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Aaiye Haath Uthayein Ham Bhi.............

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चिराग जलने दो हमारे लहू से ..........

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पड़िये गर बीमार तो तीमारदार कोई न हो,
और अगर मर जाइये नौहा ख़वा कोई न हो….


लगता है कि ग़ालिब साहब का भी ज़िन्दगी में कभी न कभी अस्पताल से साबका पड़ा होगा, तभी उन्हों ने अपने लिए ऐसी मार्मिक दुआ मांगी…कहने को तो अस्पताल जीवन दान केंद्र हैं और डॉक्टर साक्षात् भगवान ……लेकिन इन के हाथों जीवन पाने की प्रक्रिया के तहत बीमारी ग्रस्त अंग के ठीक होने के व्युत्क्रम में दिल इतना कमज़ोर हो जाता है कि झटके लगने भी बंद हो जाते हैं….
मैं तो खुद स्वास्थ्य के नियमों का इतनी कड़ाई के साथ पालन करती और करवाती हूँ कि मेरे घर में बीमारी का आना जाना ज़रा कम ही होता है..हालाँकि इस के लिए मुझे घर के लोग “control freak ” कहते हैं , लेकिन मन ही मन समझते भी हैं कि मेरे इसी अत्याचार का नतीजा है कि आज जब कि हर घर में , हर उम्र के दिल, जिगर, गुर्दे के मरीज़ पाए जाते है,…मेरे घर में अभी तक मामूली सर्दी, जुकाम या फ्लू के अतिरिक्त कोई और बीमारी झाँकने तक नहीं आयी…… लेकिन अचानक न जाने कहाँ से एक आसमानी आफत की तरह मेरे ससुर जी को ये अनोखी बीमारी हो गयी जिसमे उनकी पित्त की नली के बाहर की तरफ एक ट्यूमर हो गया और उसने नली को दबा कर पित्त का बहाव आंतों की तरफ से मोड़ कर वापस ब्लड की तरफ कर दिया…इलाज तो सिर्फ ऑपरेशन ही है लेकिन उसके पहले ब्लड में पित्त की मात्रा का नॉर्मल होना आवश्यक है तो तब तक आवश्यक ट्रीटमेंट के लिए अस्पताल में ही रहिये…..
उफफ्फ्फ्फ़……
प्राइवेट रूम न मिलने तक इमरजेंसी वार्ड में रह कर हमने क्या क्या देखा ये वर्णन कर पाना असंभव है………. एक कतार में लगे हुए तीस बेड …हर बेड के बीच में सिर्फ एक स्टूल रखने की जगह….और स्टूल पर बैठने वाले तथाकथित मज़बूत हौसले वाले लोग, जो सिर्फ उस पर बैठने से पहले तक ही साबित- जिगर हुआ करते थे..
वो नुमायाँ हिम्मत और पसमंज़र में बौखलाई सी स्टूल पर बैठी हुई मेरी ही मूर्ति थी जिसने ज़िन्दगी में पहली बार इंसानी जिस्म को बेहरकत ,बेसाँस, अकड़ते हुए देखा… तीन दिन में तीन मौतें ..सिर्फ एक हाथ के फासले पर…इससे पहले मौत का सिर्फ नाम सुना था, लेकिन वो इतना ठंडा कर देती है , ये नहीं पता था….
हालाँकि मैं अपने सर पर से अपने पिता का हाथ खो चुकी हूँ , लेकिन दुर्भाग्य की पराकाष्ठा है कि उस समय मैं उनसे इतनी दूरी पर थी कि उनके गुज़र जाने की सूचना तक मुझे काफी दिनों बाद मिल पाई…तब मैं ने लिखा था….


रास्ते पाँवों तले से बह गए,
हम जहाँ थे वहीँ पर रह गए,
कराह उठते थे मेरी उंगली के भी ज़खम से जो,
ज़ख्म इतना बड़ा जीवन का कैसे दे गए,
पता देते थे जो दुनिया जहाँ की बातों का,
पता चला ही नहीं वो इस तरह गए….


इमरजेंसी वार्ड में, मेरे स्टूल की दाहिनी तरफ वाली बेड की महिला कब जीवन से पराजीवन में पहुँच गयी, मुझे पता ही नहीं चला….
gastric cardiac arrest की शिकार …..जब डॉक्टर ने उनकी जीवन रक्षक प्रणालियाँ, ओक्सीजेन मास्क वगैरह हटाना शुरू किया तो मुझे लगा कि वो ठीक हो गयीं…मैं दम साधे बैठी चोर नज़रों से उनके सीने को देख रही थी..सच्चाई का आभास होते हुए भी नज़रें उनके शरीर में सांसों की हरकत ढूंढ़ रही थी..उनके साथ उनका बेटा आया था, जो दरवाज़े के बाहर था, वो भी नहीं दिख रहा था….तभी..अचानक….एक कर्मचारी उनके बेड के पास आया और बड़े ही निर्विकार भाव से बैंडेज का एक टुकड़ा फाड़ कर उनके पैरों के दोनों अंगूठों को एक साथ बाँधने लगा….मुझे झुरझुरी हो आई……यही होना है अंत में……???ये वही होंगी, जिन्हों ने बड़ी नज़ाकत के साथ कभी अपने प्रियतम से प्यार भरे पलों में कहा होगा…..”तुम्हारे सिवा कोई और मेरे पैर का अंगूठा तक नहीं छू सकता ” …और आज……..अस्पताल के एक अनजान चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने न केवल उनके पैर बाँधे बल्कि, हाथों के दोनों अंगूठों को सीने पर रख कर आपस में बांधा… पलकों को मूंदा… ..उन्हें करवट करा के बेड की चादर हटाई और दूसरी चादर उनके नीचे बिछा कर उसमें उन्हें लपेटना शुरू किया……….. वहां बैठना असंभव था….मैं ने अपने ससुर जी से कहना चाहा कि मैं बाहर जा रही हूँ, लेकिन मुंह से आवाज़ ही नहीं निकली….लड़खड़ाते , गिरते ,संभलते मैं वहां से बाहर निकली, लेकिन इमरजेंसी वार्ड की भयावहता का दायरा बहुत दूर तक था…पूरी गैलरी में दुखते, कराहते, निराश लोग, एक ख़ाली बेड की आस में ज़मीन पर चादर बिछाए रात और दिन काटते रहते हैं..किस किस को नज़रंदाज़ किया जाये और कैसे?? न जाने कब तक मैं बिना मतलब बाहर घूमती रही..अन्दर आने पर देखा कि उसी बेड पर एक नया मरीज़ आ चुका था…जानता भी नहीं होगा कि थोड़ी देर पहले यहाँ क्या घटित हो चुका है…..

