी परन्तु शैतान के शिष्य भी अत्याचार और अन्याय की विभिन्न पद्धतियों के साथ सामने आ रहे थे। जहां भी ज्ञान का प्रकाश फैलता और मानव समाज ईश्वरीय मार्ग पर चलना आरंभ करता वहीं अज्ञानता का अन्धकार फैलाकर लोगों को पथभ्रष्ट करने का शैतानी कार्य आरंभ हो जाता। एक लाख चौबीस हज़ार पैग़म्बरों को ईश्वर ने संसार में भेजा, अन्य महान पुरूष इनके अतिरिक्त थे, परन्तु देखने में यह आया कि इन पैग़म्बरों और महान पुरूषों के संसार से जाते ही उनके प्रयासों पर पानी फेरा जाने लगा। मन गढ़त बातें फैलाई गईं और वास्तविकता, धर्म और ईश्वरीय पुस्तकों में फेर- बदल किया जाने लगा। हज़रत ईसा, मूसा, दाऊद, सुलैमान, इल्यास, इद्रीस, यूसुफ़, यूनुस, इब्राहीम और न जाने कितने एसे नाम इतिहास के पन्नों पर जगमगा रहे हैं परन्तु इनके सामने विभिन्न दानव, राक्षस और शैतान के पक्षधर अपने दुषकर्मों की काली छाया के साथ उपस्थित रहे हैं। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.व.) का काल भी एसा ही काल था परन्तु इस समय संवेदनशीलता बढ़ गई थी क्योंकि यदि हज़रत मुहम्मद के पश्चात उनके लाए हुए धर्म में, जो वास्तव में अबतक के सभी पैग़म्बरों का धर्म था फेर बदल हो जाता, उसके सिद्धांतों को मिटा दिया जाता तो फिर संसार में केवल अन्याय और अत्याचार का ही बोलबाला हो जाता। ग़लत और सही, तथा अच्छे और बुरे की पहचान मिट जाती। इसलिए पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के पश्चात उनके परिवार ने आगे बढ़कर उनकी शिक्षाओं को शत्रुओं से बचाने का प्रयास आरंभ कर दिया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, अली और फ़ातेमा की गोदी में पले थे। पैग़म्बरे इस्लाम का लहू उनकी रगो में दौड़ रहा था। उनके ज्ञान, चरित्र और पारिवारिक महानता के कारण जनता उनसे अत्याधिक प्रेम करती थी। उनके विरोधी पक्ष में शैतान का प्रतिनिधि यज़ीद था। यज़ीद के पिता मोआविया ने इमाम हुसैन के बड़े भाई इमाम हसन के साथ जो एतिहासिक संधि की थी उसके अनुसार मुआविया को यह अधिकार प्राप्त नहीं था कि वह अपने उत्तराधिकारी का चयन करता। परन्तु मुआविया ने अपने जीवन के अन्तिम दिनों में पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे इमाम हसन के साथ हुई संधि को अनदेखा करते हुए यज़ीद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। यज़ीद ने ख़लीफ़ा बनते ही अन्याय पर आधारित और मानवता एवं धर्म विरोधी अपने कार्य आरंभ कर दिये। उसने शाम अर्थात सीरिया की राजधानी से मदीने में अपने राज्यपाल को तुरंत यह आदेश भेजा कि वह पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे इमाम हुसैन से कहे कि वे मेरी बैअत करें वरना उनका सिर काट कर मेरे पास भेज दो। बैअत का अर्थ होता है आज्ञापालन या समर्थन का वचन देना। इमाम हुसैन ने यह बात सुनते ही स्थिति का आंकलन कर लिया। वे पूर्णतयः समझ गए थे कि यज़ीद अपने दुष्कर्मों पर उनके द्वारा पवित्रता की मुहर और छाप लगाना चाहता है तथा एसा न होने की स्थिति में किसी भी स्थान पर उनकी हत्या कराने से नहीं चूकेगा। अतः इमाम हुसैन ने निर्णय लिया था कि जब मृत्यु को ही गले लगाना है तो फिर अत्याचार और अन्याय के प्रतीक से ऐसी टक्कर ली जाए कि वर्तमान विश्व ही नहीं आने वाले काल भी यह पाठ सीख लें कि महान आदर्शों की रक्षा कुर्बानियों के साथ कैसे की जाती है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को यह भी ज्ञात था कि उनकी शहादत के पश्चात यज़ीदी दानव यह प्रयास करेंगे कि झूठे प्रचारों द्वारा उनकी शहादत के वास्तविक कारणों को छिपा दें। यही नहीं बल्कि शहादत की घटना को ही लोगों तक पहुंचने न दे अतः अली व फ़ातेमा के सुपूत ने समस्त परिवार को अपने साथ लिया। इस परिवार में इमाम हुसैन के भाई, चचेरे भाई, भतीजे, भान्जे, पुत्र, पुत्रियां, बहनें पत्नियां और भाइयों की पत्नियां ही नहीं बल्कि परिवार से प्रेम करने वाले दास और दासियां भी सम्मिलित थे। यह कारवां ६० हिजरी क़मरी वर्ष के छठे महीने सफ़र की २८ तारीख़ को मदीने से मक्का की ओर चला था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भाई मुहम्मद बिन हनफ़िया ने ही नहीं बल्कि मदीना नगर के अनेक वरिष्ठ लोगों ने इमाम हुसैन को रोकने का प्रयास किया था परन्तु वे हरेक से यह कहते थे कि मेरा उद्देश्य, अम्रबिल मारुफ़ व नहि अनिल मुनकर है अर्थात मैं लोगों को भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने के उद्देश्य से जा रहा हूं। हुसैन जा रहे थे। पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से नगर लगभग ख़ाली होने वाला था। वे जिन लोगों को घर में छोड़े जा रहे थे उनमें पैग़म्बरे इस्लाम की बूढ़ी पत्नी हज़रत उम्मे सलमा, इमाम हुसैन के प्रिय भाई अब्बास की माता उम्मुल बनीन और इमाम हुसैन की एक बीमार सुपुत्री हज़रत फ़ातिमा सुग़रा थीं। मुहर्रम शुरू होने में अब केवल 1-२ दिन बचे हैं अज़दारों की आँखों में आंसू हैं इस्लामी नव वर्ष मुहर्रम है लेकिन कोई किसी को मुबारकबादी नहीं देता बल्कि नाम आँखों से माह ऐ मुहर्रम का इस्तेकबाल करते हैं और अपने अपने घरों में मजलिस इमाम हुसैन (अ.स) के दुःख , उनके परिवार वालों पे हुए ज़ुल्म को बनान कर के आंसू बहाते हैं | हर तरह इमाम हुसैन (अ.स) को अपना मेहमान बनाने के एहतेमाम हो रहे हैं |अज़खाने इमाम बड़ों को सजाया जा रहा है | अब यह अज़ादारी दो महीने आठ दिन तक इस्लाम पे चलने वाले करेंगे और इमाम हुसैन (अ.स) के किरदार से नसीहत लेते हुए ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए ,भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए , इंसानियत का पैगाम दुनिया को देते हुए अपना पूरा साल गुज़ार देंगे अपने उस इमाम के इंतज़ार में जो इस दुनिया में फिर से उजाला लाएगा |

