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हिंदी गर्व की भाषा है.....Contest

Posted On: 16 Sep, 2013 Contest में

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आइये हम एक घिसे पिटे वाक्य के साथ अपनी बात शुरू करें..
“हिंदी हमारी मातृभाषा है और हमें इस पर गर्व है.”


ये एक ऐसी ही शपथ है जैसे लीडर संसद में पद और गोपनीयता की शपथ लेते हैं , डॉक्टर मरीजों की निस्वार्थ सेवा के लिए हिपोक्रेटिक शपथ लेते हैं, या विवाह के समय पति/पत्नी निष्ठा की शपथ लेते हैं.

जिस समय यह वचन मुंह से निकलते हैं, मन में अथाह गर्वमिश्रित स्वाभिमान हिलोरें लेता रहता है, परन्तु कालांतर में ये भावनाएं कहीं धूमिल पड़ जाती हैं.
इसी प्रकार कहने को तो हम भारतवासी अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए सम्मान प्रदर्शित करते तो हैं परन्तु अंग्रेजी के प्रति एक अजीब सा आकर्षण रहता है. कह नहीं सकते कि ये चोर भाव मन में कहाँ से उपजता है.

अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुए हमें 67 वर्ष बीत गए लेकिन हम अभी तक खुद को स्वत्व का सम्मान करना नहीं सिखा पाए.

वास्तव में पहले अंग्रेजी शिक्षण महंगे पब्लिक स्कूलों में ही उपलब्ध होने के कारण केवल अभिजात्य वर्ग के बच्चे ही इन स्कूलों में प्रवेश ले पाते थे . नए नए आजाद हुए देश में व्यक्ति के सामने जीविका बहुत बड़ी समस्या थी . ऐसे में सामान्य व्यक्ति के लिए ऐसे स्कूलों में अपने बच्चो को पढ़ाना किसी मृगमरीचिका से कम न था. शायद उसी समय से अंग्रेज़ीभाषी भारतीय उच्चवर्गीय समझा जाने लगा.अंग्रेजी बोलने का कान्वेंटी लहजा ही हिंदीभाषियों के मन में हीनता के भाव उपजाने के लिए काफी होता है


अपनी भाषा को हीन समझना हमारी अपनी कमतर सोच है.

हिंदी एक समृद्ध भाषा है. यही विश्व की एकमात्र ऐसी भाषा है जिसमे व्यंजन को बिना किसी अन्य व्यंजन या स्वर की सहायता से उसके वास्तविक उच्चारण के रूप में बोला जाता है . साथ ही हिंदी भाषा का व्याकरण भी वैज्ञानिक होने के कारण उसे समझना आसान है .

अंग्रेजी भाषा का व्याकरण सधे हुए नियमों पर आधारित नहीं है. वहाँ “BUT ” अगर बट होता है तो “PUT” अकारण ही पुट हो जाता है. वचन और लिंग सम्बन्धी नियम भी बहुत स्पष्ट नहीं हैं और कई नियमों के अपवाद भी होते हैं . फिर भी अंग्रेजी भाषा के लिए हम घोषित हिन्दीभाषी अत्यधिक लालायित रहते हैं.


वास्तव में हिंदी को स्वतन्त्र भारत की राजभाषा घोषित करते समय ही उसके साथ लापरवाही की गयी.

संविधान निर्माताओं ने संविधान के निर्माण के समय राजभाषा विषय पर विचार-विमर्श करके यह निर्णय लिया कि देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूंप में अंगीकृत किया जाए । इसी आधार पर संविधान के अनुच्छेद 343(1) में हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया। किन्तु, संविधान के निर्माण के समय यह परिकल्पना की गई थी कि संघ के कार्यकारी, न्यायिक और वैधानिक प्रयोजनों के लिए 1965 (15 वर्षों ) तक अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहे.