अगले दिन तीन शहजादे, जो बाइक पर सवार हो कर लखनऊ की सड़कों को खुला आसमान समझ कर परवाज़ भर रहे थे…..लहू से नहाये हुए ,वार्ड में लाये गए…नाम ,पता, पहचान कोई नहीं जानता..भला हो मोबाइल के अविष्कारक का और अच्छे थे उनके माता पिता के सितारे , जो भयानक चोटों के बावजूद उनकी जान बच गयी..लेकिन तब तक मेरी सांस अटकी रही ……
बहुत कुछ है …..जो पहले कभी नहीं देखा, जाना , सुना…..क्या बताऊँ…..बस महसूस ही किया जा सकता है…वैसे अस्पताल तो बहुत बार आई हूँ…कभी अपनी तो कभी देवरानियों ,ननदों की ख़ुशी के लिए…..लेकिन वो मौका ऐसा होता है कि मर्मान्तक पीड़ा सहने के बाद भी मन में एक ख़ुशी का एहसास रहता है….अस्पताल से निकलते वक़्त जब बाँहों में एक नर्म मुलायम गुनगुना गुलाबी सा अपने ही कलेजे का टुकड़ा भी साथ रहता है तो कोई कष्ट , कोई खर्च याद ही नहीं रहता…वो अलग बात होती है….लेकिन इस तरह…कभी किसी को न आना पड़े….कभी भी नहीं …..
मैं बुद्ध भी तो नहीं हो सकती…राजा का बेटा नहीं हूँ न….”यशोधरा” साहब तो खैर जी लें गे लेकिन मेरे दो राहुल….?????मेरा बेटा मुझसे भी सात इंच लम्बा हो चुका है लेकिन अगर घर पर होता है तो मेरी गोद में सर रखे बिना सोता नहीं……नहीं ……….वापस तो आना ही पड़ेगा….”Thanatology ” का सिद्धांत मेरे जैसे कमज़ोर लोगों के लिए नहीं है….
वैसे एक बात का सुकून है…मेरी बरसों की साध पूरी होने वाली है………मैं कब से अंगदान करना चाहती थी..यहाँ SGPGI , लखनऊ के एनाटोमी विभाग में जा कर मैं अपना यह अरमान पूरा कर सकती हूँ….मित्रों, जल्दी ही मैं आपको ये शुभ सूचना देने वाली हूँ..
यहाँ से इस के सिवा और क्या लिखूं….आपका समय लिया है तो कुछ सन्देश भी होना चाहिए….मित्रों..अगर मेरी आंखें खुली हैं तो मैं सब को सुहानी सुबह की सूचना दे सकती हूँ…आप सभी से अनुरोध है कि स्वस्थ जीवन शैली अपनाएं…जान बूझ कर रोगों को बुलावा न दें….यूँ तो भविष्य के गर्त में क्या छुपा है कोई नहीं जानता लेकिन अपनी तरफ से तो कोई कोर कसर नहीं रखनी चाहिए….
“Precaution is better than cure” ये तो सब ने सुना है लेकिन आज़माते कम ही लोग हैं..तेल मसाले वाला गरिष्ठ अपोषक भोजन कभी कभी के लिए ठीक है लेकिन दैनिक चर्या में स्वस्थ , विटामिन और पोषक तत्वों से युक्त भोजन लें…..
निकोटिन और अल्कोहल , व्यक्ति के ही नहीं, समाज के दुश्मन हैं…जहाँ तक हो सके, इनसे दूर रहे…
अपने सुख के साथ साथ अपने अपनों के सुख के बारे में भी सोचें…
कुछ गलत करने से पहले सिर्फ एक क्षण के लिए आंखें बंद कर के अपने माता पिता/ बच्चों की तरफ से सोच कर देखें…


और अंत में…….


देहदान कर के जायें……
ज़रा सोचिये, हमारे अंग हमारे बाद भी जियेंगे….
हमारी सांसे रुक जाने के बाद भी हमारी आंखें अपनों के लिए प्यार छलकाएंगी…
हमारा अंतिम संस्कार कर के आने वाले को हमारे दिल की धड़कन हमारे बाद भी सुनाई देगी..
हमारे रक्तदान करने से किसी माँ की गोद सूनी न होने पायेगी और किसी का प्यार जिंदा रह सकेगा …..
इस एहसास को ओढ़े हुए जो आखिरी सांस आयेगी, वो सब के लिए कितना सुकून ले कर आयेगी………..
है ना………


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77 प्रतिक्रिया

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Kattiekek के द्वारा
December 23, 2017

Efrain Terzo के द्वारा
March 29, 2017

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sanjay kumar garg के द्वारा
November 26, 2013

सिंसरा जी, नमस्कार! सुन्दर अभिव्यक्ति, मुझे भी एक बार पोस्टमार्टम रूम में अपने सामने एक बॉडी को पोस्टमार्टम कराना पड़ा था! इस घटना पर मैं एक ब्लॉग डालूंगा! आपके स्वर्गीय पिता श्री को श्रीधांजलि व् आपके ससुर साहब के शीघ्र स्वास्थ्य होने कि कामना के साथ! धन्यवाद सिंसरा जी!

    sinsera के द्वारा
    November 27, 2013

    मेरी बात पर ध्यान देते हुए अपने इतनी पुरानी पोस्ट को अपना कीमती समय दिया, इसके लिए आपका हार्दिक आभार संजय जी..