    sinsera के द्वारा
    November 29, 2013

    नेट से ली गयी सामग्री थोडा एडिट कर दिया करें….इसमें लिखा है कि मुहर्रम शुरू होने वाला है, जबकि मुहर्रम माह का आधा महीना बीत चुका है..

Jafar के द्वारा
November 29, 2013

Aapko shayad pata nhi h ki aaj world me sbse tez failne wala deen islam h…aakhir kya wajah h h iske itni jaldi itna failne ki kbhi socha h…. islam pe aap koi b question uthao islam ke paas saare jawab h..or jo aap question apne block pr kr rhi ho wo aapke km ilm ki wajah se h…aap jaise 2 samjhogi ki matam h kya ya kyu h to aap samajh jaogi…hm hussain ke shia h jo un pr hue zulm ki bs kuch hi musibat apne upar lete h matam krke taaki zamane ko dikha sake ki hm musibat se nhi darrte h….or unke zulm ko yaad krte h…wo matam h churriyon ka…or hm haanth ka b matam krte h jo kisi ki musibat me kiya jata h… or jo kuch que. h aapke paas to mujhe number wise kijiye mai aapko saare jawab dene ki koshish karunga

Jafar के द्वारा
November 29, 2013

Aapko shayad pata nhi h imam hussain or unke sathiyon ko shaheed krne wale b naam k musalmaan the.. ab aap samajh jaiye ki ab jo b bekasuron ko maare wo wahi h jisne islam nhi samjha…kya aap ne kbhi ye suna h ki shio ne kbhi kisi masjid me dhamaka karwaya ho balki humesha pure world me roz shia maare jate h….or aatangwaad ka koi dharm nhi h…ye to wahi h jinke liye quran me sura e munafiqin aayi h.. ab agar aap ko islam ko or jaanna h to hindi me b quran net pe availble h…padh ligiye

Jafar के द्वारा
November 29, 2013

Or mera naam Jafar hi h जाफर

Jafar के द्वारा
November 29, 2013

Ohh to aapko itna hi showk h jaanne ka karbala k baare me to aap history padhiye islam ki.Ye jung koi choti moti jung nhi h..jise mai kuch letter type krke bata sakun…or mera sirf aapse itna hi kehna h ki aapko islam ki knowledge nhi h to phir aap beech me kyu kood rhi h. ..hm jo kr rhe h hume krne dijiye… agar jaanna h karbala ke baare me to youtube me kai videos h dekh ligiye…or hum hr saal sirf matam hi nhi krte h balki un pr hue zulm ko sunkar rote h or phir matam krte h…churi or talwar or aag pr chalna ek matam h….okkk…aap shayad nhi jaanti imam hussain ki death ke baad unki laash pe ghode run karaye gye…or unko 40 din tk kafan nhi mila…zulm ki intahan hui h karbala me isliye hm apne imam or unki shahadtat pe rote h or unke bachhon or unko 3 din tk paani nhi diya gaya… ab aapko kya bataun aapko to bs karbala bs ek choti si jung lg rhi h… plz karbala ki books b h or videos b h plz increase ur knowledge..or phir is tarah ka artical kariye to theek hoga

