Sincerely yours..

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sinsera


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जय हिन्द..जय हिन्द की नारी ..

Posted On: 15 Aug, 2016  
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Social Issues Special Days lifestyle में

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Procrastinating …..

Posted On: 30 Jul, 2016  
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Social Issues lifestyle मस्ती मालगाड़ी में

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झंडा ऊँचा रहे….

Posted On: 12 Aug, 2014  
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Others Technology lifestyle में

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कब..??

Posted On: 6 Jan, 2014  
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Others कविता मेट्रो लाइफ में

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फिर सुबह होगी…

Posted On: 12 Dec, 2013  
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Others Others social issues मस्ती मालगाड़ी में

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आखिर क्यों???

Posted On: 25 Nov, 2013  
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Others Others social issues पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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दवा करे कोई…

Posted On: 16 Nov, 2013  
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Entertainment Others lifestyle social issues में

46 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Shobha Shobha

के द्वारा:

बहुत ही प्रेरणास्पद लेख है आपका । मैं अपनी ओर से इतना ही जोड़ना चाहूँगा कि आपके ये विचार केवल प्रताड़ित स्त्री वर्ग के लिए ही नहीं, अन्याय एवं अत्याचार से प्रताड़ित निर्दोष पुरुषों के लिए भी हैं । वे भी इन पर अमल कर सकते हैं तथा अन्यायियों एवं अत्याचारियों के विरुद्ध उचित कार्रवाई कर सकते हैं, करनी ही चाहिए । अन्याय एवं अत्याचार को सहना भी पाप है क्योंकि ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है । हमारी देह, अधिकारों एवं सम्मान की सुरक्षा समाज से पहले हमारा अपना दायित्व है जिसे हमें निभाना ही चाहिए । परनिर्भर रहकर अपनी सुरक्षा नहीं की जा सकती । और जब अपनी ही सुरक्षा न कर सके तो तो समाज, राष्ट्र एवं मानवता के लिए कुछ सार्थक कैसे कर सकेंगे ? अभिनंदन आपका ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

सरिता जी नमस्कार , बहुत दिन बाद यहाँ आना हुआ और आपका ब्लॉग देखा पढ़ा और पढ़कर सच में महसूस की आपकी खीझ क्योंकि हम भी कुछ ऐसे ही हालात से गुजर रहें हैं .. फर्क ये है की हम अपने भाई के लिए लड़की देख रहे हैं और यकीन मानिये आप जैसी ही सिथिति हो रही है हमारी भी .. बल्कि कल ही मेरे चाचू ने कहा की क्युओं न रिश्ता मेट्रीमोनियल साइट से देखा जाये एक बार तो सुनकर बहुत हंसी आयी क्योंकि उन्होंने कहा ही इस तरह से था की तुम लोग जो अपने फ़ोन में चटर-पटर करते हो , कुछ भी शॉपिंग करते हो कहीं भी रास्ता पूछते हो तो फिर लड़की क्यों नहीं ढून्ढ लेते हो ..... अभी इस बात पर हम विचार ही कर रहहैं की मेट्रीमोनियल साइट पर देखें या नहीं ... हमे कुछ ज्यादा हाई फाई नहीं चाहिए बस एक सुन्दर सुशिल और घरेलु लड़की चाहिए जॉब अगर हो तो शैक्षणिक विभाग में हो पर अभी तक ३-४ देखि भी हैं लेकिन हर कोई पहली फ्लाइट से हाई भाई के साथ दुबई उड़ जाना चाहती है और उसके माँ बाप बताते हैं की एकदम घरेलु लड़की है ... अब ये तो तय हाई है की भाई दुबई में जॉब कर रहा है तो उसको लेकर तो जायेगा ही पर एकदम शादी के बाद नहीं और ताज्जुब तो ये है की दुबई जाने के चक्कर में लड़कियां अपनी जॉब छोड़ने को भी तैयार हैं ... हम तो इसीलिए जॉब वाली ही हो काम ही महत्व दे रहे हैं पर एक दो मिली भी हैं एम् ऐ ,बी एड लेक्चरर पर बात बात में ही उनका मन जाँचा तो उनको अपनी नॉकरी से कोई लगाव नहीं तुरंत जवाब मिला छोड़ देंगी नॉकरी हंसी ख़ुशी........ देखते हैं कब तक मिलती है सपनो की भाभी :) दुआ करते हैं आपको भी गुड़िया के सपनों का राजकुमार जल्द ही मिल जाये :)

के द्वारा: Malik Parveen Malik Parveen

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: Sumit Sumit

हम्म्म्म.....मैं वहीं तक भारतीय हूँ जहाँ तक यह बात युटिलिटेरीअन है...और जब मैं कहता हूँ कि मैं भारतीय नहीं हूँ तो मेरा मतलब साइकोलॉजीकल है...इसको हम ऐसे समझ सकते हैं....हमारे अंदर दो प्रकार की मेमोरी होती है...एक फैक्चूअल और दूसरा साइकोलॉजीकल....फैक्चूअल बातें हमें डिस्टर्ब नहीं करती हैं...लेकिन साइकोलॉजीकल हमें डिस्टर्ब या पागल कर सकती हैं....जहाँ तक सुविधा और उपयोगिता की बात है भारतीय होने में कोई दिक्कत नहीं है...लेकिन 'भारत' शब्द से हमारा जो साइकोलॉजीकल आइडेन्टफकेशन उससे दिक्कत पैदा हो जाती है| फिर हम इस एक शब्द के लिए किसी की जान भी ले सकते हैं...और जान दे भी सकते हैं...| साइकोलॉजीकलि या फिर अस्तित्वगत रूप से हम 'भारतीय' या जापानी कुछ भी नहीं हैं...यह सब भेद और खंड राजनितिक है...इसकी अपनी उपयोगिता है...लेकिन जब और देशभक्ति, और हमारा देश महान जैसी मूर्खतापूर्ण बाते करने लगते हैं तब यह हास्यास्पद हो जाता है| मैंने थोड़ी जटिल बातें की है लेकिन उम्मीद है कि इस बार आप इसपर विचार करेंगी....!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

सूफी महोदय, स्वागत है, कृपया कमेंट पर विचार करने से ज्यादा तिलमिलाहट में आकर जवाब देने की ज्यादा जल्दी में न आएं....मैं ने कहा (हम का मतलब सभी भारतवासी….आप भी .. )..यहाँ सिर्फ आप से नहीं बल्कि वो सभी जो भारत में पैदा हुए हैं..उनसे मतलब है....भले ही वो माने या न माने , फिर भी वो भारतीय नागरिक हैं तो हैं...तभी तो बड़ी आज़ादी से भारत का अन्न पानी कहते हैं, यहाँ की ऑक्सीजन लेते हैं और भारत सरकार द्वारा उपलब्ध कराये गए रोज़गार के अवसर लेते हैं...कभी नहीं कहते कि" हम ने कब कहा कि हम भारतीय हैं.."....लेकिन यहाँ पर एक प्रश्न आप से और सिर्फ आप से है......स्कूल, कॉलेज, ऑफिस या पासपोर्ट के लिए फॉर्म भरते समय आप अपनी नागरिकता क्या लिखते हैं.......????????कही ये तो नहीं लिखते कि.... "कोई भी बच्चा किसी देश में पैदा नहीं होता है…. यह सारा अस्तित्व हमारा है और हम इसके है........."

के द्वारा: sinsera sinsera

आजकल आपको एक मैसेज ज़रूर आता होगा जिसमे एक भारत का झंडा आता है और उसको १५ अगस्त तक अपनी प्रोफाइल पिक्चर बनाने के लिए आग्रह किया जाता है.. पर क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि उस झंडे में केसरिया रंग की जगह लाल रंग का प्रयोग हुआ है, ..ये फोटो कश्मीरी आतंकवादियों के साइबर हमले का अगला कदम है..इसको उन्होंने ‘मोबोला” नाम दिया है..(मोबाइल अबोला ).. ये फोटो एक स्लीपर सेल की तरह काम करेगी और इसको जब 15 अगस्त को वो आतंकवादी एक्टिवेट करेंगे तब ये आपका सारा निजी डेटा उनको भेज देगी और आपको भनक तक नहीं लगेगी ..इसलिए भारत का झंडा अवश्य लगाएं पर केसरिया रंग वाला और अपने देश को साइबर हमले से बचाएं.. “”"….जय भारत जय हिन्द….””’ kamaal ka lekhan sochne par vivash kar diya

के द्वारा: deepak pande deepak pande

यह मैंने कब कहा कि मैं भारतीय हूँ...?? I don't belong to any religion or national. You are projecting your thoughts on me. प्रश्न उठाने का मतलब प्रश्नवाच चिन्ह के साथ वाक्य को समाप्त करना नहीं होता है| "मैं सच बताऊँ, आप लोग बुरा न मानें, मुझे ये एक अजीब तरह का ढोंग लगता है.." यह लोग जो कर रहे हैं उसपर सवाल नहीं है क्या? संभवतः आपको मेरे कमेंट पर विचार करने से ज्यादा तिलमिलाहट में आकर जवाब देने की ज्यादा जल्दी थी| मैंने किसी के विचार का कोट नहीं किया है, मैं दुनिया के किसी भी विचारक से सहमत नहीं हूँ, हां कभी कोई विचारक की बात मेरे विचार से मेल खा जाती है तो मैं उसकी पीठ ठोक देता हूँ...मैंने बस वही किया था, यह महज इत्तेफाक है कि कृष्णमूर्ति का विचार मेरे विचार से मेल खा गया| और मैं जीवन सोच-समझकर और विचार करके नहीं जीता हूँ....जीवन हर क्षण नया है कोई भी पुराना विचार काम नहीं आ सकता है....मैं होशपूर्वक जीता हूँ, सोचपूर्वक या विचारपूर्वक नहीं....| Here, I would use Buddha's word 'right awareness'-सम्यक बोध...!!! अंतिम बात, देश, धर्म, जाति और स्वतंत्रा इत्यादि राजनितिक बातें हैं... कोई भी बच्चा किसी देश में पैदा नहीं होता है.... यह सारा अस्तित्व हमारा है और हम इसके है....!!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

भाई सूफी जी, आपको पता है कि आप भारतीय क्यों है..??? क्योंकि ये महज़ एक इत्तेफाक है कि आप भारत में पैदा हो गए..ज़रा सा खिसक के रेड क्लिफ लाइन के उस पार पैदा हुए होते तो आज 14 अगस्त को ही स्वतंत्रता दिवस मना रहे होते..जहाँ तक मुझे लगता है मैं ने इस लेख में कोई प्रश्न तो उठाया ही नहीं..बात इतनी सी है कि इत्तेफाक ही सही लेकिन जिस देश में पैदा हुए हैं वहीँ के झंडे पार अभिमान करना है और वहीँ का राष्ट्रगान गाना है चाहे वो राष्ट्रभाषा में न हो कर किसी आंचलिक भाषा में हो और किसी नोबेल प्राइज विनर द्वारा किसी गोरे साहब की चाटुकारिता में लिखा गया हो....हम तो चुपचाप सर झुका कर इस बात को मानते चले आ रहे हैं.....लड़ाई , विनाश और उपद्रव तो तब होता जब हम इसके खिलाफ आवाज़ उठाते....(हम का मतलब सभी भारतवासी....आप भी .. ) ..हाँ, ज़्यादा किताबें पढ़ कर आप विचारकों के कोट रट लेने में भले ही प्रवीण हो गए हों लेकिन जीवन शैली सीखने के लिए अपनी खुद की सोच समझ के असूल बनाना सीखिये ...धन्यवाद..

के द्वारा: sinsera sinsera

"जब तुम ख़ुद को भारतीय, मुस्लिम, इसाई या फिर कुछ और बुलाते हो, तो तुमने कभी विचार किया कि तुम हिंसक हो रहे हो? और तुम्हे पता है कि यह हिंसा क्यों है? क्योंकि, तुम्ह ख़ुद को पूरी मानवजाति से अलग कर रहे हो..!"- जे. कृष्णमूर्ति आपकी लेख सार्थक है लेकिन विचारणीय नहीं है| अप बस लोगों को 'गिल्ट फील' कराना चाह रही हैं, जो कि रुग्णता है| अब मेरा सवाल यह है कि कहीं आपको लोगों में गलती ढूंढने की आदत तो नहीं हो गयी है....?? क्योंकि जो प्रश्न आप उठा रही हैं वो सार्थक है, लेकिन फिर उसके बाद जो आप बाते कर रही हैं वह उससे भी ज्यादा निरर्थक है जो लोग अभी कर रहे हैं....!! अप बुद्धिमान विद्यार्थि की भांति बड़े-बड़े प्रश्न तो उठा देती हैं, लेकिन जब बात समाधानों की आती हैं तो आप उन्ही थोथी मूल्यों की दलीले देने लगती हैं जिससे सिवाय, लड़ाई, विनाश और उप्दर्व के आज तक कुछ नहीं हुआ है| "Nationalism is, after all, a false sentiment, stimulated by vested interests and used for imperialism and war."- J. Krishnmurti

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! सादर अभिनन्दन ! आपका स्वागत है ! बहुत दिनों के बाद आपने इस मंच पर कुछ लिखा है ! इस लेख में आपने सही कहा है कि-"जब हमारे भारत देश के नागरिक शिक्षा, तकनीकी, कला या खेल आदि के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर कोई महान उपलब्धि प्राप्त करते हैं और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर उनका सम्मान किया जाता है , उस समय बहुत सारे झंडों के बीच में जब भारत के राष्ट्रगान के साथ हमारा तिरंगा शान के साथ सर ऊँचा कर के , झूम के लहराता है , तब उस दृश्य को देख कर समूचे भारतवर्ष के प्रत्येक नागरिक को जो रोमांच होता है, मेरे विचार से यही तिरंगे का वास्तविक सम्मान होता है."15 अगस्त की सबसे बड़ी बधाई यही है कि आज हम स्वतंत्र हैं ! ये स्वतंत्रता सबको और आपको भी मुबारक हो !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

ये सच है कि जिस समय ये दुर्घटना हुई उस समय हिंदुस्तान तो क्या ,पुरे विश्व में एक आक्रोश की लहर जाग उठी थी..लोग-बाग अपना होश-हवास खो कर, भूख,प्यास,नींद, सर्दी, बारिश भूल कर सड़कों पर आ उतरे थे..सिर्फ तुम्हारा हाल जानने को और तुम्हारे न रहने पर तुम्हे न्याय दिलाने को…लेकिन क्या हुआ..समय बीतने के साथ ज़ख्म भरते गए..हफ्ता बीतते न बीतते इसी किस्म की घटनाएं फिर सुर्ख़ियों में आने लगीं..तुम्हारे अपराधी पकडे गए लेकिन पूरे समाज में जो नराधम खुले घूम रहे हैं वो अपनी करनी करतूत करते चले आ रहे हैं.. उसकी बहुत गलतियां रही होंगी और ये गलतियां दिल्ली में कोई मायने नहीं रखती जहां 14 साल की उम्र में बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड की जरुरत महसूस होने लगती है , क्यूँ ? मैं नहीं जानता ! तब अपने संस्कारों और सरोकारों की याद नहीं रह जाती किसी को भी ! जो हुआ वो जैसा हुआ , कोई अलग अलग तरीके से बयान करेगा किन्तु उसकी मौत ने बहुत कुछ बदला तो है कानून की किताब में , भले जमीन पर उसका असर नहीं दीखता !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

प्रिय यमुना जी, नमस्कार..आपकी यह छोटी सी भावाभिव्यक्ति मुझे भाव विह्वल कर गयी...और इसके साथ आपकी प्रतिक्रिया भी बहुत अच्छी लगी..ये बात तो है कि जिन तक ये बात पहुंचनी चाहिए वे तो ऐसे साहित्य से कोसों दूर हैं...इसीलिए हमें ये करना होगा कि हम समाज को जागरूक करें...आज स्कूलों में चौथी पांचवी क्लास से ही बच्चे बॉय फ्रेंड गर्ल फ्रेंड बनाना चालू कर देते हैं...ताज्जुब होता है कि अक्सर दोस्तों तक बात सीमित रहती है और माँ बाप तब जान पाते हैं जब पानी सर से ऊपर चला जाता है... आरुषि का केस इसका ज्वलंत उदहारण है..सहेलियों के उकसाने पर उसने घरेलु नौकर से सम्बन्ध बनाये ...माता पिता का इस तरह समाज में ऊँचा मुकाम हासिल करने का क्या फायदा कि अपना बच्चा ही गर्त में गिरा पड़ा हो....खैर..न तो एक अपराधी है और न ही एक शिकार.....सब शिक्षा लें और सब की भलाई सोचें तभी कुछ हो सकता है.....अपने विचार देने के लिए आपका धन्यवाद..

के द्वारा: sinsera sinsera

आदरणीय सद्गुरुजी, नमस्कार, जो बात मुझे खटकी थी उस को अपने अंडरलाइन नहीं किया...मैं ने आगे कहा..."अगर तुम बलिया में होती तब भी क्या ऐसा करती...??" थोड़ी यह बात भी होती है , बच्चे घर से निकलते ही आज़ाद पंछी की तरह उड़ने लगते हैं..खैर.....ज्योति की मृत्य "Multiple system failure" से हुई ....सिर्फ उसका ही नहीं बल्कि पूरी सोसाइटी का "Multiple system failure" हुआ था......सिर्फ इंटरनेट की ही बात नहीं है वो तो जलती हुई आग में घी जैसा है..इंसान का लालन पालन , परिवेश, पैरेंटिंग ..सब कुछ मायने रखती है....बीमारी की जड़े बहुत गहरी हैं तभी तो त्वरित सजा दे कर भी समाधान के बजाय घटनाएं बढ़ती जा रही हैं...अपने सही कहा की एक दूसरे को सम्मान देने से ही ऐसी घटनाएं रुकेंगी....स्त्रियां पुरुष को उसकी इच्छा के विरुद्ध उकसा तो सकती हैं लेकिन इससे पुरुष की प्राकृतिक शारीरिकी को कोई नुकसान नहीं पहुचता इसलिए दोनों के "after effect " में बहुत फर्क है .....अपने समय दिया इसके लिए धन्यवाद...

के द्वारा: sinsera sinsera

सरिता जी इस ब्लॉग के दोनों ही पहलू बहुत ही विचारणीय हैं. अपराध के कारणों का विश्लेषण बहुत ही तार्किक है ...और सच कहा आपने पोर्न साइट्स बंद होने चाहिए....इन अपराध को मैं क्षणिक भावावेश से उतपन्न भी नहीं मानती ये हर वक्त अंतर्मन में उठने वाले विचारों की कार्यों में परिणति होते हैं अच्छा साहित्य,अच्छी संगति से कोसों दूर ऐसे व्यक्तित्व सदा जो सोचते हैं वही कर बैठते हैं सच कहूं तो जिनके लिए साहित्य लिखा जाता है वे इसे पढते नहीं और जो पढ़ रहे होते हैं वे पहले से ही सुसंस्कृत और परिष्कृत होते हैं अगर आपका यह ब्लॉग ऐसे लोगों तक भी पहुँच पाता वे भी इसे पढते ...पर नहीं पोर्न साइट्स देखना ही जब अच्छा लगे तो कोई इतने सुन्दर विचारों तक क्यूँ आना पसंद करे .इस सम्बन्ध में मैंने यह छोटी सी भावाभिव्यक्ति रखी है यहाँ ....... o poetry ! plzzzzzzzz...... u go to hibernate or be dormant as ....... you are useless for those who need to be changed and who want to read you are already changed. इतने उत्कृष्ट ब्लॉग के लिए आपको हार्दिक बधाई.

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आदरणीया सरिता सिन्हा जी,पूरा लेख पढ़ने के बाद महसूस हुआ कि आपने कितनी मेहनत इस लेख को लिखने में की है.एक बहुत सार्थक पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाई.आपने अपने लेख में एक जगह कहा है कि-"एक बार ..अगर सिर्फ एक बार तुमने सोचा होता तो शायद रात में घूमने का कार्यक्रम दिन में भी रखा जा सकता था..रविवार था उस दिन..अवकाश का दिन था और कार्य दिवस अगले दिन था…तुमने जो अकारण सजा पायी उस कष्ट का सहभागी बनते हुए दुनिया में किसी ने कभी ये प्रश्न नहीं उठाया" उस लड़की ने तो गलती की ही,परन्तु ये घटना हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है ?समाज में गरिमा और सम्मान के साथ सभी को जीने का अधिकार है,जो हमारा सरकारी सिस्टम हमें देने में असमर्थ है.निर्भया ने अपनी जान अपनी गरिमा और सम्मान की रक्षा के लिए लड़ते हुए कुर्बान की है,उसके बहादुरी के जज्बे को सलाम.लानत है उन रेपिस्टों पर और शर्म आनी चाहिए हमारे सरकारी सिस्टम को जो हमें सुरक्षा प्रदान करने में नाकाम है.आप ने और कई ब्लॉगर मित्रों ने इंटरनेट पर परोसे जानेवाली अश्लील सामग्री को बढ़ते हुए बलात्कार के लिए दोषी ठहराया है.ये भी एक अर्धसत्य है.मैं एक पुस्तक पढ़ रहा था,उसमे दिया था कि समाज में आज से भी ज्यादा बलात्कार प्राचीन समय में होता था,जबकि उस समय इंटरनेट टीवी और फ़िल्म कुछ भी नहीं था और महियाएं कपड़ों से पूरा शरीर ढके रहती थीं.बलात्कार एक प्राकृतिक बीमारी है.यदि ऐसा नहीं होता तो तेजपाल बुद्धिजीवियों पर बलात्कार के आरोप नहीं लगते.आदरणीय संतलाल करुण जी कभी बलात्कारियों का गुप्तांग काटने की बात करते है तो कभी उनको मौत कि सजा देने की बात करते हैं.ये कोई स्थायी समाधान नहीं है और बुद्धिजीवियों के द्वारा सुझाया गया उचित समाधान भी नहीं है.इस समस्या का उचित समाधान ये है कि हम इसे एक प्राकृतिक समस्या मानते हुए स्त्री और पुरुष दोनों एक दुसरे कि प्रकृति को समझें और आपस में दोस्ती बढ़ाएं.समाज में जब भावनात्मक सम्बन्ध बढ़ेंगे तो बलात्कार जैसी घटनाएं तभी रुकेंगी.बलात्कार केवल मर्द ही नहीं करते हैं,बलात्कार स्त्रियां भी करती हैं,लेकिन उस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता है.कमेंट थोडा विस्तृत हो गया,इसके लिए क्षमा कीजियेगा.अच्छे लेख के लिए पुन:बधाई.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

नमस्कार जी ............... अगर ये कहूं कि हमेशा कि तरह ही एक बहतरीन लेख लिखा है आपने तो फिर ये एक घिसा पिटा कमेंट होगा लेकिन यही सच है तो कहना तो पड़ेगा ही ............लाजवाब लेख ...... जहाँ तक मैंने समझा है, मैंने महसूस किया है तो ये लेख एक "लेखिका" ने नही बल्कि एक "माँ" ने लिखा है ! और लोग अगर इसे पाठक न बनकर एक माँ , पिता, भाई, बहन, बेटी बनकर पढ़ेंगे तो शायद आपके लेख के उद्देश्य को ठीक से समझ पाएंगे ! अपनी सुरक्षा का खुद ही प्रबंध करना होगा लेकिन बड़े अफ़सोस से ये कहना पड़ रहा है कि सुरक्षित होना सब चाहते हैं लेकिन सुरक्षा करना कोई नही चाहता ! आप ही की तरह अगर सभी माँ- पिता या घर के बाकि सदस्य भी अपने बच्चो को ये सब बाते समझा पाये तो निश्चित ही स्थति में कुछ सुधर जरुर होगा ......आई होप कि मैंने कुछ गलत नही कहा होगा ...............धन्यवाद and All the best....

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

आदरणीय सर, .आपके आलेख पढ़े लेकिन आपने कमेंट्स बंद कर रखे हैं इसलिए खाली हाथ लौट आयी ... अपराधी को सजा दिलाने के लिए दुनिया भर में आवाज़ें उठायी गयीं और उठायी जा रही हैं..उन में मेरी भी एक आवाज़ शामिल है ..लेकिन ये अंतहीन क्रम है ...इस तरह तो पापी कुंठित हो जायेगा लेकिन पाप और पाप की सम्भावना अन्यत्र बनी रहेगी..कितने जंगलों में से कितने अपराधियों को चुन कर कितनी बार सजा दी जायेगी......मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं ने बलात्कारियों के पक्ष में कोई बात कही हो..ये तो सिर्फ एक कार्य-कारण सम्बन्ध का विश्लेषण है.. बिना कारण जाने किसी भी बीमारी को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जा सकता..ये वैसे ही है जैसे हम किसी बीमारी का वैक्सीनेशन लेते हैं...इसका ये मतलब तो नहीं कि इलाज किया ही नहीं जायेगा...आपके कहने का ये अर्थ भी लगाया जा सकता है बलात्कार की घटनाएं होती रहें ताकि बलात्कारी को भीषण सजा दी जा सके.... किसी को पकड़ कर मार डालने से सिर्फ सोच समझ का आभाव झलकता है इससे धरती का बोझ कभी कम नहीं होता......वर्ना इतनी विभीषिकाएँ हुईं...भूकम्प आये, ट्रेने टकरायीं, प्लेन क्रश हुए, बादल फटे, दंगे हुए, आतंकी हमले हुए.....लेकिन जनसँख्या का आंकड़ा वहीँ का वहीँ है...........माफ़ी चाहती हूँ, आपने हमेशा गम्भीर सोच का परिचय दिया है ,आपसे ऐसे लापरवाह कमेंट की अपेक्षा नहीं थी....कृपया अन्यथा न लीजियेगा ...कीमती समय देने के लिए धन्यवाद...

के द्वारा: sinsera sinsera

आपका कमेंट ज़माने की ज़बान बोलता है..यही सच है ..दुनिया वालों के लिए एक घटना घटी, समय बीता और बात आयी गयी हो गयी..इसीलिए तो घटनाएं घटती रहती हैं और आयी गयी होती रहती हैं...तारीफ तो उनकी है जो मोमबत्ती ले के निकले थे और आगे घटने वाली और घटनाओं के लिए और ज़यादा मोमबत्ती का आर्डर दे के बैठे हैं...गड़े मुर्दे उखाड़ने और झंडा वंडा ले के निकलने का वास्तव में क्या मतलब...." न तो हमने रेप किया न हमारा हुआ."ये शायद आपकी सोच नहीं है... .अपने जिस आत्मघाती तरीके से दुनिया की सोच को सामने रखा है वो काबिले तारीफ है....हो सकता है लोग आप को क्रूर कहें लेकिन मैं समझती हूँ कि ये ये जनसामान्य की सोच रखने का तरीका है....इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं...

के द्वारा: sinsera sinsera

शिप्रा जी, स्वागतम..आपसे मेरी पहचान नयी नहीं है..आपकी और सूफी जी की खट्टी मीठी नोक झोंक के हमने भी बहुत मज़े उठाये हैं और तभी से आपकी शब्द सम्पदा, चयन, और धाराप्रवाह लेखन शैली की मैं प्रशंसक हूँ..ये अलग बात है की उस पोस्ट में मेरे कमेंट की जगह नहीं थी सो कहा नहीं...मैं जानना चाहती हूँ कि मुझसे क्या निरिक्षण छूट गया क्यूंकि लेख का उद्देश्य सब की सुरक्षा ही है...लेकिन अपने कमेंट में आप मेरी हर बात से सहमत होती दिखीं, कहीं भी उस छूटी हुई बात का उल्लेख नहीं किया.. ये बात तो है कि जहाँ लड़कियां आधुनिकता के युग में लड़कों को चुनौती देती हुई दिखती हैं वहीँ अंदर ही अंदर पुरुष के साथ सुरक्षित रहने के संस्कार को खुद से दूर नहीं कर पाती हैं.. शायद ये अनजाने में पुरुष कि शक्ति को स्वीकार करना हो..शायद इसीलिए ये अस्तित्व की जंग कभी ख़त्म नहीं हो पाती है...जी हाँ समाज का ज़िम्मेदार नागरिक होने केनाते हैम गलतियों को उजागर करते हैं न कि किसी का पक्ष लेते हैं इसीलिए कहा कि अपनी और से सुरक्षा के प्रबंध पूरे रखना चाहिए ...फिर कब क्यूँ कहाँ कौन कैसे आदि की चर्चा तो बाद की बात है...आपकी बात अच्छी लगी ..धन्यवाद..