दरअसल समिति में शामिल कुछ दक्षिण -भारतीय सदस्यों ने अपने क्षेत्र वासियों के हिंदी का अल्प ज्ञान होने को मद्देनज़र रखते हुए ऐसे प्रावधान की मांग की थी. ताकि इन 15 वर्षों में हिंदी भाषा ,अहिंदी भाषी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों द्वारा व्यापक रूंप से स्वीकार किए जाने की क्षमता प्राप्त कर सके।


बस यहीं चूक हो गयी.


यह एक कटु सत्य है कि हम भारतवासी सदियों से गुलामी में रहते रहते आजाद होने के बाद भी मानसिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है. जब तक कोई कानून कड़ाई से लागू न किया जाये तब तक आम तौर पर भारतवासी उसका पालन नहीं करते हैं.(इस कथन की सत्यता 1975 में आपातकाल के दौरान देश के सुचारू परिचालन से सिद्ध होती है . )


वैसे भी नियम बना कर पालन करवाना अलग बात है और मन में सम्मान रखना अलग..


जब तक एक एक भारतवासी स्वयं अपनी राजभाषा हिंदी को आदरणीय स्थान नहीं देगा तब तक डंडा मार कर हिंदी को सम्मान नहीं दिलाया जा सकता.


हमारे देश में लोग अपनी आंचलिक बोली को तो बहुत प्रेम करते हैं. किसी भी राज्य या क्षेत्र विशेष के लोग जब कहीं मिलते हैं तो बहुत ही अपनत्व के साथ अपनी आंचलिक भाषा में बात करते हैं परन्तु यही प्रेम व सम्मान हिंदी के लिए क्यों नहीं जगता , ये बात समझ से परे है.


सोचने वाली बात है कि वैश्वीकरण के इस युग में कोई भारतवासी अपनी प्रतिभा के बलबूते पर सुदूर विदेश में यदि अपने देश का प्रतिनिधित्व करने जायेगा तो वहाँ उससे आंचलिक बोली (dialect ) के बजाय राष्ट्रभाषा हिंदी बोलने की अपेक्षा की जाएगी.


1893 में , भारत अंग्रेजी दासता की बेड़ियों में जकड़ा था. फिर भी युगपुरुष स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो सम्मलेन में अपार जनसमूह को हिंदी में “भाइयों और बहनों ” कहने का साहस कर दिखाया. ये अपनी भाषा के प्रति मान ही था जिसने उन्हें ये निर्भयता प्रदान की.लेकिन आज जब हम हर प्रकार से समृद्ध हो चुके हैं तो भी अपने ऊपर गर्व करने का साहस क्यूँ नहीं कर पाते.


वैसे भी हंसने बोलने के लिए मित्रों के जमावड़े (अन्य भाषाओँ ) की आवश्यकता भले ही हो लेकिन रोने के लिए तो माँ के आंचल (मातृभाषा ) की ही याद आती है.


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27 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
October 12, 2013

आदरणीया सरिता सिन्हा जी बोग मित्र चुने जाने पर बधाई.

    sinsera के द्वारा
    October 12, 2013

    आदरणीय सद्गुरुजी, नमस्कार, बधाई देने के लिए आपका धन्यवाद..

sumit के द्वारा
September 23, 2013

आपकी लेखन सैली तारीफ-इ-काबिल है …. सुंदर पोस्ट

    sinsera के द्वारा
    September 25, 2013

    आपका धन्यवाद..

    sinsera के द्वारा
    September 26, 2013

    इसको ” तारीफ-इ-काबिल ” नहीं, बल्कि “काबिल-ए-तारीफ ” कहते हैं…

neena के द्वारा
September 22, 2013

बहुत सधी और बेवाक रचना .बधाई हो

    sinsera के द्वारा
    September 25, 2013

    आपका स्वागत है, प्रतिक्रिया के लिए आभार..

    sinsera के द्वारा
    September 26, 2013

    नीना जी आपकी किसी भी पोस्ट पर कमेन्ट नहीं हो पा रहा है, आपने निस्संदेह अच्छा लिखा है..