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    November 29, 2013

    Mohammed was an absolutely illiterate man, and the Koran, in which his sayings are collected, is ninety-nine percent rubbish. You can just open the book anywhere and read it, and you will be convinced of what I am saying. I am not saying on a certain page — anywhere. You just open the book accidentally, read the page and you will be convinced of what I am saying. Whatsoever one percent truth there is here and there in the Koran is not Mohammed’s. It is just ordinary, ancient wisdom that uneducated people collect easily — more easily than the educated people, because educated people have far better sources of information — books, libraries, universities, scholars. The uneducated, simply by hearing the old people, collect a few words of wisdom here and there. And those words are significant, because for thousands of years they have been tested and found somehow true. So it is the wisdom of the ages that is scattered here and there; otherwise, it is the most ordinary book possible in the world. Muslims have been asking me, “Why don’t you speak on the Koran? You have spoken on The Bible, on the Gita, this and that.” I could not say to them that it is all rubbish; I simply went on postponing. Even just before I went into silence, a Muslim scholar sent the latest English version of the Koran, praying me to speak on it. But now I have to say that it is all rubbish, that is why I have not spoken on it — because why unnecessarily waste time? – From Unconciousness to Consciousness Chapter 5

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 29, 2013

अद्भुत, शुभ कामनाएं, सादर

    sinsera के द्वारा
    November 29, 2013

    yatindranath ji, apki shubhkamnaon ke kamyab hone ki kamna ke sath apka dhanyvad…..

Ajay के द्वारा
November 28, 2013

Bakwas Article….. lack of knowledge

    Syed के द्वारा
    November 28, 2013

    i think u r right, she has no idea what’s she write and she don’t no about “KARBALA”

    sinsera के द्वारा
    November 28, 2013

    yes !! I agree Ajay ji.. I lack knowledge. If u have, plz throw some upon me in order to make me discerning….thanking in anticipation..

    sinsera के द्वारा
    November 29, 2013

    Mr syed, It would be more better if u share your knowledge about KARBALA to make people benefited, instead of announcing the things in which nobody is interested….

sadguruji के द्वारा
November 28, 2013

बहुत समय बाद आप ने एक बेहतरीन लेख लिखा है.आज सुबह मै दैनिक जागरण में इसका कुछ अंश पढ़ा था.इस लेख को लिखने में आप ने बहुत मेहनत की है.मेरे विचार से इस दिन अगर लोग रक्तदान करें तो वो ज्यादा अच्छा होगा.आप के लेख की ये पंक्तियाँ लेख का सार है-”मुझे दुःख होता है कि खामखा सलाखों से खुद को पीट कर ज़ख्म खा कर खून बहाने वाले, सेना में भर्ती हो कर यदि सीमा पर खून बहाएं तो शायद चीन और पाकिस्तान की नापाक देशविरोधी हरकतों पर रोक लग सके.. और सेना में नहीं तो किसी भी क्षेत्र में सकारात्मक कार्य करने के लिए अपनी ऊर्जा को बचा कर रखें,” एक अच्छे लेख के लिए बधाई.

    sinsera के द्वारा
    November 28, 2013

    आदरणीय सद्गुरुजी, नमस्कार, कीमती समय देने और लेख की भावना को पसंद करने के लिए आभार…

    November 29, 2013

    महोदय, सेना में भरती होना बच्चों का खेल है क्या? आपको कोई ढंग का कार्य नहीं सुझाता है क्या? आप तो सद्गुरु है बैठे-बैठे कोई मंत्र मारिये सभी लोग एक-दुसरे से प्रेम करने लगे……………ख़ामोखा ठंडी में देशों को लड़ाकर क्यों जान लेना चाहते हैं…………आप बड़े हो गए है कुत्ते-बिल्लियों का खेल क्यों खेल रहे हैं. आपके विचारों को सुनकर मेरा बचपन याद रहा है जब मैं ५ या ६ वर्ष का हुआ करता था. तब कुत्तों के दो बच्चों का गर्दन पकड़कर उनके मुंह एक-दुसरे से लड़ाकर छोड़ दिया करता और वो एक दुसरे पर टूट जाया करते थे जिसे देखकर मैं बहुत मजा लेता था. ऐसी कुछ हरकत आपकी भी लग रही है………..

    November 29, 2013

    और ये आप क्या कह रहे हैं? बहुत समय बाद…………….क्या मतलब इससे पहले यह बेहतरीन नहीं लिखती थी.