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 12, 2012

पोस्ट दिल को छू गयी…….कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने……….बहुत खूबबेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

satish3840 के द्वारा
July 1, 2012

नमस्कार सरिता जी / बहुत ही सरल व् शिक्षाप्रद लिखा हें आपने / इश्वर करे आप के ससुर जल्दी ही सवस्थ हों / मेरी हार्दिक शुभकामनाएं आपके साथ हें / अस्पताल का जिक्र जो किया हें आपने वो वाकई दिल को दुखी करता हें / भगवान् सभी को सवस्थ रखें / बहुत ही दिल छू लेने वाला लिखा हें आपने

yogeshdattjoshi के द्वारा
June 19, 2012

सरिता जी नमस्कार, काफी दिनों बाद junction के मंच पर, शब्द ख़त्म हो गए क्या? वैसे अच्छे लेख के लिए समय तो लगता ही है…. एक आग्रह है भावुकता को बार बार जाहिर न करे…. अच्छा नहीं लगता… उम्दा लेख… रास्ते पाँवों तले से बह गए, हम जहाँ थे वहीँ पर रह गए,…. , नमस्कार

jyotsna singh के द्वारा
June 18, 2012

प्रिय.सरिता जी, आपका आलेख पढ़ा बहुत अच्छा लगा,भाव,अभ्व्यक्ति,एवं संरचना सभी अछे हैं और सन्देश भी.ज्योत्स्ना.

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 17, 2012

आपके ससुर जी का जीवन रूपी चिराग भी जलता रहे यही कामना है पति के लिए सासु तीर्थ ससुरा तीर्थ तीर्थ साला साली है लेकिन जिस ससुर की तीमारदारी उसकी बहु इतनी शिद्दत से करे वोह बहुत ही किस्मत वाला है http://krishnabhardwaj.jagranjunction.com/2012/06/17/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

allrounder के द्वारा
June 16, 2012

नमस्कार सरिता जी, अस्पतालों के दर्दनाक माहौल का जो वर्णन आपने किया है, वो जीवन की ऐसी कटु सच्चाई है जिसे लाखों लोगों का चाहे – अनचाहे सामना होता है ! आपके ससुर जी को प्रभु जल्द ही स्वास्थ लाभ दे यही शुभकामना है आपके लिए !

Santosh Kumar के द्वारा
June 15, 2012

आदरणीय सरिता दीदी ,.सादर प्रणाम आपका आवाहन और आपकी सोच बहुत प्रेरक और अनुकरणीय है ,… पिताजी जल्दी स्वस्थ हों यही कामना है ,..सादर आभार

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
June 15, 2012

अस्पताल की सही स्थिति का चित्रण किया है आपने,सरिता जी.जो भुक्तभोगी हैं उन्हें पता है.आपने बिलकुल सही फ़रमाया है…. पड़िये गर बीमार तो तीमारदार कोई न हो, और अगर मर जाइये नौहा ख़वा कोई न हो देहदान के सम्बन्ध में जागरूकता का अभाव दिखता है.बहुत सुन्दर सन्देश है आपका.काश! इसका कुछ असर हो.

follyofawiseman के द्वारा
June 14, 2012

हॉस्पिटल मैं भी आपका राग जारी है….हे भगवान……! वहाँ बैठे बैठे महराई गाना बंद कीजिए और जल्दी से वापिस आइए वहाँ से……..!  रास्ते पाँवों तले से बह गए, हम जहाँ थे वहीँ पर रह गए, कराह उठते थे मेरी उंगली के भी ज़खम से जो, ज़ख्म इतना बड़ा जीवन का कैसे दे गए, पता देते थे जो दुनिया जहाँ की बातों का, पता चला ही नहीं वो इस तरह गए…. ……………………………these lines made me shed tears………………………………….

    sinsera के द्वारा
    July 8, 2012

    संदीप जी, महराई राग कौन सा होता है,? कृपया इसका आरोह अवरोह और पकड़ भेजने की कृपा करें…

    Sandeep Kumar के द्वारा
    July 17, 2012

    गर्मी के दिनों में खलहियाँ में खाट पर लेट कर तारों को निहारते हुए….मस्त हो कर जो अड़-बड़ गातें हैं उसको महराई कहते है…..’पुरबा बहिया, मच्छर कटिया, कनिया(wife) मन परैया…..’ पुरबा-east se aane wali hawa…. बहिया-blow(hawa ka bahna), कटिया-काटना , मन परैया- missing

ajay kumar pandey के द्वारा
June 14, 2012

सिंसेरा दीदी नमन आपने बड़ा अच्छा आलेख लिखा और हमारे साथ अपने दुःख भरे अनुभव बाटे वैसे दीदी मुझे आजकल आपके ब्लॉग पर आने का समय नहीं मिला क्योंकि में शादी में जाने की तैयारी कर रहा हूँ शादी से लोटकर आने के बाद ही आपसे मिलूँगा फिर मकान का काम भी होना है तो व्यस्तता से समय भी निकालूँगा और आपके ब्लॉग पर जरुर आऊंगा फिलहाल मुझे शादी में जाने की इजाजत दीजिये धन्यवाद

MAHIMA SHREE के द्वारा
June 14, 2012

आदरणीया सरिता दी .. आप हम सबकी प्यारी दीदी है … हम सब आपसे बहुत प्यार करते हैं … आपका आलेख तो आपके सह्रदय स्वाभाव का आइना है .. आपने अपने हस्पताल में गुजारें उन दुखदायी अनुभव को हमारे साथ बाटा और हमें अपने स्वास्थ्य के पति जागरूक रहने के लिए कहा .. और अंग दान के लिए भी प्रेरित किया आपका धन्यवाद .. इस आलेख को पढ़ कर आपके लिए सम्मान दोगुना हो गया है … एक दिन मैं भी अंगदान कर अवस्य इस पुण्य का भागीदार बनुगी .. आपके साथ आपके श्वसुर जी के अच्छे स्वास्थ की शुभकामनाये .. वो जल्दी ठीक हो जाए और आप भी स्वस्थ रहे यही कामना है ..