के द्वारा: sinsera sinsera

आदरणीय सरिता जी, आपका ब्लॉग पढ़ा. बलात्कार की वीभत्सता का बहुत विस्तृत और सूक्षम वर्णन किया है आपने. मनोवैज्ञानिक स्तर पर सूक्षम निरीक्षण किया है वह वास्तव में किसी हद तक सटीक है पर बहुत हद तक इसमें एक सूक्षम निरीक्षण छूट गया है. बहुत तो नहीं पर आपके कई अन्य पोस्ट भी पढ़े हैं. खासकर आपके गज़लों की अन्य पाठकों की तरह मैं भी मुरीद हूं. आपके हर लेख में गहनता होती है. पर सच कहूं तो इस लेख से मैं कहीं निराश हुई हूं. आपने ज्योति के नाम आधुनिकता के नाम पर मस्ती-मजाक और खिलंदरेपन में जीने वाली जिन लड़कियों को यह खत लिखा है वह उद्घोष मुझे गलत लगा. मैं सहमत हूं इस बात से कि लड़कियों की अपनी सुरक्षा अपने हाथ है. मैं सहमत हूं इस बात से कि समाज में ऐसे बीमार भरे पड़े हैं और इन्हें चुन-चुन कर खत्म नहीं किया जा सकता. मेरा भी मानना है ‘Prevention is better than Cure’. मैं मानती हूं इस बात को कि लड़कियों की छ्ठी इंद्रियां बहुत तेज होती हैं और उन्हें भगवान की दी इस नेमत को अपनी सुरक्षा के चाक-चौबंद में लगाना चाहिए, इस्तेमाल करना चाहिए. मैं मानती हूं इस बात को विश्वास की जरूरत होती है, अतिरेक विश्वास इंसान को डुबा ले जाता है. मैं मानती हूं इस बात को कि अपनी सुरक्षा अपने हाथ होती है और हर लड़की को इसके लिए खुद सोचना चाहिए. लेकिन जो आपने ज्योति का मुद्दा उठाया है मुझे लगता है इसमें ज्योति का अतिविश्वास आधुनिकता के आवेग में खुद पर अतिरेक विश्वास नहीं था बल्कि हमारे समाज की एक दकियानूसी, पिछड़ी सोच का अतिरेक विश्वास था. ‘एक पुरुष के साथ सुरक्षा की भावना के सामाजिक चलन का अतिरेक विश्वास था’. यह वही भावना है कि एक 20 साल की लड़की को सुरक्षित रखने के लिए 10 साल के भाई को भेज दिया जाता है. ज्योति की अनहोनी के आस-आस ही नोएडा में 8वीं की एक लड़की जो अपने 10 साल के भाई के साथ सामान खरीदने जा रही थी और गैंगरेप की शिकार हुई (दिन में ही) उसे आप क्या कहेंगी? उसमें छ्ठी इंद्रिय से बचने की जरूरत पर आप क्या कहेंगी? जहां तक सवाल है आधी रात का.. हां, यह लड़की को सोचना चाहिए! पर इसके लिए भी जगह और परिवेश मायने रखता है. खैर वह दूसरी बात है. पर यहां सवाल आधी रात का नहीं था, यहां सवाल था कि बस एक लड़के, एक पुरुष के साथ मात्र से एक स्त्री, एक लड़की अपने आप को सुरक्षित महसूस करने लगती है जबकि हकीकत यह है कि हैवानियत पुरुष या स्त्री नहीं देखती. इसमें ज्योति का दोष नहीं समाज की उस सोच का दोष है जो ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देता है. ज्योति में आत्मविशास होता तो वह अपनी सुरक्षा के लिए खुद सोचती और सोचती कि उस खाली बस में इन ‘दो लोगों’...दो लोगों के साथ कुछ अनहोनी घट सकती है. उसमें आत्मविशास ही नहीं था. उसे अपने पुरुष साथी के साथ होने भर से अपनी सुरक्षा का विश्वास था. हमें इस सोच को बदलना होगा. कहते हैं जो अपनी मदद नहीं करता, भगवान भी उसकी मदद नहीं करता. आज की लड़कियां कपड़ों में, रहन-सहन में, टेक्नॉलोजी के इस्तेमाल में और अन्य कई रूपों में आधुनिक जरूर हो गई हैं लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह है कि सोच में आज भी ये पिछड़ी हुई हैं, हमारा समाज पिछड़ा हुआ है. ‘अपनी सुरक्षा अपने हाथ’ की सोच जब तक महिलाओं में नहीं आएगी तब तक ये निर्भया जैसे मामले होते रहेंगे लेकिन हमें यह समझना होगा कि आखिर कारण है क्या और कहां है? उस कारण का सही विश्लेषण करना होगा. वरना मुद्दा भटक जाएगा. नब्ज पकड़े बिना इंजेक्शन दोगे तो जान चली जाएगी. एक स्त्री होकर सिर्फ आधुनिकता के नाम पर स्त्रियों का पक्ष लेना सही नहीं है लेकिन समाज का एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते न सिर्फ एक स्त्री लेकिन समाज के हर व्यक्ति को इसपर गहराई से, सही दिशा से सोचने की जरूरत है, समस्या के कारणों और इसके निवारण पर सही विश्लेषण की जरूरत है. कहना तो बहुत कुछ और भी चाहती हूं. पर यहां इतने में समाप्त करना चाहूंगी. आपका भी मकसद समाज की सुरक्षा है, मेरा भी. कभी और लंबी बात होगी. बात करने से बात बनती है. ऐसे प्रयास होने चाहिए और हर समाज के तबके को अपना, पराया, धर्म, जाति, लिंग भेद से परे होकर गंभीरता से इसपर विचारना और अपने मत रखने चाहिए. प्रयास एक सही निष्कर्ष निकालने और उसे स्वीकार करते हुए बदलाव लाने के होने चाहिए. तभी वास्तव में कुछ सुधारात्मक बदलाव हो सकता है.

के द्वारा: Shipra Parashar Shipra Parashar

आदरणीया सरिता बहन, सुप्रभात! मैं सोच रहा था कि काफी दिनों से आपकी कोई पोस्ट क्यों नहीं आ रही...? मैं यह भी सोच रहा था कि आप गहन अद्ध्ययन में लगी होंगी और कुछ नया लेकर उपस्थित होंगी ... जो भी हो आपके विस्तृत आलेख को पढने के बाद मुझे यही समझ में आया कि यह आलेख हर माँ और हर लड़की अवश्य पढ़े ... शायद आपका यह 'ज्योति की जागृति' वाला आलेख पढ़कर कुछ नयी बालाओं का भला हो ... पर उन सुनन्दाओं, मदेरणाओं, गीतिकाओं,फिजाओं का क्या होगा जो जान बूझ कर गलतियां करती हैं. प्रश्न सिर्फ पुरुष की ही मानसिकता का नहीं है ...नयी अंधी और विकसित कही जेन वाली संस्कृति ... जहाँ समलैंगिकता को बढ़ावा दिया जाय ...उन सबका क्या होगा. पोर्न साइट्स तभी विकसित होते हैं जब लोग गणमान्य लोग चाव से देखते हैं ... प्राइम टाइम में या कहें हर टाइम में कोंडोम का उत्तेजक विज्ञापन ...ऊफ! दीदी ... बहुत कुछ जो यहाँ लिखने योग्य भी नहीं है ... फिर भी हमारा आपका काम है जन जागरण ...मैं चाहूंगा आप इस आलेख को अन्य मंचों पर भी रक्खे ..और फेसबुक पर तो अवश्य ही रक्खें. आपका भाई - जवाहर.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय जवाहर भाई , सद्गुरुजी, विनय सक्सेना जी, अभिषेक जी, यतीन्द्र जी, शालिनी कौशिक जी, वैद्य सुरेन्द्रपाल जी, सोनम सैनी जी, योगी जी, शाही सर, शकुंतला मिश्रा जी और भगवन बाबू जी....मैं आप सब की ह्रदय से आभारी हूँ कि आप लोगों ने मेरी मामूली सी रचना को अपना कीमती समय दिया और मुझे जन्मदिन कि शुभकामनायें प्रेषित कीं...थोडा सा अपराध बोध है मुझे कि मैं चाह कर भी आपको समय से धन्यवाद तक न कह सकी , कारण, कुछ घर की ज़िम्मेदारियाँ और बुज़ुर्गों की अचानक आयी बीमारी ने मेरे दिन के 24 घंटे मुझसे ले लिए ...मैं आप सब की भावनाओं से अभिभूत हूँ, भागयशाली हूँ जो आप सब मेरे मित्र हैं..आगे भी ऐसे ही साथ देते रहिएगा...पुनः धन्यवाद..

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

सबसे पहले आपको बधाई सरिता जी ... सार्थक लेख दिया आपने सरिता जी जो एक आदर्श समाज की नींव रखता है पर व्यवहार की कसौटी पर ये कल्पना मात्र ही है। शायद आप इसे पुरुषवादी मानसिकता कहें लेकिन मै इसे इस लिहाज से कह रहा कि ईश्वर ने सभी को अलग-अलग मस्तिष्क दिया जिसका हर कोई अपने ही अंदाज में प्रयोग करता है। सही और गलत जैसे शब्दों का स्वामी मनुष्य ही है जिसने एक आदर्श और सभ्य समाज को बनाने के स्वरूप इसे इजात किया। कुदरत भी कभी अपने नियम के विपरीत होता है , कभी बिन बादल बरसात भी होती है , कभी जन्म लेने से पूर्व ही बच्चे को रोग का सामना करना पड़ता है। इसी तरह स्त्री-पुरुष की कथा भी है। वर्तमान समाज में स्त्रियों को ही सबसे ज्यादा बेटे की कामना होती है। पुरुषों के बारे में आप ज्यादा जानती हैं लेकिन ये आंकड़ा है कि 70 प्रतिशत से ज्यादा स्त्रियां अपने पति के लिए ईमानदार नहीं होती। जिसका विवरण आपने अपने लेख के माध्यम से दूसरी तरह से पेश किया ही है। सास - बहु जैसे किस्से भी स्त्रियों के ही आपसी मतभेद है। जो हमेशा ही पुरुष भूमिका से संयमित होते हैं। अच्छे और संयमित मनुष्य ही सदैव समाज के लिए सर्वोत्तम और प्रथम रहेंगे , उनमें चाहे स्त्री हो या पुरुष । फिर एक नया सवेरा होगा जैसा आपने वर्णित किया। .......................एक बार फिर बधाई के साथ आपकी सोच को नमन ।

के द्वारा: RAHUL YADAV RAHUL YADAV

के द्वारा:

हमेशा की तरह बहुत सुन्दर प्रयास सरिता जी । अब जैसा जागरण परिलक्षित हो रहा है, चहुँओर जैसी खुशनुमा बयार का आभास हो रहा है, उसमें असामान्य पहियों की लंगड़ाती चाल अवश्य तिरोहित होगी । फ़िर वह सुबह भी अवश्य आएगी, जिसकी प्रतीक्षा में भारतीय नारी समाज ने सदियों तक घनघोर तिमिर के मध्य ही साँसें चलाते रहने का अभिशाप झेला, और उफ़ तक नहीं करने दिया गया । परन्तु सन्तुलन के लिये सह-अस्तित्व का बोध, एकदूसरे के प्रति परम्परागत सम्मानभाव, तथा अपनी-अपनी सीमाओं के प्रति सजगता भी नितान्त आवश्यक होगी । समाज को नारी से जो अपेक्षाएँ रही हैं, उसकी मर्यादाएँ लांघ कर अप्राकृतिक स्वरूप की चाह जैसी अभीप्सा भी समाज के हित में नहीं होगी, इसका ध्यान भी नारी को रखना ही होगा । जब ध्रुवसत्य है कि प्राकृतिक दुर्बलता का कोई निदान नहीं, तो महत्वाकांक्षाओं में भी एक मर्यादा का भाव लेकर चलना ही होगा, ताकि कुंठाजनित विवादों का कभी सामना न करना पड़े । साधुवाद !

के द्वारा:

आदरणीया सरिता जी, आप का सम्बंधित आलेख प्रशंसनीय, पठनीय और भली-भाँति विचारणीय हैं | पर जब तक स्वयं किन्नर जमातों तथा समाज परस्पर दोनों ओर से इस विसंगति के विरुद्ध सामाजिक अभिकर्ता पैदा नहीं होंगे और किन्नर इस अभिशाप को स्वीकार करके सात्विक जीवन शैली के लिए आगे नहीं बढ़ेंगे, तब तक इनके पक्ष की मेरी, आप की और सब की सारी बातें सिर्फ़ बातें ही रहेंगी | न तो इनके विकृत भोग की जिद जायज है और न ही समाज द्वारा इनके प्रति उपेक्षा और किसी तरह का दुर्व्यवहार | कुत्सित पुरुषों द्वारा इनके प्रति यौनिकता को बलात्कार की श्रेणी में दंडनीय अपराध माना जाना चाहिए | इनके द्वारा व्यंग, विद्रूपता, हास-परिहास चार पैसे के लिए अनुचित है और समाज द्वारा इनकी उचित शिक्षा-प्रशिक्षण, काउंसलिंग आदि से इनके अश्लील दुर्व्यवहारों को भी दूर किया जा सकता है और इन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सकता है | पर वह मंजिल अभी दूर है, इनके प्रति समाज और शासन अभी उतना चेता नहीं है और उल्टे ये अय्यासी और अप्राकृतिक घिनौने यौनिक भोग के अधिकार की माँग पकड़े हुए हैं | न्यायालय से नहीं, तो अब संसद से अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं | आप बताइए, इनके ऐसे असामाजिक, अश्लील, अप्राकृतिक और हमें, आप और सब को शर्मसार करनेवाले कुकृत्य का समर्थन कैसे किया जा सकता है ! ब्लॉग पर आने और इतने महत्त्वपूर्ण ब्लॉग का लिंक देने के लिए हार्दिक आभार !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

हाँ.................हाँ...................हाँ.......................हाँ.................हाँ...................हाँ.......................ओह माय गॉड ................हाँ.................हाँ...................हाँ.......................हँसी बंद नहीं हो रही है दी.........................नाराज मत होइए; जी भर के हँस लेने दीजिये..................हाँ.................हाँ...................हाँ.......................हाँ.................हाँ...................हाँ.......................ओह माय गॉड ................हाँ.................हाँ...................हाँ.......................मैं यह सोचकर हँस रहा हूँ कि आप का कहना है, "मैं सोच ही रही थी कि खून की गंध लगते ही वैम्पायर आने लगेंगे……." हाँ.................हाँ...................हाँ.......................हाँ.................हाँ...................हाँ.......................ओह माय गॉड ................हाँ.................हाँ...................हाँ.......................हँसी बंद नहीं हो रही है दी.........................और मेरा कहना यह है कि काश आप खून बहाने से पहिले सोच लेती तो वैम्पायर नहीं आते. हाँ.................हाँ...................हाँ.......................हाँ.................हाँ...................हाँ.......................ओह माय गॉड ................हाँ.................हाँ...................हाँ.......................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीया सरिता जी, आज मैंने आप का यह अत्यंत मौलिक और बड़े साहस के साथ लिखा गया आलेख देखा, तो 184 वीं टिप्पणी करने का मन हुआ | मैंने सरसरी निगाह से लगभग सभी टिप्पणियों को भी समझने का प्रयास किया | जाफ़र साहब के ब्लॉग पर जाने की कोशिश की पर उनका ब्लॉग खुला नहीं | आलेख और उस पर आई टिप्पणियों ने तथ्य को काफी-कुछ स्पष्ट किया है, किन्तु भारतीय ( वैदिक-पौराणिक युग से आज तक ) वैचारिकाता के समान ज़ाफरों में लकीर का फ़कीर से बाहर होने की व्यापक वैचारिक उदारता और समझ अभी भी पैदा नहीं हुई है | कम-से-कम भारत में ही यदि ऐसा हुआ होता तो आतंकवाद के शमन में बड़ा योगदान मिला होता | खैर.., वैचारिक तारों को झनझनाते इस नायाब आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: Rajesh Kumar Srivastav Rajesh Kumar Srivastav

आदरणीया सरिता जी, आप ने नारी और उसके जीवन की विसंगतियों पर विस्तृत तथा बहुत ही पठनीय आलेख दिया है -- "यहाँ प्रश्नचिन्ह शोषण करने वाले पुरुषों पर नहीं है..बल्कि अपने फायदे के लिए स्वेच्छा से देह समर्पित करने का शॉर्ट -कट अपनाने वाली नारियों से पूछा गया प्रश्न है कि जब तक स्वार्थ सिद्धि होती रहती है , तब तक आदान-प्रदान का ये खेल राज़ी ख़ुशी से चलता रहता है , लेकिन जैसे ही लाभ में कोई कमी आने लगती है या कोई मुद्दा फंसता है वैसे ही ये सती नारियां यौन-शोषण का ट्रम्प कार्ड क्यों चल देती हैं…" XXXXX "अंत में एक बहुत छोटा वर्ग उन नारियों का है जिनके सामने सच में ही अस्तित्व की रक्षा का संकट है…ये वो महिलाएं और बच्चियां हैं जो संसाधन विहीन हैं…मेधावी और कुशाग्र होने के बाद भी या तो कमज़ोर आर्थिक स्थिति या दूरस्थ गांवों अदि में रहने के कारण जो शिक्षा से वंचित रह जाती हैं…जिनके दो हाथ कलम पकड़ने के बजाय अपने माता पिता के साथ पेट भरने के उपाय खोजते हैं..और जिनके आगे बढ़ने के अरमानो को कुचलते हुए उनके माता पिता कच्ची उम्र में ही ज़िम्मेदारी से मुक्ति पाने के लिए शादी के चक्रव्यूह में फंसा देते हैं …." ...इत्यादि | मेरी निजी धारणा है कि नारी-जीवन के प्रति समझ, सहभाव और सद्व्यवहार हर पुरुष का धर्म है, पर चिंतनीय कि ऐसा दुनिया में बराबर दिखाई नहीं देता | आप के लेख से मुझे पन्त की ये पंक्तियाँ याद हो आईं -- " प्रकट हुई मानव-अंगों में सुन्दरता नैसर्गिक शत उषा-संध्या से निर्मित नारी-प्रतिमा स्वर्गिक |" ऐसे स्वस्थ लेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय जाफर जी,मेरा प्रेम आप तक पहुंचे.अनगिनत मुस्लिम भाई मेरे परिचित हैं.हमारे त्योहारों पर वो हमें बधाई देते है और उनके त्योहारों पर हम उन्हें बधाई देते हैं.इसी देश में हमको और आप को मिल जुल के रहना है.इस देश में हिन्दू मुस्लिम के बीच कितने दंगे हुए,कोई गिनती नहीं है.लेकिन क्या इससे हम दोनों के धर्म पर कोई फर्क पड़ा,नहीं.आप अपने त्यौहार मनाते हैं और हम अपने त्यौहार मनाते हैं.इसी तरह से इस लेख का भी आप के त्यौहार पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.समय के साथ साथ मनुष्य अपने त्योहारों में कोई न कोई नई चीज भी जोड़ते जाता है.सरिता जी ने केवल इस लेख में एक सुझाव दिया है.उस सुझाव को अभी कोई नहीं मानेगा,लेकिन भविष्य में कभी इस पर इंसान विचार कर सकता है.बुद्धिजीवी लोगों का कार्य ही यही है.कि वो समाज को अच्छा सुझाव दें.ये लोग हिन्दू धर्म की तो और ज्यादा आलोचना करते हैं.आप बुरा न मानते हुए इस बहस को यहीं ख़त्म करें और हाँ,यदि आप का ब्लॉग है तो वहाँ पर अपने धर्म से सम्बंधित लेख लिखें.हम सब लोग भी आकर पढ़ेंगे.अब हम लोग इस बहस को यही ख़त्म करते हैं.अपनी शुभकामनाओं सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा:

आज मेरी स्थिति उस माँ की तरह है जिसके सारे बच्चे आपस मे लड़ रहे हों.. .....इतना कि पाएँ तो एक दूसरे का रक्तपान कर लें...फिर भी सभी माँ से ही शिकायत भी ले कर आते हैं...ऐसे मे माँ क्या करे, सब ग़लत हों तो भी गला तो किसी का नहीं काट सकती , समझाएगी गी ही, ज़रूरी हुआ तो चपत भी देगी, बस ....जानती है कि अभी ये एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं लेकिन मिनटों मे साथ बैठ कर हंसते बोलते और गाते नज़र आएँगे..लड़ाई किसी मुद्दे को लेकर तो है नही बस सब अपनी अपनी बात उपर रखने के चक्कर मे योग्यता दिखा रहे हैं...सभी आपस मे एक दूसरे को जानते हैं फिर वर्णन करने की क्या ज़रूरत है...अच्छे बच्चों की तरह से बात ख़तम करके हाथ मुँह धो कर पढ़ने बैठिए.....क्योंकि समझने समझाने का टाइम अब ख़त्म हुआ... ......सबसे अच्छे तो जाफ़र साहब निकले..जिस बात को पहले दिन बोले थे , आज भी उसी पर अड़े हैं..इस पूरी कहासुनी का उनपर कोई असर नही है..सद्गुरुजी सही कहते हैं, उनका प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है, वैसे प्रश्न तो कोई था ही नही...उनकी एक बनी बनाई धारणा है, अटल विश्वास है....जिस पर वो अडिग हैं............सद्गुरुजी समझदार हैं , अच्छी तरह समझ गये कि कौन क्या चाहता है...आगे से ऐसी लड़ाइयाँ देख कर व्यथित ना होइएगा बल्कि मेरी तरह आनंद उठाइएगा...जीवन चार दिन का है , ये भी सही है, और जीवन का आनंद उठाइए, किसी बात की जल्दी नही है, ये भी सही है......मंच पर चुपचाप काम करने का भी एक मज़ा है और इस किस्म के कोलाहल का भी अपना एक आनंद है...जीवन खट्टा, मीठा, तीखा ....हर स्वाद का मिश्रण है..ये मेरा दर्शन है...चार श्लोक याद करके ज्ञानी बन जाऊँ, अभी इतना वक़्त मेरे पास कहाँ..........

के द्वारा: sinsera sinsera

मुनिवर आप मामले की गंभीरता को समझ नहीं रहे हैं.. ख़राब टेप रिकॉर्डर की तरह एक ही धुन सुनाने लगते हैं आप..मुझे मेरे बचपन के मित्र चमन की याद आ रही है वो रोज़ मेरे यहाँ ताश खेलने आता था रोज़ लड़ाई हो जाती थी उसकी किसी न किसी से, रोज़ बोल के जाता था कि अब कल नहीं आऊंगा, लेकिन फिर अगले दिन तय समय पर आ जाता था...!! ज्ञानी को इतनी गंभीरता शोभा नहीं देती है...!! मैं आपकी दिल से इज्ज़त करता हूँ...आप बेकार में क्रोधित हो जाते हैं... ब्रह्म चर्चा सुंदर है लेकिन हर वक़्त ब्रह्म चर्चा उचित नहीं है...!! और आप को बता दूं जो मैं कर रहा हूँ वो अति प्राचीन तिब्बतन ध्यान विधि है 'अतिशयोक्ति' किसी बात को उस पॉइंट तक पहुंचा दो जहाँ उसका रूपांतरण हो जाये...जैसे पानी का कोथनांक 100 d c होता है जहाँ पहुँच पर पानी भाप बन जाता है उसकी तरह विवाद का भी कोथनांक होता है...!! लगता है तिब्बत के बारे में आप बहुत कम जानते हैं...!! खैर..!! "मुझे आप से बात करने में कोई रूचि नहीं है.इसीलिए आप भी जबदस्ती बातचीत न करें." रूचि कैसे होगी आपकी, लेकिन क्या करें...मेरी भी मज़बूरी है... कल अनील कह रहा था 'ये कैसे सद्गुरु हैं यार...?' मैंने कहा जैसे भी अच्छे हैं...इनको इनके जैसे बने रहने दो...जैसे आसाराम के बात लोगों की साधू शब्द पर से श्रधा उठ गया उसी तरह धीरे धीरे सद्गुरु शब्द का जो सम्मोहन है लोगों के भीतर हो भी इनके मद्ध्यम से टूट जाएगा...मैं भी जानबुझ कर अपने नाम में सूफ़ी जोड़ लिया... लोग शब्द से सम्मोहित हो जाते हैं... ज़रुरत है कि शोब्दों को नए अर्थ दे दिए जाएँ...ताकि लोग इसके भार से मुक्त हो जाए... शायद आप नहीं जानते आप का सद्गुरु होना मेरे लिए कितना उपयोगी है...ये सब मेरा ही कमाल है कि सोनम जी ने आपको डांट दिया था...वर्ना इस देश के लोगों में इतनी कहां हिम्मत की सदगुरुओं को डांट दे...अगर होता तो आज इस देश की ये दुर्दशा नहीं होती....!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आदरणीय सूफी महोदय,जितना आप दूसरों के बारे में नेगेटिव बोलते है,वो सब अपनी ही गई गुजरी स्थिति बयान करते हैं.न तो आप में कोई ज्ञान है और न ही कोई शिष्टाचार.मुझे आप से बात करने में कोई रूचि नहीं है.इसीलिए आप भी जबदस्ती बातचीत न करें.अकेले में बैठ के अपने बारे सोचेंगे तो ये आप पे बिलकुल फिट बैठेगा-"बुरा जो देखन मै चला बुरा न मिलिया कोय,जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय."आप अपने ज्ञान से पहले अपने को तो सुधार लें,फिर बाद में दूसरों को उपदेश दीजियेगा.मुझे आप के ज्ञान की जरुरत नहीं है.पहले अपने भीतर की अज्ञानता और अशंति को देखें.एक अंगुली आप किसी की तरफ उठाएंगे तो चार अंगुलियां अपनी तरफ होती हैं.वास्तव में आप चाहते नहीं हैं कि कोई इस ब्लॉग पर आये,इसीलिए हमेशा कोई न कोई नौटंकी करते रहते हैं.ऐसी घटिया दर्जे की नौटंकी आप करेंगे तो कोई उन ब्लॉगों पर जायेगा भी नहीं ,जहाँ जहाँ आप जायेंगे.यही आप चाहते भी हैं.वास्तव में आप मित्रता करके शत्रुता निभाते हैं.ये आप का नेचर है.मुझे ऐसे ज्ञानियों की जरुरत नहीं है.आप से लाखों गुना बेहतर अनेको ज्ञानी मेरे मित्र हैं.आप अपनी शब्दों की बाजीगरी और बौद्धिक चालबाज़ी से एक दो को मूर्ख बना लेंगे,लेकिन सबको नहीं.ज्यादा अच्छा हो कि अब आगे न आप कमेंट करें और न मै.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

सूफी महोदय,जितना आप दूसरों के बारे में नेगेटिव बोलते है,वो सब अपनी ही गई गुजरी स्थिति बयान करते हैं.न तो आप में कोई ज्ञान है और न ही कोई शिष्टाचार.मुझे आप से बात करने में कोई रूचि नहीं है.इसीलिए आप भी जबदस्ती बातचीत न करें.अकेले में बैठ के अपने बारे सोचेंगे तो ये आप पे बिलकुल फिट बैठेगा-"बुरा जो देखन मै चला बुरा न मिलिया कोय,जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय."आप अपने ज्ञान से पहले अपने को तो सुधार लें,फिर बाद में दूसरों को उपदेश दीजियेगा.मुझे आप के ज्ञान की जरुरत नहीं है.पहले अपने भीतर की अज्ञानता और अशंति को देखें.एक अंगुली आप किसी की तरफ उठाएंगे तो चार अंगुलियां अपनी तरफ होती हैं.वास्तव में आप चाहते नहीं हैं कि कोई इस ब्लॉग पर आये,इसीलिए हमेशा कोई न कोई नौटंकी करते रहते हैं.ऐसी घटिया दर्जे की नौटंकी आप करेंगे तो कोई उन ब्लॉगों पर जायेगा भी नहीं ,जहाँ जहाँ आप जायेंगे.यही आप चाहते भी हैं.वास्तव में आप मित्रता करके शत्रुता निभाते हैं.ये आप का नेचर है.मुझे ऐसे ज्ञानियों की जरुरत नहीं है.आप से लाखों गुना बेहतर अनेको ज्ञानी मेरे मित्र हैं.आप अपनी शब्दों की बाजीगरी और बौद्धिक चालबाज़ी से एक दो को मूर्ख बना लेंगे,लेकिन सबको नहीं.ज्यादा अच्छा हो कि अब आगे न आप कमेंट करें और न मै.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