Jafar के द्वारा
November 28, 2013

Karbala ki jung k aage sbhi jung choti h….aapko koi b gyan nhi h…hm aur apne imam ke gum ko taaza banaye hue h matam krke…aapki tarah nhi sirf 26/11 ko mumbai humle me marne walon ko yaad krte h..hm log hr khushi me imam hussain ko yaad krte h.. jinhone burai k aage sir de diya lekin sir jhukaya nhi… Ya Hussain plz pahele puri history padhiye islam ki….

    ajay के द्वारा
    November 28, 2013

    well sais…

    sinsera के द्वारा
    November 28, 2013

    ज़फर जी, कौन सी जंग छोटी है और कौन बड़ी , ये साबित करने वाला तराज़ू कहाँ होगा..मेरा तो ये मानना है कि जिस जंग में निर्दोषों ने अपनी जान गंवाई, उसका मास्टर माइंड कोई ईमान वाला व्यक्ति नहीं हो सकता… इमाम हुसैन और उनके साथियों ने बुराई के आगे जो लड़ाई लड़ी और क़ुरबानी दी वो इतनी छोटी नहीं कि उसको ज़िंदा या ताज़ा रखने के लिए सड़कों पर मातम का तमाशा करने की ज़रूरत हो….वो महान लोग थे , उनकी क़ुरबानी किसी के सहारे की मुहताज नहीं है..आप खामखा अपने सर सेहरा ले रहे हो कि हम ताज़ा किये हुए हैं….ताज़ा ही करना है तो अपने सही नाम और फोटो के साथ ओपन ब्लॉग बना कर कर्बला की पूरी हिस्ट्री लिखिए…ताकि सभी जान सकें ..अपने सच कहा कि आधी अधूरी जानकारी ठीक नहीं होती…..वैसे आप का नाम , जहाँ तक मुझे लगता है”Zafar” होना चाहिए , न कि “jafar ” ….आपका ब्लॉग सर्च करने पर नहीं मिला..आप छुपते क्यूँ हैं??किसी से डरते हैं क्या???सामने आइये और खुल कर अपनी बात कहिये..यहाँ कोई हिन्दू-मुस्लिम दंगा थोड़ी होने वाला है…

    sinsera के द्वारा
    November 28, 2013

    अजय जी..आपकी भाषा/व्याकरण समझ में नहीं आया….कृपया स्पष्ट लिखिए….

    November 29, 2013

    ज़फर जी…………………! यदि वास्तव में कर्बला में हुई कुर्बानियों से कोई सबक लिया होता तो आये दिन हज़ारों की संख्या में लोग नहीं मारे जाते. यदि मानव इतिहास में हुई भूलों और नरसंहारों का सबकों अफ़सोस है…………..तो फिर आये दिन उन हादसों को दोहराया क्यों जाता है? यह पुरे मानव समाज का दुर्भाग्य है कि हम अपने इतिहास से कोई सबक नहीं लिए ……इससे तो बेहतर होता कि हम अपने क्रिया-कलापों का अध्ययन किये होते…………..

Jafar के द्वारा
November 28, 2013

Aapko koi ilm nhi h islam k baare me.karbala ki jung ke barabar koi jung nhi h…ye pura world maanta h yahan tk ki humare gaandhi ji ne bhi kaha h..or premchand ne b ispr ek book likhi h..or imam hussain humare nabi mohammad s.a.w.w ke nawase the.or unhone jung apne liye nhi ki balki islam ko bachane k liye ki…u have no idea ki aap kya bol rhi h..and plz dubara bina kuch jaane na boliyega… pahele history janiye phir baat. aise to hindu b ajeeb se festival banate h kbhi apni body k aar paar sui daalte h wo b bewajah…

    sinsera के द्वारा
    November 28, 2013

    ज़फर जी, नमस्कार, आपका स्वागत है लेकिन आप ने ध्यान से लेख पढ़ा नहीं शायद..मैं ने भी कर्बला के युद्ध को अति दारुण बताया है, गैर मुस्लिम भी सुन कर रोते हैं, ऐसा लिखा है…इमाम हुसैन हज़रत मुहम्मद (स अ व ) के नवासे हैं ये मुझे भी मालूम है और मैं ने लिखा भी है..अगर मैं ने उनकी शान में कोई बेअदबी की हो या कुछ गलत लिखा हो तो प्लीज़ बताइये….मैं भी जानने के लिए उत्सुक हूँ कि आखिर इस ख़ूनी परंपरा का क्या औचित्य है… ये लेख लिखने का यही मकसद है..हाँ, बॉडी के आर पार सुई डालने का कोई त्यौहार होता है, ऐसा मुझे नहीं पता..कुछ पिछड़े जाहिल आदिवासी इलाकों में शायद ऐसा कुछ होता होगा पर उनको बानगी मानना तो खुद को जाहिल साबित करना ही होगा…

    November 29, 2013

    जिन्हें इल्म है…………….इस्लाम के बारे में या किसी अन्य धर्म के बारे में………………..उसे देखकर बुद्धिमानों को रोना आता……………..लगभग पूरी की पूरी मानव जाति ने मजहब और धर्म के नाम पर मानवता को शर्मसार किया है …………………………………..