मनु (tosi) के द्वारा
June 14, 2012

आदरणीय सरिता जी , सादर नमस्कार ! आपके विचार आकर्षित करते हैं मुझे … आपने सच कहा … जिस हिम्मत से आपने ये लेख तैयार किया कबीले तारीफ है, बधाई !!

Mohinder Kumar के द्वारा
June 14, 2012

सरिता जी, जीवन में हर किसी को “अस्पताल” जिससे हर कोई बचना चाहता है किसी न किसी कारण जाना पडता है और जो जीवन्त वर्णन आपने किया उससे दो चार होना पडता है. अंग दान महादान है यदि सब इस बात को जान जायें तो कई जीवन बचाये जा सकते हैं…. सार्थक लेख के लिये बधाई.

    sinsera के द्वारा
    June 14, 2012

    मोहिंदर जी, नमस्कार, मैं किसी को मजबूर तो नहीं करती लेकिन इस लेख के माध्यम से आह्वान ज़रूर करना चाहती हूँ…सोचने वाली बात है कि जिस अंग से किसी को जीवनदान मिल सके उसे मृत्यु के हवाले कर देने से क्या मिलेगा… मुझे नहीं लगता कि इस में कोई ख़राब बात है…. समय देने के लिए धन्यवाद….

nishamittal के द्वारा
June 14, 2012

सरिता जी विकत परिस्थितियां सभी के जीवन में आती हैं लेकिन धैर्य और साहस शेष लोगों को और स्वयं को सम्भालने के लिए जरूरी है ,सकारात्मक सोच के साथ शरीर का मरणोपरांत सदुपयोग स्वयं को भी शान्ति देता है और जिसको जीवन का सुख मिलता है उसके लिए तो वरदान है.

    sinsera के द्वारा
    June 14, 2012

    आदरणीय निशा जी, नमस्कार, समय /सहमति देने के लिए धन्यवाद…. समय व परिस्थितियां तो वास्तव में आजकल अनुकूल नहीं है लेकिन आप लोगो से मिलने किसी तरह समय निकालती हूँ …आप ने पढ़ा तो अच्छा लगा….

आर.एन. शाही के द्वारा
June 14, 2012

खुशामदीद ! अपने लाभकारी संस्मरण के साथ आपके पुनरागमन का हार्दिक स्वागत !!

    sinsera के द्वारा
    June 14, 2012

    आदरणीय शाही जी, सादर नमस्कार, स्वागत के लिए /समय देने के लिए धन्यवाद.. मेरा लिखा हुआ आप पढ़ते हैं , जान कर अच्छा लगता है…इस के लिए भी धन्यवाद….

vasudev tripathi के द्वारा
June 13, 2012

दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिर वसंतौ पुनरायातः। कालः क्रीड़ति गच्छत्यायुः तदपि न मुंचत्याशा वायुः॥ ये पंक्तियाँ आदि शंकराचार्य जी की चर्पटमंजरी के प्रारम्भ की हैं जिनका अर्थ है कि दिन रात सांय प्रभात सब आ रहे हैं जा रहे हैं, काल क्रीड़ा कर रहा है और आयु नष्ट हो रही है किन्तु सांसरिक आशा रूपी वायु से नहीं छूट रहे हैं। ये काफी बड़ी रचना है जिसका प्रत्येक पद अनुपम है, कभी पढ़िएगा। निश्चित रूप से जीवन क्षणिक है किन्तु जब तक जीवन है कर्तव्यों के निर्वहन के साथ उद्देश्य को केन्द्र में रखकर जीना आवश्यक है। अतः जीवन में स्वस्थ शरीर परमावश्यक है। महर्षि चरक ने चरक संहिता में कहा है कि धर्म अर्थ काम मोक्ष सब शरीर से ही सिद्ध होते हैं अतः स्वस्थ शरीर आवश्यक है। संदेशपूर्ण सराहनीय लेख।

    sinsera के द्वारा
    June 14, 2012

    वासुदेव जी, नमस्कार, जब आप जैसे छोटी उम्र के बच्चे सारगर्भित बातें करते हैं, किताबें पढने का शौक रखते हैं और पढ़ कर उसे याद भी रखते हैं तो बहुत अच्छा लगता है….लगता है कि हम बेकार ही धरती के ख़त्म होने की चिंता करते हैं..आप जैसे विचारशील लोग हों तो धरती ख़त्म नहीं होगी, अभी बहुत दिन जिएगी…….. ऐसे ही रहिएगा हमेशा…..आप पर ईश कृपा बनी रहे..

yamunapathak के द्वारा
June 13, 2012

पापा (ससुरजी)की हाल में ही निधन हुआ रक्त देकर भी नहीं बचाए जा सके, आप बहुत दिनों बाद आये.

    sinsera के द्वारा
    June 13, 2012

    यमुना जी नमस्कार, दुखद है कि कभी कभी ज़िन्दगी वक़्त नहीं देती है जब कि इन्सान अपनी तरफ से कोई कोर कसर नहीं छोड़ता है….आप हमें याद रखती हैं इस के लिए धन्यवाद..