सोनम जी नमस्कार, "व की गलियो के कुत्तो की याद आ गयी ! वो भी बिलकुल आप दोनों की ही तरह व्यव्हार करते थे या यूँ कहूं कि आप दोनों बिलकुल उनकी ही तरह व्यवहार कर रहे हैं " .... ये कौन सी कहावत है, हमने तो पहले नहीं सुनी थी ये कहावत...??? आगे आप कहती हैं...,"जितना भौंकना है भौंकिये हमे कोई फर्क नही पड़ता " ... इससे साफ़ पता चलता है कि आप अनील को कुत्ता समझती हैं... आप फिर कहती हैं, "Be Happy…… :) … और जिनको भौंकना हैं उनको भौंकने दीजिये …" आप ने साफ़ और स्प्ष्ट शब्दों में अनील को कुत्ता कहा है... दूसरी बात जब मैंने और सरिता जी ने अनील को पहले ही डांट दिया था तो फिर आपको गड़े मुर्दे उखाड़ने की क्या ज़रुरत थी...सब आप केलिए लड़ ही रहे थे... आदरणीय सद्गुरु जी ने भी इसकी भर्तसना की थी.. अगर अनील के व्यवहार में फिर भी सुधार नहीं आता तो हम 'फीडबेक' पर शिकायत करते, लेकिन इस तरह से खुले आम किसी को कुत्ता बिल्ली बोना अति निंदनीय है...अगर कल अनील ने गलती की थी तो आज आपने महा गलती की है ...आपने सरिता जी की भी अवहेलना की है जब वो मामले की कारवाही कर रही थीं तो आपको बोलने की क्या ज़रुरत थी..?? अनील जी हमारे मंच के सम्मानित ब्लॉगर हैं जागरण परिवार भी इस बात को मानता है, अनील जी पर लगे सरे प्रतिबंध को जागरण परिवार ने हटा दिया है... अब हम सरिता जी, सद्गुरु जी और अनील जी के प्रतिक्रिया का इंतज़ार है...मंच की मर्यादा का सवाल है बात ऊपर तक जायेगी...!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

एक शिकायत है आपसे (आदरणीय सरिता जी), आपने जब अनील को डांट ही दिया था तो फिर सोनम जी को अनील को कुत्ता बोलने की क्या ज़रुरत थी...?? ये तो बात बढ़ाने वाली बात हो गयी...मामला निपट गया था, सब शांत थे लेकिन सोनम जी ने आ के आग में घी डाल दिया...अभी तक मैं सोनम जी के साथ था लेकिन अब मैं अनील का साथ दूंगा..लड़की की बेज्ज़ती अगर बेज्ज़ती होती है तो क्या लड़कों की कोई इज्ज़त नहीं होती है... अनील एक शादी-शुदा व्यवस्थित पुरुष हैं...अगर उनकी धर्म पत्नी पढ़ेंगी तो सोचिये उनपे क्या बीतेगी...मुझे नहीं लगता कि कोई सभ्य स्त्री ये कभी बर्दाश्त कर पाएगी कि कोई लड़की उसके पति की तुलना 'कुत्तों' से करे... आपकी बात मान कर अनील ने अपना मुंह बंद कर लिया था...सोनम जी को उसके मुंह में अंगुली करने की क्या ज़रुरत थी... अभी वो सरकारी मीटिंग में है मुझे बोला शाम को फ्री होता हूँ तो सब को देख लूँगा... आप से निवेदन है कि आप सब से कहिए कि वो कुत्ते-बिल्ली वाला भाषा का प्रयोग न करें...इससे से मंच का माहौल दूषित होता है...!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

मुनिवर, आपने किस हिसाब से जीवन को चार दिन का कहा है....??? और ये किस की बातों में पड़ गए हैं आप कि सूफी पहले बहस करता है उकसाता है, भड़कता है और फिर हँसता है...?? लोगों ने कह दिया और आपने एक धारणा बना ली...??? इतनी जल्दी निर्णय पर नहीं पहुंचे, आपके हिसाब से जीवन भले ही चार दिन का हो, लेकिन मेरे देखे..जीवन बस है, बिना किसी शुरुआत, मध्य और अंत के...कोई जल्दी नहीं है...घबराहट में कुछ भी मान कर मत बैठ जाइये...!!! 'भक्त पेड़ से गिरे सूखे पत्ते की तरह होता है, उसको जहाँ हवा ले जगाये वहाँ जाता है उसकी अपनी कोई मर्ज़ी नहीं होता', आपका अफ़सोस करना इस बात का सूचक है कि आप जीवन को अपने नियंत्रण में लेना चाहते हैं...आप निर्णायक बनना चाहते हैं...और जब कुछ आपकी मर्ज़ी के अनुकूल नहीं होता है तो आप बौखला जाते हैं...छोटे बच्चे की तरह हाथ-पैर पटकने लगते हैं...'भक्त प्रवाह एक साथ एक हो जाता है उसके विपरीत नहीं...' उसके जीवन में कोई चुनाव नहीं होता...शांति तो शांति अशांति तो अशांति...वो सब के साथ राजी है...!! आपकी अज्ञानता हद दर्ज़े की है...छोटे बच्चे को भी जो बात समझ में आ जाये वो आपके पल्ले नहीं पड़ती.....जब इस देश के सद्गुरुओं का ये हाल है तो बांकी लोगों का क्या होगा...??? ठीक ही कहता है वॉट्स "भारत में कोई भी चार श्लोक याद कर के गुरु बन जाता है" कुछ सीखिए गीता से...कृष्ण आपकी तरह भीरु नहीं थे अगर होते तो वो भी आपकी तरह चुपचाप ॐ शांति शांति करते...!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

सोनम जी हमें आपकी बात का तनिक भी बुरा नहीं लग रहा है, आपकी तिलमिलाहट बिलकुल जायज है, जैसा आपके साथ हुआ अगर वो किसी भी अबला नारी के साथ होता तो वो बौखला ही जाती...हम आपके प्रति सहानुभूति प्रगट करते हैं...आप के गावं के कुत्ते बिना बात के भौंकते हैं लेकिन हमारे यहाँ के कुत्ते भौंकते ही नहीं थे, पता है फिर हम क्या करते थे...?? हम उसके पूछ पर मिट्टी-तेल डाल देते थे...फिर वो ऐसा भौंकता था कि पूछिए मत...एक दम से बौखला जाता है, तिलमिलाहट में कुछ से कुछ करने लगता है...खैर ये तो रही गावं की बात लेकिन आज भी हम 'पूंछ पर मिट्टी-तेल डालने वाला फार्मूला' इस्तेमाल में लातें हैं...कुत्तों के साथ नहीं इंसानो के साथ...!!! खैर ये तो रही कुत्तों और इंसानों की बात.... आपने बिलकुल ठीक किया 'कोई अगर किसी को धोबी का वाहन बोलेगा तो दूसरा उसको थोड़े न छोड़ देगा...आपने अनील की तुलना श्वान से की मेरे कलेजे को ठंडक पहुंचा.....!!! आज आपने अनील को 'सर' नहीं बोला ये देख कर भी अच्छा लगा...आप इसको sir क्या बोलती थीं...ये तो 'सर' पर ही चढ़ने लगा था...!! लेकिन आपकी एक बात से मैं सहमत नहीं हूँ...आप कहती हैं कि आप की कोई बेज्ज़ती नहीं हुई है...ऐसा कैसे मान लेंगे हम...इस तरह भरी महफ़िल में सब के सामने उनको आपकी भद नहीं करनी चाहिए थी...ये तरीका नहीं है, उनको आपको व्यक्तिगत् मेल या कॉल करके समझा देना चाहिए था..इस तरह सब के सामने...वो भी सद्गुरु जी जैसे सम्मानित व्यक्ति के सामने आपका मजाक उड़ना उचित नहीं है... "अक्सर ऐसा होता है कि लोग चुप रहने वाले को कमजोर समझ लेते हैं" ये बात आपकी एक दम सही है... कमज़ोर ही नहीं समझ लेते हैं फिर हमें कई फोर्मुला इस्तेमाल में लाना पड़ता है उनके मुखार-बिंदु से हुनकर भरबाने के लिए...कई फार्मूला में से हमारे 'all टाइम हिट फार्मूला' के बारे में मैं आपको बता ही चूका हूँ...!! मैं तो कहता हूँ लाइफ ऐसा होना चाहिए 'बोलो और बोलने दो'...!! (मुझ से जितना बन पड़ता था उतनी खातेदारी मैंने आपकी कर दी है, जो कमी रही गई होगी वो अभी थोड़ी देर में मेरे लतारणीय मित्र अनील पूरी कर देंगे...अगर वो भी चुक गये तो..आपकी 'स्वीटेस्ट ए जे' तो हैं हीं ..वैसे ईईई 'ए जे' का होता है जी...??)

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

मुझे अफ़सोस है कि आदरणीया सरिता जी का लेख "आखिर क्यों?" कर्बला का मैदान बन गया है.उस मैदान में आज भी आदरणीय जाफर जी अपना अनुत्तरित सवाल लिए खड़े हैं.मै लेख पढ़ने गया था,परन्तु जाने-अनजाने बहस का एक पात्र बन गया.मै बहस करना नहीं चाहता परन्तु किसी के सवालों का जबाब नहीं देना भी ठीक नहीं है.मुझे महसूस हुआ कि सरिता जी आप नाम के अनुरूप ज्ञान की बहती हुई नदी हैं,साथ ही ज्ञानियों की गरिमा के अनुरूप विनम्रता और शिष्टाचार में पारंगत हैं.अनिल जी पहले हँसते है,मजाक उड़ाते हुए आनंद लेते है और फिर बहस के लिए उकसाते हैं.सूफी जी पहले बहस के लिए उकसाते और भड़काते हैं और फिर जबाब पाकर हँसते हैं,उसका आनंद लेते हैं.ये उनका तरीका है,जिसे मै पसंद नहीं करता.कमेंट करते समय सभी ब्लॉगर्स को विनम्रता और शिष्टाचार का पालन करना चाहिए.सारी बहस का मेरा एकमात्र उद्देश्य था कि इस मंच पर शांति बनी रहे.चार दिन का जीवन है.क्या पता किसकी कौन सी स्वांस आखिरी हो और ये सफ़र ख़त्म हो जाये.इस मंच बहुत से लोग अपना कार्य चुपचाप कर रहे हैं,वो सबसे बेहतर रास्ता है.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

अनिल कुमार अलीन जी............आप की तो पूरी स्टोरी ही मुझे कंफ्यूज लगती है .... आपकी बातो से ऐसा लगता है कि आप अपने खुद के ही विचारो में उलझे हैं , कृपया पहले यह तय कर लें कि आप किस बात से सहमत हैं और किस बात से नही .......ये चमचागिरी करना छोड़िये कि सूफी मोहम्मद ने कुछ कह दिया तो आप भी चल दिए उनकी हाँ में हाँ मिलाने .... ऊपर आपने एक कमेंट में लिखा है कि "भगवान इस डर्ड्स को सहने के लिए उसे शक्ति दे" जब आप का भगवान पर विश्वाश ही नही है तो फिर उनसे भीख मांगने की क्यों जरूरत पड़ गयी ??? ............और हाँ कुछ घटिया लोगो की घटिया बातो से कोई अपनी माँ को माँ मानने से इंकार नही करता और न ही उसकी भावनाए बदल जाती हैं , न ही माँ के लिए सम्मान खतम हो जाता है ....हम जिसे अपना मानते हैं वो उम्र भर हमारा ही रहेगा ........लेकिन ये बात शायद आपको समझ में न आये , शायद आप के वहाँ दुसरो की बातो में आकर अपने ही माँ बाप को छोड़कर भागने का रिवाज होगा ......... खैर हमे जो कहना था कह दिया आप को जितनी सफाई देनी है देते रहिएगा ..... क्योंकि आपका तो काम ही यही हैं न ........

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

आप दोनों को देखकर (सूफी मोहम्मद और अनिल जी) मुझे हमारे गांव की गलियो के कुत्तो की याद आ गयी ! वो भी बिलकुल आप दोनों की ही तरह व्यव्हार करते थे या यूँ कहूं कि आप दोनों बिलकुल उनकी ही तरह व्यवहार कर रहे हैं ...... वो जब भौंकते थे तो हम गली में जाकर उन्हें डांटते-मारते थे कि भौकना बंद कर दो लेकिन वो मानते नही थे और और ज्यादा भौंकने लगते थे .....वही हाल आप दोनों का है .... जितना आप लोगो को रोकेंगे आप उतना ही ज्यादा भौंकेंगे इसीलिए हमने सोचा कि आप को पूरी छूट दे दें जितना भौंकना है भौंकिये .........जब लगेगा कि कोई सुन नही रहा है तो अपने आप भौंकना बंद कर देंगे ! इसीलिए जितना भौंकना है भौंकिये हमे कोई फर्क नही पड़ता ...............

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

अनिल जी, मज़ाक थोडा ज्यादा हो गया है..सब धान साढ़े बाइस पसेरी नहीं होता... जो कहना है हमसे कहिये सुनिये, सोनम को परेशान न करें...सूफी साहब...कहावत की छीछालेदर न करें....मुहावरे का शाब्दिक अर्थ नहीं बल्कि भावार्थ समझें...अगर मैं कहूं कि आपकी शोहरत को देख कर अनिल जी की छाती पर साँप लोट रहे हैं तो कृपया आप अनिल जी के कपडे फाड़ कर साँप मारने की जुगत में न लग जाइयेगा.... और सोनम जी, आपके लिए एक और शिक्षा....ये संसार है, यहाँ कदम कदम पर ऐसे ही टाँग खींचने वाले लोग मिलेंगे..ये तो कुछ नहीं है, कुछ बनने और पाने की राह में अभी न जाने ऐसे कितने इम्तेहान देने पड़ेंगे....अगर इन बातों को दिल से लगा कर रुक गए तो लोग धक्का दे कर आगे निकल जाते हैं......."मैं गिरा था तो बहुत लोग हँसे थे लेकिन, सोचता हूँ मुझे आये थे उठाने कितने...... " कोई किसी को उठाने नहीं आता है , अपने कदम खुद ही मज़बूत करने पड़ते हैं........

के द्वारा: sinsera sinsera

मुनिवर क्रोध में आपका विवेक समाप्त हो गया है लगता है…”कहते हैं की विचार इसान की छवि होते हैं” कोई कहता है और आप मान लेते हैं…??? “मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है की वो बेहद ख़राब है” कब तक अफ़सोस और क्रोध के द्वन्द में फसे रहिएगा…?? या तो क्रोध से मुक्त हो जाइये या अफ़सोस से…!! “और अनिल जी से मै क्यों डरूंगा ?” ये तो आप जाने कि आप उनसे क्यों डरते हैं…इस पर ध्यान कीजिए…!! “मै नहीं भी ये सब करता तो भी चलता रहता,उससे क्या फर्क पड़ता ? ” सवाल सुन्दर है, खुद से पूछें…शयद जड़ तक पहुँच पाएं…. “जागरण जंक्शन से आग्रह मैंने अपने विवेक से दिया था” झूठ बोल रहे हैं आप ऐसा आपने अनील के द्वारा खॊचारे जाने पर किया…उससे त्रस्त हो कर किया…!! “बचपन से मेरी आदत है कि ” सभी आदत बेहोशी से पैदा होते हैं…यही नहीं बहुत आदत आपमें बच्चों जैसी है…बचपना बरक़रार है…बच्चों जैसा होना चाहिए संत को, बचपना अच्छी बात नहीं…!! “ञान को परखने का मेरा अपना ही एक अलग तरीका है.” एक ही इसलिए है क्योंकि तरीका सदैव उधार होता है…बोध को जगाइए…कबतक तरीके की बैशाखी के सहारे चलते रहेंगे…??? “जरुर आप से शिकायत करेंगे ” शौक से कीजिए मेरी साड़ी बातें आपत्तीजनक होती हैं…!! “आदरणीय सरिता जी के इस ब्लॉग पर न करें” सुन्दर राजनीती है, अगर सरिता जी आदरणीय हैं तो क्या अनील जी लतरणीये हैं..लात खाने योग्य हैं जो उनके ब्लॉग पर ऐसी बाते करेंगे आप…??? “आपस में लड़ना-भिड़ना ही आप का शौक और घटिया राजनीती है” मुझे तो किसी से कोई लड़ाई नहीं है, लोग खुद अपनी बचाव में मुझ से लड़ने लगते हैं…!!! राजनीति तो मेरे खून में… I love it.

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आदरणीय सूफी मुहम्मद जी,आप हमेशा ग़लतफ़हमी में क्यों जीते हैं.कहते हैं की विचार इसान की छवि होते हैं.अगर आप के विचारों को मै आप की छवि मान लूँ तो मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है की वो बेहद ख़राब है.आप ये बताइये की मैंने अनिल जी से लड़ाई कब की ? और अनिल जी से मै क्यों डरूंगा ? मै नहीं भी ये सब करता तो भी चलता रहता,उससे क्या फर्क पड़ता ? जागरण जंक्शन से आग्रह मैंने अपने विवेक से दिया था.अपने कुछ कमेंट में अनिल जी ऐसा करने का सुझाव भी दिया था.आप को विश्वास न हो तो मेरा लेख "जागरण परिवार से निवेदन" में उनके कमेंट पढ़ लें.आप हमेश आपस में लड़ाने-भिड़ने वाली बात क्यों करते हैं ?आप ने मेरे कमेंट में ये पढ़ा होगा-"बचपन से मेरी आदत है कि पांच रुपये की हांड़ी (मिटटी का बर्तन) भी लेता था खूब ठोंक बजाकर.आज भी वही आदत बरकरार है.किसी के ज्ञान को परखने का मेरा अपना ही एक अलग तरीका है.चाहे सूफी जी हों या अलीन जी,कुछ बातें उनकी सही होती हैं और कुछ गलत भी.उनकी सही बात का समर्थन करना चाहिए और गलत बात का विरोध.दुश्मनी क्या चीज होती है मै नहीं जानता." और जागरण जंक्शन वाले कमेंट में ये भी पढ़ा होगा-"उनके किसी लेख में कोई आपत्तिजनक बात होगी तो जरुर आप से शिकायत करेंगे और आप कार्यवाही भी कीजियेगा." आप कमेंट ध्यान से पढ़कर तब कमेंट किया कीजिये.आपस में लड़ना-भिड़ना ही आप का शौक और घटिया राजनीती है.आखिर में एक बात और वो ये की हम लोग ऐसे कमेंट आदरणीय सरिता जी के इस ब्लॉग पर न करें ,यही बेहतर है.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

नमस्कार, शुक्रिया...!! लेकिन आप जो कर रहे हैं...उससे आपके भीतर का भय प्रगट हो रहा है, अहिंसा- हिंसा का ऑपोसिट नहीं है, भय के कारण किया गया प्रेम सिर्फ दिखावा होता है... 'और ये तुम भी ठीक और वो भी ठीक और सब ठीक वाली बात दिल्ली में अच्छी लगती है', ध्यानी पुरुष किसी के घाव पर फूल चढाने का काम नहीं करता है, आप जो कर रहे हैं वो कमज़ोरों की राजनीती है, 'जिओ और जीने दो'... इस तरह की चालबाज़ियों ने इस देश को नपुंसक बना दिया है..हर कोई एक दूसरे की मुंह पोछने में लगा रहता है...!! आप जो आज कर रहे हैं वो औरतें सदियों से करती आ रही हैं...पहले बहस करती है...फिर अगर तर्क में हारने लगती हैं तो उग्र हो जाती हैं, फिर जब वहाँ भी असफलता मिलती है तो रोने लगती हैं...और मैंने आपका ये तीनो रूप देखा है...!! मीरा भी एक भक्त थी...क्या मलाज कि पडित उसे रणछोड़ दास जी के मंदिर में जाने से रोक दे...बोलती बंद कर दी थी मीरा ने पंडित की...धार था उसके व्यक्तित्व में...वो चापलूसी नहीं करती थी... चेतन्य महापंडित थे पहले फिर भक्त हुए... और एक आप हैं जो खुद को भक्त कहते हैं...काम सारे आप नेताओं वाले करते हैं...कभी प्रतियोगिता में भाग लेते हैं तो कभी अनील के लिए गुहार लगाने जेजे के सामने खड़े हो जाते हैं... पहले अनिल से लड़ते हैं फिर डर के मारे हाय-अनील-हाय-अनील करने लगते हैं.... मन के प्रति सजग होइए सद्गुरु जी...!! शान्ति की माला जपने से शांति नहीं आती है...सदियों से इस देश के मंदबुद्धि पंडित शांति शांति जप रहे हैं...

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

राजनीति हो रही है इस मंच पर, लोग भाई-भतीजावाद की राजनीती कर रहे हैं...लोगों को भावुक कर के उसके बुद्धि पर पर्दा डाला जा रहा है...ऐसा लगरहा जैसे सब उन्माद में कुछ से कुछ बक रहे थे...जब उन्माद उतरा तो हाई-दईया-हाई-भैया कर रहे हैं...सास-बहु की सीरियल चल रहा हो जैसे, अनील जी और सद्गुरु जी ऐसे गले मिल रहे हैं जैसे मेरे में बिछड़े दो भाई हो, मनमोहन देसाई की फ़िल्म की तरह पहले खूब लड़े अब गठ्जोडी कर रहे हैं, एक दूसरे का आंसू पोछ रहे हैं.......'इसी को कहते हैं एक ही थैली के चट्टे-बट्टे' या फिर चोर-चोर मौसेरे भाई..., सरिता जी कह रहीं हैं मैं अनील को व्यक्तिगत रूप से जानती हूँ, तो क्या आप दोनों लोगों का वोट बटोरने के लिए एक दूसरे का विरोध कर रहीं थीं...??? सोनम जी कह रहीं है कि वो किसी को छोड़ेंगी नहीं...क्या है ये सब...??? अब लेखनी में भी जातिवाद, क्षेत्रवाद, और परिवारवाद होगा...?? लानत है...!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

एकला चलो, एकला चलो, चरैवेति..चरैवेति...... क्या हो रहा है बही इस मुल्क में...?? खाली-पीली लोग इमोशनल हो रहे हैं...कोई हथियार डाल रहा है तो कोई, राग अलाप रहा है... देखिये लेखनी में भाई-भतीजा-वाद नहीं चलेगा....ये तो औरतों वाली बात हो गई, औरतें पहले बहस करती हैं, फिर गुस्सा करती हैं, फिर रोने लगती हैं...और मैं यहाँ यही देख रहा हूँ... आदरणीय सद्गुरु, अनील जी, और 'आप'....कृपया भावुक न हों...लेखक को संवेदनशील होना चाहिए भावुक नहीं...भावुकता चलवाज़ी है.... और आप के लिए एक शेर..."किस बात का डर है तुम्हें क्यूँ चुप सी लगी है सच बोलने भर से तो क़यामत नहीं आती, थोड़ी सी मोहब्बत भी ज़रूरी है जिगर में गुस्से से ही सीने में बगावत नहीं आती" सद्गुरु जी और अनील जी के लिए एक शेर.... "पनाहों में जो आया हो तो उस पर वार क्या करना.....जो दिल हारा हुआ हो उस पर फिर अधिकार क्या करना .... मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कश्मकश मे है.... हो गर मालूम गहराई तो दरिया पार क्या करना...!!" भाई उठो, जागो, लोगों को हिलाओं, एक दूसरे के घावों पर फूल मत डालो...अगर कुछ करना ही है तो मरहम में नमक मिला कर घाव पर मल दो....!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

दी, आपने सिर्फ बकवास लिखा होता तो मैं यहाँ नहीं आया होता. चूँकि आपने क्षमा मांगकर मुझे शर्मिंदा कर दिया. मेरे बारे में कभी भी कहीं आलोचना होती मैं उसका बुरा नहीं मानता और न ही सफाई देता हुआ. मैं मुख्यतः दो बातों पर जवाब देता हूँ पहला किसी लेख(विषय) पर दूसरा मेरे द्वारा शुरू किये गए बकवास पर क्योंकि वह गेम मैं खेल रहा होता हूँ. मुझे कोई मजबूर नहीं कर सकता अनाप सनाप बोलने के लिए सिवाय मेरे. आपने इससे पहले भी मुझे देखा है कि जब भी मुझ पर व्यक्तिगत आक्षेप होता है मैं चुप रहा हूँ...या फिर कुछ बोला हूँ तो एक हसीं मजाक के साथ ताल गया हूँ. .......अभी हाल ही में शिप्रा पराशर मुझे उकसाने की कोशिश की परन्तु मैं उसे नज़र अंदाज़ कर गया....! मैं उनके अधीन नहीं यहाँ तक की अपने मन के भी नहीं उसके साथ भी एक गेम ही खेल रहा हूँ............

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जाफ़र साहब ..आपकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना इस लेख का मकसद नहीं था..भूल चूक से ऐसा हुआ हो तो क्षमा करें....मैं अल्लाह की शक्ति को भी मानती हूँ और पैगम्बर तथा इमाम की भी इज़ज़त करती हूँ, बेशक वो आम आदमी नहीं थे...यहाँ .सोनम जी का कहना भी सही है..आप अपनी बात पर अड़े है और मैं अपनी..इस तर्क-वितर्क का कोई अंत नहीं है..फिर भी आपसे एक बात कहना चाहूंगी..मुझे आपकी बात थोडा कायरतापूर्ण लगती है..चलिए मान लेते हैं की इमाम कभी आएंगे , लेकिन हम आप तो अभी आये हुए हैं..हम भी तो अपनी तरफ से कुछ करें..या फिर से सारी ज़िम्मेदारी उन्ही के सर डाल दें कि जब वो आयें तो चैन से जी न सकें...लड़ाई में खुद को झोंक दें और प्यासे अपनी जान दे दें......फिर हम आप उनके नाम पर मातम और अज़ादारी करें....ऐसा नहीं है, सब को अपने अपने हिस्से की लड़ाई लड़नी होगी..... ये आग अब किसी एक इमाम के बुझाने से नहीं बुझने वाली है...दीन कभी ये नहीं कहता है कि किसी का अन्याय सहो ...शैतानों को मुंहतोड़ जवाब देना है...कलम से ही सही..आवाज़ तो उठाइये............अपने एक पुराने ब्लॉग का लिंक दे रही हूँ, थोडा समय दे कर कृपया पढ़ने का कष्ट करियेगा.........http://sinsera.jagranjunction.com/2012/04/06/%E0%A4%85%E0%A4%AC-%E0%A4%AF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%88-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%88-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%86/

के द्वारा: sinsera sinsera

आदरणीय सद्गुरुजी, निर्णायक भी नहीं हूँ और विदुषी भी नहीं..लेकिन चर्चा अगर शास्त्रार्थ से मुड़ कर तकरार की और जाने लगे तो ज़रा घबराहट होती है...आप ज्ञानी लोग हैं इस लिए बात-चीत में मज़ा आ रहा है..चर्च में ज्ञान की परतें खुल रही हैं अन्यथा मैं कब की ये पोस्ट छोड़ कर जा चुकी होती.....अनिल जी को आप नहीं जानते हम लोग बहुत पहले से जानते हैं ..आपका पुराना ब्लॉग एक दुर्घटनावश डिलीट हो चूका है , मुझे दुःख है कि आप उन की पहले की शानदार पोस्ट्स पढ़ने से वंचित रह गए..फीडबैक पर सबसे पहले मैं ने ही उनका ब्लॉग खोलने के विषय में अनुरोध किया था और दुर्भाग्य कि बात है कि उनकी एक भटकी हुई पोस्ट को डिलीट करने के लिए भी मैं ने ही फीडबैक पर लिखा था....बात सिर्फ एक पोस्ट डिलीट करने कि थी ब्लॉग कैसे डिलीट हो गया ये मैं नही जान सकी उन दिनों मैं अपने श्वसुर महोदय के ऑपरेशन के कारण लगभग दो महीने हॉस्पिटल में थी.....जो भी हो मैं आज भी उनके लेखन की प्रशंसक हूँ इसीलिए उनकी हर "बकवास"(क्षमा सहित )झेलती हूँ....वैसे हम लोग व्यक्तिगत रूप से भी मिल चुके हैं.No offence to say that he is a very nice man ..

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: sinsera sinsera

आदरणीय सद्गुरु जी ...........सुबह मैंने यहाँ इस पोस्ट पर एक कमेंट किया था शायद आपने नही पढ़ा ...हाँ मुझसे एक गलती हो गयी कि वहाँ मैंने सिर्फ जफ़र भाई को सम्बोधित कर के लिखा है आप लोग को नही, इसीलिए अब यहाँ मैं सभी से कह रही हूँ कि अब आगे इस पोस्ट पर जो भी कमेंट करे वो पोस्ट के बारे में हो न कि उजुल फिजूल बातो के बारे में ! मुझे उमीद है कि बाकी सभी के लिए मुझे अलग से कोई कमेंट करने कि जरूरत न पड़े ! अगर आप लोग समझदार हैं तो समझ जायेंगे और अगर समझदार नही हैं तो भी कृपया बेकार के कमेंट करके मिसेज सिन्हा के लिखे विचारो का अपमान न करें ........ जो उन्होंने कहना चाहा है उसी वही रहने दे ................धन्यवाद ..........और हाँ ये सभी के लिए है ............