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
November 27, 2013

सार्थक पोस्ट .आभार

    sinsera के द्वारा
    November 28, 2013

    धन्यवाद शिखा जी.. :-)

nishamittal के द्वारा
November 27, 2013

सरिता जी ,आपका पोस्ट देखा ,अपना विचार इसलिए नहीं दे सकती क्योंकि इस विषय में मुझको कोई गहन जानकारी नहीं क्षमा चाहती हूँ

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    November 27, 2013

    विचार देने के लिए गहन जानकारी की नहीं साफ़ दृष्टि की ज़रुरत होती है, बच्चों जैसी शुद्ध बोध चाहिए होता है, सरिता जी ने आंखन देखि कहा है, कोई राजनितिक कारणों से उन्होंने ये प्रश्न नहीं उठाया है…’गहन जानकारी लोगों को होशियार और राजनितिक बनता है, और राजनितिक लोग अक्सर ‘क्षमा मांग कर निकल जाते हैं’

    sinsera के द्वारा
    November 27, 2013

    आदरणीय निशाजी, नमस्कार..बहुत दिनों बाद आपको यहाँ देख कर बहुत अच्छा लगा…गहन क्या , मुझे तो बिकुल भी जानकारी नहीं है, नोहे सुने हैं पर याद थोड़ी रहते हैं, नेट से लिया है और मुहर्रम का मातम तो सड़कों पर सभी देखते हैं, आपने भी देखा होगा…ये खामखा का खून खच्चर कहीं अच्छा लगता है क्या…

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
November 26, 2013

हमें दूसरों का घाव तो दिख जाता है लेकिन अपना नहीं दीखता, हमारी दृष्टि दूसरों पर तो खुलती है लेकिन खुद को कभी नहीं देख पाती है…, हिंदुओं को ये तो दिख जाता है कि इस्लाम धर्म में, यहूदियों में, जैन धर्म में, ईसाईयों में क्या-क्या पागलपन है, लेकिन हिन्दू धर्म में कितना पगापन ये कभी नहीं दीखता…! पहली बात कोई भी परंपरा नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होता, जीवन बहुत जटिल है जो आपको नकारात्मक दिख रहा है किसी के लिए सकारात्मक ज़रूर होगा…| दूसरी बात मुक्ति का मतलब होता है सभी प्रकार के बंधनो से मुक्त होता…बीमारी बीमारी होती है, बिमारिओं को अच्छी बुरी कहना खुद को भुलावे में रखना होगा, या तो परम्परा मात्र को छोड़ दिया जाये या जो जैसा है उसे वैसा चलने दिया जाय, ये कहना कि तुम्हारी परंपरा गलत है, नकारात्मक है मेरी सही है राजनीती है, होशियारी है…धोखा है…!! मैं इसका पक्षधर नहीं हूँ…!! ज़ंजीर सोने के हों या लोहे का इससे कुछ ज्यादा भेद नहीं पड़ता, अच्छा हो कि ज़ंजीर लोहे का हो, मुक्त होना असना होगा, सोने के ज़ंजीर से कौन मुक्त होना चाहता है…??? मैं सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के पगापन के विरोध में हूँ… यहाँ ये स्पष्ट नहीं कर रहा हूँ कि अगर इस्लाम में ये गलत है तो हिन्दू में भी ये गलत है, न तो मुझे इस्लाम से कोई राग है न ही हिंदुओं से कोई द्वेष…मेरे देखे दोनों गलत हैं, दोनों में पगापन मौज़ूद है… हिंदुओं के पगापना का कोई अंत नहीं है… हज़ारों साल पहले शुरू हुई बेहूदगी आज भी ज़ारी है…!!! हमारे माकन शीशे के हैं…पत्थर फेकने की गलती हमें मंहगी पड़ सकती है..!!

    sinsera के द्वारा
    November 26, 2013

    मान्यवर, यहाँ मैं ने हिन्दू या मुस्लिम कि तो कोई चर्चा नहीं उठाई, केवल एक ऐसी परंपरा पर प्रश्नचिन्ह उठाया है जिसका कोई औचित्य फ़िलहाल मुझे समझ नहीं आता..हो सकता है यहाँ चर्चा करने से कोई सकारात्मक कारण ही पता चल जाये..मैं हिन्दू-मुस्लिम के प्रति पक्षपात तो कभी नहीं रखती …गलत परम्पराएं तो हर धर्म में हैं, जिनका कोई तुक नहीं है, लेकिन खून बहा कर बर्बाद करने का तो दूर दूर तक कोई मतलब समझ नहीं आता…आप डॉ रही मासूम रज़ा का उपन्यास “आधा गाँव ” कभी पढ़िए ..वो खुद एक शिया मुस्लिम थे , आपने उपन्यास में उन्होंने एक शिया बाहुल्य गाँव के बारे में लिखा है कि कैसे वहाँ के लोग मुहर्रम में मातम की नौटंकी किया करते थे…लोग हंसी मज़ाक करते थे फिर हंसी आने पर कहते थे कि “अरे चुप रहो, हंसो मत क्योंकि आज मुहर्रम की दसवीं तारीख है….” वो शिया हो कर इस बात को ज़रूर समझते होंगे कि शायद ये मातम एक परंपरा होने के कारण मज़बूरी में किया जाता है..हम आप खैर क्या जानें….मुझे सिर्फ रक्त की बर्बादी से गुरेज़ है, इससे अच्छा तो इस तिथि पे लोग रक्तदान करें, कि वो किसी मरते हुए को जीवन दान दे सके…