Sunny Kumar के द्वारा
June 13, 2012

आपको सादर प्रणाम, माफ़ कीजियेगा मुझे आपका नाम नहीं पता .. जो भी आपकी शंका है वो जायज है.. लेकिन जिस तरह आप हमेशा नकारात्मक प्रतिक्रिया करते हो वह जायज नहीं है ..वैसे कहावतो को मैं मानता नहीं हूँ लेकिन किसी ने सही कहा है की इंशान दूसरों को देखकर दुखी है.. रही बात रचनाओ की मुझे भी नहीं पता यह रचनाये किसने लिखी है.. लेकिन जहाँ से भी मेने यह रचना पड़ी, पड़कर बहुत अच्छा लगा… और शुक्रगुजार हूँ उस व्यक्ति का जिसके ब्लॉग से पड़कर मैंने forward कर दिया..जिससे किसी और को पड़ने का अवसर मिले.. मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की कि यह किसकी रचना है .. फर्क भी क्या पड़ता है ? जरूरी तो नहीं जो कलम का अविष्कार करेगा बस वही उसे इस्तेमाल करेगा .. फिर उस चीज़ का फायेदा ही क्या ? मैं यह नहीं कह रहा कि जिसने भी ये लिखी है उसका श्रेय उसे नहीं मिलना चाहिए .. लेकिन मेरे लिए तो वही बधाई के पात्र है जिसकी वजह से मुझे यह पड़ने का मोका मिला.. मुझे इस बात से मतलब नहीं उसने कहाँ से देखकर लिखी या वह उसकी अपनी रचना थी …ज्ञान बांटने से बढता है.. और सुन्दर रचनाओं को जितने व्यक्तियों में बांटा जाए अच्छा है .. जाने किसके काम आ जाये . और किसके लिए सीख बन जाए.. बाकी आप इस सोच को किस तरह से लेते हो आपके उपर है ..

    sinsera के द्वारा
    June 13, 2012

    नकारात्मक प्रतिक्रिया….?????आपकी शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने एहसास दिलाया..मुझे पता ही नहीं चला और किसी ने कभी टोका भी नहीं….लेकिन अब से सकारात्मक होने की कोशिश करुँगी… मेरा नाम सरिता है, और आपका..??मुझे थोडा संदेह है क्यों कि आप जो रचना यहाँ जेजे पर सनी कुमार के नाम से लिखते हैं वो दूसरी साइट्स पर दूसरे नामों से लिखी हुई पाई गयी हैं…. मैं ने ये प्रश्न आपके ब्लॉग पर पूछा था आपने यहाँ उत्तर दिया….जो लोग आपका ब्लॉग विज़िट नहीं करते हैं वो बिना भूमिका के इस बात को समझ नहीं पाएं गे इस लिए लिंक दिए दे रही हूँ…. http://optimist.jagranjunction.com/2012/06/10/%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%81/ वैसे मैं भी और अन्य ब्लोगर भी जब किसी दूसरे की रचना यहाँ रखते हैं तो असली लेखक/कवी का नाम लिखते हैं..उस कि रचना की वाहवाही खुद लूट कर धन्यवाद नहीं कहते हैं…… आपसे भी यही अपेक्षा की थी…. बाकी आप इस सोच को किस तरह से लेते हो आपके उपर है ..

yogi sarswat के द्वारा
June 13, 2012

इतनी विकत परिस्थति में आपने अपने को और अपने परिवार को संभाले रखा और इस मंच के लिए अपने अनुभव भी बांटे , ये बड़ी और हिम्मत की बात है ! अब लगता है आप सिर्फ कहने में ही नहीं करने में भी बहुत तेज हैं ! आपने जो अनुभव बांटे हैं , स्वाभाविक रूप से कोई न कोई उनसे जुड़ा हुआ है !

    sinsera के द्वारा
    June 13, 2012

    योगी जी नमस्कार, अभी हॉस्पिटल में कुछ दिन रहना पड़ेगा इसी लिए मैं ने अपना समय न बर्बाद करते हुए कुछ सार्थक करने की सोची …यहाँ बहुत कुछ सीखा और सीख रही हूँ..सब कुछ आप लोगो के साथ शेयर करुँगी….ताकि किसी को यहाँ न आना पड़े….

sonam के द्वारा
June 13, 2012

Very Good Morning Mam आपके लिए लिए दो लाइने पेश है सूना सूना सा लगता है मुझे सारा जहाँ …… एक तू ही तो नहीं बाकि सब है यहाँ ……… आपके बिना ये मंच भी सूना सा लगने लगा था , अच्छा किया कि आप जल्दी ही आ गयी ! आपके इस article के लिए आपकी क्या तारीफ करूं , मेरे पास तो शब्द ही नही है कुछ भी कहने को बस एक ही बात कहना चाहूंगी कि जितनी सुंदर आप खुद है उससे कही ज्यादा सुंदर आपका दिल भी है !

    sinsera के द्वारा
    June 13, 2012

    प्रिय सोनम , स्नेह.. ज़हे नसीब..आपने याद रखा.. मैं अपने सुन्दर सुन्दर organ donate करने का संकल्प तो ले ही चुकी हूँ..अब आप कह रही हैं कि मुंह भी सुन्दर है…चलिए कल डॉक्टर से पूछूंगी , अगर कोई प्राविधान होता होगा तो उस को भी donate कर दूंगी ….क्या करुँगी साथ ले जा कर..है ना……:-) :-)

jlsingh के द्वारा
June 13, 2012

आदरणीय सरिता बहन, नमस्कार! आप पिछले काफी दिनों से मंच से अनुपस्थित थी …. कारण अब समझ में आया! सत्य हरिश्चन्द्र नाटक में पढ़ता था — रजा हरिश्चंद्र जब श्मशान घाट की रखवाली करते थे … उनके मन में भी बहुत तरह के वैराग्य विचार आते थे, जिसका जीवंत चित्रण भारतेंदु हरिश्चंद्र ने उस रचना में किया है…… आजकल के आधुनिक श्मशान स्थल पर भी कुछ सूक्तियां लिखी होती हैं …पर निज अनुभव से बड़ा कुछ नहीं होता ….. आपका सजीव चित्रण और अंत में अंगदान का सन्देश कितना भावपरक है …… शुभकामना श्वसुर महोदय के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की …. आभार!