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

अपने को 'मुसलमान' कहने वाले चरमपंथियों द्वारा किये गये आतंक को इस्लामी आतंकवाद कहते हैं। ये तथाकथित मुसलमान भांति-भांति के राजनीतिक तथा मजहबी उद्देश्यों की पूर्ति के लिये आतंक फैलाते हैं। इस्लामी आतंकवाद मध्य पूर्व, अफ्रीका, यूरोप, दक्षिणपूर्व एशिया, भारत एवं अमेरिका में बहुत दिनों से मौजूद है। आतंकी संगठनों में ओसामा बिन लादेन द्वारा स्थापित अल कायदा नामक सैनिक संगठन कुख्यात है। इस संगठन ने मध्य पूर्व एवं अरब प्रायदीप में अमेरिकी सेना की उपस्थिति को समाप्त करने को अपना उद्देश्य घोषित किया है इसके अलावा इस संगठन के घोषित उद्देश्य हैं - उन अरब शासनों को उखाड़ फेंकना जिन्हें यह संगठन 'भ्रष्ट' एवं ' कम मजहबी ' समझता है ; इजराइल को अमेरिकी समर्थन की समाप्ति; पूर्वी तिमोर एवं कश्मीर को मुसलमानों को सौंपना आदि।

के द्वारा: sadguruji sadguruji

नमस्कार जफ़र भाई .........देखिये वो कितना जानती हैं और आप कितना जानते हो ये आप दोनों अच्छे से जानते हो ! अब इस बात को यही खत्म करिये ..आप इस्लाम के बारे में आदरणीय श्रीमती सरिता सिन्हा से ज्यादा जानते हो ऐसा सही हो सकता है, जरूरी तो नही कि आप को कम जानकारी हो या उन्हें कम जानकारी हो ! बात को आगे बढ़ाने से क्या फायदा ! उन्होंने ऊपर जो भी लिखा है वो सिर्फ अपने विचार रखे हैं, जिसका अधिकार सभी को है और जिसका अधिकार जागरण जंक्शन मंच सभी को देता है ! आप उनसे असहमत है या कोई और उनसे असहमत है ये तो आपके अपने विचार हैं जो आप भी यहाँ रख चुके हो ! मेरा आपसे ये विनय निवेदन है कि अब इस टॉपिक पर की जाने वाली बहस को यही ख़त्म करे और आगे बढे ! और रही बात सूफी मुहम्मद की बातो का जवाब देने की तो मैं यही कहूँगी कि इस पर आप अपना एक अलग से ब्लॉग लिखे और वहाँ उनसे जवाब मांगे या फिर उनके ब्लॉग पर जाकर तभी आपको सही जवाब मिल पायेगा ! उम्मीद हैं आप मेरी बातो को अन्यथा नही लेंगे और समझेंगे .....शुक्रिया ...

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

महोदय, पहिले आप यह निश्चित हो जाएँ कि मैं आपका दोस्त हूँ या भाई हूँ या फिर दोनों? मैं आपके इस सवाल का जवाब नहीं दूंगा क्योंकि मैं जान रहा था कि आप ऐसा ही कुछ बोलने वाले हैं. मतलब यह मेरी इच्छा थी कि आप मुझसे लड़ना शुरू करें. कारण कि इससे पहले किया हुआ आपका कमेंट और वह यह है............ "बहुत खूब आदरणीय सूफी जी आदरणीय सरिता दीदी आदरणीय मित्र अनिल जी आदरणीय सद्गुरु जी और आदरणीय जाफर साहब…………क्या लड़ने को और वाद विवाद को ही अभिव्यक्ति कहते हैं " जो आपके साथ हुआ है बिलकुल वही सद्गुरु के साथ हुआ उसमे उनकी कोई अपनी गलती नहीं जैसे कि यहाँ आपकी कोई गलती नहीं. परन्तु आपको मैं मजबूर कर लड़ने को. यह आपका भी स्वाभाय जिसे आप स्वीकार नहीं करना चाह रहे थे. परन्तु आपके अहम् को चोट करते ही आप भी लड़ने के लिए मैदान में आ गए और सफाई देने लगे आप पर मेरे द्वारा लगाये गए इल्ज़ामों पर. यदि आप चुप-चाप बचकर निकल गए होते तो आप सही हो गए होते. परन्तु यह असम्भव था सिर्फ आप ही के लिए नहीं हर किसी के लिए और उससे मैं अलग नहीं. आपका या मेरा सफाई देना यह इंगित करता है कि या तो हैम गुनाहगार या फिर कमजोर. जब किसी के विचारों से ऐसा लगता है कि खुद को अहंकार, द्वेष, इत्यादि से मुक्त बताता हैं तो मैं उसके अहंम पर चोट कर देता हूँ फिर उसका वह रूप बाहर निकल आता है जिससे वह भागता है या फिर इंकार करता है. परन्तु हकीकत यह है कि सकारात्मक या फिर नकारात्मक दोनों ही गुण हमारे अंदर विदयमान है उससे कभी भी किसी प्रकार अलग नहीं हो सकते. जिससे हमारा बैलेंस बना है एक ख़त्म दूसरा ख़त्म परन्तु यह असम्भव है क्योंकि फिर आप, आप नहीं रह जायेंगे. न आपके अंदर सच रह जाएगा और न ही झूठ.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

सादर चरण स्पर्श डी! झूठ को मान लेने से वो सत्य नहीं हो जाता है और सत्य को माना नहीं जाता वरन वो झूठ हो जाता है. कारण मन तो उसे जाता है जो नहीं हो और जो है उसे मानना एक झूठ है. किताबों से उठाया हुआ ज्ञान कभी सही काम कर ही नहीं सकता क्योंकि वो सब झूठ है उसमे हमारी कोई अनुभव या अनुभूति नहीं. ज्ञान, हम सबके अंदर ही है जिसका एक सिरा ईश्वर से जुड़ा है. जो कभी ख़त्म नहीं हो सकता. बिलकुल कुवें की भांति, जिसमे से जितना चाहे निकालिये , कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि उसका स्रोत तो कोई और है. परन्तु किताबों या किसी अन्य माध्यम से प्राप्त किया हुआ ज्ञान, मन पर बने एक हौज के जल की तरह है. जिसको समय-समय पर नहीं बदलने पर सड़ने लगता है. जिसमे अहम् है कि यह मेरा है. परन्तु कुवें का अपना कोई अहम् नहीं. कारण उसका अपना कुछ भी नहीं वो जो कुछ भी पा रहा है किसी और माध्यम से जितना देगा उतना बढ़ेगा. परन्तु हौज से निकालने पर दिन प्रति दिन कम होता जाएगा और एक दिन खाली हो जाएगा. यही कारण है कि जब कोई हमारे इकट्ठे किये हुए ज्ञान पर उंगली उठाता है तो हम तिलमिला जाते है कि अब तो इसे खाली करना पड़ेगा. हममे अहम् पैदा हो जाता है कि यह मेरा है, मेरा मेहनत किया हुआ है. युहीं कैसे खाली कर दे. परन्तु ज्ञान तो सुव्यवस्थित एवं क्रमबद्ध होता है..... आपुने अभी पूछा है न, "…….”विद्या ददाति विनयं”……..ये कैसी विद्या है जो विनय नहीं प्रदान कर पा रही है…." तो बस यह विद्या वैसी ही है जैसे किसी हौज में इकठ्ठा किया हुआ जल. यदि हम चाहते है कि ज्ञान के कुवें को प्राप्त करना जिसे पाकर सारा अहम् नाश होता है तो मन द्वारा बनाये गए हौज को तोड़ना होगा, उसके जल को बह जाने देना होगा. फिर अपने भीतर खुदाई करना होगा. जैसे-जैसे हम निचे चलते जायेंगे वैसे-वैसे कंकड़, पत्थर, मिटटी, कीचड़ निकलता जाएगा परन्तु उससे भयभीत नहीं होना, हतोत्सहित नहीं होना है, भागना नहीं,..........निरंतर लगे रहना है तब जाकर हम ज्ञान के स्रोत को पा पाएंगे परन्तु उस कुवें को बचाने के लिए निरंतर कुवें की सफाई करते रहना होगा वरन एक दिन ऐसा आएगा कि वह धीरे-धीरे भर जाएगा और हमें फिर अपने मन पर एक हौज बनाकर चलना होगा........................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय सरिता सिन्हा जी,सौवे कमेंट की आपको बधाई.आप निर्णायक विदुषी हैं चर्चा मण्डली की,आप ये मत सोचिये कि कोई लड़ाई चल रही थी.ये तो विचारों का समुंद्रमंथन था.बचपन से मेरी आदत है कि पांच रुपये की हांड़ी (मिटटी का बर्तन) भी लेता था खूब ठोंक बजाकर.आज भी वही आदत बरकरार है.किसी के ज्ञान को परखने का मेरा अपना ही एक अलग तरीका है.चाहे सूफी जी हों या अलीन जी,कुछ बातें उनकी सही होती हैं और कुछ गलत भी.उनकी सही बात का समर्थन करना चाहिए और गलत बात का विरोध.दुश्मनी क्या चीज होती है मै नहीं जानता.मुझे तो इस बात की फिक्र है कि सब शांत ही हों जायेंगे तो हम चर्चा करेंगे किससे ? बिना चर्चा के ज्ञान हज़म होता नहीं है.काशी शास्त्रार्थ के लिए हमेशा से प्रसिद्द रहा है.मेरी नज़र में वो काशी की सबसे बड़ी चीज है.ये मंच भी मेरे लिए काशी ही है.आप को ह्रदय से धन्यवाद देते हुए मै बताना चाहूंगा कि बीच में जब अलीन जी का ब्लॉग पेज खुल रहा था तब कुछ लेख उनके मैंने पढ़े थे और मुझे अच्छे लगे थे.अलीन जी करेला हैं,लेकिन मंथन रूपी स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद हैं.तटस्थ होकर मैंने अपनी आत्मा और विवेक से निर्णय लिया है कि जागरण परिवार से आग्रह करूँ कि उनके ब्लॉग पर जो भी पाबन्दी लगी हों वो हटाई जाये और उन्हें नये ब्लॉग पोस्ट करने कि अनुमति दी जाये.आप की सलाह और विचार के लिए मै जागरण परिवार को भेजा जाने वाला सुझाव नीचे दे रहा हूँ.इसे जागरण के "फीडबैक" और "ब्लॉगिंग शिखर सम्मान" दोनों जगह मैंने लगा दिया है- ................................................................................................................................................ ................................................................................................................................................. आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार, महोदय सादर हरि स्मरण ! आप लोगों ने इस मंच पर मुझे जो भी सम्मान दिया है,उसके लिए ह्रदय से धन्यवाद.मै आप लोगों से एक आग्रह करना चाहता हूँ कि इस मंच के ब्लॉगर आदरणीय अनिल कुमार "अलीन" जी के साफ्टवेयर को ठीक कर उन्हें बिना किसी बढ़ा के पुन:लिखने कि अनुमति दी जाये.बीच में जब उनका ब्लॉग पेज खुल रहा था,तब मैंने उनके लेख पढ़े थे.उनके लेख उच्च स्तर के हैं और पाठकों के लिए उपयोगी और शिक्षाप्रद हैं.इस समय पाठक उनके नए लेखों से वंचित हो रहे हैं.जीवन का कोई भरोसा नहीं है कि कौन कब तक जियेगा ? इसीलिए सच कहने वाले ऐसे विद्वान जब तक इस संसार में हैं,तब तक उनके विचार और अनुभव लोगों के बीच प्रसारित होना चाहिए और ये लोगों पर छोड़ दिया जाये की क्या वो पसंद करते हैं और क्या नहीं ? उनके किसी लेख में कोई आपत्तिजनक बात होगी तो जरुर आप से शिकायत करेंगे और आप कार्यवाही भी कीजियेगा,परन्तु फ़िलहाल अभी उन्हें ब्लॉग लिखने व् पोस्ट करने की अनुमति दी जाये.मै पहले की बातें नहीं जानता,परन्तु सच कहने वाले ऐसे विद्वान व्यक्ति से यदि जाने अनजाने कुछ गलतियां भी हुईं हैं तो उसे क्षमा करते हुए उन्हें पुन:ब्लॉग लिखने और पोस्ट करने की अनुमति प्रदान की जाये.इससे अनगिनत पाठकों को लाभ होगा.मेरी जानकारी के अनुसार उनके ब्लॉग के पाठक सबसे ज्यादा हैं.यदि आप लोग तत्काल अनिल कुमार अलीन जी के सॉफ्टवेयर को ठीक कर उन्हें लिखने और पोस्ट करने की सुविधा पुन:प्रदान करते हैं तो मुझे ही नहीं बल्कि इस मंच के सभी ब्लॉगरों को बहुत ख़ुशी होगी.सादर धन्यवाद और शुभकामनाओं सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

मुझसे पहिले आपको सूफी ध्यान मुहम्मद बता चुके हैं कि सारी अवस्थाएं झूठ होती है. इसका मतलब कि सत्य कोई और है जो इन अवस्थाओं का साक्षी है. दूसरी बात मैं कोई अवस्था का जिक्र नहीं किया जो मैं हूँ उसे बताया हूँ. भ्रमित, सम्मोहित, थका, हारा, इर्ष्या, मजाक और बदला......................अब आप काफी हद तक कुछ-कुछ देख रहे हैं जो कब से दिखाना चाह रहा था. परन्तु आप गुरुर के मारे सत्य को स्वीकार नहीं करना चाह रहे थे. कुछ दिन पहिले आपसे बोला था कि आप जो भी मुझको बोल रहे हैं वो एक झूठ है सिवाय यह कि मैं एक आइने की तरह हूँ. एक ऐसे आइने की तरह जिसके सामने आदमी का केवल वो रूप सामने आता है जिसे वो अस्वीकार करता है. वो चाहे सद्गुरु हो या फिर अनिल दरअसल आप जो मुझमें देख रहे हैं वह आपका वही प्रतिबिम्ब है जिससे आप दूर भाग रहे हैं, जिसे अस्वीकार कर रहे हैं. यह आपका पीछा तबतक करेगा जबतक कि आप खुद को स्वीकार न कर लेते. अभी भी आपकी बातों में गुरुर है, झूठ, द्वेष है, .....आपका या फिर किसी अन्य का पीछा तबतक नहीं छोडूंगा जबतक कि वह मुझसे भागता रहेगा. क्योंकि जिसे आप अनिल में ढूढ़ रहे हैं वह आपसे अलग नहीं. वह आप ही का रूप है. आप कभी खुद को ग्यानी कहते हैं, तो कभी भक्त, कभी सद्गुरु, कभी आप गुरुओं में लीन रहते है, कभी किताबों व ग्रंथों में, कभी खुद में ,...........................यह सब आपकी अवस्थाएं हैं जो कि एक झूठ है. इसके अलावा भी कुछ अवस्थाएं है आपकी जिसे आप स्वीकार नहीं करना चाहते........जैसे कि ढोंगी, मुर्खता, भ्रमित, सम्मोहित, थका, हारा, इर्ष्या, मजाक और बदला इत्यादि. यह सब भी झूठ है. यह झूठ सिर्फ आप ही के साथ नहीं अनिल के साथ भी है और अन्य के साथ भी. परन्तु मैं न ही कोई व्यक्ति हूँ और न ही कोई अवस्था. आप बार-बार मुझसे या किसी अन्य से प्रभावित होने की मुर्खता क्यों करते हैं आप खुद से प्रभावित होइए. मैं ज्ञान और अज्ञान से पार नहीं हूँ, बल्कि परे हूँ. मैं कोई मुक्त या बंधक नहीं बल्कि इससे परे हूँ, मैं को व्यक्ति या आत्मा नहीं बल्कि इससे परे हूँ,....आपका कहना, " –बड़े बड़ाई ना करें,बड़े न बोलें बोल ! हीरा मुख से कब कहे लाख हमारो मोल ." यह रति-रटाई बाते बंद करिए आखें खोलिए और सच का सामना करिए. आखें बंद कर लेने से सूरज डूब नहीं जाता बल्कि आप उससे आखें बंद करके अँधेरे से नाता जोड़ना जोड़ लेते हैं. अलीन( जो ग्रहण करने योग्य न हो) मेरा उपनाम नहीं बल्कि वह रूप है जिसे दुनिया स्वीकार नहीं करना चाहती और यह अनिल के अन्दर ही नहीं आपके अन्दर भी है और दूसरो के अन्दर भी जब कोई इससे मुख मोड़ने की कोशिश करता है या फिर यह देखने की कोशिश करता है कि मेरा इससे कोई नाता नहीं तब-तब यह हरेक अनिल में अलीन बनकर बाहर आता है और अपने होने का एहसास करता है. परन्तु मेरे लिए तो अनिल भी झूठ है और अलीन भी................क्योंकि मैं इन दोनों से परे हूँ.............अनिल कुमार अलीन तो बस मेरा ऑब्जेक्ट था, एक माध्यम था जिसके सहायता से आपके अन्दर के अलीन को निकालकर आपके सामने रख सकू जिससे आप मुंह मोड़ रहे हैं, जिससे आप भाग रहे हैं, खुद को गलतफहमी में डाले हुए है. आप बाहर से किसी भी अवस्था में रहे अन्दर आपकी हरेक आव्स्थाएं रहेंगी. .............आपने खुद को गुरु, ग्यानी, भक्त इत्यादि नामक आवलंबन लगा रखा था. सबकों ख़त्म कर दिया हूँ, आप एकदम निर्वस्त्र हो चुके हैं,..........आज आप उतने ही नंगे दिख रहे हैं जितना अलीन है. परन्तु यह सब झूठ सिवाय मेरे ..................मेरा काम ख़त्म हुआ....................अब मैं चलता हूँ........... When all the knowledge and the power of world come to end. I am started from there……………..I am Anil Kumar ‘Aline.’…

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जाफ़र साहब, आप क्यों इन भुलावों में अटके हैं कि अभी कोई पैगम्बर और इमाम आने वाले हैं और दुनिया सुधर जायेगी...ज़रा अंतरात्मा से पूछ कर बताइये, क्या आप को ये बातें सच लगती हैं...?? वो जो लोग थे वो भी आम इंसानों कि तरह ही पैदा हुए थे लेकिन उन्हों ने अपने स्तर से समाज में फैली हुई बुराइयों को दूर करने कि कोशिश कि औए खुद को मिटा दिया...उनके माथे पर नहीं लिखा होता है कि वो पैगम्बर या इमाम हैं...आप हम मे से ही किसी को उठना होगा ...कोई भी आम आदमी जिसके अंदर ज़बरदस्त विल पॉवर हो वो ये काम कर सकता है...क़यामत जब होगी तब होगी तब तक दुनिया यूँ ही आग में जलती रहे...? ?? ये जिहादी और आतंकवादी मुसलमान नहीं है बल्कि इबलीस की औलादें हैं....इन लोगों के पास इतनी शक्ति कहाँ से आती है कि ये सारी दुनिया को दहशत में लिए हुए हैं..इन लोगो ने इस्लाम को मिटाने का ज़िम्मा ले रखा है, आज इन्ही की वजह से लोग अच्छे मुस्लिमों को भी शक की नज़र से देखते हैं..आप भी फील करते होंगे कि एक ज़माने में जैसे सिखों को देख के लोग डरते थे वैसे आज मुस्लिमों से डरते हैं....जनता मे ये धारणा घर करती जा रही है की ये जेब मे पाकिस्तान से आए हुए बम ले कर घूमते हैं.....ये अपने को जेहादी कहने वाले चाहते क्या हैं . ये भी नही पता...सिर्फ़ निर्दोषों को कत्ल करना इनका काम है...यही तो यज़ीदियत है....इससे लड़ने कौन आगे आ रहा है.......इनके खिलाफ कुछ करिये , ये मस्जिदों के वाइज़ जैसी बोली मत बोलिये..ये उनका प्रोफ़ेशन है, जिसके लिए वो तनख़ाह उठाते हैं......बल्कि आप लोग ऐसी आवाज़ उठाइये कि कुछ परिणाम दिखे....आप देखिये , पूरा विश्व आपके साथ होगा.....क़यामत के हश्र से वो शैतान की औलाद नहीं डरेंगे , क्योंकि उनको भी पता है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है......

के द्वारा: sinsera sinsera

सूफी साहब , यहाँ पर आप थोडा सही हैं..आपने और जाफ़र साहब ने नेट से उठाया हुआ मैटर ज्यों का त्यों यहाँ पेस्ट कर दिया , ध्यानपूर्वक पूरा पढ़ना सम्भव न हो सका , फिर भी साधु बनने की कोशिश कि और सार सार गह लिया..थोडा बहुत छूटा भी होगा, क्षमा चाहती हूँ..देखिये, मैं ने सड़क पर मुहर्रम के जुलुस में खून से लथपथ युवा देखे, दुःख हुआ तो ये लेख लिख दिया...अब इसमें राजनीती कैसी........Mohammed was an absolutely illiterate man, and the Koran, in which his sayings are collected, is ninety-nine percent rubbish. आपके कहे हुए ये शब्द अगर निंदा की श्रेणी में नहीं आते हैं तो मैं गलत हूँ....मैं महान बनने केलिएकिसी की डर के मरे तारीफ करुँ ऐसा नहीं है, गीता और कुरान "वाद " हैं, मैं ने दोनों पुस्तकों को पूरा नहीं पढ़ा है, सिर्फ अंश पढ़े हैं, प्रभावित हूँ , इसका मतलब डरना नहीं है...अब मैं किस किस से डरूँ.......एक तो जागरण वालों नेमेरा लेख छापा , तो बिना किसी भूमिका के सिर्फ एक नोहा छाप दिया....मैं आपको क्या बताऊँ, मेरे पास परिचितों के जितने भी फोन आये, सब यही कह रहे हैं की अब तुम नोहा लिखने लग गयी...कुछ रिश्तेदरों ने समझाया कि मुसलमानों वाला काम न करो, कल को तुम्हारे बच्चों की शादी में दिक्कत आयेगी...........मेरे घर के लोगो का कहना है कि ऐसे लेख लिखोगी तो शहर में हिन्दू-मुस्लिम दंगा हो जायेगा....हमारे घर पर लोग पत्थर फेंकने लगेंगे...जीना मुश्किल हो जायेगा.....ये तो हाल है इस देश का...मैं क्या जवाब दूं इस बात का..ये हिंदू मुस्लिम का मुद्दा लगता है आपको कहीं से..?? ये सारे हिंदू-मुस्लिम एकता की बातें करने वाले लोग हैं...जो दीखता है वो सच होता है, क्या आप अब भी इस बात से सहमत हैं...??गुलाब का फूल ही क्या , इंसान भी मुरझाता है, मरता है क्यों कि ये आर्गेनिक चीज़ें हैं, इनकी एक हाफ लाइफ होती है, decaying और weathering होती है, इसे हम आप नहीं रोक सकते, प्लास्टिक का फूल सिथेटिक है, एक सिद्धांत के आधार पर बनाया गया है, इसे आप ज़मीन में गाड़ दीजिये और सौ साल बाद भी निकालिये तो वैसे का वैसा मिलेगा .....सिद्धांत ज़िंदा रहते हैं, क्योंकि वो सिंथेसिस किये जाते हैं... किताबों में सिद्धांत होते हैं, इसीलिए वो ज़िंदा रहती हैं........जाहिल हर युग में हुए हैं और होते रहेंगे तभी तो कसाब और अफ़ज़ल को फाँसी दे दी गयी........क्या वो गुनहगार थे या जिन्होंने उनका ब्रेन-वाश करके इस तरफ धकेला , वो गुनहगार थे....बड़ी वाहवाही मिली बस..आतंकवाद जहाँ था वहीं रहे, इससे किसको फ़र्क पड़ा..... एक ही किताब , एक ही टीचर से एक ही क्लास में पढ़ने वाले बच्चो को अलग अलग नंबर मिलते हैं......क्योंकि सबकी grasping power अलग अलग होती है...लेकिन बुरा भला टीचर को कहा जाता है....जहाँ तक मोटिव की बात है, कड़वी दवा का मोटिव क्या होता है...?? परिणाम पाने के लिए क्या वो अपना characteristic छोड़ दे?? उसे आपने काम से मतलब है, रूप से नहीं..ये कोई conclusion नहीं है सिर्फ मेरे विचार हैं, विचार रखना कोई fanaticism तो नहीं होती.....

के द्वारा: sinsera sinsera

मान्यवर अनिल कुमार "अलीन" जी.आप ने कहा है- when all the knowledge and the power of world come to end. I am started from there……………..I am Anil Kumar ‘Aline.’……….आप को मै बता दूँ कि जिस अवस्था का आप ने जिक्र किया है,उस अवस्था को प्राप्त व्यक्ति मौन हो जाता है.काशी में इस अवस्था को प्राप्त अनगिनत लोग हैं.आप भ्रमित और आत्म सम्मोहित हैं.मै तो हर क्षण स्वयं में लीन रहता हूँ,लेकिन आप स्वयं से बहुत दूर हैं,स्वयं को जानते भी नहीं हैं,केवल एक थके हारे व्यक्ति की तरह दूसरों से ईर्ष्या करके,दूसरा का मजाक उड़ाकर और अपनी समझ से दूसरों से बदला लेकर सुख महसूस करते हैं.ये एक मानसिक बीमारी है.पहले आप एक अच्छा इंसान तो बनिए,ज्ञान की ऊँची बातें बाद में कीजियेगा.आप के लेख पढ़कर आप के ज्ञान से थोडा सा प्रभावित हुआ था,लेकिन आप के व्यवहार ने सब धो पोंछ के साफ कर दिया है.बेहतर हो कि आप अपना ज्ञान अपने पास रखें और कमेंट पर कमेंट न करें.आदमी मुह से बक बक करके ज्ञान अज्ञान से पार नहीं होता है,बल्कि मौन से होता है और ज्ञान अज्ञान के पार मुक्त व्यक्ति का एक ही लक्षण है--बड़े बड़ाई ना करें,बड़े न बोलें बोल ! हीरा मुख से कब कहे लाख हमारो मोल !!आप ने अपना उपनाम अलीन रखा है,फिर भी कम क्रोध लोभ मोह ईर्ष्या-द्वेष प्रतिशोष की भावना और अहंकार में "लीन" रहते हैं.पहले अपने उपनाम को सार्थक कीजिये ज्ञान की बातें बाद में कीजियेगा.अपने प्रेम और शुभकामनाओं सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

हाँ............हाँ...............हाँ................हूँ.........हूँ................हूँ............! समझने और होने में वही अंतर है जो जमीं और आसमान में है. आपकी जानकारी के लिए एक बार फिर बता दूँ कि मैं कोई ज्ञानी नहीं. जी, जवाब आप नहीं दे रहे हैं बल्कि मैं दिलवा रहा हूँ. वो इसलिए ताकि आपका वह चेहरा सामने आये जिसको आप दुनिया से छिपा रहे हैं. आप जो है उसे स्वीकार कर सके. बचपने से ही नहीं बचपन में लड़ाया है, दोनों दो बाते हैं. रहीं बात मेरी तो मैं जो हूँ उसे स्वीकार करता हूँ. हो सकता है कि आपका ह्रदय बचपन से ही शुद्ध हो. यदि ऐसा है तो आप सड़ रहे हैं. यह अलग बात है कि आप स्वीकार न करे. तलब का पानी कितना भी शुद्ध हो यदि समय के साथ नहीं बदला गया तो सड़ने लगता है, बदबू देने लगता है, उसमे कीड़े पड़ने लगता है. ऐसा ही कुछ आपके साथ है, यहाँ आपकी शुद्धता नहीं बल्कि आपका गुरुर बोल रहा वो भी झूठ और धोखे से भरा हुआ. आपने कमेंट में क्या लिखा है और किया नहीं, इसकी सफाई आपको देने की कोई जरूरत नहीं. क्योंकि यह गुनहगारों और कमजोरों का काम होता हैं परन्तु आप तो शुद्ध हैं. हैं न.........हाँ...........हाँ.........मुझे ज्ञानी कहकर खुद को अपमानित न करें. वरना शुद्धता की तोहीन होगी. वैसे भी आपको एक बार बताया था कि मैं ज्ञान और मूर्खता दोनों से परे हूँ........मैं अनिल कुमार 'अलीन' हूँ और इस नाम को किसी विशेषण अथवा उपाधि की. आवश्यकता नहीं.........साबित करना और करवाना दोनों ही मूर्खों का काम है मजा तो बस जो हैं हम, वही होने में हैं. अभी आपने कहाँ कि फलदार वृक्ष हमेशा धरती की तरफ झुके होते हैं. मतलब आपके कहे अनुसार झुक गया तो मैं फलदार हो जाउंगा मतलब ज्ञानी सही अर्थों में कहलाऊंगा. महोदय इससे हास्यपद क्या होगा कि आप मुझे जानते हैं जो मैं हूँ फिर भी मुझे वह साबित करना चाहते हैं जो मैं नहीं हूँ. यह बनावटी जीवन जीना छोड़िये और खुद को स्वीकार करिये. आप यहाँ कहना, "ये सारे कमेंट पढ़ने के बाद आदरणीय सरिता सिन्हा जी सबसे ज्यादा व्यवहारिक और सबसे बड़ी ज्ञानी नज़र आती हैं." संदिग्ध है. इससे सिद्ध होता है कि आप दुबिधा में है. आपके अनुसार वो नज़र आती है, वैसा है नहीं.....आप एकदम भ्रमित है. आपको खुद नहीं पता कि आप क्या बोल रहे हैं? क्यों बोल रहे हैं? कहाँ बोल रहे हैं? किससे बोल रहे हैं? बस खुद की खुद से नाराजगी दूसरों पर झल्लाकर निकाल रहे हैं. जी, खुद से मुंह छुपकर दूसरों से, यह आप ही सीखिए और जीवन भर खुद से दूर होकर दूसरों के पीछे युहीं भागते रहिये और जब थक जाइयेगा तब खुद के पास आइयेगा वही मिलूंगा आपसे. फिर यह सवाल वहीँ उठाइएगा......... when all the knowledge and the power of world come to end. I am started from there.................I am Anil Kumar 'Aline.'...........इसे भी समझने मत लगिएगा क्योंकि समझ से बाहर हूँ खुद को समझिये आप. जब ऐसा कर जायेंगे तो मैं खुदबखुद समझ में आ जाउंगा. ........