yogi sarswat के द्वारा
September 20, 2013

1893 में , भारत अंग्रेजी दासता की बेड़ियों में जकड़ा था. फिर भी युगपुरुष स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो सम्मलेन में अपार जनसमूह को हिंदी में “भाइयों और बहनों ” कहने का साहस कर दिखाया. ये अपनी भाषा के प्रति मान ही था जिसने उन्हें ये निर्भयता प्रदान की.लेकिन आज जब हम हर प्रकार से समृद्ध हो चुके हैं तो भी अपने ऊपर गर्व करने का साहस क्यूँ नहीं कर पाते.! गर्व तो है हमें ! हमें हर उस चीज पर गर्व है जो हमारी अपनी नहीं है या जो कभी हमारी अपनी नहीं रही ! कल को अगर हिंदी अमेरिका से आयातित होकर आने लगे तो हमें गर्व होने लगेगा ! बहुत सटीक और स्पष्ट शब्दों ( जैसी आपकी लेखन शैली है ) में बेहतरीन लेख आदरणीय सरिता सिन्हा जी !

    sinsera के द्वारा
    September 20, 2013

    योगी जी नमस्कार, मेरे शब्दों को सम्मति देने के लिए धन्यवाद..

Bhagwan Babu 'Shajar' के द्वारा
September 20, 2013

हिन्दी का वैज्ञानिक विश्लेषण करके सच में ही आपने हिन्दी को गौरवांवित किया है… धन्यवाद…

    sinsera के द्वारा
    September 20, 2013

    भगवान बाबू जी , सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
September 19, 2013

“हिंदी ‘हमारी’ मातृभाषा है और हमें इस पर गर्व है.”- this is the problem, ‘हमारा-देश’, ‘हमारी-भाषा’, ‘हमारा-धर्म’, हमारा and हमारा…..| ये पागलपन है….!!!! हमे उन्ही चीज़ों में अच्छाई दिखती है जो ‘हमारा’ होता है, और अगर कभी गलती कोई दूसरी चीज़ हमें अच्छी लग जाती है तो हम उसको ‘हमारा’ बनाने की जुगत में लग जाते हैं…| ये बेहूदगी है… हम जीवन का सारा सौदर्य ही नष्ट कर देते हैं,…!!! हिंदी उतनी ही सुन्दर जितनी की उर्दू या बंगला…और भी कई भाषाएँ है….एक से बढ़ कर एक खुबसूरत जुबान है दुनियां में….सब की अपनी विशेषता है, अपनी उपयोगिता है….. ये ‘हमारा/हमारी’ छिछलापन है, ये हमारी ओछी मानसिकता का प्रतीक है ||| मुझे हिंदी से तो प्रेम है लेकिन मैं इसकी पैरोकारी करने वालों की विरोध करता हूँ..!! तरफदारी या पैरोकारी करना राजनीती है और राजनीती वही लोग करते हैं जो अन्दर से हीन-भावना से ग्रसित होते हैं…एक स्वस्थ व्यक्ति कभी भी ‘हमारा/हमारी’ के चक्कर में नहीं पड़ता…चीज़ें सुन्दर हैं क्योंकि वो सुन्दर हैं इसलिए नहीं कि वो ‘हमारा/हमारी’ हैं….!!!!