    sinsera के द्वारा
    June 13, 2012

    आदरणीय जवाहर भाईसाहब , नमस्कार , शुभकामना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.. वैराग्य का झटका खा के संभल चुकी हूँ…आदत के अनुसार सोचा कि जब यहाँ रह ही रही हूँ तो किसी दूसरे काम में मन लगाऊं इस लिए लैपटॉप मंगा लिया..किताबें भी हैं..उस के बाद भी समय बचता है तो खुराफातें ढूंढती हूँ..इसी खुराफात के अंतर्गत कल किचेन में कुछ सुधार करवाए हैं….और जाने से पहले (अस्पताल से )देहदान तो कर के ही जाऊंगी….

    jlsingh के द्वारा
    June 14, 2012

    आदरणीय बहन, सकारात्मक खुराफात सबके लिये लाभकारी होती है … ज्यादातर लोग चुपचाप देखते रहते हैं.. और सहते रहते हैं … यह भी जुल्म सहने के बराबर है …..

minujha के द्वारा
June 12, 2012

सरिता जी अक्षरश  सत्य है ये बात  कि इन जगहों के चक्कर बङे दुखदायी होते है ,अपनी माता जी की बीमारी में हुए  अनुभवों को आज आपने ताजा कर  दिया,ईश्वर जल्द ही आपके परिवार को दुखों से दूर करें,बहुत सारी शुभकामनाएं आपको

    sinsera के द्वारा
    June 12, 2012

    प्रिय मीनू जी, नमस्कार, शुभकामनाओं के लिए बहुत बहुत धन्यवाद… सच है ईश्वर किसी को अस्पताल का मुंह न दिखाए, …बस एक ख़ुशी का मौका छोड़ कर…

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 12, 2012

देहदान कर के जायें…… ज़रा सोचिये, हमारे अंग हमारे बाद भी जियेंगे…. हमारी सांसे रुक जाने के बाद भी हमारी आंखें अपनों के लिए प्यार छलकाएंगी… हमारा अंतिम संस्कार कर के आने वाले को हमारे दिल की धड़कन हमारे बाद भी सुनाई देगी.. हमारे रक्तदान करने से किसी माँ की गोद न सूनी होगी और किसी का प्यार जिंदा रहेगा…… इस एहसास को ओढ़े हुए जो आखिरी सांस आयेगी, वो सब के लिए कितना सुकून ले कर आयेगी……….. है ना… ईश पुत्री , सस्नेह लेख के बारे में क्या कहना. ये जीवन है. कहने को तो बहुत कुछ है मगर हम नहीं कहते . हाँ मेरी शुभ कामना आप के साथ साथ तमाम उन लोगों के प्रति है की वे शीघ्र स्वस्थ हो के प्रसन्नता पूर्वक घर जाएँ. मेरे अपने भी जिंदगी और मौत से खेल रहे हैं.

    sinsera के द्वारा
    June 12, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी, सादर नमस्कार, आप का सहयोग हर समय प्राप्त होता है, मैं आभार प्रकट करने योग्य भी नहीं हूँ…बस बिना कहे ही सब कुछ समझ लीजिये….धन्यवाद कहने पर डांट पड़ने का डर है…

sadhna srivastava के द्वारा
June 12, 2012

हाँ….. और इस तरह से मरने के बाद भी हम जिंदा रहेंगे….. कई लोगो की ज़िन्दगियों में….. मैं काफी दिनों से आपका इंतज़ार कर रही थी….. अब कुछ राहत है…… आपके पिताजी जल्दी से ठीक हो जाएँ…… यही मेरी दुआ है…..

    sinsera के द्वारा
    June 12, 2012

    प्रिय साधना, स्नेह, आपकी प्यारी सी दुआ के लिए बहुत आभार….. मुझे पता था….:-) आप ने याद किया तभी तो मुझे आना पड़ा…:-) विचारों से सहमति के लिए धन्यवाद…

VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
June 12, 2012

अच्छी प्रस्तुति एक अच्छे सन्देश के साथ |

    sinsera के द्वारा
    June 12, 2012

    विवेक जी नमस्कार, सार्थक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद …………

omdikshit के द्वारा
June 12, 2012

सरिता जी, नमस्कार. बहुत अच्छा भावनात्मक आलेख.मैं आप के विषय में बहुत तो नहीं जानता,लेकिन यह अवश्य है कि आप ज़रुरत से ज्यादा ही भावुक हो जाती हैं,जो आप के भी स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है……prevention is better than cure.

    sinsera के द्वारा
    June 12, 2012

    आदरणीय ओम जी, नमस्कार, ये तो है, तभी मैं सोचती हूँ कि स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने के बावजूद कभी कभी मैं बीमार क्यूँ पड़ जाती हूँ…आप की उपयोगी सलाह ध्यान में रखूंगी….धन्यवाद..