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    November 27, 2013

    आपने चर्चा नहीं की है हिन्दू मुस्लमान की लेकिन चोट तो किया है न आपने इस्लाम पर…??? अगर आपको लगता है कि सकारात्मक कारण पता लग जाने से ये परम्परा ठीक हो जायेगा तो मैं आपको दस बीस सकारात्मक कारण दे सकता हूँ…. आप कही रही हैं कि हर धर्म में गलत परम्पराए होती है… लेकिन जहाँ तक मुझे समझ में आता है, ‘धर्म खुद एक गलत परम्परा है’ जहाँ तक मुझे पता ठीक ऐसी ही परम्परा हिंदुओं में भी है ‘भगत खेलना’ यहाँ भी खून बहता है, ईसाइयत में भी है ‘ईसाई फ़कीर खुद को सूली पर लटकते हैं, वहाँ भी खून बहता है, और ऐसा बौद्ध धर्म में भी ‘बुद्ध भिक्षु आग पर चलते हैं’…| जैसे हिंदुओं ने अपने सब पागलपन के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण खोज लिया है उसी प्रकार बांकी के धर्म के लोगों ने भी किया…किसी भी कृत्य का औचित्य स्थापित किया जा सकता है, उसको ठीक ठहराया जा सकता है…हमारी चालाकियों का हिसाब नहीं है…!!! जब तक आदमी के चेतना का विकास नहीं होता है वो एक पागलपन को छोड़ कर दूसरे को पकड़ लेता है, तथाकथित शिक्षित लोग यही करते हैं, पुरानी परम्पराओं को छोड़ कर के नए ढंग का पागलपन शुरू कर देते हैं…’रक्त दान’ नय ढंग का पागलपन है…पुराना हम से दूर होता है इसीलिए दिख जाता है, लेकिन नए के हम इतने करीब होते हैं, उससे इतना जुड़े होते हैं कि हमें उसका पागलपन नहीं दीखता है…!!!

    sinsera के द्वारा
    November 27, 2013

    बात का रुख कैसे भी मोड़ा जा सकता है…मैं ने कहा युवा वर्ग की शक्ति , ऊर्जा , लहू बेवजह पागलपन में बह न जाये और अपने उसे हिन्दू, मुस्लिम सिख, ईसाई से जोड़ दिया…पागलपन भी कई प्रकार के होते हैं..पर बेसिकली दिमाग ख़राब होना ही चाहिए….कुछ पागलपन किसी अच्छे काम की तरफ ले जाते हैं जैसे किसी काम को करने की लगन अगर पागलपन की हद तक हो तो कोई अविष्कार हो जाता है, लेकिन अगर दिमाग काम करना ही बंद कर दे तो वो पागलपन की ओर ले जाता है….फिर वो पागलपन किस ओर ले जाये ये समय बताता है…..फ़िलहाल बात पागलपन की नहीं है, और न ही हिन्दू मुस्लिम दंगों की….कोई बात अगर गलत है तो उसका विरोध होना चाहिए….

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    November 28, 2013

    गलत बात का विरोध बिलकुल नहीं होना चाहिए…विरोध करने से गलत को बल मिलता है..न कि वो समाप्त या बदल जाता है…सही का समर्थन होना चाहिए, दृष्टि हमेशा सही पर रहनी चाहिए, जिसपर हम ध्यान देते हैं वो बढ़ने लगता है, चाहे वो गलत हो या सही, इतनी बड़ी दुनियां में आपको ‘गलत बातें ही क्यों मिलती है…??’ विरोध करना विस्क्षिप्त है, दूसरों का विरोध कर के हम अपने अहंकार की पुष्टि करते हैं और कुछ नहीं…मैं अगर किसी चीज़ के विरोध में हूँ तो वो है ‘विरोध’ करने की ‘प्रविर्ती’…!! ये जीवन जीने का विधेयक ढंग नहीं है…मैं किसी देश के बारे में पढ़ रहा था वहाँ ‘नकारात्मक खबर’ को अख़बार में न के बराबर जगह मिलती है, वो भी आखरी पृष्टों पर…शुरू के पृष्ट सकारात्मक ख़बरों से पटे पड़े होते हैं…वहाँ अपराध न के बराबर है…!! प्रेम की गीत गाये जाने चाहिए,,, अन्धकार से लड़ने की ज़रुरत नहीं है, प्रकाश को लाना है… विधेयक दृष्टिकोण अपनाने की ज़रुरत है…!!

    sinsera के द्वारा
    November 28, 2013

    thik  hai , virodh  nahi  karte , par charcha to kar sakte hain na….pichhle panne par hi sahi par nakaratmakta hai to ……bina usko jagah diye sakaratmakta ko pahla panna kaise mil sakta hai….ham insan abhi tak polio ko eradicate to kar nahi paye to mansik viklangta ko kya eradicate karenge……vo sirf isliye ki kuch log bachcho ko polio vaccination vale din chhupa dete hain …unko lagt ahai ki ye dharm virodhi hai……fir hota kya hai ki ek bhi virus chhut jata hai to bimari vahi ki vahi rah jati hai , sari mehnat bekar ho jati hai…..vaise hi dharmik unmad hai….jab tak aap bat ki jad ko nahi samjhenge tab tak aise hi tu-tu-mai-mai chalti rahegi…(network kamzor ho gaya hai….sorry)