    sinsera के द्वारा
    September 19, 2013

    स्वयंघोषित सूफी महोदय, आपका स्वागत है.. आपको हिंदी से प्रेम है , जानकर ख़ुशी हुई..सिर्फ और सिर्फ कारण जानना चाहूंगी… मैं ने अपना कारण बताया है,अगर अपने ध्यान से पढ़ा होता तो इसे problem न कहते. हम मनुष्य हैं , एक ही जगह पैदा हो सकते हैं. कोई फिल्म नहीं हैं की एक साथ कई थिएटर्स में रिलीज़ हो जायें. जहाँ पैदा हुए हैं पहले वहीँ की भाषा जानने के बाद ही दूसरी भाषा सीखने की नौबत आती है. और अगर सीखने का मौका न मिले तो कौन सी भाषा याद रह जाएगी…..???ये आप बताइए… जब आप ” बिल्ली ” को ही नहीं जानेंगे तो C A T माने क्या होता है ये कैसे जान पायेंगे .सौन्दर्य तो बाद में दिखेगा. अब ये मत कहियेगा कि भारत में बच्चा पैदा होते ही इंग्लिश उर्दू और बंगला भाषा की सुन्दरता जान लेता है… बहरहाल…आपको हिंदी भाषा से प्रेम क्यों है, ये बताइए…

    के द्वारा
    September 20, 2013

    “आपको हिंदी भाषा से प्रेम क्यों है, ये बताइए…” क़िबला, प्रेम जब भी होता है अकारण होता है, इसके पीछे कोई हेतु नहीं होता, कारण ढूंढ कर प्रेम करना व्यपार है, प्रेम प्रथम है…सारे कारण आरोपित होते है…आपका सवाल असंगत है…हिंदी व्यकरण के हिसाब से सही भी हो लेकिन ये अस्तित्वगत नहीं है, अस्तित्व में प्रेम का कोई कारण नहीं है…. मुझे बस प्रेम है, हृदय अगर प्रेमपूर्ण हो तो प्रेम स्वभाव हो जाता है , फिर ऑब्जेक्ट का सवाल नहीं रह जाता है, कोई भेद-भाव नहीं रह जाता है….जैसे खुशबू फूल का स्वभाव है, फूल के पास हिंदुस्तानी जाये या पाकिस्तानी वो दोनों को सामान रूप से खुशबू देगा…ऑब्जेक्ट के हिसाब से उसके खुशबू का अनुपात कम या ज्यादा नहीं हो जायेगा…अगर हम फूल से उसके खुशबू बिखेरने का कारण पूछे तो बेचारा मुसीबत में पड़ जायेगा…. यही आग के साथ भी सच है , जलना आग का स्वभाव है वो किसी को भी जलाएगा…..इसी तरह मुझे हिंदी की वजह से हिंदी से प्रेम नहीं है वजह नीजी है…यहाँ प्रेम सब्जेक्टिव है ऑब्जेक्टिव नहीं….ऑब्जेक्ट तो एक बहाना है…| देने को मैं अनेको कारण दे सकता हूँ पर सब आरोपित होगा…|| “हम मनुष्य हैं , एक ही जगह पैदा हो सकते हैं”…. हम अस्तित्व की अनुपम अभिव्यक्ति है, जैसे पेड़ से पत्ता निकलता है, सागर पर लहरे उठती है वैसे ही हम इस अस्तित्व से निकलते है, हम इससे अलग नहीं है, ये सारा अस्तित्व हमारा है और हम इसके हैं, पैदा होने और मरने का सवाल ही नहीं है, we are part of it or we are it. “सौन्दर्य तो बाद में दिखेगा”- बिलकुल गलत बात… तथा कथित ज्ञान हमारे सौन्दर्य बोध को नष्ट कर देता है एक अबोध बच्चा हम से कहीं ज्यादा संवेदनशील होता है, हमारे आँखों पर पड़ी जानकारी की पड़त हमें शनै शनै अँधा बना देती है…हम देख कर भी नहीं देखते हैं….| “स्वयंघोषित सूफी महोदय”- क्या आप सोचती हैं कि इस बात की घोषणा कोई और भी कर सकता है…??? सूफी होना आन्तरिक बात है, किसी और के लिए इसको जानने का कोई उपाय नहीं है….अगर मुझे सर दर्द है तो ये मैं ही जान सकता हूँ, इसके लिए मुझे किसी से प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं है …. “अगर अपने ध्यान से पढ़ा होता तो इसे problem न कहते”- मैं ने ध्यान से पढ़ कर ही प्रॉब्लम कहा था, मुझे पढने का एक ही ढंग आता है, इसीलिए ध्यान से पढने या न पढने का सवाल ही नहीं है…मैं ने ये नहीं कहा कि ये आपकी प्रॉब्लम है…मेरा विरोध विचारों से है किसी व्यक्तिविशेष से नहीं…विचार सही या गलत होते है व्यक्ति नहीं…आपके लेख का पहला वाक्य मुझे गलत लगा और मैं ने उसका विरोध किया…| “आपको हिंदी से प्रेम है , जानकर ख़ुशी हुई.”— आप गलतफहमी में खुश हो गईं है…आप कृपया खुश न होयें…मुझे हिंदी से प्रेम है न कि आपकी हिंदी या किसी हिन्दुस्तानी की हिंदी से..मुझे इस बात का दुःख है कि आपने खुश होने में जल्दबाजी दिखा दी….. :) :)