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

पहले दो तीन मज़ाक कर लूँ आप से... पहला- मुझे नहीं लगता कि आपने मेरे कमेंट को ध्यान से पढ़ा है... आपने जल्दबाजी में प्रतिक्रिया दे दिया है... मैंने अभी तक न तो क़ुरान की निंदा की है न ही मोहम्मद साहेब की... दूसरा- आपकी ये प्रतिक्रिया मजह लीपा-पोती ही है, आपने हड़बड़ाहट में कुछ से कुछ बोल दिया है...जैसे, "अच्छी जीवन शैली सिखाने के लिए सोच-समझ कर एक किताब लिखी…तो हमें उनका आभारी होना चाहिए", "गम ये कि खुद को इतना महान समझने लगे कि युगों से स्थापित महान व्यक्तियों और पुस्तकों पर आपत्ति उठाने लायक हो गए" "मेरा खुद का ये मानना है की लक्ष्य लेकर तो कई लोग चलते हैं लेकिन मरते दम तक जो अपने रस्ते से न डिगे , उसे ही ईश्वरीय दूत कहा जा सकता " ...... ये सब क्या हैं..?? मैं क्या अगर कोई भी मुस्लमान अगर आपकी ये प्रतिक्रिया पढ़कर आपके विरोध में खड़ा हो जाएगा... आपने सही कहने के चक्कर में गलत गलत बात कह दी है... अब मेरी बात- किसने कहा आपको कि गीता के साथ मेरी 'श्रद्धा' है...?? आपने मेरी बातों को गलत ढंग से रखा है, "कोई गीता पर ऊँगली उठता है तो मुझे लगता है किसी ने 'मेरी' माँ को गाली दी हो''...??? मैंने ऐसा कही और कहीं नहीं कहा है...?? मैंने कहा था, 'गीता का अपमान करना ‘माँ’ को गाली देने के समान है..' इसमें 'मेरी माँ और गाली कहाँ है...??? सारे धर्म ग्रन्थ कूड़ा-कचड़ा है, और जब मैं ये कहता हूँ कि 'गीता समस्त ग्रंथों का सार है' तो मेरा सिर्फ इतना मतलब है कि 'कूड़ा-कचड़ा' का सार है...दूसरी बात अगर निंदा करना महानता नहीं है तो डर के मारे किसी की झूठी तारीफ करना कौन सी महानता है....??? आप कहती हैं, "अगर उनमे कुछ बात न होती तो वो अब तक मिट चुके होते" गलती में हैं आप 'गुलाब का फूल सुबह खिलता है सांझ कुमलाह जाता है, जब कि प्लास्टिक का फूल सदियों सदियों ज़िंदा रहता है', चूँकि उनमे कोई बात नहीं है सिर्फ बकवास है इसीलिए वो ज़िंदा हैं...लोगों को झूठ के साथ जीने में आसानी होती है... मेरा किसी राजनितिक, धार्मिक, साम्प्रदायिक, या किसी जाति और क्षेत्र से कोई लेना देना नहीं है, अतः मैं किसी की तरफदारी नहीं कर सकता... बुद्धपुरुष माहौल से को प्रभावित करते हैं उससे खुद प्रभावित नहीं होते हैं...'क्यों बुद्ध ने अंगुलिमाल से लड़ाई नहीं की...क्यों उसको तलवार से नहीं डराया???' आप की सब दलीलें बचकानी हैं... जैसे कोई माँ अपने बच्चे की गलती को को सही सावित करने के लिए कुछ से कुछ दलीलें देने लगती है, उसी तरह आप भी डर कर कुछ से कुछ बोल रहीं है...!! लोग सब दिन से सब जगह जाहिल ही रहे हैं, ऐसा नहीं कि पहले जाहिल थे आज नहीं हैं.... 'जीसस को सूली देने वाले लोग क्या जाहिल नहीं थे...?? सुकरात को जहर देने वाले लोग क्या जाहिल नहीं थे...? महावीर के कान में सीसा पिघलवा कर डालने वाले लोग जाहिल नहीं थे...?? बुद्ध पर पत्थर फेकने वाले लोग जाहिल नहीं थे क्या...???, दिल्ली के जामा मस्जिद में सरमद का गला काट देने वाले लोग जाहिल नहीं थे क्या...??? अल्हिल्लाज मंसूर को सूली देने वाले लोग जाहिल नहीं थे क्या...?? एम्.फ़ हुसैन को भारत से खदेड़ कर भगा देने वाले लोग जाहिल नहीं थे क्या...??? "अप मोटिव देखिये , तरीके पे क्यूँ जाते हैं" नहीं बिल्कुल नहीं, आप देखिये मोटिव, मुझे सत्य देखने दीजिए...नीम का मोटिव कितना भी अच्छा हो उसमे मीठे आम नहीं लग सकता, मोटिव से क्या होता, परिणाम मायने रखता है... कोई चाहे कितने ही सही मोटिव के साथ बबूल पेड़ उगाये उसमे आम नहीं लग सकते, आप को राजनीती करनी है आप मोटिव देखिये.... .i strongly condemn people who disrespect great men, prophets and holy बुक्स... what's the difference between and the other illiterate men then... Now you strongly condemn, tomorrow you will surely kill, isn't it..?? Now I ask you, are you fanatic... one should be open for discussion not ready to jump into conclusion???

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आदरणीय अनिल कुमार "अलीन" जी,आप ज्ञानी जरुर हैं,लेकिन अपने को जरुरत से ज्यादा चालक समझते हैं.आप ने गलत टिपण्णी की है,इसीलिए मै उसका जबाब दे रहा हूँ.मेरा हृदय स्वच्छ है और मै आप की तरह लड़ाने-भिडाने का कम नहीं करता हूँ.आप ने बचपन से ही पिल्लों को लड़ाया है और आज भी आप की वही आदत बनी हुई है.मैंने अपने कमेंट में ये नहीं कहा कि सरिता जी पहले अच्छा नहीं लिखती थीं.कई महीने बाद उन्होंने लेख लिखा है,मेरा मंतव्य उसी बात से था.सबसे पहले तो ज्ञानी व्यक्ति को किसी के बीच टाँग अडाना नहीं चाहिए और यदि आप ऐसी गलती कर ही रहे हैं तो पहले आप कमेंट तो ध्यान से पढ़ लिया कीजिये.अपने को इस मंच का सबसे बड़ा ज्ञानी साबित करने का रोग आपको लगा हुआ है.फलदार वृक्ष हमेशा धरती की तरफ झुका रहता है.आप तो ये भी भूल जाते हैं कि शिष्टाचार और विनम्रता ज्ञानी व्यक्ति का पहला लक्षण है.ये सारे कमेंट पढ़ने के बाद आदरणीय सरिता सिन्हा जी सबसे ज्यादा व्यवहारिक और सबसे बड़ी ज्ञानी नज़र आती हैं.अपनी गलतियों को स्वीकारते हुए उसे ठीक करते जाना ये उनकी विशेषता है.उन्ही से आप कुछ सीखिए.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

सूफी ध्यान मुहम्मद जी, आपको नमस्कार....आपके अध्ययन को नमस्कार....यहाँ भी थोड़ी ख़ुशी थोडा गम है...ख़ुशी ये कि आप किसी विषय को ध्यान पूर्वक पढ़ते हैं और जानकारी शेयर करते हैं..गम ये कि खुद को इतना महान समझने लगे कि युगों से स्थापित महान व्यक्तियों और पुस्तकों पर आपत्ति उठाने लायक हो गए.... जिस समय और जिस महाद्वीप में इस्लाम धर्म की शुरुआत हुई, वहाँ का माहौल इतना जाहिलाना था कि उन लोगों को नफीस ज़ुबान में नहीं समझाया जा सकता था..सब आपस में लड़ने कटने वाले क़बीले थे ..उको समझने के लिए उनकी बुद्धि के अनुसार बातें कही गयीं..उस प्रतिकूल माहौल में एक व्यक्ति ने अगर समाज सुधार का काम किया, अच्छी जीवन शैली सिखाने के लिए सोच-समझ कर एक किताब लिखी...तो हमें उनका आभारी होना चाहिए, वो ज़माना सोचिये, आज की तरह लैपटॉप और नेट नहीं था..पथरीले पहाड़ों पर , आग उगलते रेगिस्तानों में भटक कर सब तरफ से सताया हुआ इंसान अगर मानवमात्र की भलाई के लिए ही सोचता रहा और अपने कर्तव्य से नहीं डिगा तो वो कोई साधारण इंसान नहीं बल्कि ईश्वर का पैगम्बर ही होगा...आप इसे लीपा पोती नहीं कहियेगा और न ही किसी को प्रभावित करने की कोशिश...मेरा खुद का ये मानना है की लक्ष्य लेकर तो कई लोग चलते हैं लेकिन मरते दम तक जो अपने रस्ते से न डिगे , उसे ही ईश्वरीय दूत कहा जा सकता है ...आज हम जिन बातों को कमी समझते हैं , हो सकता है वो उस वक़्त कि डिमांड रही हो .......जब आज तक लोग सीधी बात नहीं समझते , ऊँगली टेढ़ी करनी पड़ती है , तो 1500 साल पहले तो जहालत कि हद थी .........जैसे माएं बच्चों को खाना खिलाती हैं तो शेर भालू को बुलाती हैं , कुछ वैसा ही रहा होगा ...अप मोटिव देखिये , तरीके पे क्यूँ जाते हैं .....जो भी हो ...........i strongly condemn people who disrespect great men, prophets and holy books.....अगर उनमे कुछ बात न होती तो वो अब तक मिट चुके होते ......आपके पास ज्ञान का असीमित भंडार है .....but plz.....be modest and polite......आपने कुछ दिनों पहले कहा कि कोई गीता पर ऊँगली उठता है तो मुझे लगता है किसी ने मेरी माँ को गाली दी हो .......अब आप क़ुरान पर ऊँगली उठा रहे हैं ......क्यूँ ...............गीता के साथ आपकी श्रद्धा है , क़ुरान के साथ क्यूँ नहीं , जबकि दोनों ही पुस्तकें अपनी उत्पत्ति के काल के हिसाब से जीवन शैली सिखाती हैं जो आज भी लाभकारी है ..................आपसे उत्तर चाहती हूँ कि आप गीता के लिए निष्ठावान हैं तो क़ुरान के लिए क्यूँ नहीं ......ARE U BIASED ........???????

के द्वारा: sinsera sinsera

जाफ़र साहब नमस्कार, ..क्यों भाई , आर्टिकल लिखने में क्या हो गया..नहीं लिखती तो इतनी सारी जानकारी कैसे मिलती..इसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद ..मुझे तो बहुत ख़ुशी है और थोडा दुःख भी...ख़ुशी इस बात की कि आप लोगो ने अपनी बातों को बहुत ही शालीन तरीके से सामने रखा वर्ना आम तौर पर ऐसे मुद्दों पर लोग यूँ उछलते है जैसे सांप की पूँछ पर पैर पड़ गया हो...और दुःख ये की जो मैं ने कहना चाहा था वो आपने समझा नहीं..मेरा मतलब सिर्फ ये था कि जो बात गुज़र चुकी है उसे बदला नहीं जा सकता , तो उस दुःख को अपने दिल के अंदर रखें और आगे बढे, तरक्की करने की सोचें...आपने कहा कि मातम करके हम ये दिखाते हैं कि हम ज़ुल्म सहने के लिए तैयार हैं..लेकिन ये तैयारी कहीं दिखी नहीं....हाल ही में अभी इतनी सारी अन्यायपूर्ण दुर्घटनाएं हुईं लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं लगा ....बाद में लोगो ने अफ़सोस ज़ाहिर किये लेकिन दंगो कि आग में कोई नहीं कूदा...सड़कों पर, स्टेशन पर, ट्रेनों में जो निर्दोष मारे गए, उनपर आप कभी नहीं रोये, क्या इसलिए कि वो आपका मज़हब शेयर नहीं करते...कुछ पागल आतंकवादियों की हरकतों से आज इस्लाम जैसा महान धर्म दाँव पर लगा हुआ है..उनको जड़ से मिटाने का बीड़ा ये हौसलामंद नौजवान क्यों नहीं उठाते...आपको पता है, इसी बेहूदे तथाकथित "जिहाद " ने इस्लाम की इतनी बदनामी करा रखी है, आपको बुरा नहीं लगता...?? आप मुझे शिक्षित लगते हैं...क्यों नहीं आप आपने जैसे और शिक्षितों को साथ लेकर इस झूठे जिहाद को जड़ से उखाड़ फेंकने का बीड़ा उठाते हैं..यकीं मानिये..अगर तब कोई लड़ाई हुई और उसमे खून बहाना पड़े तो आप की माँओ के साथ हमें भी गर्व होगा...अजमल कसाब को जन्नत की हूरों के झूठे सपने दिखा कर जिन लोगों ने आतंकवाद का रास्ता पकड़ाया, उस ने अपनी दो साल की की कैद में उन पर हज़ार लानतें भेजी होंगी और कोसा होगा..ऐसा न होता तो वो कोर्ट में रोता हुआ न दिखायी देता...आप ऐसे भटके हुए नौजवानो को सही रास्ता दिखाने का नेक काम उठाइये ....बहुत मुश्किल है न...उन पाकिस्तान और दुबई में बैठे हुए आकाओं से लड़ना....लेकिन तब हम जानेंगे की आप क़ुरबानी देने से नहीं डरते और ज़ुल्म सहने को तैयार हैं....शुभकामनाओं सहित...

के द्वारा: sinsera sinsera

करबला में लिखी गई थी इस्लामी आतंकवाद की पहली इबारत मोहर्रम का महीना तो दरअसल इस्लामिक कैलेन्डर के अनुसार वर्ष का पहला महीना होता है। परन्तु इसी मोहर्रम माह में करबला (इराक) में लगभग 1400 वर्ष पूर्व अत्याचार व आतंक का जो खूनी खेल एक मुस्लिम बादशाह द्वारा खेला गया, उसकी वजह से आज पूरा इस्लामी जगत मोहर्रम माह का स्वागत नववर्ष की खुशियों के रूप में करने के बजाए शोक व दुःख के वातावरण में करता आ रहा है। शहीद-ए-करबला हजरत इमाम हुसैन को अपनी अश्रुपूरित श्रद्घांजलि देने के साथ-साथ पूरी दुनिया में इस्लामी जगत के लोग उस सीरियाई शासक यजीद को भी लानत भेजते हैं, जिसने हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन व उनके 72 परिजनों को आज से लगभग 1400 वर्ष पूर्व मैदान-ए-करबला में फुरात नदी के किनारे तपती धूप में क्रूरतापूर्वक भूखा व प्यासा शहीद कर इस्लामी आतंकवाद की पहली इबारत लिखी थी।बडे दुःख का विषय है कि इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मोहम्मद द्वारा इस्लाम के रूप में परिचित कराए गए इस पंथ पर उन्हीं के अपने दौर में ही ग्रहण लगना शुरु हो गया था। हजरत मोहम्मद इस्लाम धर्म का पालन करने वाले मुसलमानों से ऐसी उम्मीद करते थे कि वे केवल एक अल्लाह के समक्ष नतमस्तक हों, चरित्रवान हों, पवित्र हों, एक-दूसरे के प्रति प्रेम, सद्भाव व सहयोग की भावना रखने वाले हों, दानी हों, छल-कपट, झूठ, मक्कारी, व्याभिचार, दुराचार से दूर हों। किसी दूसरे के माल व दौलत पर नजर न रखते हों, जुआ, शराब, हरामखोरी, हरामकारी जैसे दुव्र्यसनों से हरगिज वास्ता न रखते हों। ऐसी व ऐसी और तमाम विशेषताओं को धारण करने वाले व्यक्ति को हजरत मोहम्मद साहब एक सच्चे मुसलमान की श्रेणी में गिना करते थे। यही निर्देश उन्होंने अपने परिजनों को भी दिए थे। अतः उनके निर्देशों का पालन करना तथा हजरत द्वारा बताए गए इस्लामिक सिद्घान्तों पर हूबहू अमल करना उनके परिजन अपना कर्त्तव्य समझते थे।दूसरी ओर इस्लाम की उत्पत्ति के केंद्र मदीना से कुछ दूर सीरिया देश जिसे उस समय ‘शाम’ के नाम से जाना जाता था में मुआविया नामक शासक का दौर था। मुआविया का पुत्र यजीद जिसमें कि सभी अवगुण मौजूद थे, वह अपने पिता मुआविया की मृत्यु के बाद शाही वारिस के रूप में शाम राज्य की गद्दी पर काबिज हो गया। इस्लामी इतिहास का वह पहला काला दिन था जिस दिन यजीद जैसे भ्रष्ट, चरित्रहीन व अत्याचारी शासक ने स्वयं को किसी इस्लामिक देश का बादशाह घोषित करने का दुस्साहस किया था। उधर हजरत मोहम्मद द्वारा चलाए गए पवित्र पंथ इस्लाम की रक्षा के लिए तथा इसे यजीद जैसे किसी अपशकुनी बादशाह से दूर रखने के लिए हजरत मोहम्मद का वह पहला घराना था जिसने यजीद जैसे दुष्ट क्रूर सीरियाई सुल्तान को किसी इस्लामी देश का इस्लामी शासक मानने से साफ इन्कार कर दिया था। यही कारण था जिसके चलते दसवीं मोहर्रम को करबला के मैदान में बेगुनाहों के खून की होलियां खेली गईं। क्रूरता का एक ऐसा इतिहास करबला के मैदान में यजीद के सेनापतियों व उसके सैनिकों द्वारा रचा गया जिसकी दूसरी मिसाल आज तक देखने व सुनने को नहीं मिली। एक ओर तो यजीद अपनी गुलाम महिलाओं, मां जैसी उम्र वाली गुलाम महिलाओं, अपनी ही बहनों व बेटियों तक से व्याभिचार करने में गर्व महसूस करता था। उसे शराब के नशे में खुदा से रुबरु होने अथवा नमाज पढने का ढोंग करने में आनन्द की अनुभूति होती थी। हजरत इमाम हुसैन तथा हजरत मोहम्मद का पूरा घराना यजीद के दुष्चरित्र से पूरी तरह परिचित था। केवल हजरत मोहम्मद का परिवार ही नहीं बल्कि पूरे इस्लामी जगत में उस समय यजीद की चरित्रहीनता की चर्चा होने लगी थी। यजीद जैसे आततायी व्यक्ति को इस्लामी देश के शासक के रूप में देखकर मुस्लिम जगत इसे इस्लाम धर्म पर एक बडे अपशकुन के रूप में देख रहा था। ऐसे क्रूर, दुष्ट एवं व्याभिचारी शासक को इस्लामी देश के शासक के रूप में अपनी स्वीकृति प्रदान कर देना हजरत मोहम्मद के नवासे व हजरत अली व फातिमा के बेटे हजरत हुसैन के लिए आखिर कहां सम्भव था।हजरत इमाम हुसैन ने यजीद को शाम के इस्लाम शासक के रूप में स्वीकृति प्रदान करने से इन्कार कर दिया। और हजरत हुसैन का यही इन्कार करबला की दर्दनाक घटना का तो कारण बना ही साथ-साथ करबला की यही घटना इस्लाम की रक्षा के लिए हजरत मोहम्मद के घराने की ओर से दी गई महान कुर्बानी का भी एक सबब बनी। इतिहास साक्षी है कि दस मोहर्रम को करबला में यजीद की सेनाओं द्वारा हजरत हुसैन के 6 माह के बच्चे अली असगर, 18 वर्ष के जवान बेटे अली अकबर से लेकर 80 वर्ष के बुजुर्ग तक को तीरों व तलवारों से शहीद कर दिया गया। इतिहासकार बताते हैं कि करबला की घटना मई माह में घटित हुई थी। इराक में मई माह में पडने वाली गर्मी के विषय में आसानी से सोचा जा सकता है। आज भी वहां गर्मियों में दिन के समय सामान्य तापमान 50 डिग्री से अधिक ही होता है। सुना यह जाता है कि करबला के हादसे के समय प्राकृतिक रूप से कुछ ज्यादा ही गर्मी पड रही थी तथा फुरात नदी के किनारे की रेगिस्तानी जमीन आग की तरह तप रही थी। ऐसे भयंकर गर्मी के वातावरण में यजीदी फौजों द्वारा हजरत हुसैन व उनके सभी 72 साथियों के तम्बुओं को फुरात नदी के किनारे से बलपूर्वक हटा दिया गया। इतना ही नहीं बल्कि तीन दिन तक इन्हें नदी से पानी लेने की इजाजत तक नहीं दी गई। हजरत इमाम हुसैन की ओर से कुर्बानी देने आए इन 72 लोगों में दूध पीने वाले बच्चे से लेकर बुजुर्ग महिलाएं यहां तक कि हजरत हुसैन के एक पुत्र जैनुल आबदीन भी शामिल थे जोकि उन दिनों बहुत बीमारी की अवस्था से गुजर रहे थे।यजीद रूपी उस आतंकवादी शासक ने किसी पर भी कोई दया नहीं की। यदि हजरत मोहम्मद के परिवार के इन सदस्यों के कत्ल तक ही बात रह जाती तो भी कुछ गनीमत था। परन्तु यजीद ने तो करबला में वह कर दिखाया जिससे आज का यजीदी आतंकवाद भी कांप उठे। हजरत इमाम हुसैन व उनके पुरुष साथियों व परिजनों को क्रूरता के साथ कत्ल करने के बाद यजीद ने हजरत इमाम हुसैन के परिवार की महिला सदस्यों को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया। उनके बाजुओं पर रस्सियां बांधकर उन्ह बेपर्दा घुमाया गया। उसी जुलूस में आगे-आगे हजरत इमाम हुसैन उनके बेटों, भाई अब्बास व अन्य शहीदों के कटे हुए सरों को भाले में बुलंद कर आम लोगों के बीच प्रदर्शित किया गया। हजरत हुसैन की 4 वर्ष की बेटी सकीना को सीरिया के कैदखाने में कैद कर दिया गया जहां उसकी मृत्यु हो गई। आश्चर्य की बात तो यह है कि एक ओर तो इस घटना से दुःखी होकर इस्लामी जगत यजीद के नाम पर थूक रहा था तथा उसके मुस्लिम शासक होने पर सवाल खडे कर रहा था तो वहीं दूसरी ओर यजीद अपने को महान विजेता समझता हुआ हुसैन के लुटे हुए काफिले को देखने वालों को यह भ्रमित करने की कोशिश कर रहा था कि यह हश्र उन लोगों का किया गया है जिन्होंने यजीद के शासन के विरुद्घ विद्रोह करने का साहस किया था। एक ओर तो सीरिया के बाजारों में हजरत हुसैन व उनके परिजनों की शहादत को लेकर कोहराम मचा था तो दूसरी ओर यजीद अपने दरबार में ठीक उसी समय शराब व ऐश परस्ती से भरपूर जश्न मना रहा था।बहरहाल इस दर्दनाक घटना को 1400 वर्ष से अधिक बीत चुके हैं। हजरत इमाम हुसैन व उनके परिजनों द्वारा दी गई बेशकीमती कुर्बानी के फलस्वरूप इस्लाम आज दुनिया का दूसरा सबसे बडा पंथ माना जा रहा है। परन्तु यह भी एक कडवा सच है कि यजीदियत आज भी अपना फन उठाए हुए है। यजीदियत आतंकवाद के रूप में आज भी पूरे विश्व की शांति भंग करने का प्रयास कर रही है। कहना गलत नहीं होगा कि आज फिर यजीदियत को समाप्त करने के लिए हुसैनियत के परचम को बुलंद करने की जरूरत महसूस की जा रही है। अर्थात् आतंकवाद के आगे न झुकने के संकल्प की जरूरत, इसका मुंहतोड जवाब देने की जरूरत, इसे हरगिज आश्रय व प्रोत्साहन न देने की जरूरत तथा कदम-कदम पर इसका विरोध करने की जरूरत। और यदि जरूरत पडे तो इसके लिए बडी से बडी कुर्बानी देने के लिए भी तत्पर रहने की जरूरत। हुसैनियत का जज्बा ही इस्लाम पर लगते जा रहे ग्रहण से उसे बचा सकता है अन्यथा आतंकवाद के रूप में यजीदियत ठीक उसी प्रकार इस्लाम धर्म को निगल जाने के लिए बेताब है जैसे कि करबला में 1400 वर्ष पूर्व इस्लाम को आहत करने का एक प्रयास यजीदी विचाराधारा द्वारा किया गया था। कत्ल-ए-हुसैन अस्ल में मर्ग-ए-यजीद है। इस्लाम जिंदा होता है हर करबला के बाद।