    Jafar के द्वारा
    November 29, 2013

    Or jo kai log kehte h ki quran ko bakri ya murgi kha gyi h wo sara sar galat h jis deen ki allah ne quran me hifazat ki zimmedari li h us islam ke base quran ko kon bhala km kr skta h….or quran pura mukkammal h…or agar quran half hota to humare mola ali isko pura krte

Navaneeta srivastava के द्वारा
November 26, 2013

हकीकत में तो अपने कम ज्ञान की वजह से कइ शब्दों का अर्थ समझ में ही नही आया़़़़़ पर अाशय एवं भाव बिल्कुल स्पष्ट और सोचने को विवश करते हैैं। उत्तम विचारशील लेख़़़़ । 

    sinsera के द्वारा
    November 26, 2013

    प्रिय नवनीता, अबू धाबी के मेहमान को हमारी तरफ से शत शत स्वागतम…आज आपको यहाँ देख के कितना अच्छा लग रहा है मैं बता नहीं सकती..शब्दों के अर्थ समझना ज़रूरी भी नहीं है, जब भावनाएं काम करती हों तो शब्दों का क्या काम…आपका कमेंट ही आपके सुलेखन का संकेत दे रहा है…हम आशा करते हैं कि जल्दी ही आपके द्वारा लिखा हुआ कोई अच्छा सा आर्टिकल हमें पढ़ने को मिलेगा…यहाँ तक आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद…

Sonam Saini के द्वारा
November 26, 2013

आखिर क्यों क्यों क्यों, आखिर क्यों क्यों क्यों, आखिर क्यों क्यों क्यों, आखिर क्यों क्यों क्यों, आखिर क्यों क्यों क्यों, आखिर क्यों क्यों क्यों, क्यों क्यों क्यों क्यों ………..???????????????? हर सवाल का जवाब खुदा ने बनाया नही, या ऐसा हो कि हर जवाब खुदा को आया नही, कोशिश तो की होगी इंसान को सब समझने की, पर क्या करे इंसान की छोटी सी खोपड़ी में जब सब समाया नही ……………. Good Luck….. :)

    sinsera के द्वारा
    November 26, 2013

    सही बात कही सोनम.. Good Luck….. :) के लिए thanx..और कीमती समय व प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद…

    November 29, 2013

    जी, सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह सवाल-जवाब ही खुदा का नहीं है. यह सवाल भी अपना है और जवाब भी……………….जब खुदा को हम बनाये है तो वो क्या ख़ाक बनाएगा हमारे जवाबों…………..छोड़िये इन सब बातों को. बात बढती जायेगी और यदि बात बढ़ी तो फिर ये काली मैया तो मुझे नहीं छोड़ने वाली…………….तो आइये एक शेर सुनाता हूँ…………………. यहाँ खुदा, वहाँ खुदा, वाह…..वाह……………तो मेरा कहना है, यहाँ खुदा वहाँ, इधर खुदा, उधर खुदा , ऊपर खुदा, निचे खुदा, और जहाँ नहीं खुदा वहाँ खुद देंगें…………… हाँ……….हाँ…………….हाँ……………ओह माय गॉड …………….अब चलते हैं वरना हसंते-हसंते पेट फट जाएगा.

    Sonam Saini के द्वारा
    November 29, 2013

    नमस्कार अनिल सर जी …………………..मुझे लगता है कि आप लोग खुद को एक दूसरे से ऊँचा और ज्ञानी साबित करने के चक्कर में जो वास्तव में सच्चाई है उसी से दूर होते जा रहे हैं ! कृपया बचपने से बाहर निकलिए और जैसा कि मिसेज सिन्हा कहती हैं कुछ सकारात्मक कार्य करिये ………….. भगवान आपको सदबुद्धि दे …………

    November 29, 2013

    सुस्वागतम! आप लोग का मतलब नहीं समझा क्योंकि सम्बोधन में सिर्फ आपने मेरा नाम उपयोग किया है. मेरे सिवा वे कौन लोग है जिनके सामने आप अपनी बात रख रही हैं? खुद को ऊँचा या फिर ज्ञानी साबित करना सच में या तो बचपन है या मूर्खता और इन सबसे बहुत दूर ही रहना ठीक है. परन्तु इसका मतलब यह नहीं की मैं मुर्ख हूँ क्योंकि यह भी मूर्खता या बचपन है. अब आप पूछेंगी कि मैं हूँ क्या? और जो मैं हूँ उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता. अतः जो व्यक्त नहीं किया जा सकता उसके बारे में कहना भी एक मूर्खता ही है या फिर बचपन है. शायद अब मेरी बातों से आप कन्फ्यूज़ हो रही हैं. अतः यह सब फालतू के सवाल क्यों उठा रहीं है. जो टॉपिक चल रहा है उस पर चलिए या फिर चुप. भगवान् सद्बुद्धि देता है. यह कहना मूर्खता ही है. आपका कहने का मतलब कहीं वो व्यापारी तो नहीं या फिर बुद्धि बाटंने वाला तो नहीं तो आप हमें बताये वह कहाँ है उससे मैं खरीद लूंगा या फिर मांग लूंगा जो भी सहज हो. सकारात्मकता करने में नहीं होता क्योंकि जब भी हम करने जायेंगे तो साथ में यह भी दिमाग में रहेगा कि नकारात्मक न हो जाए तो फिर यह काम सतारात्मक नहीं हो सकता. अतः सकारात्मकता होने में होती है न की करने में……………