    sinsera के द्वारा
    September 20, 2013

    फिर तो बात ही ख़तम… आप स्वभावगत प्रेम करते हैं, यहाँ ऑब्जेक्ट से मतलब नहीं है. कालीन पर चल के भी प्रेम करेंगे और काँटों पर चल के भी क्योंकि ये आपका स्वभाव है. राजमहल में भी खुश रहेंगे और कीचड़ में भी क्योंकि ये आपका स्वभाव है.मुझे यह कहते हुए बड़े इत्मिनान से ख़ुशी हो रही है की अपने वो पा लिया है जो लोग पूरी उम्र बिता कर भी नहीं अर्जित कर पाते हैं… चेतन शून्यता की ये अवस्था कुण्डलिनी को जागृत कर के ब्रह्म की ओर ले जाती है. आप इस संसार से परे हैं. आप को नमस्कार… “या तो पागल हँसे या वो जिसे तौफीक करे, वर्ना इस दौर में अब कौन मुस्कुराता है…”

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    September 20, 2013

    “मुझे यह कहते हुए बड़े इत्मिनान से ख़ुशी हो रही है”- मेरे देखे अनुभव हमेशा विपरीत का होता है, ज़रूर आप के भीतर कोई उदास भी हो गया होगा, और चूँकि उदासी ख़ुशी से गहरी होगी इसीलिए ख़ुशी का अनुभव हो पाया…, “अपने वो पा लिया है”- समझने में कहीं भूल हो गयी, आप ने फिर से खुश होने में जल्दबाजी दिखा दी, स्वभाव का अर्थ होता है जिसे चाह कर भी खोया न जा सके, और जिसे खोया ही नहीं जा सकता उसे पाने का सवाल ही नहीं उठता…मैंने कुछ भी नहीं पाया है, न ही कुछ खोया था…जिसे खोया या पाया जा सके वो स्वभाव नहीं… “लोग पूरी उम्र बिता कर भी नहीं अर्जित कर पाते”- आप जाने अनजाने में मेरी तुलना लोगों से कर रहीं हैं, मुझे महान बता कर उन्हें हीन दिखा रही हैं….मैं ने पिछले कमेंट भी कहा था ‘हम’ अस्तित्व के ‘अनुपम’ अभिव्यक्ति हैं, मैं न तो किसी से महान हूँ और न ही कोई मुझ से हीन है, हम सब अनूठे हैं…तुलना का सवाल नहीं है, किसी और से तुलना कर के खुश होना पाप है ये स्वस्थ चित्त का लक्षण नहीं है…इसका ये अर्थ हुआ कि हम लोगों को दुखी देख कर खुश होते हैं….अक्सर हम लोगों को सिखाते हैं कि जब उदास होओ तो दुसरे लोगों को देख लिया करो…दूसरों का दुःख देख कर तुम्हारा दुःख कम हो जायेगा, पर हम कभी विचार नहीं करते कि ये रुग्णता है…इसका अर्थ हुआ कि हम चाहते हैं कि लोग दुखी रहे ताकि हम उनका दुःख देख कर खुश हो सके और अपने दुखों को कम महसूस कर सकें…. “चेतन शून्यता की ये अवस्था कुण्डलिनी को जागृत कर के ब्रह्म की ओर ले जाती है’’- इस के सन्दर्भ में मैं कुछ भी नहीं कहूँगा..ये बात मेरे अनुभव की नहीं ही किताबों में पढ़ी है मैं न लेकिन लिखी सुनी बातों से मैं अपनी समझ निर्मित नहीं करता….. “आप इस संसार से परे हैं-आप को नमस्कार”- आपकी ये दोनों बातें परस्पर विरोधी है….अगर आप सच में ही ये मानती हैं कि मैं संसार से परे हूँ तो फिर नमस्कार करने की कोई ज़रुरत नहीं, नमस्कार संसार का ढंग है, संसारियों को खुश करने का तरीका….लेकिन आपने शायद मेरा मजाक उड़ाया है… | मैं न तो इस संसार से परे हूँ न ही संसार का हूँ….सच ये है कि ‘हम संसार हैं’ ये सब हम से हैं और हम सब से…मैं जितना शरीर में हूँ उतना ही शरीर से बहार भी हूँ…हम सब एक दुसरे से जुड़े हैं….हम यहाँ जमीन पर एक पत्ता भी तोड़ते है तो वहां दूर आकाश में चाँद तारे काँप जाते हैं…. अलग और परे होने की बात सोचना अज्ञानता है …सागर का लहर सागर से अलग नहीं होता…