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उफ़ुक़ पर मुहर्रम का चाँद नुमुदार होते ही दिल महज़ून व मग़मूम हो जाता है। ज़ेहनों में शोहदा ए करबला की याद ताज़ा हो जाती है और इस याद का इस्तिक़बाल अश्क़ों की नमी से होता है जो धीरे धीरे आशूरा के क़रीब सैले रवाँ में तबदील हो जाती है। उसके बाद आँसूओं के सोते ख़ुश्क होते जाते हैं और दिल ख़ून के आँसू बहाने पर मजबूर हो जाता है। यह कैसा ग़म है जो मुनदमिल नही होता?। यह कैसा अलम है जो कम नही होता?। यह कैसा कर्ब है जिसे एफ़ाक़ा नही होता?। यह कैसा दर्द है जिसे सुकून मयस्सर नही आता?। सादिक़े मुसद्दक़ पैग़म्बर (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमाया था: ............................ बेशक क़त्ले हुसैन से मोमिनीन के दिल में ऐसी हरारत पैदा होगी जो कभी भी ख़त्म नही होगी। वाक़ेयन यह ऐसी हरारत है जो न सिर्फ़ यह कि कम नही होती बल्कि चौहद सदियाँ गुज़रने के बाद भा बढ़ती ही जाती है, बढ़ती ही जा रही है। मैदाने करबला में फ़रज़ंदे रसूल (स) सैय्यदुश शोहदा हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके अंसार व अक़रबा को तीन दिन का भूखा प्यासा शहीद कर दिया गया। करबला वालों का ऐसा कौन सा अमल है जो दूसरों की बनिस्बत ख़ास इम्तेयाज़ का हामिल है?। जहाँ हमे करबला के मैदान में अज़मते आमाल व किरदार के बहुत से नमूने नज़र आते हैं उन में एक निहायत अहम सिफ़त उन में आपस में एक दूसरे के लिये जज़्ब ए ईसार का पाया जाना है। शोहदा ए करबला की ज़िन्दगी के हर हर पहलू पर, हर हर मंज़िल पर ईसार व फ़िदाकारी व क़ुरबानी की ऐसी मिसालें मौजूद हैं जिसकी नज़ीर तारीख़े आलम में नही मिलती। शहादत पेश करने के लिये अंसार का बनी हाशिम और बनी हाशिम का अंसार पर सबक़त करना तारीख़े ईसारे आलम की सबसे अज़ीम मिसाल है। करबला करामाते इंसानी की मेराज है। करबला के मैदान में दोस्ती, मेहमान नवाज़ी, इकराम व ऐहतेराम, मेहर व मुहब्बत, ईसार व फ़िदाकारी, ग़ैरत व शुजाअत व शहामत का जो दर्स हमें मिलता है वह इस तरह से यकजा कम देखने में आता है। मैंने ऊपर ज़िक किया कि करबला करामाते इंसानी की मेराज का नाम है। वह तमाम सिफ़ात जिन का तज़किरा करबला में बतौरे अहसन व अतम हुआ है वह इंसानी ज़िन्दगी की बुनियादी और फ़ितरी सिफ़ात है जिन का हर इंसान में एक इंसान होने की हैसियत से पाया जाना ज़रुरी है। उसके मज़ाहिर करबला में जिस तरह से जलवा अफ़रोज़ होते हैं किसी जंग के मैदान में उस की नज़ीर मिलना मुहाल है। बस यही फ़र्क़ होता है हक़ व बातिल की जंग में। जिस में हक़ का मक़सद, बातिल के मक़सद से सरासर मुख़्तलिफ़ होता है। अगर करबला हक़ व बातिल की जंग न होती तो आज चौदह सदियों के बाद उस का बाक़ी रह जाना एक ताज्जुब ख़ेज़ अम्र होता मगर यह हक़ का इम्तेयाज़ है और हक़ का मोजिज़ा है कि अगर करबला क़यामत तक भी बाक़ी रहे तो किसी भी अहले हक़ को हत्ता कि मुतदय्यिन इंसान को इस पर ताज्जुब नही होना चाहिये। अगर करबला दो शाहज़ादों की जंग होती?। जैसा कि बाज़ हज़रात हक़ीक़ते दीन से ना आशना होने की बेना पर यह बात कहते हैं और जिन का मक़सद सादा लौह मुसलमानों को गुमराह करने के अलावा कुछ और होना बईद नज़र आता है तो वहाँ के नज़ारे क़तअन उस से मुख़्तलिफ़ होते जो कुछ करबला में वाक़े हुआ। वहाँ शराब व शबाब, गै़र अख़लाक़ी व गै़र इंसानी महफ़िलें तो सज सकती थीं मगर वहाँ शब की तारीकी में ज़िक्रे इलाही की सदाओं का बुलंद होना क्या मायना रखता?। असहाब का आपस में एक दूसरों को हक़ और सब्र की तलक़ीन करना का क्या मफ़हूम हो सकता है?। माँओं का बच्चों को ख़िलाफ़े मामता जंग और ईसार के लिये तैयार करना किस जज़्बे के तहत मुमकिन हो सकता है?। क्या यह वही चीज़ नही है जिस के ऊपर इंसान अपनी जान, माल, इज़्ज़त, आबरू सब कुछ क़ुर्बान करने के लिये तैयार हो जाता है मगर उसके मिटने का तसव्वुर भी नही कर सकता। यक़ीनन यह इंसान का दीन और मज़हब होता है जो उसे यह जुरअत और शुजाअत अता करता है कि वह बातिल की चट्टानों से टकराने में ख़ुद को आहनी महसूस करता है। उसके जज़्बे आँधियों का रुख़ मोड़ने की क़ुव्वत हासिल कर लेते हैं। उसके अज़्म व इरादे बुलंद से बुलंद और मज़बूत से मज़बूत क़िले मुसख़्ख़र कर सकते हैं। यही वजह है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पाये सबात में लग़ज़िश का न होना तो समझ में आता है कि वह फ़रज़ंदे रसूल (स) हैं, इमामे मासूम (अ) हैं, मगर करबला के मैदान में असहाब व अंसार ने जिस सबात का मुज़ाहिरा किया है उस पर अक़्ल हैरान व परेशान रह जाती है। अक़्ल उस का तजज़िया करने से क़ासिर रह जाती है। इस लिये कि तजज़िया व तहलील हमेशा ज़ाहिरी असबाब व अवामिल की बेना पर किये जाते हैं मगर इंसान अपनी ज़िन्दगी में बहुत से ऐसे अमल करता है जिसकी तहलील ज़ाहिरी असबाब से करना मुमकिन नही है और यही करबला में नज़र आता है। हमारा सलाम हो हुसैने मज़लूम पर हमारा सलाम हो बनी हाशिम पर हमारा सलाम हो मुख़द्देराते इस्मत व तहारत पर हमारा सलाम हो असहाब व अंसार पर। या लैतनी कुन्तो मअकुम।

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पिछले 1400 वर्षों के दौरान, साहित्य की एक अभूतपूर्व राशि दुनिया की लगभग हर भाषा में इमाम हुसैन (अस) , पर लिखी गयी है, जिसमे मुख्य रूप से इमाम हुसैन (अस) के सन 61हिजरी में कर्बला में अवर्णनीय बलिदान का विशेष अस्थान और सम्मान है! इस्लाम धर्म के सबी मुसलमान इस बात पर सहमत हैं के कर्बला के महान बलिदान ने इस्लाम धर्म को विलुप्त होने से बचा लिया ! हालांकि, कुछ मुसलमान इस्लाम की इस व्याख्या से असहमत हैं और कहते हैं की इस्लाम में कलमा के "ला इलाहा ईल-लल्लाह" के सिवा कुछ नहीं है! मुसलमान का कुछ गिरोह हजरत मुहम्मद को भी कलमा के एक अनिवार्य अंग मानते हुए कलमा में "मुहम्मद अर रसूल-अल्लाह" को भी पहचाना है! इस्लाम धर्म के मुख्य स्तम्भ (तौहीद, अदल, नबूअत और कियामत) में तो सभी विश्वास रखते हैं परंतू यह समूह पैगम्बर (स अ ) द्वारा बताये, सिखाये और दिखाए[1] हुए “इमामत” को ना तो पहचानता ही है और ना ही इसको कलमा का एक अभिन्न अंग मानता है! मुसलमानों के केवल एक छोटे तबके ने इमामत को पहचाना और यह विश्वास करते हैं की इमामत के प्रत्येक सदस्य अल्लाह के प्रतिनीधि और नियुक्ती हैं! यह अल्लाह के ज्ञान में था कुछ मुसलमान हजरत अली (अस) को "अमीर उल मोमनीन" के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे! इसलिए अल्लाह ने इन लोगों का परीक्षण करने के लिए और अपनी स्वीकृति पर लोगों को विलाए-अली (अस) की स्वीकृति/अस्वीकृति के अनुसार इनाम / सज़ा देने का फैसला किया था ! अल्लाह ने इनके अस्वीकृति के फलसवरूप हजरत मुहम्मद द्वारा यह घोषणा कर दी के इनके (हजरत अली (अस) के ) बिना कोई भी कर्म या पूजा के कृत्यों इनके लिए नहीं जमा किये जायेंगे और ना ही अल्लाह इनके धर्मो कर्मो को स्वीकार करेगा! इसी कारण हजरत मुहम्मद (स अ व ) , उनकी पुत्री हजरत फातिमा ज़हरा (स:अ) ने सारी ज़िंदगी अल्लाह के इस फैसले को बचाने में निछावर कर दी! और इन्ही कारणों से उन्हें शहीद भी कर दिया गया! जब इमाम हुसैन (अस) कुफा के रेगिस्तान से कर्बला की तरफ जा रहे थे तो किसी ने उनसे उनकी यात्रा का उद्देश्य पुछा! इमाम (अस) ने कहा , मै कर्बला , इस्लाम को पुनर्जीवित करने के लिए जा रहा हूँ और मै उन हत्यारों को उजागर करने जा रहा हूँ जिसने मेरे नाना मुहम्मद मुस्तफा (स अ व ) , मेरी माँ फातिमा ज़हर (स:अ) , मेरे भाई हजरत हसन (अस) को क़त्ल किया है और इस्लाम को नेस्त-ओ-नाबूद करने में कोई कसार नहीं छोड़ी है! इमाम हुसैन (अस) पर यह संक्षिप्त लेख उत्तरार्द्ध सिद्धांत के अनुयायियों को समर्पित है. हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम : इमाम हुसैन (अल हुसैन बिन अली बिन अबी तालिब , यानि अबी तालिब के बेटे अली के बेटे अल हुसैन , 626-680 ) अली अ० के दूसरे बेटे और पैग़म्बर मुहम्मद के नाती थे! आपकी माता का नाम फ़ातिमा जाहरा था । आप अपने माता पिता की द्वितीय सन्तान थे। आप शिया समुदाय के तीसरे इमाम हैं! आपका जन्म 3 शाबान, सन 4 हिजरी, 8 जनवरी 626 ईस्वी को पवित्र शहर मदीना, सऊदी अरब) में हुआ था और आपकी शहादत 10 मुहर्रम 61 हिजरी (करबला, इराक) 10 अक्टूबर 680 ई. में वाके हुई! आप के जन्म के बाद हज़रत पैगम्बर(स.) ने आपका नाम हुसैन रखा, आपके पहले "हुसैन" किसी का भी नाम नहीं था। आपके जनम के पश्चात हजरत जिब्रील (अस) ने अल्लाह के हुक्म से हजरत पैगम्बर (स) को यह सूचना भेजी के आप पर एक महान विपत्ति पड़ेगी, जिसे सुन कर हजरत पैगम्बर (स) रोने लगे थे और कहा था अल्लाह तेरी हत्या करने वाले पर लानत करे। आपकी मुख्य अपाधियाँ निम्नलिखित हैं : * मिस्बाहुल हुदा * सैय्यिदुश शोहदा * अबु अबदुल्लाह * सफ़ीनातुन निजात इतिहासकार मसूदी ने उल्लेख किया है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम छः वर्ष की आयु तक हज़रत पैगम्बर(स.) के साथ रहे। तथा इस समय सीमा में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को सदाचार सिखाने ज्ञान प्रदान करने तथा भोजन कराने का उत्तरदायित्व स्वंम पैगम्बर(स.) के ऊपर था। पैगम्बर (स.) इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से अत्यधिक प्रेम करते थे। वह उनका छोटा सा दुखः भी सहन नहीं कर पाते थे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से प्रेम के सम्बन्ध में पैगम्बर(स.) के इस प्रसिद्ध कथन का शिया व सुन्नी दोनो सम्प्रदायों के विद्वानो ने उल्लेख किया है। कि पैगम्बर(स.) ने कहा कि हुसैन मुझसे हैऔर मैं हुसैन से हूँ। अल्लाह तू उससे प्रेम कर जो हुसैन से प्रेम करे। हज़रत पैगम्बर(स.) के स्वर्गवास के बाद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम तीस (30) वर्षों तक अपने पिता हज़रत इमामइमाम अली अलैहिस्सलाम के साथ रहे। और सम्स्त घटनाओं व विपत्तियों में अपने पिता का हर प्रकार से सहयोग करते रहे। हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद दस वर्षों तक अपने बड़े भाई इमाम हसन के साथ रहे। तथा सन् पचास ( 50) हिजरी में उनकी शहादत के पश्चात दस वर्षों तक घटित होने वाली घटनाओं का अवलोकन करते हुए मुआविया का विरोध करते रहे । जब सन् साठ (60) हिजरी में मुआविया का देहान्त हो गय, व उसके बेटे यज़ीद ने गद्दी पर बैठने के बाद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत (आधीनता स्वीकार करना) करने के लिए कहा , तो आपने बैअत करने से मना कर दिया।और इस्लामकी रक्षा हेतु वीरता पूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गये। हज़रत मुहम्मद (स.) साहब को अपने नातियों से बहुत प्यार था मुआविया ने अली अ० से खिलाफ़त के लिए लड़ाई लड़ी थी । अली के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र हसन को खलीफ़ा बनना था । मुआविया को ये बात पसन्द नहीं थी । वो हसन अ० से संघर्ष कर खिलाफ़त की गद्दी चाहता था । हसन अ० ने इस शर्त पर कि वो मुआविया की अधीनता स्वीकार नहीं करेंगे, मुआविया को खिलाफ़त दे दी । लेकिन इतने पर भी मुआविया प्रसन्न नहीं रहा और अंततः उसने हसन को ज़हर पिलवाकर मार डाला । मुआविया से हुई संधि के मुताबिक, हसन के मरने बाद 10 साल (यानि 679 तक) तक उनके छोटे भाई हुसैन खलीफ़ा बनेंगे पर मुआविया को ये भी पसन्द नहीं आया । उसने हुसैन साहब को खिलाफ़त देने से मना कर दिया । इस दस साल की अवधि के आखिरी 6 महीने पहले मुआविया की मृत्यु हो गई । शर्त के मुताबिक मुआविया की कोई संतान खिलाफत की हकदार नहीं होगी, फ़िर भी उसका बेटा याज़िद प्रथम खलीफ़ा बन गया और इस्लाम धर्म में अपने अनुसार बुराईयाँ जेसे शराबखोरि, अय्याशी, वगरह लाना चाह्ता था। आप ने इसका विरोध किया, इस कुकर्मी शासन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए इमाम हुसैन (अस) को शहीद कर दिया गया, इसी कारण आपको इस्लाम में एक शहीद का दर्ज़ा प्राप्त है। आपकी शहादत के दिन को अशुरा (दसवाँ दिन) कहते हैं और इसकी याद में मुहर्रम (उस महीने का नाम) मनाते हैं । करबला की लडाई करबला ईराक का एक प्रमुख शहर है । करबला , इराक की राजधानी बगदाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में एक छोटा-सा कस्बा है ! यह क्षेत्र सीरियाई मरुस्थल के कोने में स्थित है । करबला शिया स्मुदाय में मक्का के बाद दूसरी सबसे प्रमुख जगह है । कई मुसलमान अपने मक्का की यात्रा के बाद करबला भी जाते हैं । इस स्थान पर इमाम हुसैन का मक़बरा भी है जहाँ सुनहले रंग की गुम्बद बहुत आकर्षक है । इसे 1801 में कुछ अधर्मी लोगो ने नष्ट भी किया था पर फ़ारस (ईरान) के लोगों द्वारा यह फ़िर से बनाया गया । यहा पर इमाम हुसैन ने अपने नाना मुहम्मद स्० के सिधान्तो की रक्षा के लिए बहुत बड़ा बलिदान दिया था । इस स्थान पर आपको और आपके लगभग पूरे परिवार और अनुयायियों को यजिद नामक व्यक्ति के आदेश पर सन् 680 (हिजरी 58) में शहीद किया गया था जो उस समय शासन करता था और इस्लाम धर्म में अपने अनुसार बुराईयाँ जेसे शराबखोरि,अय्याशी, वगरह लाना चाह्ता था। । करबला की लडा़ई मानव इतिहास कि एक बहुत ही अजीब घटना है। यह सिर्फ एक लडा़ई ही नही बल्कि जिन्दगी के सभी पहलुओ की मार्ग दर्शक भी है। इस लडा़ई की बुनियाद तो ह० मुहम्मद मुस्त्फा़ स० के देहान्त के के तुरंत बाद रखी जा चुकी थी। इमाम अली अ० का खलीफा बनना कुछ अधर्मी लोगो को पसंद नहीं था तो कई लडा़ईयाँ हुईं अली अ० को शहीद कर दिया गया, तो उनके पश्चात इमाम हसन अ० खलीफा बने उनको भी शहीद कर दिया गया। यहाँ ये बताना आवश्यक है कि, इमाम हसन को किसने और क्यों शहीद किया? असल मे अली अ० के समय मे सिफ्फीन नामक लडा़ई मे माविया ने मुँह की खाई वो खलीफा बनना चाहता था प‍र न बन सका। वो सीरिया का गवर्नर पिछ्ले खलिफाओं के कारण बना था अब वो अपनी एक बडी़ सेना तैयार कर रहा था जो इस्लाम के नही वरन उसके अपने लिये थी, नही तो उस्मान के क्त्ल के वक्त खलिफा कि मदद के लिये हुक्म के बावजूद क्यों नही भेजी गई? अब उसने वही सवाल इमाम हसन के सामने रखा या तो युद्ध या फिर अधीनता। इमाम हसन ने अधीनता स्वीकार नही की परन्तु वो मुसलमानो का खून भी नहीं बहाना चाहते थे इस कारण वो युद्ध से दूर रहे अब माविया भी किसी भी तरह सत्ता चाहता था तो इमाम हसन से सन्धि करने पर मजबूर हो गया इमाम हसन ने अपनी शर्तो पर उसको सि‍र्फ सत्ता सोंपी इन शर्तो मे से कुछ ये हैं: - 1. वो सिर्फ सत्ता के कामो तक सीमित रहेगा धर्म मे कोई हस्तक्षेप नही कर सकेगा। 2. वो अपने जीवन तक ही सत्ता मे रहेगा म‍रने से पहले किसी को उत्तराधिकारी न बना सकेगा। 3. उसके म्ररने के बाद इमाम हसन खलिफा़ होगे यदि इमाम हसन कि मृत्यु हो जाये तो इमाम हुसैन को खलिफा माना जायगा। 4. वो सिर्फ इस्लाम के कानूनों का पालन करेगा। इस प्रकार की शर्तो के द्वारा वो सिर्फ नाम मात्र का शासक रह गया, उसने अपने इस संधि को अधिक महत्व नहीं दिया इस कारण करब्ला नामक स्थान मे एक धर्म युध हुआ था जो मुहम्म्द स्० के नाती तथा अधर्मी यजीद (पुत्र माविया पुत्र अबुसुफियान पुत्र उमेय्या)के बीच हुआ जिसमे वास्त्व मे जीत इमाम हुसेन अ० की हुई प‍र जाहिरी जीत यजीद कि हुई क्योकि इमाम हुसेन अ० को व उन्के सभी साथीयो को शहीद कर दिया गया था उन्के सिर्फ् एक पुत्र अली अ० (जेनुलाबेदीन्)जो कि बिमारी के कारन युध मे भाग न ले सके थे बचे आज यजीद नाम इतना जहन से गिर चुका हे कोई मुसलमान् अपने बेटे का नाम यजीद नही रखता जबकी दुनिया मे ह्सन व हुसेन नामक अरबो मुस्ल्मान हे यजीद कि नस्लो का कुछ पता नही पर इमाम हुसेन कि औलादे जो सादात कहलाती हे जो इमाम जेनुलाबेदीन अ० से चली दुनिया भ‍र मे फेले हे इमाम हुसैन ( अस) विरोध और उसका उद्देश्य हज़रत इमाम हुसैन (अस) ने सन् ( 61) हिजरी में यज़ीद के विरूद्ध क़ियाम ( किसी के विरूद्ध उठ खड़ा होना) किया। उन्होने अपने क़ियाम के उद्देश्यों को अपने प्रवचनो में इस प्रकार स्पष्ट किया कि 1. जब शासकीय यातनाओं से तंग आकर हज़रत इमाम हुसैन (अस) मदीना छोड़ने पर मजबूर हो गये तो उन्होने अपने क़ियाम के उद्देश्यों को इस प्रकार स्पष्ट किया। कि मैं अपने व्यक्तित्व को चमकाने या सुखमय जीवन यापन करने या उपद्रव फैलाने के लिए क़ियाम नहीं कर रहा हूँ। बल्कि मैं केवल अपने नाना (पैगम्बरे इस्लाम) की उम्मत (इस्लामी समाज) में सुधार हेतु जारहा हूँ। तथा मेरा निश्चय मनुष्यों को अच्छाई की ओर बुलाना व बुराई से रोकना है। मैं अपने नाना पैगम्बर(स.) व अपने पिता इमाम अली ( अस) की सुन्नत(शैली) पर चलूँगा। 2. एक दूसरे अवसर पर कहा कि ऐ अल्लाह तू जानता है कि हम ने जो कुछ किया वह शासकीय शत्रुत या सांसारिक मोहमाया के कारण नहीं किया। बल्कि हमारा उद्देश्य यह है कि तेरे धर्म की निशानियों को यथा स्थान पर पहुँचाए। तथा तेरी प्रजा के मध्य सुधार करें ताकि तेरी प्रजा अत्याचारियों से सुरक्षित रह कर तेरे धर्म के सुन्नत व वाजिब आदेशों का पालन कर सके। 3. जब आप की भेंट हुर पुत्र यज़ीदे रिहायी की सेना से हुई तो, आपने कहा कि ऐ लोगो अगर तुम अल्लाह से डरते हो और हक़ को हक़दार के पास देखना चाहते हो तो यह कार्य अल्लसाह को प्रसन्न करने के लिए बहुत अच्छा है। ख़िलाफ़त पद के अन्य अत्याचारी व व्याभीचारी दावेदारों की अपेक्षा हम अहलेबैत सबसे अधिक अधिकारी हैं। 4. एक अन्य स्थान पर कहा कि हम अहलेबैत शासन के उन लोगों से अधिक अधिकारी हैं जो शासन कर रहे है। इन चार कथनों में जिन उद्देश्यों की और संकेत किया गया है वह इस प्रकार हैं, 1. इस्लामी समाज में सुधार। 2. जनता को अच्छे कार्य करने का उपदेश । 3. जनता को बुरे कार्यो के करने से रोकना। 4. हज़रत पैगम्बर(स.) और हज़रत इमाम अली ( अस) की सुन्नत (शैली) को किर्यान्वित करना। 5. समाज को शांति व सुरक्षा प्रदान करना। 6. अल्लाह के आदेशो के पालन हेतु भूमिका तैयार करना। यह समस्त उद्देश्य उसी समय प्राप्त हो सकते हैं जब शासन की बाग़ डोर स्वंय इमाम के हाथो में हो , जो इसके वास्तविक अधिकारी भी हैं। अतः इमाम ने स्वंय कहा भी है कि शासन हम अहलेबैत का अधिकार है न कि शासन कर रहे उन लोगों का जो अत्याचारी व व्याभीचारी हैं। इमाम हुसैन ( अस) के विरोध के परिणाम 1. बनी उमैया के वह धार्मिक षड़यन्त्र छिन्न भिन्न हो गये जिनके आधार पर उन्होंने अपनी सत्ता को शक्ति प्रदान की थी। 2. बनी उमैया के उन शासकों को लज्जित होना पडा जो सदैव इस बात के लिए तत्पर रहते थे कि इस्लाम से पूर्व के मूर्खतापूर्ण प्रबन्धो को क्रियान्वित किया जाये। 3. कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन ( अस) की शहादत से मुसलमानों के दिलों में यह चेतना जागृत हुई ; कि हमने इमाम हुसैन (अस) की सहायता न करके बहुत बड़ा पाप किया है। इस चेतना से दो चीज़े उभर कर सामने आईं एक तो यह कि इमाम की सहायता न करके जो गुनाह (पाप) किया उसका परायश्चित होना चाहिए। दूसरे यह कि जो लोग इमाम की सहायता में बाधक बने थे उनकी ओर से लोगों के दिलो में घृणा व द्वेष उत्पन्न हो गया। इस गुनाह के अनुभव की आग लोगों के दिलों में निरन्तर भड़कती चली गयी। तथा बनी उमैया से बदला लेने व अत्याचारी शासन को उखाड़ फेकने की भावना प्रबल होती गयी। अतः तव्वाबीन समूह ने अपने इसी गुनाह के परायश्चित के लिए क़ियाम किया। ताकि इमाम की हत्या का बदला ले सकें। 4. इमाम हुसैन (अस) के क़ियाम ने लोगों के अन्दर अत्याचार का विरोध करने के लिए प्राण फूँक दिये। इस प्रकार इमाम के क़ियाम व कर्बला के खून ने हर उस बाँध को तोड़ डाला जो इन्क़लाब (क्रान्ति) के मार्ग में बाधक था। 5. इमाम के क़ियाम ने जनता को यह शिक्षा दी कि कभी भी किसी के सम्मुख अपनी मानवता को न बेंचो । शैतानी ताकतों से लड़ो व इस्लामी सिद्धान्तों को क्रियान्वित करने के लिए प्रत्येक चीज़ को नयौछावर कर दो। 6. समाज के अन्दर यह नया दृष्टिकोण पैदा हुआ कि अपमान जनक जीवन से सम्मान जनक मृत्यु श्रेष्ठ है।

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करबला की लडा़ई मानव इतिहास कि एक बहुत ही अजीब घटना है। यह सिर्फ एक लडा़ई ही नही बल्कि जिन्दगी के सभी पहलुओ की मार्ग दर्शक भी है। इस लडा़ई की बुनियाद तो ह० मुहम्मद मुस्त्फा़ स० के देहान्त के बाशी रखी जा चुकी थी। इमाम अली अ० का खलीफा बनना कुछ अधर्मी लोगो को पसंद नहीं था तो कई लडा़ईयाँ हुईं अली अ० को शहीद कर दिया गया, तो उनके पश्चात इमाम हसन अ० खलीफा बने उनको भी शहीद कर दिया गया। यहाँ ये बताना आवश्यक है कि, इमाम हसन को किसने और क्यों शहीद किया?, असल मे अली अ० के समय मे सिफ्फीन नामक लडा़ई मे माविया ने मुँह की खाई वो खलीफा बनना चाहता था पर न बन सका। वो सीरिया का गवर्नर पिछ्ले खलिफाओं के कारण बना था अब वो अपनी एक बडी़ सेना तैयार कर रहा था जो इस्लाम के नही वरन उसके अपने लिये थी, नही तो उस्मान के क्त्ल के वक्त खलिफा कि मदद के लिये हुक्म के बावजूद क्यों नही भेजी गई? अब उसने वही सवाल इमाम हसन के सामने रखा या तो युद्ध या फिर अधीनता। इमाम हसन ने अधीनता स्वीकार नही की परन्तु वो मुसलमानो का खून भी नहीं बहाना चाहते थे इस कारण वो युद्ध से दूर रहे अब माविया भी किसी भी तरह सत्ता चाहता था तो इमाम हसन से सन्धि करने पर मजबूर हो गया इमाम हसन ने अपनी शर्तो पर उसको सिर्फ सत्ता सोंपी इन शर्तो मे से कुछ ये हैं: - वो सिर्फ सत्ता के कामो तक सीमित रहेगा धर्म मे कोई हस्तक्षेप नही कर सकेगा। वो अपने जीवन तक ही सत्ता मे रहेगा मरने से पहले किसी को उत्तराधिकारी न बना सकेगा। उसके म्ररने के बाद इमाम हसन खलिफा़ होगे यदि इमाम हसन कि मृत्यु हो जाये तो इमाम हुसैन को खलिफा माना जायगा। वो सिर्फ इस्लाम के कानूनों का पालन करेगा। इस प्रकार की शर्तो के द्वारा वो सिर्फ नाम मात्र का शासक रह गया।