akraktale के द्वारा
June 12, 2012

सरीता जी सादर नमस्कार, बस बहुत कुछ शमशान वैराग्य सी बातें हैं. शायद अस्पताल से बाहर आकर आप भी सब भूल जाओ हाँ जब जब याद करोगी एक सिहरन जरूर ही पैदा करेगा यहाँ का अनुभव. खुशकिस्मत हैं आप कि जो किसी बर्न वार्ड का चक्कर नहीं लगाना पडा जो कि अस्पताल का सबसे सबसे भयानक प्रतीत होने वाला वार्ड होता है. आपने अपने अनुभव के आधार पर सही सन्देश दिया है और कहा भी जाता है भगवान् किसी को थाना कोर्ट और अस्पताल का मुह ना दिखाए. इश्वर करे आप जल्दी ही अपने श्वसुर साहब को स्वस्थ करा कर घर लौटें यही शुभकामनाएं हैं.

    sinsera के द्वारा
    June 12, 2012

    मान्यवर अशोक जी, शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद…. मानव की यही तो खासियत है , कितना भी गहरा ज़ख्म हो , वक़्त के साथ भर जाता है..न भरे तो जीना मुश्किल हो जाये.. अब कोई भी वार्ड और अस्पताल देखने को जी नहीं चाहता..मैं मदर टेरेसा की बहुत बड़ी फैन हूँ लेकिन यहाँ आ कर लगता है कि महान शब्द उन के लिए बहुत छोटा है, वे वास्तव में संत थीं…

June 12, 2012

“अगले दिन तीन शहजादे, जो बाइक पर सवार हो कर लखनऊ की सड़कों को खुला आसमान समझ कर परवाज़ भर रहे थे…..लहू से नहाये हुए ,वार्ड में लाये गए…” “मैं कब से अंगदान करना चाहती थी..यहाँ SGPGI , लखनऊ के एनाटोमी विभाग में जा कर मैं अपना यह अरमान पूरा कर सकती हूँ….मित्रों, जल्दी ही मैं आपको ये शुभ सूचना देने वाली हूँ..” “निकोटिन और अल्कोहल , व्यक्ति के ही नहीं, समाज के दुश्मन हैं…जहाँ तक हो सके, इनसे दूर रहे… अपने सुख के साथ साथ अपने अपनों के सुख के बारे में भी सोचें… कुछ गलत करने से पहले सिर्फ एक क्षण के लिए आंखें बंद कर के अपने माता पिता/ बच्चों की तरफ से सोच कर देखें… और अंत में……. देहदान कर के जायें…… ज़रा सोचिये, हमारे अंग हमारे बाद भी जियेंगे…. हमारी सांसे रुक जाने के बाद भी हमारी आंखें अपनों के लिए प्यार छलकाएंगी… हमारा अंतिम संस्कार कर के आने वाले को हमारे दिल की धड़कन हमारे बाद भी सुनाई देगी.. हमारे रक्तदान करने से किसी माँ की गोद न सूनी होगी और किसी का प्यार जिंदा रहेगा…… इस एहसास को ओढ़े हुए जो आखिरी सांस आयेगी, वो सब के लिए कितना सुकून ले कर आयेगी……….. है ना………” बाकी सब बकवास के सिवा कुछ nahiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii

    sinsera के द्वारा
    June 12, 2012

    अनिल जी, कुछ nahiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii

    June 14, 2012

    कुछ nahiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii ___________________कमाल है तबियत तो ठीक है न दीदी…………!

June 12, 2012

चिराग जलने दो हमारे लहू से और घर जलने दो घर की बहू से …………………हाँ…..हाँ……हाँ……! अरे फिर आप गुस्सा हो गयी………….हम आपको थोड़े नहीं कह रहे हैं…..तत्कालीन सामाजिक परिवेश को………… अच्छा हम चलते हैं एक दुश्मन की शादी में जाने की तैयारी करनी है….बुलावा तो नहीं है पर जाना तो पड़ेगा, उसका बर्वादी देखने मतलब की शादी……………सादर प्रणाम!

    sinsera के द्वारा
    June 12, 2012

    अनिल जी नमस्कार, अप मुझे क्या समझते हैं?? मैं हर घडी गुस्सा लिए घूमती हूँ क्या??जब टोकने की बात थी टोक दिया, तो क्या दुश्मनी हो गयी है??आगे बढ़ने को कहा था आपसे ,वहीँ अटकने को नहीं……. देखती हूँ आपने नया क्या लिखा है, फिर बताती हूँ………..:-)

    June 14, 2012

    दीदी आप भी अजीब है, मैं उस चीज को लेकर कभी आप से शिकायत किया भी नहीं……….आप कब से गंभीर होने लगी……….क्या उससे पहले मैं आपका या आप मेरा मजाक नहीं उड़ाती थी…………! आप औरतों के साथ यही प्रॉब्लम है कि आप दूसरों के साथ कभी सीरियस नहीं रहती हो परन्तु आपसे कोई हलके मूड में बात करें तो सीरियस हो जाती हो……………..जबकि अभी आप अस्पताल में हो तो आप भी अपने दिमाग का एक बार चेक अप करावा लेना….ताकि फिर कभी हमारे साथ प्रॉब्लम न हो………..और मेरे साथ आप बिलकुल हल्का रहिये और कभी कुछ आप कहीं भी हो तो उसे दिल से निकाल दीजिये…………..अपता नहीं लोग मुझको इतना सीरियस क्यों लेते हैं………..मैं तो सीरियस सिर्फ समस्याओं और बुराइयों के प्रति हूँ और अन्जानी को लेकर ….किसी व्यक्ति के प्रति …..आप तो सब कुछ मेरे बारे में जानती है फिर भी…………….

    June 14, 2012

    सही के एक नंबर की काली मैया हो………..जिसके जान के पीछे एक बार पड़ जाती हो तो बस पड़ जाती हो…………….

    sinsera के द्वारा
    June 14, 2012

    इलाजे दर्दे दिल तुमसे मसीहा हो नहीं सकता , तुम अच्छा कर नहीं सकते मैं अच्छा हो नहीं सकता…. (शायर का नाम याद नही आ रहा है..:-) )

    June 14, 2012

    वाह-वाह …………..मज़ा आ गया……! आपका यह चुराया हुआ शेर सुनकर तन-वदन में खुजली होने लगी……यानि कि मैं हँसतें-हँसतें लोटना शुरू कर दिया हूँ……………..!