seemakanwal के द्वारा
September 17, 2013

जब तक एक एक भारतवासी स्वयं अपनी राजभाषा हिंदी को आदरणीय स्थान नहीं देगा तब तक डंडा मार कर हिंदी को सम्मान नहीं दिलाया जा सकता.. बिलकुल सही लिखा .आभार

    sinsera के द्वारा
    September 19, 2013

    सीमा जी, कीमती समय देने के लिए आभार…

Madan Mohan saxena के द्वारा
September 17, 2013

बहुत खूब हिंदी दिवस पर सार्थक रचना हेतु बधाई बहुत उम्दा रचना। कभी यहाँ भी पधारें। सादर मदन

    sinsera के द्वारा
    September 19, 2013

    मदन मोहन जी, समय देने के लिए आपका धन्यवाद..

sonam saini के द्वारा
September 17, 2013

वैसे भी नियम बना कर पालन करवाना अलग बात है और मन में सम्मान रखना अलग.. जी ……आपकी बातो से सहमत हूँ! हिंदी को सम्मान प्राप्त हो भी तो कैसे जब हम ही नही चाहेंगे सम्मान देना ! एक जानकारी भरे लेख के लिए बधाई …..

    sinsera के द्वारा
    September 19, 2013

    समय देने के लिए धन्यवाद प्रिय सोनम …

amarsin के द्वारा
September 16, 2013

एक दम सही… वैसे भी हंसने बोलने के लिए मित्रों के जमावड़े (अन्य भाषाओँ ) की आवश्यकता भले ही हो लेकिन रोने के लिए तो माँ के आंचल (मातृभाषा ) की ही याद आती है.

    sinsera के द्वारा
    September 19, 2013

    भावनाओं को समझने के लिए आपका धन्यवाद अमर सिंह जी

Pradeep Kesarwani के द्वारा
September 16, 2013

बिलकुल सही कहा हिंदी भाषा को किसी पर जबरजस्ती दबाव बनाकर भाषा को सम्मान और इज्ज़त नही दिलवाई जा सकती… सुन्दर अभिलेख बधाई स्वीकारें……

    sinsera के द्वारा
    September 19, 2013

    सहमति के लिए धन्यवाद प्रदीप जी…


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