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कर्बला का पैग़ाम | इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद से मोहर्रम केवल एक महीने का नाम नहीं रह गया बल्कि यह एक दुखद घटना का नाम है, एक सिद्धांत का नाम है और सबसे बढ़कर सत्य व असत्य, अत्याचार तथा साहस की कसौटी का नाम है। वास्तव में करबला की नींव उसी समय पड़ गई थी कि जब शैतान ने आदम से पहली बार ईर्ष्या का आभास किया था और यह प्रतिज्ञा की थी कि वह ईश्वर के बंदों को उसके मार्ग से विचलित करता रहेगा। समय आगे बढ़ता गया। विश्व के प्रत्येक स्थान पर ईश्वर के पैग़म्बर आते रहे और जनता का मार्ग दर्शन करने का प्रयास करते रहे दूसरी ओर शैतान अपने काम में लगा रहा। ईश्वर के मार्ग पर चलने वालों की संख्या भी कम नहीं थी परन्तु शैतान के शिष्य भी अत्याचार और अन्याय की विभिन्न पद्धतियों के साथ सामने आ रहे थे। जहां भी ज्ञान का प्रकाश फैलता और मानव समाज ईश्वरीय मार्ग पर चलना आरंभ करता वहीं अज्ञानता का अन्धकार फैलाकर लोगों को पथभ्रष्ट करने का शैतानी कार्य आरंभ हो जाता। एक लाख चौबीस हज़ार पैग़म्बरों को ईश्वर ने संसार में भेजा, अन्य महान पुरूष इनके अतिरिक्त थे, परन्तु देखने में यह आया कि इन पैग़म्बरों और महान पुरूषों के संसार से जाते ही उनके प्रयासों पर पानी फेरा जाने लगा। मन गढ़त बातें फैलाई गईं और वास्तविकता, धर्म और ईश्वरीय पुस्तकों में फेर- बदल किया जाने लगा। हज़रत ईसा, मूसा, दाऊद, सुलैमान, इल्यास, इद्रीस, यूसुफ़, यूनुस, इब्राहीम और न जाने कितने एसे नाम इतिहास के पन्नों पर जगमगा रहे हैं परन्तु इनके सामने विभिन्न दानव, राक्षस और शैतान के पक्षधर अपने दुषकर्मों की काली छाया के साथ उपस्थित रहे हैं। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.व.) का काल भी एसा ही काल था परन्तु इस समय संवेदनशीलता बढ़ गई थी क्योंकि यदि हज़रत मुहम्मद के पश्चात उनके लाए हुए धर्म में, जो वास्तव में अबतक के सभी पैग़म्बरों का धर्म था फेर बदल हो जाता, उसके सिद्धांतों को मिटा दिया जाता तो फिर संसार में केवल अन्याय और अत्याचार का ही बोलबाला हो जाता। ग़लत और सही, तथा अच्छे और बुरे की पहचान मिट जाती। इसलिए पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के पश्चात उनके परिवार ने आगे बढ़कर उनकी शिक्षाओं को शत्रुओं से बचाने का प्रयास आरंभ कर दिया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, अली और फ़ातेमा की गोदी में पले थे। पैग़म्बरे इस्लाम का लहू उनकी रगो में दौड़ रहा था। उनके ज्ञान, चरित्र और पारिवारिक महानता के कारण जनता उनसे अत्याधिक प्रेम करती थी। उनके विरोधी पक्ष में शैतान का प्रतिनिधि यज़ीद था। यज़ीद के पिता मोआविया ने इमाम हुसैन के बड़े भाई इमाम हसन के साथ जो एतिहासिक संधि की थी उसके अनुसार मुआविया को यह अधिकार प्राप्त नहीं था कि वह अपने उत्तराधिकारी का चयन करता। परन्तु मुआविया ने अपने जीवन के अन्तिम दिनों में पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे इमाम हसन के साथ हुई संधि को अनदेखा करते हुए यज़ीद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। यज़ीद ने ख़लीफ़ा बनते ही अन्याय पर आधारित और मानवता एवं धर्म विरोधी अपने कार्य आरंभ कर दिये। उसने शाम अर्थात सीरिया की राजधानी से मदीने में अपने राज्यपाल को तुरंत यह आदेश भेजा कि वह पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे इमाम हुसैन से कहे कि वे मेरी बैअत करें वरना उनका सिर काट कर मेरे पास भेज दो। बैअत का अर्थ होता है आज्ञापालन या समर्थन का वचन देना। इमाम हुसैन ने यह बात सुनते ही स्थिति का आंकलन कर लिया। वे पूर्णतयः समझ गए थे कि यज़ीद अपने दुष्कर्मों पर उनके द्वारा पवित्रता की मुहर और छाप लगाना चाहता है तथा एसा न होने की स्थिति में किसी भी स्थान पर उनकी हत्या कराने से नहीं चूकेगा। अतः इमाम हुसैन ने निर्णय लिया था कि जब मृत्यु को ही गले लगाना है तो फिर अत्याचार और अन्याय के प्रतीक से ऐसी टक्कर ली जाए कि वर्तमान विश्व ही नहीं आने वाले काल भी यह पाठ सीख लें कि महान आदर्शों की रक्षा कुर्बानियों के साथ कैसे की जाती है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को यह भी ज्ञात था कि उनकी शहादत के पश्चात यज़ीदी दानव यह प्रयास करेंगे कि झूठे प्रचारों द्वारा उनकी शहादत के वास्तविक कारणों को छिपा दें। यही नहीं बल्कि शहादत की घटना को ही लोगों तक पहुंचने न दे अतः अली व फ़ातेमा के सुपूत ने समस्त परिवार को अपने साथ लिया। इस परिवार में इमाम हुसैन के भाई, चचेरे भाई, भतीजे, भान्जे, पुत्र, पुत्रियां, बहनें पत्नियां और भाइयों की पत्नियां ही नहीं बल्कि परिवार से प्रेम करने वाले दास और दासियां भी सम्मिलित थे। यह कारवां ६० हिजरी क़मरी वर्ष के छठे महीने सफ़र की २८ तारीख़ को मदीने से मक्का की ओर चला था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भाई मुहम्मद बिन हनफ़िया ने ही नहीं बल्कि मदीना नगर के अनेक वरिष्ठ लोगों ने इमाम हुसैन को रोकने का प्रयास किया था परन्तु वे हरेक से यह कहते थे कि मेरा उद्देश्य, अम्रबिल मारुफ़ व नहि अनिल मुनकर है अर्थात मैं लोगों को भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने के उद्देश्य से जा रहा हूं। हुसैन जा रहे थे। पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से नगर लगभग ख़ाली होने वाला था। वे जिन लोगों को घर में छोड़े जा रहे थे उनमें पैग़म्बरे इस्लाम की बूढ़ी पत्नी हज़रत उम्मे सलमा, इमाम हुसैन के प्रिय भाई अब्बास की माता उम्मुल बनीन और इमाम हुसैन की एक बीमार सुपुत्री हज़रत फ़ातिमा सुग़रा थीं। मुहर्रम शुरू होने में अब केवल 1-२ दिन बचे हैं अज़दारों की आँखों में आंसू हैं इस्लामी नव वर्ष मुहर्रम है लेकिन कोई किसी को मुबारकबादी नहीं देता बल्कि नाम आँखों से माह ऐ मुहर्रम का इस्तेकबाल करते हैं और अपने अपने घरों में मजलिस इमाम हुसैन (अ.स) के दुःख , उनके परिवार वालों पे हुए ज़ुल्म को बनान कर के आंसू बहाते हैं | हर तरह इमाम हुसैन (अ.स) को अपना मेहमान बनाने के एहतेमाम हो रहे हैं |अज़खाने इमाम बड़ों को सजाया जा रहा है | अब यह अज़ादारी दो महीने आठ दिन तक इस्लाम पे चलने वाले करेंगे और इमाम हुसैन (अ.स) के किरदार से नसीहत लेते हुए ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए ,भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए , इंसानियत का पैगाम दुनिया को देते हुए अपना पूरा साल गुज़ार देंगे अपने उस इमाम के इंतज़ार में जो इस दुनिया में फिर से उजाला लाएगा |

के द्वारा:

Mohammed was an absolutely illiterate man, and the Koran, in which his sayings are collected, is ninety-nine percent rubbish. You can just open the book anywhere and read it, and you will be convinced of what I am saying. I am not saying on a certain page — anywhere. You just open the book accidentally, read the page and you will be convinced of what I am saying. Whatsoever one percent truth there is here and there in the Koran is not Mohammed's. It is just ordinary, ancient wisdom that uneducated people collect easily — more easily than the educated people, because educated people have far better sources of information — books, libraries, universities, scholars. The uneducated, simply by hearing the old people, collect a few words of wisdom here and there. And those words are significant, because for thousands of years they have been tested and found somehow true. So it is the wisdom of the ages that is scattered here and there; otherwise, it is the most ordinary book possible in the world. Muslims have been asking me, "Why don't you speak on the Koran? You have spoken on The Bible, on the Gita, this and that." I could not say to them that it is all rubbish; I simply went on postponing. Even just before I went into silence, a Muslim scholar sent the latest English version of the Koran, praying me to speak on it. But now I have to say that it is all rubbish, that is why I have not spoken on it — because why unnecessarily waste time? - From Unconciousness to Consciousness Chapter 5

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

के द्वारा:

सुस्वागतम! आप लोग का मतलब नहीं समझा क्योंकि सम्बोधन में सिर्फ आपने मेरा नाम उपयोग किया है. मेरे सिवा वे कौन लोग है जिनके सामने आप अपनी बात रख रही हैं? खुद को ऊँचा या फिर ज्ञानी साबित करना सच में या तो बचपन है या मूर्खता और इन सबसे बहुत दूर ही रहना ठीक है. परन्तु इसका मतलब यह नहीं की मैं मुर्ख हूँ क्योंकि यह भी मूर्खता या बचपन है. अब आप पूछेंगी कि मैं हूँ क्या? और जो मैं हूँ उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता. अतः जो व्यक्त नहीं किया जा सकता उसके बारे में कहना भी एक मूर्खता ही है या फिर बचपन है. शायद अब मेरी बातों से आप कन्फ्यूज़ हो रही हैं. अतः यह सब फालतू के सवाल क्यों उठा रहीं है. जो टॉपिक चल रहा है उस पर चलिए या फिर चुप. भगवान् सद्बुद्धि देता है. यह कहना मूर्खता ही है. आपका कहने का मतलब कहीं वो व्यापारी तो नहीं या फिर बुद्धि बाटंने वाला तो नहीं तो आप हमें बताये वह कहाँ है उससे मैं खरीद लूंगा या फिर मांग लूंगा जो भी सहज हो. सकारात्मकता करने में नहीं होता क्योंकि जब भी हम करने जायेंगे तो साथ में यह भी दिमाग में रहेगा कि नकारात्मक न हो जाए तो फिर यह काम सतारात्मक नहीं हो सकता. अतः सकारात्मकता होने में होती है न की करने में...............

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

ज़फर जी, कौन सी जंग छोटी है और कौन बड़ी , ये साबित करने वाला तराज़ू कहाँ होगा..मेरा तो ये मानना है कि जिस जंग में निर्दोषों ने अपनी जान गंवाई, उसका मास्टर माइंड कोई ईमान वाला व्यक्ति नहीं हो सकता... इमाम हुसैन और उनके साथियों ने बुराई के आगे जो लड़ाई लड़ी और क़ुरबानी दी वो इतनी छोटी नहीं कि उसको ज़िंदा या ताज़ा रखने के लिए सड़कों पर मातम का तमाशा करने की ज़रूरत हो....वो महान लोग थे , उनकी क़ुरबानी किसी के सहारे की मुहताज नहीं है..आप खामखा अपने सर सेहरा ले रहे हो कि हम ताज़ा किये हुए हैं....ताज़ा ही करना है तो अपने सही नाम और फोटो के साथ ओपन ब्लॉग बना कर कर्बला की पूरी हिस्ट्री लिखिए...ताकि सभी जान सकें ..अपने सच कहा कि आधी अधूरी जानकारी ठीक नहीं होती.....वैसे आप का नाम , जहाँ तक मुझे लगता है"Zafar" होना चाहिए , न कि "jafar " ....आपका ब्लॉग सर्च करने पर नहीं मिला..आप छुपते क्यूँ हैं??किसी से डरते हैं क्या???सामने आइये और खुल कर अपनी बात कहिये..यहाँ कोई हिन्दू-मुस्लिम दंगा थोड़ी होने वाला है...

के द्वारा: sinsera sinsera

ज़फर जी, नमस्कार, आपका स्वागत है लेकिन आप ने ध्यान से लेख पढ़ा नहीं शायद..मैं ने भी कर्बला के युद्ध को अति दारुण बताया है, गैर मुस्लिम भी सुन कर रोते हैं, ऐसा लिखा है...इमाम हुसैन हज़रत मुहम्मद (स अ व ) के नवासे हैं ये मुझे भी मालूम है और मैं ने लिखा भी है..अगर मैं ने उनकी शान में कोई बेअदबी की हो या कुछ गलत लिखा हो तो प्लीज़ बताइये....मैं भी जानने के लिए उत्सुक हूँ कि आखिर इस ख़ूनी परंपरा का क्या औचित्य है... ये लेख लिखने का यही मकसद है..हाँ, बॉडी के आर पार सुई डालने का कोई त्यौहार होता है, ऐसा मुझे नहीं पता..कुछ पिछड़े जाहिल आदिवासी इलाकों में शायद ऐसा कुछ होता होगा पर उनको बानगी मानना तो खुद को जाहिल साबित करना ही होगा...

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: sinsera sinsera

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गलत बात का विरोध बिलकुल नहीं होना चाहिए...विरोध करने से गलत को बल मिलता है..न कि वो समाप्त या बदल जाता है...सही का समर्थन होना चाहिए, दृष्टि हमेशा सही पर रहनी चाहिए, जिसपर हम ध्यान देते हैं वो बढ़ने लगता है, चाहे वो गलत हो या सही, इतनी बड़ी दुनियां में आपको 'गलत बातें ही क्यों मिलती है...??' विरोध करना विस्क्षिप्त है, दूसरों का विरोध कर के हम अपने अहंकार की पुष्टि करते हैं और कुछ नहीं...मैं अगर किसी चीज़ के विरोध में हूँ तो वो है 'विरोध' करने की 'प्रविर्ती'...!! ये जीवन जीने का विधेयक ढंग नहीं है...मैं किसी देश के बारे में पढ़ रहा था वहाँ 'नकारात्मक खबर' को अख़बार में न के बराबर जगह मिलती है, वो भी आखरी पृष्टों पर...शुरू के पृष्ट सकारात्मक ख़बरों से पटे पड़े होते हैं...वहाँ अपराध न के बराबर है...!! प्रेम की गीत गाये जाने चाहिए,,, अन्धकार से लड़ने की ज़रुरत नहीं है, प्रकाश को लाना है... विधेयक दृष्टिकोण अपनाने की ज़रुरत है...!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

आपने चर्चा नहीं की है हिन्दू मुस्लमान की लेकिन चोट तो किया है न आपने इस्लाम पर...??? अगर आपको लगता है कि सकारात्मक कारण पता लग जाने से ये परम्परा ठीक हो जायेगा तो मैं आपको दस बीस सकारात्मक कारण दे सकता हूँ.... आप कही रही हैं कि हर धर्म में गलत परम्पराए होती है... लेकिन जहाँ तक मुझे समझ में आता है, 'धर्म खुद एक गलत परम्परा है' जहाँ तक मुझे पता ठीक ऐसी ही परम्परा हिंदुओं में भी है 'भगत खेलना' यहाँ भी खून बहता है, ईसाइयत में भी है 'ईसाई फ़कीर खुद को सूली पर लटकते हैं, वहाँ भी खून बहता है, और ऐसा बौद्ध धर्म में भी 'बुद्ध भिक्षु आग पर चलते हैं'...| जैसे हिंदुओं ने अपने सब पागलपन के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण खोज लिया है उसी प्रकार बांकी के धर्म के लोगों ने भी किया...किसी भी कृत्य का औचित्य स्थापित किया जा सकता है, उसको ठीक ठहराया जा सकता है...हमारी चालाकियों का हिसाब नहीं है...!!! जब तक आदमी के चेतना का विकास नहीं होता है वो एक पागलपन को छोड़ कर दूसरे को पकड़ लेता है, तथाकथित शिक्षित लोग यही करते हैं, पुरानी परम्पराओं को छोड़ कर के नए ढंग का पागलपन शुरू कर देते हैं...'रक्त दान' नय ढंग का पागलपन है...पुराना हम से दूर होता है इसीलिए दिख जाता है, लेकिन नए के हम इतने करीब होते हैं, उससे इतना जुड़े होते हैं कि हमें उसका पागलपन नहीं दीखता है...!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

मान्यवर, यहाँ मैं ने हिन्दू या मुस्लिम कि तो कोई चर्चा नहीं उठाई, केवल एक ऐसी परंपरा पर प्रश्नचिन्ह उठाया है जिसका कोई औचित्य फ़िलहाल मुझे समझ नहीं आता..हो सकता है यहाँ चर्चा करने से कोई सकारात्मक कारण ही पता चल जाये..मैं हिन्दू-मुस्लिम के प्रति पक्षपात तो कभी नहीं रखती ...गलत परम्पराएं तो हर धर्म में हैं, जिनका कोई तुक नहीं है, लेकिन खून बहा कर बर्बाद करने का तो दूर दूर तक कोई मतलब समझ नहीं आता...आप डॉ रही मासूम रज़ा का उपन्यास "आधा गाँव " कभी पढ़िए ..वो खुद एक शिया मुस्लिम थे , आपने उपन्यास में उन्होंने एक शिया बाहुल्य गाँव के बारे में लिखा है कि कैसे वहाँ के लोग मुहर्रम में मातम की नौटंकी किया करते थे...लोग हंसी मज़ाक करते थे फिर हंसी आने पर कहते थे कि "अरे चुप रहो, हंसो मत क्योंकि आज मुहर्रम की दसवीं तारीख है...." वो शिया हो कर इस बात को ज़रूर समझते होंगे कि शायद ये मातम एक परंपरा होने के कारण मज़बूरी में किया जाता है..हम आप खैर क्या जानें....मुझे सिर्फ रक्त की बर्बादी से गुरेज़ है, इससे अच्छा तो इस तिथि पे लोग रक्तदान करें, कि वो किसी मरते हुए को जीवन दान दे सके...

के द्वारा: sinsera sinsera

हमें दूसरों का घाव तो दिख जाता है लेकिन अपना नहीं दीखता, हमारी दृष्टि दूसरों पर तो खुलती है लेकिन खुद को कभी नहीं देख पाती है..., हिंदुओं को ये तो दिख जाता है कि इस्लाम धर्म में, यहूदियों में, जैन धर्म में, ईसाईयों में क्या-क्या पागलपन है, लेकिन हिन्दू धर्म में कितना पगापन ये कभी नहीं दीखता...! पहली बात कोई भी परंपरा नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होता, जीवन बहुत जटिल है जो आपको नकारात्मक दिख रहा है किसी के लिए सकारात्मक ज़रूर होगा...| दूसरी बात मुक्ति का मतलब होता है सभी प्रकार के बंधनो से मुक्त होता...बीमारी बीमारी होती है, बिमारिओं को अच्छी बुरी कहना खुद को भुलावे में रखना होगा, या तो परम्परा मात्र को छोड़ दिया जाये या जो जैसा है उसे वैसा चलने दिया जाय, ये कहना कि तुम्हारी परंपरा गलत है, नकारात्मक है मेरी सही है राजनीती है, होशियारी है...धोखा है...!! मैं इसका पक्षधर नहीं हूँ...!! ज़ंजीर सोने के हों या लोहे का इससे कुछ ज्यादा भेद नहीं पड़ता, अच्छा हो कि ज़ंजीर लोहे का हो, मुक्त होना असना होगा, सोने के ज़ंजीर से कौन मुक्त होना चाहता है...??? मैं सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के पगापन के विरोध में हूँ... यहाँ ये स्पष्ट नहीं कर रहा हूँ कि अगर इस्लाम में ये गलत है तो हिन्दू में भी ये गलत है, न तो मुझे इस्लाम से कोई राग है न ही हिंदुओं से कोई द्वेष...मेरे देखे दोनों गलत हैं, दोनों में पगापन मौज़ूद है... हिंदुओं के पगापना का कोई अंत नहीं है... हज़ारों साल पहले शुरू हुई बेहूदगी आज भी ज़ारी है...!!! हमारे माकन शीशे के हैं...पत्थर फेकने की गलती हमें मंहगी पड़ सकती है..!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

'अपना अपना सोच' होना गलत नहीं है लेकिन जब आप अपने दिमाग के कूड़ा-कचड़ा को दुसरों के दिमाग में डालने लगते हैं तो दिक्कत पैदा हो जाती है, और जब सद्गुरु जी, अनील जी, जवाहर जी, दिनेश जी, मनोज जी या फिर रंजना जी जैसे उच्य स्तर के लोग इस तरह का काम कर रहे हो तो और भी मुश्किल पैदा हो जाती है...लोग आपको पढ़ते हैं आपको सम्मान देते हैं इसका ये मतलब तो नहीं कि आप लोगों के अज्ञानता का फायदा उठाएंगे...??? 'गीता को गलत कहना, समझ रहे हैं आप कितनी बेहूदगी की बात है', बोलने की आजादी है लेकिन गाली देने की नहीं...मैं किसी भी प्रकार के पागलपन के विरोध में हूँ, चाहे वो धार्मिक पागलपन ही क्यों न हो...!! मैं इस देश के प्रतिभावान युवकों और बुद्धिजीवियों से निवेदन करता हूँ कि वो आगे आएं और इन सड़क छाप पंडितों और ज्ञानियों को रास्ता दिखने में मेरी मदद करें...!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

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संदीप जी.......दो स्त्रियों से बात सुलझने वाली नहीं है..किसी चौथे की मध्यस्ता ज़रूरी है….!! अनीता जी की बात आधी सही है और पूरी गलत है, और आपकी (सिनसेरा) बात पूरी गलत है और आधी सही है ! इसीलिए आप दोने के राग अलापने से बात बिलकुल भी नहीं सुलझेगी........बस इसी एक लाइन को छोड़ कर आपकी बाकी सारी बातें सौ प्रतिशत सही हैं..ये गलत इसलिए कि स्त्री न कह कर व्यक्ति कहें तो ज़यादा ठीक होगा...जिसकी समझ में आ जाये वो स्त्री हो या पुरुष क्या फर्क पड़ता है..मेरा भी बिलकुल यही कहना है कि ऊर्जा को रचनात्मक कार्यों में लगाया जाये लेकिन अगले इंसान की सोच का क्या पता ...इसलिए क्यों न हम अपने लिए सुरक्षात्मक आवरण ले कर चलें ताकि अपने हिस्से का काम कर सकें...एक बहुत विवादित बात कहने का दुस्साहस कर रही हूँ......अगर ज्योति सिंह (दिल्ली गैंग रेप विक्टिम ) नाइट शो में अपने बॉय फ्रेंड के साथ मूवी देखने जैसा tabooed काम न किया होता तो आज फ़िज़िओथेरेपिस्ट के रूप में कुछ सकारात्मक काम कर रही होती.......जिन्हों ने ये अति घृणित अमानवीय कृत्य किया उनके लिए तो कोई भी सजा कम होगी लेकि उनके सामने ऑब्जेक्ट बन कर जाने वाली भले ही "निर्भया" कहलायी , लेकिन मुझे वो सिर्फ परिस्थिति का शिकार लगती है...निर्भयता का कोई काम उसने किया हो ऐसा मुझे तो नहीं लगता....

के द्वारा: sinsera sinsera

दो स्त्रियों से बात सुलझने वाली नहीं है..किसी चौथे की मध्यस्ता ज़रूरी है....!! अनीता जी की बात आधी सही है और पूरी गलत है, और आपकी (सिनसेरा) बात पूरी गलत है और आधी सही है ! इसीलिए आप दोने के राग अलापने से बात बिलकुल भी नहीं सुलझेगी, यहाँ मामला ऐसे है जैसे किसी बच्चे को उन का गोला हाथ लग गया हो और वो उसे सुलझाने की कोशिश कर रहा हो | कोशिश आप दोनों की नेक है लेकिन रेत के साथ कितनी भी कोशिश की जाय उससे तेल नहीं निकल सकता...!!! सब से पहले तो मैं ये कहना चाहूंगा कि पुरुष और स्त्री दो नहीं हैं, और अगर दो नहीं हैं तो एक भी नहीं हैं....क्योंकि अगर एक होगा तो दो भी होगा, दो के बिना एक का होना सम्भव नहीं है | एक का अस्तिवत सदैव दो पर निर्भर करता है | जीवन के साथ सब से बड़ी दिक्कत ये है कि इसमें कहीं कोई समस्या नहीं है...सब रहस्य है....लेकिन हमें सिखाया जाता है कि 'ये समस्या है' इसका समाधान ढूंढो...फिर मुश्किल शुरू हो जाती है... रहस्य का कोई समाधान नहीं हो सकता है...रहस्य को समस्या मान लेने में ही भूल हो जाती है...! न तो कोई किसी से बड़ा है न ही कोई किसी से छोटा है, न तो कोई दिखा रहा है न ही कोई कुछ देख रहा है... इसीलिए आप लोग विवाद न करने...व्यर्थ ऊर्जा खर्च करने की कोई ज़रुरत नहीं है... हम सब इन्टर्डिपेन्डन्ट हैं, 'इन्टर्बिंग'(interbeing) हैं !!! स्त्री को पुरुष से या फिर पुरुष को स्त्री से स्वतंत्र होने की ज़रुरत नहीं है... हमें अपने माइंड-कान्शस्निस से फ्री होना है...!!! हमारा विचार हमारी दुनियां को निर्मित करता है...गलत विचार गलत लोगों को आकर्षित कर लेता है...मेरे एक मित्र से मेरी बात हो रही थी उन्होंने कहा मुझे सब धोखेबाज़ ही क्यों मिलते हैं..?? मैं ने कहा वो इसलिए कि आप खुद धोखेबाज़ हैं | क्यों पुरुष अगर किसी स्त्री को दबता है तो वो इसलिए क्योंकि स्त्री ऐसा करने में उसका सहयोग करती है ...हमारे बिना सहयोग के हमारे जीवन में खुछ भी घटित नहीं हो सकता है |

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

के द्वारा: sinsera sinsera

धन्यभाग हमारे अनीता जी कि आप हमारे ब्लॉग पर पधारीं...सबसे पहले तो मैं बता दूँ कि "आसमान पे है ख़ुदा और ज़मीं पे हम..." सो बात सिर्फ ख़ुदा (कुदरत) के बनाये हुए नियमों की है..जिन्हे मनुष्य होने के नाते सामाजिकता का जामा पहनाना हमारी मजबूरी है.. वर्ना सचाई तो ये है कि विपरीत लिंग के लिए मनुष्यों के भी ठीक वही भाव होते हैं जो पशुओं के .परन्तु विडम्बना ये है कि आज तक "खुशवंत सिंह " के सिवा किसी ने इसे स्वीकार नहीं किया....वैसे ये तो विज्ञान है, इसे दोष कहना सरासर नाइंसाफी होगी..लेकिन समाज के नियमों को ईमानदारी से निभाने वाले पुरुषों को उनकी शराफत के खिलाफ उकसाना क्या स्त्री का कर्तव्य है...?? माना कि कोई बहुत शक्तिशाली है, तो इसका ये मतलब तो नहीं कि सामने आते हुए साँड़ से भिड़ जाये ,जिसे कुदरत ने उससे भी ताकतवर बनाया है ,उसी प्रकार जब आधी आबादी को अपने "वीकर जेंडर " होने का पता है तो खामखा इठलाने की क्या ज़रूरत है...सोबर तरीके से रह कर भी अपना काम किया जा सकता है..मेरा पूछना सिर्फ यही है कि " क्लीवेज" दिखा कर स्त्री खुद को क्या सिद्ध करना चाहती है...क्या शरीर प्रदर्शन ही स्त्री की सार्थकता है..शालीन रहना मर्दों की हुक्म -परस्ती कैसे हो गया ये मेरी समझ में नहीं आया...(माफ़ी चाहती हूँ, "हुक्म उदूली "शब्द का अर्थ होता है हुक्म न मानना..शायद आप ये नहीं कहना चाह रही हैं...अगर नहीं तो आप खुद अपनी बात को काटती नज़र आती हैं....)अपने दायरे में रहना और रिज़र्व रहना तो ऊर्जा का संरक्षण है, इससे कोई भी इंसान चाहे वो पुरुष हो या महिला अपनी ऊर्जा को बेहतर सकारात्मक कार्यों में लगा सकता है और समाज को कुछ दे कर जा सकता है बजाय इसके कि चार दिन की ज़िन्दगी में खेले, खाये,एक्सपोज़ करके एक दूसरे को चैलेन्ज दे और ले , नकाब (सांकेतिक )को संरक्षण न समझ कर अपमान समझने जैसी बातों में उलझ कर काम करने के उपयोगी घंटों को छोटा कर दे.....मेरे ख्याल से स्त्री हो या पुरुष ,सार्थकता तभी है जब वो अपने कार्यों से समाज को कुछ दे..... आज PETA के कार्यकर्त्ता नंगे हो कर पत्ते पहन कर घूमते हैं लेकिन उनकी सराहना होती है क्योंकि उनका नंगा होना किसी को उकसाता नहीं है वरन समाज को एक सन्देश देता है.......