    Sonam Saini के द्वारा
    November 29, 2013

    देखिये सर मैंने तो बात सिर्फ आप ही के सामने रखी है अब आप इसे किसी और को फॉरवर्ड करना चाहते हैं तो इसमें मैं कुछ नही कर सकती हूँ और रही बात बुद्धि खरीदने की या मांगने की तो वो आपके बस की बात नही अगर होती तो यूँ निरर्थक सवाल न करते और अंत में “डर” दिमाग में कभी होता ही नही है वो तो दिल में होता है ….इसीलिए अगर सकारात्मक करने की सोचोगे तो निश्चित ही सकारात्मक होगा ………

    November 29, 2013

    आप द्वारा…………….यह मुझे नई बात पता चली कि दिल में डर होता है……………………नहीं तो यह मेरा अपना अनुभव है किया डर दिमाग से उपजता है. यह अलग बात है कि उसका असर दिल तक होता है………………..तो आपका कहना का मतलब यह तो नहीं कि भगवान् रिश्वत खोर है वो सिर्फ आपकी सुनते है. अतः आपने मेरे लिए उनसे मनोकामना कर रही है कि” ………….. भगवान आपको सदबुद्धि दे ………” तो आपसे यह कहना चाहूंगा कि खैरात में मिले ज्ञान से इंकार करता हूँ.इसे अपने पास रखिये वैसे भी फिजूल की चीजों को रखने के लिए मेरे पास खाली दिमाग नहीं है…………….

    sinsera के द्वारा
    November 29, 2013

    हा हा हा हा हा… :-) :-) उधर भी एक जंग…इधर भी एक जंग…

    November 30, 2013

    जिसका डर था वही हुआ…………….अच्छा तो हम चलते हैं…………..

Rachna Varma के द्वारा
November 26, 2013

सरिता जी दरअसल आगे बढ़ने का नाम ही जिंदगी है आज मुम्बई ब्लास्ट की पांचवी तिथि है , जिस तरह से मुम्बई कराह रही थी कुछ सिरफिरे या यूँ कहिये उन भटके और गुमराह नौजवानो के कारनामो के कारण कि उसे याद करके आज भी रूह कांपती है मगर इसका यह मतलब तो नहीं कि हम डर कर जिंदगी जीना ही छोड़ दे आपने बहुत बढ़िया लिखा है अतीत से सबक ले वर्तमान को संवारे बस यही कोशिश होनी चाहिए |

    sinsera के द्वारा
    November 26, 2013

    रचनाजी, नमस्कार, बहुत दिनों बाद दर्शन दिए, अच्छा लगा..मेरा कहने का यही मतलब है कि अतीत की दुखद घटनाओं से सबक ले कर उस से वर्त्तमान को संवारना चाहिए..ताकि शहीदों की क़ुरबानी व्यर्थ न जाये…26 /11 के शहीदों को हार्दिक नमन ..

lalitpratapchhapar के द्वारा
November 26, 2013

समाज को आईना दिखता एक सुन्दर आलेख| इस पोस्ट के लिए हार्दिक आभार…

    sinsera के द्वारा
    November 26, 2013

    ललित जी, समय देने के लिए आपका हार्दिक आभार..

sumit के द्वारा
November 25, 2013

गुरु जी, वाकिये ये पोस्ट तारीफ-ए-काबिल है, दो लाइन मेरी तरफ से – दिखावे के लिए गम न हो, गम हो तो रूह से दिल तलाक हो होंठ सिये रहे सुबह तक, गम तब तक है मेरा गम जब तक आंसुओ की बरसात न हो

    sinsera के द्वारा
    November 26, 2013

    सुमित जी, एक करेक्शन….तारीफ-ए-काबिल नहीं, काबिल-ए-तारीफ…पहले भी बताया था…सबक ठीक से याद किया करें..टाइपिंग की गलती माफ़ है , शेष, समय देने के लिए धन्यवाद..

    November 29, 2013

    वाह……………..वाह……………………….वाह……………..वाह……………………….

deepakbijnory के द्वारा
November 25, 2013

BAHUT KHOOB SUNDER LEKHAN

    sinsera के द्वारा
    November 26, 2013

    आपका धन्यवाद दीपक जी..

sanjay kumar garg के द्वारा
November 25, 2013

सिंसरा जी, बढ़िया लिखा है, बधाई!

    के द्वारा
    November 25, 2013

    आप कॊ कब से महान हॊने का रोग लग गया -  रिकूं लखनऊ

    sinsera के द्वारा
    November 25, 2013

    इसमें महान बनने की क्या बात है रिंकू लखनऊ जी…

    sinsera के द्वारा
    November 26, 2013

    कीमती समय व प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद संजय जी..


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