चन्दन राय के द्वारा
June 12, 2012

सरिता जी , किसी ने ठीक ही कहा स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है, स्वास्थ का ख़राब होना सबसे बड़ा नुक्सान है हमारे द्वारा दिन में अपने स्वास्थ्य को दिया आधा घंटा भी काफी है , और फिर मरना है भी तो शान से मरें , क्या फिजूल की मौत मरना बीमार होकर !

    sinsera के द्वारा
    June 12, 2012

    चन्दन जी नमस्कार, बड़ी ख़ुशी हुई जान कर कि आप स्वास्थ्य के लिए जागरूक हैं..शास्त्रों में भी कहा गया है “पहला सुख निरोगी काया”.. निरोगी भव….चिरायु भव….

dineshaastik के द्वारा
June 12, 2012

सरिता जी, नमस्कार।  बहुत  दिनों बाद  आपको मंच  पर देख  कर खुशी हुई। बीमारी से एक  लाभ  होता है सबका प्यार, दुलार कई गुना बढ़ जाता है, पर मेरे जीवन  में यह अवसर दो या साल  बाद  आता है। मेरी वह कसर  मेरी पत्नि  कर  देती है। क्योंकि वह सब मुझे उसके लिये करना पड़ता है जिसकी मैं कामना करता हूँ। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ निम्न  पंक्तियाँ तो बहुत  ही अधिक  प्रभावित  कर गईं- रास्ते पाँवों तले से बह गए, हम जहाँ थे वहीँ पर रह गए, कराह उठते थे मेरी उंगली के भी ज़खम से जो, ज़ख्म इतना बड़ा जीवन का कैसे दे गए, पता देते थे जो दुनिया जहाँ की बातों का, पता चला ही नहीं वो इस तरह गए…. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ सरकारी अस्पतालों की अव्यवस्था के कारण  भूल  चुके हम  उन्हें जाने कब का। एक  बीमारी की जगह दूसरी मिल  जाती है। लेकिन  प्राइवेट  भी कम  नहीं  होते हैं। एक  की जगह  दूसरी बीमारी बता देते हैं, जो होती ही नहीं। अनावश्यक  टेस्ट  जिनका परिणाम पहले ही से निगेटिव होता है।  यदि आपको सर्दी जुकाम  है तो ब्लड टेस्ट और यूरिन  टेस्ट। सवाल  करोगे तो कहेंगे डॉक्टर आप हैं कि हम। इतना ही जानते हो तो डॉक्टरों के पास  आने की क्या जरूरत है। दवाइयों का मूल  नाम  न  लिखकर कम्पनियों नाम  लिखेंगे। आमिर का आभार  कि उन्होंने हमें जगाकर हमारा हौसला बढ़ाया। यदि डॉक्टर हमारे जीवन का भगवान है तो हम उसके पेट के भगवान  है। आपके दो संदेशों में से दूसरा संदेश  अधिक  प्रभावित  कर गया- देहदान कर के जायें…… ज़रा सोचिये, हमारे अंग हमारे बाद भी जियेंगे…. हमारी सांसे रुक जाने के बाद भी हमारी आंखें अपनों के लिए प्यार छलकाएंगी… हमारा अंतिम संस्कार कर के आने वाले को हमारे दिल की धड़कन हमारे बाद भी सुनाई देगी.. हमारे रक्तदान करने से किसी माँ की गोद न सूनी होगी और किसी का प्यार जिंदा रहेगा…… इस एहसास को ओढ़े हुए जो आखिरी सांस आयेगी, वो सब के लिए कितना सुकून ले कर आयेगी……….. है ना……… देहदान  की प्रक्रिया की जानकारी मैसेज  द्वारा देने की कृपा करें। एक  लाभ  तो होगा  परिवार को कर्मकाण्ड से मुक्ति मिलेगी। इस  योजना का हम  सभी को लाभ  उठाना चाहिये। हम  देहदान करके दूसरों पर अहसान नहीं करते, बल्कि अपनी स्वार्थ  सिद्धि करते हैं। दाहसंस्कार से उत्पन्न प्रदूषण  के पाप  से मुक्त  होते हैं। मृत्युभोज  के अतार्किक आयोजनों से परिवार को बचाने का प्रयास  करते हैं। रूढिवादी परंपराओं का नया रूप देने का प्रयास  करते हैं। संदेश  देते हुये आलेख  की प्रस्तुति  के लिये बधाई…..

    sinsera के द्वारा
    June 12, 2012

    स्नेही दिनेश जी , नमस्कार, हाँ बीमारी अच्छी तो है, आराम मिलता है लेकिन ठीक हो जाने के बाद जो पेंडिंग काम निपटाना पड़ता है तो लगता है कि बेकार ही ठीक हुए.. प्राइवेट डॉक्टर बिना वजह टेस्ट करवाते है ये तो सही है , दरअसल उनको अपने ऊपर भरोसा नहीं होता है, इसी लिए रिपोर्ट द्वारा शक मिटाते हैं.. देहदान के लिए इच्छुक व्यक्ति को लखनऊ के sgpgi में आना पड़ेगा.यहाँ एनाटोमी विभाग में एक फॉर्म भरना पड़ता है और कुछ फोर्मैलिटीज पूरी करनी पड़ती है बस…लेकिन उस से पहले घर वालों की सहमति होना आवश्यक है..मेरे ख्याल से आप दिल्ली में हैं तो यह सुविधा वहां AIIMS में भी होगी…


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