के द्वारा: sinsera sinsera

परम आदरणीय़ सरिता जी, आपके इस ब्लॉग का लिंक मुनीश जी(स्त्री को नैसर्गिक रूप से कमजोर समझने वाले चालाक मर्दों में शुमार) ने दिया था। आपके कई आलेखों को पढ़ने के बाद मैं ये समझ सकती हूं कि आज हम औरतें क्यूं इतनी असहाय हैं। जब आप जैसी स्त्री गुलामी की पैरोकार औरतें मौजूद हों तो मर्दों से कैसी शिकायत? कैसे-कैसे कुचक्र रचकर पुरुष समाज ने पूरी आधी आबादी को ये एहसास दिला दिया कि उनकी नियति ही है मर्दों की हुक्म- अदूली और आप के दिमाग में यही बैठ गया। आप स्वयं पैरवी कर कहती हैं कि निकलो ना बेनकाब क्योंकि तुम्हारी संरचना मर्दों को आवेशित करती है। अजीब समस्या है कि एक औरत होकर भी आप ये नहीं समझ सकीं कि मर्दों के उत्तेजन में हमारा कोई दोष नहीं बल्कि दोष और प्रवृत्ति तो उनकी है जो ऐसी नजर रखते हैं। आपसे लंबी वार्ता होती रहेगी तो शायद आपकी लेखनी से कुछ स्त्री के लिए भी सार्थक निकल आए। धन्यवाद आपका

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

आदरणीय सद्गुरुजी से मैं भी पूर्ण सहमती रखती हूँ , आपने यहाँ जो भी लिखा है वो सब मेरे छोटे से प्यारे से दिमाग में कई दिनों से घूम रहा है ! खैर अब क्या कर सकते हैं जो हुआ अच्छा हुआ ......... भगवान सबका भला करे .............. :) लेकिन जे जे को थोडा ध्यान तो रखना ही चाहिए था .....बेकार में डॉक्यूमेंट स्कैन करने में ४०-५० रुपीस खर्च करवा दिए! जिनको इनाम के लिए सेलेक्ट किया उन्ही से इनफार्मेशन मांगनी थी न ! और जब इतनी ही गलतियाँ थी तो टॉप ३० में भी जगह देने की क्या जरुरत थी ? शुद्ध लेखो को ही सेलेक्ट करना था फिर चाहे वो ३० की जगह १५ ही क्यों न होते !............चलिए जाने दीजिये ........... आपको बहुत बहुत बधाई मिसेज सिन्हा जी........ और निश्चित रहिये हम आपसे एक भी कटोरी या चमच्च नही मांगेंगे ........... :) :P :D

के द्वारा: sonam saini sonam saini

आदरणीय सद्गुरुजी, नमस्कार.. आपने सही कहा कि प्रतियोगिता पुरस्कार की भावना से कहीं अलग होती है..ये तो सिर्फ एक पहचान की चाह होती है, साथ ही ये पता चलता है की हम कितने पानी में हैं..हम जज तो नहीं लेकिन थोड़ी बहुत निर्णय शक्ति भी होती ही है..सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटना कोई अच्छी बात नहीं लेकिन सवाल तो उठते ही हैं...लेकिन .........कुछ कहे जाने पर अन्यथा लिए जाने का अंदेशा है...फिर भी इतना तो कहूँगी ही कि सिर्फ एक प्रथम पुरस्कार को छोड़ कर अन्य पुरस्कारों का निर्णय कुछ जँचा नहीं.....मैं अपनी बात नहीं कहती क्योंकि मुझे अपना लेवल खुद पता है लेकिन और कई ब्लॉग ऐसे थे जिनका स्तर काफी अच्छा था...कम से कम प्रथम, द्वितीय और तृतीय को तो मानक के बिलकुल अनुरूप रखना चाहिए था.....हिंदी मांगी थी तो हिंदी भाषा का प्रयोग करने वाले को ही पुरस्कार देना चाहिए था.....रही बात पुरस्कार की तो ये सही है कि सम्मान के रूप में मानदेय और प्रशस्तिपत्र आदि देने का ही चलन होता है, खैर जो भी मिल गया ठीक ही है....हिंदी का प्रचार कौन करे..मैं आपको बताऊँ , मैं ने एक बार फेसबुक पर सिर्फ एक दिन के लिए केवल और केवल हिंदी के शब्दों के प्रयोग का प्रस्ताव रखा तो एक दो मित्रों को छोड़ कर सभी को दिन में तारे दिखाई देने लगे..साधारण बोलचाल के लिए भी लोगों को विशुद्ध हिंदी के शब्द ढूँढना पद रहा था.....अंग्रेजी का इन्फेक्शन इतना तगड़ा है कि हिंदी के रक्त में इसके कीटाणु घुस कर समूचे परिसंचरण में प्रवाहित हो रहे हैं और असली तत्व का नाश किये दे रहे हैं.....देखिये आने वाला समय क्या बताता है.....

के द्वारा: sinsera sinsera

आदरणीया सरिता जी ब्लॉग मित्र चुने जाने पर बधाई."इति श्री ब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता कथा संपूर्णम" शीर्षक चर्चित लेख के कालम में देखकर आपके ब्लॉग पर चले आया और आपका आलेख पढ़ा.बच्चे के बहाने आपने अपने मन की बात कही है.ब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता के पुरस्कार उस कहावत को चरितार्थ करतें हैं कि "खोदा पहाड़ निकला चूहा."कहने को बहुत कुछ था,मगर मैंने वहां पर जितना उचित समझा वही कहा.आपने लेख में हिंदी व्याकरण के त्रुटियों कि बात की है.मैंने सबके लेख पढ़ के देखे.किसके लेख में व्याकरण की दृष्टि से त्रुटियाँ नहीं है?जब आप हिंदी प्रतियोगिता के जरिये हिंदी का प्रचार-प्रसार करने निकलें हैं तो विषयवस्तु देखना चाहिए.जब आप कहतें हैं कि "कई ऐसे भी आलेख मिले जिनके आलेख और विषयवस्तु अत्यंत उत्कृष्ट श्रेणी के थे" लेकिन उनमे कुछ "मात्रात्मक या शाब्दिक त्रुटियाँ" थीं.उत्तर वही जो आपने दिया है-"……..और ज़रा दूसरे ब्लॉग पढ़ कर देखिये ….मात्रा की कितनी गलतियाँ हैं…कहीं हुस्न को हुश्न लिखा है कहीं सम्प्रेसन लिखा है कहीं उर्दू ही उर्दू भरी है……… "इसके अलावा भी बहुत से अनुत्तरित प्रश्न हैं जैसे-बहुत से लोग प्रतियोगिता चलते समय आये और कुछ ब्लॉग लिखकर विजेता हो गये.जान पहचान भी चलती है वाली बात हुई.मुझे तो ये समझ में नहीं आया कि जब १३ लोगों को पुरस्कार देना है तो ३० लोगों से आप एड्रेस व् आईडी प्रूफ और फोटो क्यों ले रहे हैं?जो अंतिम १३ चुने गए हैं उनसे ही आवश्यक जानकारी की मांग करनी चाहिए.३० सितम्बर को प्रतियोगिता समाप्त होने के बाद ३ अक्टूबर को "अंतिम परिणाम के करीबी दावेदार" में सूचना दी जाती है कि "30 श्रेष्ठ ब्लॉगरों का चयन किया गया है। ये 30 ब्लॉगर अंतिम परिणाम के पूर्व प्रतिस्पर्धा के दावेदार हैं। यानि ब्लॉग शिरोमणि के लिए आगे की प्रतिस्पर्धा इनके बीच ही होगी तथा अंतिम 13 विजेता इनमें से ही चयनित होंगे।"प्रतिस्पर्धा समाप्ति के बाद भी प्रतिस्पर्धा जारी रहती है.सबसे बड़ी बात ये कि जो गैर हिंदी भाषी हैं या जो कम हिंदी जानतें हैं मगर हिंदी के विकास के लिए ज्यादा अच्छा सोचतें हैं,भाषा शैली व् भाषा की त्रुटियों का ध्यान रखते हुए उन्हें तो कभी आप पुरस्कृत करेंगे ही नहीं.फिर हिंदी का प्रचार-प्रसार कैसे होगा?जो अच्छा हिंदी जानतें हैं जो हिंदी का प्रचार-प्रसार कर ही रहे हैं सिर्फ उन्हें ही पुरस्कृत करके आप हिंदी का कौन सा विकास कर लेंगे?आपके पास जागरण जंक्शन मंच के रूप में राष्ट्रिय ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मंच है,आप चाहते तो सारी दुनिया को आमंत्रित कर सकते थे.हिंदी में लिखने के लिए आप सबको प्रोत्साहित और पुरस्कृत करें हिंदी का भला करने की ये सही नीति है.मैंने उस समय ये सब नहीं कहा क्योंकि वो ये सोचते कि अंतिम १३ में नहीं शामिल करने के कारण ऐसी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं.पुरस्कार मुझे प्रभावित नहीं करते हैं, हाँ आप सब के लिए मै पुरस्कारों की गुणवत्ता चाहता था.मै आज भी वही कडवी बात कहूँगा कि हिंदी के अख़बार आज बहुत अमीर हैं,परन्तु वो हिंदी में लिखने वालों को कुछ देना नहीं चाहते.समाज में जैसी दुर्दशा हिंदी झेल रही है ठीक वैसी ही दुर्दशा हिंदी के लेखक व् बुद्धिजीवी भी झेल रहे हैं.हिंदी को रोजगार परक भाषा ये लोग बनाना ही नहीं चाहते.इस मामले में अंग्रेजी के अख़बार बेहतर हैं.वो अपने लेखकों व् बुद्धिजीविओं और प्रतियोगिता के विजेताओं को न सिर्फ सम्मानित धनराशी देते हैं बल्कि हर तरह से वो अंग्रेजी का प्रचार-प्रसार भी कर रहें हैं.यही वजह है कि आज समाज में अंग्रेजी का बोलबाला है.हम कितना भी हिंदी का ढोल पीतें परन्तु आज के समाज की इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकते कि अच्छी अंग्रेजी जानना आज के समय में रोजगार की गारंटी है.हिंदी के बड़े अख़बार धीरे-धीरे खुद को हिंग्लिश और अंग्रेजी में ढालते जा रहे हैं.उनकी व्याकरण कौन चेक करेगा?कोई माने या न माने मगर ये एक सच्चाई है कि हिंदी के बड़े अख़बार अपने व्यवसायिक हित के लिए हिंदी और हिंदी भाषियों का सिर्फ दोहन ही कर रहें हैं.आज हिंदी के बड़े अख़बार बहुत अमीर हैं,हिंदी के विकास के वो चाहें तो बहुत कुछ कर सकतें हैं.

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के द्वारा: sinsera sinsera

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के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: sinsera sinsera

“मुझे यह कहते हुए बड़े इत्मिनान से ख़ुशी हो रही है”- मेरे देखे अनुभव हमेशा विपरीत का होता है, ज़रूर आप के भीतर कोई उदास भी हो गया होगा, और चूँकि उदासी ख़ुशी से गहरी होगी इसीलिए ख़ुशी का अनुभव हो पाया..., “अपने वो पा लिया है”- समझने में कहीं भूल हो गयी, आप ने फिर से खुश होने में जल्दबाजी दिखा दी, स्वभाव का अर्थ होता है जिसे चाह कर भी खोया न जा सके, और जिसे खोया ही नहीं जा सकता उसे पाने का सवाल ही नहीं उठता...मैंने कुछ भी नहीं पाया है, न ही कुछ खोया था...जिसे खोया या पाया जा सके वो स्वभाव नहीं... “लोग पूरी उम्र बिता कर भी नहीं अर्जित कर पाते”- आप जाने अनजाने में मेरी तुलना लोगों से कर रहीं हैं, मुझे महान बता कर उन्हें हीन दिखा रही हैं....मैं ने पिछले कमेंट भी कहा था ‘हम’ अस्तित्व के ‘अनुपम’ अभिव्यक्ति हैं, मैं न तो किसी से महान हूँ और न ही कोई मुझ से हीन है, हम सब अनूठे हैं...तुलना का सवाल नहीं है, किसी और से तुलना कर के खुश होना पाप है ये स्वस्थ चित्त का लक्षण नहीं है...इसका ये अर्थ हुआ कि हम लोगों को दुखी देख कर खुश होते हैं....अक्सर हम लोगों को सिखाते हैं कि जब उदास होओ तो दुसरे लोगों को देख लिया करो...दूसरों का दुःख देख कर तुम्हारा दुःख कम हो जायेगा, पर हम कभी विचार नहीं करते कि ये रुग्णता है...इसका अर्थ हुआ कि हम चाहते हैं कि लोग दुखी रहे ताकि हम उनका दुःख देख कर खुश हो सके और अपने दुखों को कम महसूस कर सकें.... “चेतन शून्यता की ये अवस्था कुण्डलिनी को जागृत कर के ब्रह्म की ओर ले जाती है’’- इस के सन्दर्भ में मैं कुछ भी नहीं कहूँगा..ये बात मेरे अनुभव की नहीं ही किताबों में पढ़ी है मैं न लेकिन लिखी सुनी बातों से मैं अपनी समझ निर्मित नहीं करता..... “आप इस संसार से परे हैं-आप को नमस्कार”- आपकी ये दोनों बातें परस्पर विरोधी है....अगर आप सच में ही ये मानती हैं कि मैं संसार से परे हूँ तो फिर नमस्कार करने की कोई ज़रुरत नहीं, नमस्कार संसार का ढंग है, संसारियों को खुश करने का तरीका....लेकिन आपने शायद मेरा मजाक उड़ाया है... | मैं न तो इस संसार से परे हूँ न ही संसार का हूँ....सच ये है कि ‘हम संसार हैं’ ये सब हम से हैं और हम सब से...मैं जितना शरीर में हूँ उतना ही शरीर से बहार भी हूँ...हम सब एक दुसरे से जुड़े हैं....हम यहाँ जमीन पर एक पत्ता भी तोड़ते है तो वहां दूर आकाश में चाँद तारे काँप जाते हैं.... अलग और परे होने की बात सोचना अज्ञानता है ...सागर का लहर सागर से अलग नहीं होता...

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

1893 में , भारत अंग्रेजी दासता की बेड़ियों में जकड़ा था. फिर भी युगपुरुष स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो सम्मलेन में अपार जनसमूह को हिंदी में “भाइयों और बहनों ” कहने का साहस कर दिखाया. ये अपनी भाषा के प्रति मान ही था जिसने उन्हें ये निर्भयता प्रदान की.लेकिन आज जब हम हर प्रकार से समृद्ध हो चुके हैं तो भी अपने ऊपर गर्व करने का साहस क्यूँ नहीं कर पाते.! गर्व तो है हमें ! हमें हर उस चीज पर गर्व है जो हमारी अपनी नहीं है या जो कभी हमारी अपनी नहीं रही ! कल को अगर हिंदी अमेरिका से आयातित होकर आने लगे तो हमें गर्व होने लगेगा ! बहुत सटीक और स्पष्ट शब्दों ( जैसी आपकी लेखन शैली है ) में बेहतरीन लेख आदरणीय सरिता सिन्हा जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

"आपको हिंदी भाषा से प्रेम क्यों है, ये बताइए…" क़िबला, प्रेम जब भी होता है अकारण होता है, इसके पीछे कोई हेतु नहीं होता, कारण ढूंढ कर प्रेम करना व्यपार है, प्रेम प्रथम है...सारे कारण आरोपित होते है...आपका सवाल असंगत है...हिंदी व्यकरण के हिसाब से सही भी हो लेकिन ये अस्तित्वगत नहीं है, अस्तित्व में प्रेम का कोई कारण नहीं है.... मुझे बस प्रेम है, हृदय अगर प्रेमपूर्ण हो तो प्रेम स्वभाव हो जाता है , फिर ऑब्जेक्ट का सवाल नहीं रह जाता है, कोई भेद-भाव नहीं रह जाता है....जैसे खुशबू फूल का स्वभाव है, फूल के पास हिंदुस्तानी जाये या पाकिस्तानी वो दोनों को सामान रूप से खुशबू देगा...ऑब्जेक्ट के हिसाब से उसके खुशबू का अनुपात कम या ज्यादा नहीं हो जायेगा...अगर हम फूल से उसके खुशबू बिखेरने का कारण पूछे तो बेचारा मुसीबत में पड़ जायेगा.... यही आग के साथ भी सच है , जलना आग का स्वभाव है वो किसी को भी जलाएगा.....इसी तरह मुझे हिंदी की वजह से हिंदी से प्रेम नहीं है वजह नीजी है...यहाँ प्रेम सब्जेक्टिव है ऑब्जेक्टिव नहीं....ऑब्जेक्ट तो एक बहाना है...| देने को मैं अनेको कारण दे सकता हूँ पर सब आरोपित होगा...|| "हम मनुष्य हैं , एक ही जगह पैदा हो सकते हैं".... हम अस्तित्व की अनुपम अभिव्यक्ति है, जैसे पेड़ से पत्ता निकलता है, सागर पर लहरे उठती है वैसे ही हम इस अस्तित्व से निकलते है, हम इससे अलग नहीं है, ये सारा अस्तित्व हमारा है और हम इसके हैं, पैदा होने और मरने का सवाल ही नहीं है, we are part of it or we are it. "सौन्दर्य तो बाद में दिखेगा"- बिलकुल गलत बात... तथा कथित ज्ञान हमारे सौन्दर्य बोध को नष्ट कर देता है एक अबोध बच्चा हम से कहीं ज्यादा संवेदनशील होता है, हमारे आँखों पर पड़ी जानकारी की पड़त हमें शनै शनै अँधा बना देती है...हम देख कर भी नहीं देखते हैं....| "स्वयंघोषित सूफी महोदय"- क्या आप सोचती हैं कि इस बात की घोषणा कोई और भी कर सकता है...??? सूफी होना आन्तरिक बात है, किसी और के लिए इसको जानने का कोई उपाय नहीं है....अगर मुझे सर दर्द है तो ये मैं ही जान सकता हूँ, इसके लिए मुझे किसी से प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं है .... "अगर अपने ध्यान से पढ़ा होता तो इसे problem न कहते"- मैं ने ध्यान से पढ़ कर ही प्रॉब्लम कहा था, मुझे पढने का एक ही ढंग आता है, इसीलिए ध्यान से पढने या न पढने का सवाल ही नहीं है...मैं ने ये नहीं कहा कि ये आपकी प्रॉब्लम है...मेरा विरोध विचारों से है किसी व्यक्तिविशेष से नहीं...विचार सही या गलत होते है व्यक्ति नहीं...आपके लेख का पहला वाक्य मुझे गलत लगा और मैं ने उसका विरोध किया...| "आपको हिंदी से प्रेम है , जानकर ख़ुशी हुई."--- आप गलतफहमी में खुश हो गईं है...आप कृपया खुश न होयें...मुझे हिंदी से प्रेम है न कि आपकी हिंदी या किसी हिन्दुस्तानी की हिंदी से..मुझे इस बात का दुःख है कि आपने खुश होने में जल्दबाजी दिखा दी..... :) :)

के द्वारा:

स्वयंघोषित सूफी महोदय, आपका स्वागत है.. आपको हिंदी से प्रेम है , जानकर ख़ुशी हुई..सिर्फ और सिर्फ कारण जानना चाहूंगी... मैं ने अपना कारण बताया है,अगर अपने ध्यान से पढ़ा होता तो इसे problem न कहते. हम मनुष्य हैं , एक ही जगह पैदा हो सकते हैं. कोई फिल्म नहीं हैं की एक साथ कई थिएटर्स में रिलीज़ हो जायें. जहाँ पैदा हुए हैं पहले वहीँ की भाषा जानने के बाद ही दूसरी भाषा सीखने की नौबत आती है. और अगर सीखने का मौका न मिले तो कौन सी भाषा याद रह जाएगी.....???ये आप बताइए... जब आप " बिल्ली " को ही नहीं जानेंगे तो C A T माने क्या होता है ये कैसे जान पायेंगे .सौन्दर्य तो बाद में दिखेगा. अब ये मत कहियेगा कि भारत में बच्चा पैदा होते ही इंग्लिश उर्दू और बंगला भाषा की सुन्दरता जान लेता है... बहरहाल...आपको हिंदी भाषा से प्रेम क्यों है, ये बताइए...

के द्वारा: sinsera sinsera

“हिंदी 'हमारी' मातृभाषा है और हमें इस पर गर्व है.”- this is the problem, 'हमारा-देश', 'हमारी-भाषा', 'हमारा-धर्म', हमारा and हमारा.....| ये पागलपन है....!!!! हमे उन्ही चीज़ों में अच्छाई दिखती है जो 'हमारा' होता है, और अगर कभी गलती कोई दूसरी चीज़ हमें अच्छी लग जाती है तो हम उसको 'हमारा' बनाने की जुगत में लग जाते हैं...| ये बेहूदगी है... हम जीवन का सारा सौदर्य ही नष्ट कर देते हैं,...!!! हिंदी उतनी ही सुन्दर जितनी की उर्दू या बंगला...और भी कई भाषाएँ है....एक से बढ़ कर एक खुबसूरत जुबान है दुनियां में....सब की अपनी विशेषता है, अपनी उपयोगिता है..... ये 'हमारा/हमारी' छिछलापन है, ये हमारी ओछी मानसिकता का प्रतीक है ||| मुझे हिंदी से तो प्रेम है लेकिन मैं इसकी पैरोकारी करने वालों की विरोध करता हूँ..!! तरफदारी या पैरोकारी करना राजनीती है और राजनीती वही लोग करते हैं जो अन्दर से हीन-भावना से ग्रसित होते हैं...एक स्वस्थ व्यक्ति कभी भी 'हमारा/हमारी' के चक्कर में नहीं पड़ता...चीज़ें सुन्दर हैं क्योंकि वो सुन्दर हैं इसलिए नहीं कि वो 'हमारा/हमारी' हैं....!!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आदरणीय मैम नमस्कार ज्ञान से भरपूर लेख लिखा है आपने ! इतनी जानकारी हम तक पहुचाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! हिंदी लेखन जहाँ कलम द्वारा बेहद आसान होता है वहीँ टाइपिंग के लिए काफी कठिन और समय लेने वाला होता है.ऐसे में हिंदी लेखन का स्मार्ट तरीका “हिंगलिश ” कम समय में ज्यादा शब्द टाइप कर, अपनी बातों को त्वरित रूप से प्रसारित करने में सक्षम होने के कारण लोकप्रिय होता जा रहा है. होना भी चाहिए. विकास के लिए परिवर्तन आवश्यक है .जब तक हम परिवर्तन को जीवन में स्थान नहीं देंगे , तब तक विकास नहीं हो सकता . आने वाला समय पिछले युग से अधिक विकसित हो तभी सृष्टि का लक्ष्य पूरा होगा.....आपकी बातो से पूर्णतय सहमत हूँ ...........

के द्वारा: sonam saini sonam saini

संदेह नहीं कि हिंदी एक सुन्दर भाषा है | काव्य की दृष्टि से सटीक व सार्थक है, लेकिन हिंदी की अपनी कुछ सीमाए हैं | वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ये भाषा अपरिपक्व है | I think, it's high time we accepted 'English' whole-heatedly. हिंदी हमें एक दायरे में क़ैद कर देती है, उर्दू के साथ भी यही हाल है | मैं कहीं गुलज़ार को पढ़ रहा था वो कहते हैं, 'मैं लिखता उर्दू मैं हूँ, छपता हिंदी में हूँ, लेकिन मेरी ज़ुबान 'हिंदुस्तानी' है | 'हिंदुस्तानी' हिंदी और उर्दू दोनों से खूबसूरत ज़ुबान है..यह हमारे दायरे को बढ़ा तो देता है....लेकिन हमे मुक्त नहीं करता है पर English sets us free from the all boundaries. No doubt I love Hindi, Urdu, Hinglish, and Hindustani, but I will advocate for English. मैं हिंदी प्रेम का पक्षधर हूँ लेकिन हिंदी के प्रति जो हमारा मोह है उसका मैं विरोध करता हूँ, मोह हमें संकीर्ण और दकियानूसी बनता है | To love a language as language is beautiful, but to lave a language as 'My-Language' is ugly. बहुत सी भाषाएँ हैं दुनियाँ में जो हिंदी से कहीं अधिक सुन्दर हैं, हमारे घर में ही 'बंगला' है, शुद्ध रूप से काव्य की भाषा है लेकिन हम कभी उसका गुणगान नहीं गाते, हम कभी नहीं कहते कि 'बंगला' को व्यापक स्वीकार्यता मिले | अभी में चार दिन पहले 'हिंदी-दिवस' एक कार्यकर्म में गया था, मुझे ये देख कर ख़ुशी हुई कि वहां हिंदी के कवि के अलावा उर्दू के शायर भी थे, and I was more than happy जब एक महानुभाव ने 'हिंदी-दिवस' पर इंग्लिश में बोला....|

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

बहुत सुन्दर रचना, कड़वे सच का यथार्थ चित्रण. ...बधाई. मनुष्य सहित प्रत्येक जीव आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. शक्तिशाली, दुर्बल पर सदा से भारी रहा है, यह एक सत्य है; परन्तु साथ ही यह भी सत्य है कि मनुष्य के अतिरिक्त किसी अन्य जीव ने अपने से निर्बल जीव की स्वतंत्रता व खुशियों से ईर्ष्या नहीं की है और न ही उसकी राह में जलनवश या स्वार्थवश कांटे बोये हैं! वन्य जीवों में जो भी मारकाट होती है वह केवल निज-अस्तित्व की लड़ाई हेतु, परन्तु मनुष्य प्रजाति में, विशेषकर भारत जैसे विकासशील या अविकसित देशों में मारकाट का कारण है- संग्रह की वृत्ति, ईर्ष्या, जलन, और सबसे बढ़कर स्वार्थपूर्ति हेतु अनापशनाप 'शॉर्टकट' अपनाना! मनुष्य ही इकलौता ऐसा जानवर है जो अन्य प्रजातियों के अलावा खुद अपनी प्रजाति के शोषण का भी कोई मौका नहीं चूकता है! मेरा विचार से आपकी कहानी केवल मछलियों की दुखद दास्ताँ भर नहीं है बल्कि इससे इतर भी वह काफी कुछ और कह जाती है, यदि हम गहरे में उतरें तो!

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के द्वारा: sonam saini sonam saini

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

राजेश जी , आपकी बात बिकुल सही है .. अति सर्वत्र वर्जेयत ... महत्वाकांक्षा की भी जब अति हो जाती है तो परेशानी खड़ी होती है, मुझे लगता है, हर चीज़ का बैलेंस होना चाहिए....बच्चो को बड़ा करने में जो महत्त्व माता पिता की देखभाल का होता है, वो अच्छी से अच्छी संस्था नहीं दे सकती , ऐसा मेरा मानना है... एक और कड़वा सच है....अगर कोई माता पिता अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट कर छोटे से असहाय बच्चे को बोर्डिंग में डाल देते हैं, तो आगे चल कर वही बच्चा बुज़ुर्ग माँ बाप को वृद्धाश्रम में डाल दे तो हाय तोबा कैसी.... (मेरा मतलब प्रतिशोध से नहीं है, बल्कि ये कहना चाहती हूँ कि बच्चे को जो संस्कार मिलते हैं, वो वैसा ही प्रतिदान देता है....)

के द्वारा: sinsera sinsera

नमस्कार जी ............. माँ की हर बात निराली है ....... आपने जो उम्मीद लगाई है , i थिंक की सभी मॉम्स यही उम्मीद रखती हैं अपने बच्चो से खासकर अपने बेटो से , लेकिन जब बच्चे बड़े हो जाते हैं खासकर लड़के तो माँ को अपनी उम्मीदों के दायरे दो कम करना ही पड़ता है , मेरे भाई ने भी अभी 12th कम्पलीट किया है , और कुछ दिनों के लिए वो दिल्ली गया किसी काम से , मेरी माँ उसके बिना एक दिन नही रह पाती लेकिन वो रही १०-१५ दिन तक, वो कभी अकेला नही रहा इस बार गया तो हमे डर था कि पता नही उसका मन लगेगा या नही अकेले लेकिन ... :) जब उसने कई दिनों तक कॉल नही किया तो माँ ने उसको फ़ोन करके पूछा कि तेरा मन लग गया क्या , तो वो बोला कि मैं अब बड़ा हो गया हूँ मम्मी, मेरा मन सब जगह लग जाता है .....माँ का मन चाहे लगे या न लगे बच्चो का बड़े होकर लग जाता है ,माँ के बिना ..........और एक बात और कहना चाहूंगी कि जिसे जो आसानी से मिल जाता है उसे उसकी कद्र इतनी नही होती...... :) ...नमस्ते जी ...... आपकी सारी उम्मीदे पूरी हो ..... ऐसी शुभकामनाये हमारी आपके लिए .......

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विज्ञापन में "टेढ़ा है पर मेरा है" - यह पंक्ति क्या सन्देश देती है, वह यह कि "ऊपरी आकार या रंग-रूप पर न जाओ दोस्तों! चखकर, खाकर भीतर से महसूस करो कि कैसा लगता है, स्वादिष्ट और पौष्टिक लगा न! जब ऐसा है तो यह टेढ़ा होते हुए भी मुझे प्रिय है." हमारा भी बाहरी ढांचा, रूप-रंग-आकार, केशविन्यास, वस्त्र इत्यादि भले ही कुरूप हों, ..सब चलेगा, ..परन्तु तब ही, जब हम भीतर से अच्छे हों अर्थात् मन में सुविचार हों, हम कर्मठ हों, ईमानदार हों, सत्यनिष्ठ हों, बोलने में कम और करने में अधिक विश्वास करते हों. ऐसे ऊपरी रूप से टेढ़े, पर भीतर से सुन्दर देशवासियों पर किसे न गर्व होगा. ...परन्तु अभी ऐसा है क्या?? वर्तमानकाल में हम ऊपर से तो सीधे, परन्तु भीतर से अत्यंत टेढ़े हैं. तो प्रथमतः क्या लेखों और चर्चा के रूप में ऐसा आईना देखना आवश्यक नहीं, जो हमें हमारा भीतरी स्वरूप दिखा सके? परन्तु साथ ही ब्लॉगर्स सहित समस्त पाठकों को ध्यान रहे कि बारम्बार दर्पण देखने भर से दाग नहीं जायेंगे, उन्हें ठोस व्यावहारिक प्रयत्न करके निरंतरता से साफ़ भी करना पड़ेगा.

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